रविवार, जून 14, 2026
अचकन, खान-पान और 'पंडित' का उपनाम – सियासत की यह छिछली और बीमार सोच!
साथियों,
भारतीय जनता पार्टी से राज्य सभा सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा "मुझे पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को पंडित जी कहने पर आपत्ति है। वह तो बीफ (गाय का मांस) खाते थे। इसके बहुत सारे सबूत पड़े है। उनको संस्कृत आती नहीं थी और उर्दू में शेरो- शायरी करते थे। धोती कभी पहनी नहीं और अचकन पहनते थे। फिर किस बात के पंडित जी?
भारतीय राजनीति के वर्तमान दौर में राजनीति का स्तर दिन-प्रतिदिन किस कदर रसातल में जा रहा है, इसका ताजा प्रमाण भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी का वह बयान है, जिसमें उन्होंने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के 'पंडित' कहे जाने पर घोर आपत्ति जताई है। सुधांशु त्रिवेदी का यह तर्क कि "नेहरू धोती नहीं अचकन पहनते थे, संस्कृत नहीं उर्दू बोलते थे और बीफ खाते थे, इसलिए वे पंडित नहीं थे" न केवल ऐतिहासिक अज्ञानता का शर्मनाक प्रदर्शन है, बल्कि देश के गंभीर मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की एक सुनियोजित और कुत्सित राजनीतिक चाल भी है।
आज जब देश को आर्थिक नीतियों, बेरोजगारी, सुरक्षा और भविष्य की तकनीकों पर गंभीर विमर्श की जरूरत है, तब सत्ता पक्ष के कर्णधार इस बात पर अखाड़ा तैयार कर रहे हैं कि दशकों पहले मर चुके एक नेता की थाली में क्या था और उसकी अलमारी में कौन से कपड़े टंगे थे! यह भारतीय लोकतंत्र के बौद्धिक दिवालियेपन की पराकाष्ठा है।
सुधांशु त्रिवेदी को शायद यह याद दिलाने की जरूरत है कि नेहरू के नाम के आगे लगा 'पंडित' शब्द उनके किसी मंदिर के पुजारी होने का सार्टिफिकेट नहीं था। यह उनके कश्मीरी सारस्वत ब्राह्मण वंश की पहचान थी। जिस कश्मीरी पंडित समुदाय के दर्द को भुनाकर मौजूदा सरकार अपनी राजनीति चमकाती रही है, उसी समुदाय की ऐतिहासिक और पारिवारिक पहचान को महज इसलिए खारिज कर दिया गया क्योंकि वह विरोधी दल के नेता का पूर्वज था? यह कश्मीरी पंडितों की विरासत का भी उतना ही बड़ा अपमान है। क्या अब संघ या भाजपा की कोई संस्कृति प्रयोगशाला यह तय करेगी कि किस ब्राह्मण को पंडित कहलाने का हक है और किसे नहीं?
सुधांशु जी नेहरू ने "धोती नहीं पहनी, अचकन पहनी; संस्कृत नहीं बोली, उर्दू में शायरी की" यह तर्क देकर आप ने अपनी उस संकीर्ण मानसिकता को उजागर किया है जो भारत की विविधता और 'गंगा-जमुनी तहजीब' को पचा नहीं पाती। उत्तर भारत के कुलीन समाज और स्वतंत्रता संग्राम के नायकों का परिधान अचकन और चूड़ीदार रहा है। क्या देश का परिधान और भाषा भी अब चुनावी ध्रुवीकरण के तराजू पर तौली जाएगी? अगर उर्दू बोलना या अचकन पहनना अपराध है, तो फिर वर्तमान भारत सरकार को साझी संस्कृति का ढोंग बंद कर देना चाहिए। नेहरू ने 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' लिखकर भारत के उपनिषदों और संस्कृति की जो व्याख्या दुनिया के सामने रखी, उसे समझने के लिए जिस ऊंचे बौद्धिक स्तर की आवश्यकता है, वह आज के सोशल मीडिया विंग वाले प्रवक्ताओं के पास होना मुमकिन ही नहीं है।
आपके वंशजों व दल द्वारा नेहरू के खान-पान व जीवनशैली को लेकर उड़ाए जाने वाले कथित 'सबूत' और अफवाहें कोई नई नहीं हैं। यह व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के उस प्रोपेगैंडा का हिस्सा हैं, जिसका मकसद पंडित जवाहरलाल नेहरू की आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक छवि को धूमिल करना है। लेकिन इतिहास गवाह है कि नेहरू की पहचान इस बात से नहीं है कि वे क्या खाते थे, बल्कि इस बात से है कि उन्होंने भूखे और फटेहाल भारत को IIT, ISRO, IIM और AIIMS जैसे संस्थान देकर पैरों पर खड़ा किया। जब देश सुई तक नहीं बना पाता था, तब नेहरू ने आधुनिक भारत के मंदिरों (उद्योगों और बांधों) की नींव रखी।
नेहरू के कद को उनकी अचकन की लंबाई या उनकी थाली के भोजन से छोटा नहीं किया जा सकता। आज की सत्ता चाहे जितनी कोशिश कर ले, वह इतिहास की किताबों से नेहरू के आधुनिक भारत के निर्माण वाले पन्नों को नहीं फाड़ सकती।
जनता को अब यह सोचना होगा कि क्या वे राजनीतिक दलों को इस बात की खुली छूट देते रहेंगे कि वे इतिहास की कब्रें खोदते रहें और वर्तमान के असल मुद्दों को दफनाते रहें? सुधांशु त्रिवेदी आपका यह बयान केवल पंडित जवाहरलाल नेहरू पर हमला नहीं है, बल्कि देश के विवेक पर हमला है। इस तरह की तीखी, सतही और नफरती बयानबाजी को सिरे से खारिज किया जाना चाहिए, क्योंकि जो देश अपने अतीत के कपड़ों और खान-पान में उलझा रहेगा, वह भविष्य की रेस में कभी नहीं जीत पाएगा।
जय हिन्द
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