रविवार, जून 21, 2026

सियासत का जुमला: जब न्याय प्रक्रिया ही हो अविश्वास के घेरे में और दिलवाई जाए वर्दी की कुर्बानी

भाजपा शासित केन्द्र व राज्य की सरकारों ने इनमें खासकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार, मध्य प्रदेश की मोहन और बिहार की सम्राट व दिल्ली की रेखा ने अपनी लाल फीता शाही को सुशासन का नाम देकर पुलिस को मैदान में उतार तो रखा है, लेकिन कानून की किताब में कोई खुली छूट नाम का प्रावधान नहीं होता। इन लोगों ने चीफ शब्द को चीप के स्तर तक गिरा दिया है, ये लोग इसकी गरिमा को बरकरार रख पाने के काबिल नहीं है। आज के दौर में लालफीताशाही का सुशासन और कानून की सीमाएं, संविधान और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश आज भी हर एनकाउंटर पर जांच अनिवार्य करते हैं। नतीजा- मंच पर तालियां सरकार बटोरेगी, लेकिन ट्रायल कोर्ट में अकेला खड़ा होगा वर्दीधारी। समकालीन राजनीति का यह सबसे क्रूर विरोधाभास है कि 'खुली छूट' जैसे जुमले राजनीतिक मंचों से तालियां बटोरने के लिए उछाले जाते हैं, लेकिन जब कानूनी जवाबदेही की बात आती है, तो सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग सुरक्षित पीछे हट जाते हैं। न्यायालय और संविधान के स्पष्ट नियम (जैसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट के 16 दिशा-निर्देश) यह तय करते हैं कि हर पुलिस मुठभेड़ की स्वतंत्र मजिस्ट्रेट जांच अनिवार्य होगी। सवाल कानून और न्याय व्यवस्था पर जनता के भरोसे का है। पिछले आठ-दस वर्षों में यदि कोई चूक या साजिश हुई तो सच सामने आएगा और जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई भी होगी, लेकिन विडंबना यह है कि कार्यवाही के नाम पर सिर्फ छोटे कर्मचारी ही नापे जाएंगे। सत्ता के गलियारों में बैठे नीति-निर्माता कभी कोर्ट के कठघरे में नहीं दिखते। याद रखिए गोली चलाने का अधिकार, कानून देता है; लेकिन कानून तोड़ने का अधिकार किसी वर्दी को नहीं है। इन वर्दीधारकों को यह भली-भांति याद रखना होगा कि सत्ता की शाबाशी कुछ दिन की होती है, जबकि अदालत का फैसला पीढ़ियों तक मिसाल बन जाता है। लेकिन वर्तमान भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को अपने ही कानून व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। न्यायालयों के न्याय प्रक्रिया से खुद सरकार इतनी असंतुष्ट है की वह पुलिस को अपराधी बना देने पर तुली हुई है। आज अदालतों में मुकदमों के लंबित होने या न्याय की धीमी गति को सुधारने के बजाय, पुलिस को ही 'न्यायाधीश' की भूमिका में पेश किया जा रहा है। सरकार को चाहिए की वह न्याय प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने का प्रयास करें। पुलिस के हाथों में न्याय का अधिकार देना राज्य, समाज और देश सबके लिए घातक है, क्योंकि यह अंततः एक अनियंत्रित और अराजक पुलिसिया राज्य की नींव रखता है। आज हिन्दुस्तान जुमलों की कीमत और लोकतंत्र की अग्नि परीक्षा देकर चुका रहा है। वर्तमान दौर में देश की जनता और वर्दीधारियों को यह समझना होगा - खुली छूट का मतलब कानून से ऊपर होना नहीं है। यह एक खतरनाक राजनीतिक जुमला है, जिसकी कीमत वर्दी पहनने वाले गरीब घर के जवान चुकाएंगे, सत्ता के गलियारों में बैठे लोग नहीं। जब एक जवान बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी के जीवन का फैसला सड़क पर करता है, तो वह अनजाने में खुद को आने वाले वर्षों के लिए कानूनी मुकदमों के अंतहीन भंवर में धकेल देता है। लोकतंत्र और कानून का राज तभी जिंदा रहेगा जब न्याय केवल अदालतों के जरिए ही मिले। यह समय समाज और सुरक्षा बलों दोनों के लिए जागने का है, ताकि राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की वेदी पर न्याय का मुकुट पहनने वाली खाकी को बलि का बकरा न बनाया जा सके।