Tuesday, May 05, 2026
गंगा एक्सप्रेसवे: आधुनिकता की रफ्तार, या उजाड़ होती विरासत और जीविका?
उत्तर प्रदेश का गंगा एक्सप्रेसवे विकास के उस मॉडल का उदाहरण है जिसे जबरन थोपा गया है। जब तक विकास की योजनाओं में स्थानीय पारिस्थितिकी, आम आदमी की सहमति और निविदाओं में पूर्ण पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक इन्हें सार्थक प्रगति नहीं कहा जा सकता। पर्यावरण को तबाह करके और अपने करीबियों की तिजोरियां भरकर बनाया गया यह एक्सप्रेसवे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक कर्ज और उजाड़ विरासत छोड़कर जाएगा। असली विकास कंक्रीट की सड़कों में नहीं, बल्कि सुरक्षित पर्यावरण और पारदर्शी शासन में बसता है।
अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए सरकार दावा कर रही है कि एक्सप्रेसवे के किनारे इंडस्ट्रियल क्लस्टर बनेंगे और रोजगार मिलेगा। हकीकत से लगभग सभी परिचित हैं कि अब तक कितने इंडस्ट्रियल क्लस्टर बने और क्षेत्रीय लोगों को कितना रोजगार मिला? दूसरी हकीकत यह है कि इन उद्योगों का स्वामित्व भी उन्हीं बड़े समूहों के पास होगा जिन्हें निर्माण का ठेका मिला है। स्थानीय ग्रामीण यहाँ केवल न्यूनतम मजदूरी पर श्रमिक बनकर रह जाएंगे, जबकि उनकी जमीन का लाभ बड़े कॉर्पोरेट ही उठाएंगे।
उत्तर प्रदेश के मानचित्र पर मेरठ से प्रयागराज तक खिंची 594 किलोमीटर लंबी लकीर को सरकार प्रगति का पथ बता रही है। गंगा एक्सप्रेसवे को राज्य के सबसे बड़े आर्थिक बुनियादी ढांचे के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन इसकी भव्यता के नीचे मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज जनपदों के आम नागरिकों की पीड़ा और प्रकृति की सिसकियां दबी हुई हैं। आज यह प्रश्न पूछना अनिवार्य हो गया है कि क्या यह एक्सप्रेसवे वाकई जनहित में है, या यह केवल क्रोनी कैपिटलिज्म और पर्यावरणीय अनदेखी का एक नया अध्याय है?
विकास और प्रगति के नाम पर इस एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए प्रकृति की जो बलि दी गई है, उसकी भरपाई नामुमकिन है। मेरठ से प्रयागराज के बीच के हरे-भरे बेल्ट को पूरी तरह साफ कर दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए लगभग 6 लाख से अधिक पुराने और फलदार पेड़ों को काट दिया गया है। इनमें से अधिकांश पेड़ दशकों पुराने थे, जो न केवल ऑक्सीजन देते थे बल्कि स्थानीय तापमान को भी नियंत्रित रखते थे। क्या पारिस्थितिकी का विनाश ही आज विकास की परिभाषा है? एक्सप्रेसवे के निर्माण से वन्यजीवों के गलियारे नष्ट हो गए हैं और भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge) की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हुई है। कंक्रीट की यह विशाल पट्टी 'हीट आइलैंड' प्रभाव पैदा कर रही है, जिससे आसपास के गांवों का तापमान बढ़ रहा है और जीवन दूभर होता जा रहा है।
गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना की सबसे विवादास्पद कड़ी इसकी निविदा प्रक्रिया और ठेकों का वितरण रहा है। आरोप है कि इस मेगा प्रोजेक्ट का उपयोग जनसेवा से अधिक पूंजीपति मित्रों को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया। परियोजना के बड़े हिस्से के ठेके उन गिने-चुने कॉर्पोरेट घरानों को दिए गए, जो सत्ता के करीबी माने जाते हैं। प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव और शर्तों को बड़े खिलाड़ियों के पक्ष में करने के कारण स्थानीय और मध्यम स्तर के ठेकेदारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यह केवल एक सड़क का निर्माण नहीं है, बल्कि सार्वजनिक धन का बड़े कॉर्पोरेट समूहों के साथ साठगांठ कर हस्तांतरण करने की प्रक्रिया मात्र है। जब चुनिंदा समूहों को हज़ारों करोड़ के ठेके दिए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर एकाधिकार (Monopoly) को बढ़ावा देता है। यह न केवल भ्रष्टाचार की संभावनाओं को जन्म देता है, बल्कि उसका पोषण और संरक्षण भी करता है।
जब उत्तर प्रदेश में पहले से मौजूद एक्सप्रेसवे (जैसे आगरा-लखनऊ और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे) अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, तो एक और एक्सप्रेसवे के लिए हज़ारों करोड़ खर्च करना और लाखों पेड़ काटना कहाँ तक तर्कसंगत है? पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर की अनदेखी की जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप राज्य के अधिकांश राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग (NH/SH) बदहाली का शिकार हैं। यदि सरकार की मंशा वास्तविक विकास की होती, तो नए विनाशकारी निर्माण के बजाय मौजूदा सड़क नेटवर्क को सुदृढ़ किया जा सकता था। भारी टोल टैक्स और वैकल्पिक मार्गों की मौजूदगी के कारण यह डर बना हुआ है कि यह एक्सप्रेसवे भी केवल 'सफेद हाथी' बनकर रह जाएगा, जबकि इसकी लागत का बोझ अंततः आम जनता पर ही पड़ेगा।
गंगा एक्सप्रेसवे के लिए उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण ने छोटे किसानों को भूमिहीन बना दिया है। मुआवजे की राशि से जीवनयापन और सुरक्षित भविष्य संभव नहीं है। यह राशि अक्सर शिक्षा या सही निवेश के अभाव में समाप्त हो जाती है और किसान व उसका परिवार दिहाड़ी मजदूर बनने को विवश हो जाता है। जबकि खेती से मिलने वाला अनाज परिवार के साथ-साथ समाज का भरण-पोषण करता है। भूमि से मिलने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी आजीविका हमेशा के लिए छिन गई है। एक्सप्रेसवे ने गांवों को दो हिस्सों में बांट दिया है। स्थानीय लोगों के लिए सड़क पार करना अब एक बड़ी चुनौती है, जिससे उनके सामाजिक रिश्ते और रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं।
सरकारी चश्मे से गंगा एक्सप्रेसवे का निर्माण आधुनिक उत्तर प्रदेश की एक महत्वाकांक्षी तस्वीर पेश करता है, लेकिन इसके पीछे छिपे पर्यावरण विनाश, किसानों की बेबसी और पूंजीवादी हितों के गठजोड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि विकास का लाभ केवल उन बड़ी कंपनियों तक सीमित रह जाता है जिन्हें इसके ठेके मिले हैं और आम नागरिक केवल अपनी जमीन और हरियाली खोकर धूल फांकने पर मजबूर है, तो ऐसे विकास की सार्थकता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
असली प्रगति वह है जहाँ एक्सप्रेसवे की रफ़्तार के साथ-साथ स्थानीय पर्यावरण सुरक्षित रहे और निविदाओं में पारदर्शिता के जरिए जनता के धन का सही उपयोग हो, न कि इसे पसंदीदा समूहों की तिजोरियां भरने का माध्यम बनाया जाए। समृद्ध विरासत वह है जहां आधुनिकता और प्रकृति सह-अस्तित्व में हों और जहां की योजनाएं ऊपर से नीचे (Top-down) थोपने के बजाय नीचे से ऊपर (Bottom-up) यानी आम आदमी की सहभागिता से बनी हों। हम आने वाली पीढ़ी को रफ़्तार तो दे रहे हैं, लेकिन उनसे सांसें और जमीन छीन रहे हैं। विकास का पैमाना केवल जीडीपी नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और पारिस्थितिक स्थिरता होना चाहिए।
अतुल कुमार श्रीवास्तव
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