मंगलवार, मई 19, 2026
आईना जब ढाल बन जाए..!
भारतीय मीडिया का बदलता चरित्र और नागरिक जिम्मेदारी
लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जो केवल हर पांच साल में वोट डाल देने से सुरक्षित रहे; यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को जीवित रखने के लिए 'जागरूक नागरिक' ईंधन का काम करते हैं और 'स्वतंत्र मीडिया' उस इंजन को सही दिशा में बनाए रखने वाली धुरी है। यदि यह धुरी जाम हो जाए या सिर्फ एक ही दिशा में, वह भी सत्ता पक्ष की ओर घूमने लगे, तो लोकतंत्र का पतन तय है।
लोकतंत्र की इमारत चार खंभों पर टिकी होती है: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता। जब पहले तीनों स्तंभ निरंकुश होने लगते हैं, तो चौथा स्तंभ समाज के साथ-साथ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को आईना दिखाकर उन्हें उनकी जिम्मेदारी याद दिलाता है। लेकिन वर्तमान समय में भारत में यह धारणा मजबूत हुई है कि चौथा स्तंभ अब आईना दिखाने के बजाय सत्ता की ढाल बन गया है। वैश्विक सूचकांकों से लेकर रोज टीवी स्क्रीनों पर होने वाली बहसों तक में भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता अपने सबसे निचले स्तर पर खड़ी नजर आती है।
'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' (RSF) की मानें तो विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान लगातार नीचे खिसकना गंभीर चिंता का विषय है। भारत का स्थान इस बात का प्रमाण है कि यहां पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल कठिन होता जा रहा है। आम तौर पर भारतीय जनमानस में यह माना जाता है कि पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे देशों में लोकतांत्रिक जड़ें बहुत कमजोर हैं। लेकिन जब प्रेस स्वतंत्रता में ये देश भारत के समकक्ष या कभी-कभी बेहतर स्थिति में दिखते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र और यहां की विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के लिए एक बड़ा झटका होना चाहिए। इसके विपरीत, यहां की शासन-व्यवस्था इस कड़वे सच को स्वीकार करने से बचती है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में पत्रकारों पर कानूनी शिकंजे (जैसे UAPA या देशद्रोह के कानून), धमकियों और कॉरपोरेट दबाव में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण मुख्यधारा का मीडिया खुद में सुधार नहीं करना चाहता।
नॉर्वे और अन्य नॉर्डिक देश सालों से इस सूची में शीर्ष पर रहते हैं। वहां की सरकारें पारदर्शी हैं, और प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक को पत्रकारों के तीखे व असहज करने वाले सवालों के जवाब देने ही पड़ते हैं। इसके विपरीत, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शीर्ष नेतृत्व का मीडिया से दूरी बनाना एक नई प्रशासनिक संस्कृति को दर्शाता है। भारतीय राजनीति में 'विश्व गुरु' या वैश्विक महाशक्ति बनने की आकांक्षा एक बड़ा नैरेटिव (विमर्श) रही है। ऐसे में क्या एक जीवंत लोकतंत्र का नेता बिना किसी पूर्व-निर्धारित स्क्रिप्ट के, पत्रकारों के खुले और तीखे सवालों का सामना करने से बच सकता है?
पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। अब संवाद द्विपक्षीय न रहकर एकतरफा हो गया है। रेडियो कार्यक्रमों (जैसे: मन की बात), सोशल मीडिया पोस्ट्स और रैलियों के जरिए जनता तक अपनी बात सीधे पहुंचाई जाती है। इसमें जनता और सरकार के बीच का माध्यम, यानी पत्रकार गायब हो गया है। इंटरव्यू के बदलते स्वरूप में जो इक्का-दुक्का साक्षात्कार होते भी हैं, उन पर अक्सर चुनिंदा या सॉफ्ट होने के आरोप लगते हैं जो सही भी है। जब देश के मुखिया से बेरोजगारी, महंगाई, सीमा विवाद या सांप्रदायिक तनाव पर तीखे सवाल पूछने के बजाय उनकी जीवनशैली या आम खाने के तरीकों पर बात होने लगे, तो पत्रकारिता की साख का गिरना स्वाभाविक है।
पिछले एक दशक से भारतीय पत्रकारिता जगत पर यह आरोप लग रहा है कि मुख्यधारा का मीडिया (विशेषकर हिंदी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल) सत्ताधारी दल के आईटी सेल या प्रवक्ता की तरह काम कर रहा है, जो कई मायनों में सच प्रतीत होता है। यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक मीडिया कोई चैरिटी नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यवसाय है, जिसके संचालन में अरबों का खर्च आता है। न्यूज चैनलों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया सरकारी विज्ञापन और बड़े कॉरपोरेट घरानों से मिलने वाला फंड है। चूंकि सरकार विज्ञापन रोकने की ताकत रखती है, इसलिए चैनलों के मालिक ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते जिससे सत्ता नाराज हो। नतीजा यह होता है कि चैनल सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से सवाल पूछता है। साथ ही, टीवी मीडिया ने यह समझ लिया है कि जटिल आर्थिक या सामाजिक मुद्दों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) पर गंभीर चर्चा से टीआरपी (TRP) नहीं मिलती। टीआरपी मिलती है हिंदू-मुस्लिम डिबेट, पाकिस्तान-विरोधी विमर्श और राष्ट्रवाद के शोर से। यह विमर्श न केवल सत्ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल है, बल्कि चैनलों की जेबें भी भरता है। यही वजह है कि जनता ने इस मीडिया को 'गोदी मीडिया' का नाम दिया है।
इस संस्थागत पतन का एक बड़ा कारण भारत में मीडिया नियामक ढांचे (Regulatory Framework) का कमजोर होना भी है।'प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) जैसी वैधानिक संस्थाएं आज के दौर में दंतविहीन बाघ (Toothless Tiger) साबित हो रही हैं, जिनका अधिकार क्षेत्र केवल प्रिंट मीडिया तक सीमित है। टीवी और डिजिटल मीडिया के नियमन के लिए कोई सख्त सरकारी या स्वतंत्र ढांचा नहीं है; वहां स्व-नियमन (Self-regulation) के नाम पर औपचारिकता निभाई जा रही है। जब तक क्रॉस-मीडिया ओनरशिप (कॉरपोरेट एकाधिकार) को रोकने और नियामक संस्थाओं को वित्तीय जुर्माना या लाइसेंस रद्द करने जैसी दंडात्मक शक्तियां देने वाले कड़े कानूनी सुधार नहीं किए जाते, तब तक इस व्यवस्था में प्रशासनिक सुदृढ़ता लाना असंभव है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब मीडिया अपनी निष्पक्षता खो देता है, तो उसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार को घेरना होता है, लेकिन जब मीडिया खुद ही विपक्ष पर हमलावर हो जाए, तो सरकार पूरी तरह निरंकुश हो जाती है। उसे किसी नीति की विफलता का डर नहीं रहता, क्योंकि मीडिया उस विफलता को भी 'मास्टरस्ट्रोक' साबित करने में जुट जाता है। प्राइम-टाइम डिबेट्स में जिस तरह की भाषा और नफरत परोसी जाती है, उसने भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को गहरा नुकसान पहुंचाया है। पड़ोसी, पड़ोसी पर शक करने लगा है और यह सब सिर्फ कुछ रेटिंग्स और राजनीतिक फायदों के लिए किया जा किया जा रहा है।
भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भले ही आज सत्ता की चाटुकारिता में लीन हो, लेकिन पूरी तस्वीर इतनी धुंधली भी नहीं है। मुख्यधारा के टेलीविजन से निराश होकर आज भारत का जागरूक नागरिक डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों और खोजी पत्रकारिता पोर्टल्स (जैसे द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, स्क्रॉल, सूर्यांशश्री समाचार आदि) की तरफ मुड़ रहा है। कई स्वतंत्र पत्रकार आज भी अपनी जान और करियर को जोखिम में डालकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं।
भारत को 'विश्व गुरु' बनने के लिए सिर्फ आर्थिक या सैन्य ताकत की जरूरत नहीं है, बल्कि एक ऐसे स्वतंत्र और निडर मीडिया की जरूरत है जो सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सच बोल सके। जब तक भारतीय दर्शक खुद नफरत के तमाशे को देखना बंद नहीं करेंगे और गंभीर पत्रकारिता के लिए आर्थिक रूप से भुगतान (पे/सब्सक्राइब) नहीं करेंगे, तब तक भारत में मीडिया का यह 'आईटी सेल' वाला अवतार बदलना मुश्किल होगा।
थॉमस जेफरसन (अमेरिकी राष्ट्रपति और विचारक) ने कहा था: "सतर्कता ही स्वतंत्रता की शाश्वत कीमत है।" एक जागरूक नागरिक वह नहीं है जो केवल खबरें देखता है, बल्कि वह है जो यह समझता है कि कौन सी खबर दिखाई जा रही है और कौन सी छिपाई जा रही है। जब मीडिया सत्ता की चाटुकारिता पर उतर आए, तब नागरिकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे फैक्ट-चेक करें, वैकल्पिक स्रोतों से जानकारी जुटाएं और खुद को प्रोपेगैंडा (दुष्प्रचार) का शिकार होने से बचाएं। जागरूक नागरिक कभी भी धर्म, जाति या राष्ट्रवाद के नाम पर आंख मूंदकर ताली नहीं बजाएगा। वह सरकार से स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और अपने अधिकारों पर सवाल पूछता रहेगा।
रोमन कवि जुवेनल का एक प्रसिद्ध कथन है:
"Quis custodiet ipsos custodes?" अर्थात "पहरेदारों पर पहरा कौन रखेगा? लोकतंत्र में मीडिया जनता का पहरेदार है जो सत्ता पर नजर रखता है। लेकिन जब पहरेदार ही सत्ता का वेतनभोगी या मित्र बन जाए, तो पहरा देने की जिम्मेदारी खुद मालिक यानी जनता को उठानी पड़ती है।
यदि भारत या दुनिया का कोई भी लोकतंत्र आज खोखला होने की कगार पर है, तो उसका कारण सिर्फ चाटुकार मीडिया नहीं है, बल्कि वह दर्शक वर्ग भी है जो इस चाटुकारिता को चुपचाप स्वीकार कर रहा है। जब तक नागरिक 'दिखाए जा रहे सच' और 'वास्तविक सच' के अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक लोकतंत्र का लिबास तो लोकतांत्रिक रहेगा, लेकिन उसके अंदर की आत्मा तानाशाही की हो जाएगी। अतः लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी जितनी पत्रकारों की है, उतनी ही इसे देखने, सुनने और पढ़ने वाली जनता की भी है।
रविवार, मई 17, 2026
बढ़ता भीड़ तंत्र, घटती योग्यता के बीच विकास की अंधी दौड़
आधुनिक समाज का एक गंभीर संकट:
आज का वैश्विक परिदृश्य दो बड़ी शक्तियों के प्रभाव में है: बेतहाशा बढ़ती आबादी और अंधाधुंध पूंजीवादी व्यवस्था। इस जुगलबंदी ने हमें गगनचुंबी इमारतें, बुलेट ट्रेनें और चमचमाते मॉल जैसे तथाकथित विकास के प्रतीक तो दिए हैं, लेकिन इसके समानांतर हर क्षेत्र में एक ऐसी अंधी भीड़ भी पैदा कर दी है जिसने योग्यता और उसकी गंभीरता को मटियामेट कर दिया है। आज विकास की परिभाषा केवल संख्या और पैसा बनकर रह गई है, जिसके मलबे के नीचे वास्तविक प्रतिभा, ज्ञान और नैतिक मूल्य मरणासन्न होते जा रहे हैं।
आधुनिक समाज में पद, प्रतिष्ठा और रसूख की चाहत हर किसी को है। हर व्यक्ति शीर्ष पर बैठना चाहता है, लेकिन उस शीर्ष तक पहुँचने के लिए जिस कड़े परिश्रम, अनुशासन और वैचारिक परिपक्वता की आवश्यकता होती है, उससे आज की पीढ़ी कोसों दूर भाग रही है। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ शॉर्टकट को बुद्धिमानी और अनुभव को पुराने ख्यालात मान लिया गया है। कई बार युवा पीढ़ी वर्षों के कड़े अनुभव से तपे हुए जानकारों का मज़ाक उड़ाने से भी नहीं चूकती। वे भूल जाते हैं कि सूचना और ज्ञान में बहुत बड़ा अंतर होता है।
भविष्य के सुनहरे सपने देखने वाली आज की पीढ़ी विभिन्न चमक-दमक वाले शिक्षण संस्थानों और पाठ्यक्रमों में दाखिला तो ले लेती है; वे रट-रटाकर, असाइनमेंट कॉपी करके या परीक्षा प्रणालियों की कमियों का फायदा उठाकर डिग्रियां भी हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब बात इस ज्ञान को व्यावहारिक धरातल पर उतारने की आती है, तो उनके भीतर की योग्यता का खोखलापन साफ नजर आने लगता है।
आज हमारे पास डिग्री धारकों की एक फौजनुमा भीड़ खड़ी हो गई है। कहने को यह भीड़ अपने-अपने क्षेत्र में जोर-आजमाइश करने को तैयार है, लेकिन इसके परिणाम बेहद निराशाजनक आ रहे हैं।
ज्ञहर गली-मोहल्ले में पत्रकार और दर्जनों 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल्स व सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भीड़ हमें देखने को मिल रही है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट डिजिटल न्यूज रिपोर्ट और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वैश्विक सूचकांकों पर नजर डालें, तो सनसनीखेज खबरों (Sensationalism) और टीआरपी की अंधी दौड़ के कारण पत्रकारिता की साख लगातार गिरी है। लेखन शैली, जो कभी हर मुद्दे का गहराई से मूल्यांकन कर सटीकता के साथ निष्पक्ष बात कहने और लिखने की क्षमता रखती थी, आज चीखने-चिल्लाने और चाटुकारिता में बदल चुकी है। टीआरपी और पूंजीपतियों के इशारे पर नाचते एंकरों के पास न तो भाषाई मर्यादा बची है और न ही किसी विषय पर गंभीर शोध करने की योग्यता।
ऐसे ही शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए हर साल लाखों की संख्या में बीएड (B.Ed), नेट (NET) और पीएचडी (Ph.D) धारकों की फौज खड़ी दिखाई देती है। राष्ट्रीय स्तर के असर (ASER - Annual Status of Education Report) जैसे सर्वेक्षणों के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि उच्च डिग्रियां होने के बावजूद कई शिक्षक बुनियादी व्याकरण, गणित या अपने विषय की मूल अवधारणा तक छात्रों को नहीं समझा पाते। शिक्षा अब ज्ञान देने के बजाय सिर्फ अटेंडेंस और सिलेबस खत्म करने तथा क्रेडिट सिस्टम बटोरने का जरिया बन गई है।
चिकित्सा के लिए गली-मोहल्लों में धड़ाधड़ खुलते निजी मेडिकल्स व कॉलेज और वहां से हर साल निकलने वाले हजारों डॉक्टरों की फौज तो होती है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न मेडिकल जर्नल के अध्ययन बताते हैं कि व्यावहारिक प्रशिक्षण (Clinical Exposure) की कमी के कारण बुनियादी डायग्नोसिस (रोग की पहचान) में भी भारी चूक होती रहती है। दवाओं के भारी-भरकम प्रिस्क्रिप्शन और गैर-जरूरी टेस्ट्स (Over-diagnosis) के पीछे अक्सर वास्तविक चिकित्सीय समझ की कमी, व्यावसायिक लालच और अज्ञानता साफ झलकती है।
अभियांत्रिकी क्षेत्र की हालात भी ऐसी ही है। जहां देश में लाखों की संख्या में बी.टेक और आईटी ग्रेजुएट्स की भरमार है। नेशनल एम्प्लॉयबिलिटी रिपोर्ट (National Employability Report by Aspiring Minds) के ऐतिहासिक और वर्तमान ट्रेंड्स बताते हैं कि 80% से अधिक इंजीनियर्स उद्योग जगत की जरूरतों के मुताबिक रोजगार के काबिल (Employable) हैं ही नहीं। उनके पास थ्योरी की रटी-रटाई बातें तो हैं, लेकिन कोडिंग, डेटा एनालिसिस, डिजाइनिंग या वास्तविक समस्या को हल करने का कोई व्यावहारिक कौशल (Skill) नहीं है।
विधि के क्षेत्र में नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि अदालतों में काले कोट और वकीलों की अनियंत्रित भीड़ के बीच डिग्रियों की भरमार है। विधि आयोग (Law Commission) की विभिन्न टिप्पणियों और कानूनी विश्लेषकों के अनुसार, बार काउंसिल की ढीली नियंत्रण प्रणाली के कारण इस भीड़ में ऐसे वकीलों की बड़ी तादाद आ गई है जो कानून की धाराओं की सही व्याख्या नहीं कर पाते या कोर्ट के सामने ठीक से जिरह (Argument) नहीं रख पाते। इसका परिणाम मुकदमों के अंतहीन खिंचाव और न्याय में देरी के रूप में सामने आता है।
देश के भीतर इस संकट को गहरा करने में अनियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा हाथ है। पूंजीवाद ने हर विधा को साधना से बदलकर मुनाफे का व्यापार बना दिया है। कमर्शियलाइजेशन ऑफ एजुकेशन (शिक्षा का व्यवसायीकरण) के चलते निजी विश्वविद्यालय पैसे के बदले डिग्रियां बांटने वाले कारखाने बन गए हैं। इसी तरह मीडिया हाउस भी अब केवल कॉरपोरेट कंपनियां हैं जिन्हें जनसरोकार के मुद्दों से ज्यादा अपने विज्ञापनों और इन्वेस्टर रिटर्न की चिंता है।
क्लिकबेट कल्चर, रील्स और सोशल मीडिया के इस दौर में गहराई से सोचना, निष्पक्ष रहना या किसी विषय पर वर्षों शोध करना घाटे का सौदा लगने लगा है। आज की भीड़ को त्वरित (जल्दी) परिणाम चाहिए, चाहे उसके लिए योग्यता और नैतिकता की बलि ही क्यों न चढ़ानी पड़े। और इन सभी विकृतियों की अंतिम मार देश के आम आदमी पर पड़ती है।
कारण बिल्कुल स्पष्ट है: योग्यता की कमी और उसके प्रति गंभीरता का अभाव! जब तक समाज सफलता का पैमाना केवल कैमरे के सामने की चमक, कागज के टुकड़े (डिग्री) और बैंक बैलेंस को मानता रहेगा; तब तक यह संकट और गहराता जाएगा। यदि हमें एक मजबूत, जागरूक और दूरदर्शी समाज का निर्माण करना है, तो हमें इस फौजनुमा भीड़ को संख्या बल के बजाय योग्यता और नैतिकता की कसौटी पर कसना होगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। जिनमें डिग्रियों की अनिवार्यता को कम करके व्यावहारिक कौशल और वास्तविक ज्ञान की परीक्षा को प्राथमिकता देने के साथ शॉर्टकट और हाइप के बजाय वर्षों के कड़े अनुभव व वरिष्ठता के प्रति सम्मान की भावना को समाज में पुनः स्थापित करना होगा। अन्यथा, यह तथाकथित विकास केवल एक रंगीन बुलबुला बनकर रह जाएगा, जिसके भीतर सिर्फ योग्यता का खोखलापन और अंतहीन निराशा होगी।
शनिवार, मई 16, 2026
सियासी लालच और नियति का न्याय
'नेताजी' की बहू के दोराहे पर खड़े होने की कहानी:
जब कभी भी राजनीति और पारिवारिक रिश्तों का ताना-बाना एक साथ उलझा है, तब-तब उस उलझाव ने इतिहास की बड़ी पटकथाओं को जन्म दिया है। महाभारत के पौराणिक काल से लेकर वर्तमान दौर की लोकतांत्रिक सियासत तक, सत्ता और महत्वाकांक्षा की वेदी पर रिश्तों की बलि चढ़ने के अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति के ‘गढ़’ और देश के सबसे कद्दावर सियासी कुनबों में से एक—मुलायम सिंह यादव के परिवार में घटित हुई हालिया घटनाएं इसी कड़वे सच को एक बार फिर बयां करती हैं।
यह केवल एक राजनीतिक घराने के भीतर का अंतर्विरोध नहीं है, बल्कि यह कहानी है असीमित महत्वाकांक्षा, पारिवारिक निष्ठा के बिखराव और अंततः उसके दूरगामी व अप्रत्याशित परिणामों की। जो साम्राज्य दशकों के संघर्ष, खून-पसीने और आपसी तालमेल से खड़ा किया गया था, वह कैसे व्यक्तिगत जिद और सियासी महत्वाकांक्षा की भेंट चढ़ जाता है, यह घटनाक्रम इसका एक सजीव दस्तावेज है।
इस पूरे घटनाक्रम की जड़ें उस समय से जुड़ी हैं, जब समाजवादी पार्टी के संस्थापक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव के छोटे बेटे प्रतीक यादव ने अपर्णा बिष्ट (अब अपर्णा यादव) से विवाह का निर्णय लिया था। राजनीति के धुरंधर और समाज की नब्ज को पहचानने वाले 'नेताजी' इस रिश्ते के पूरी तरह पक्ष में नहीं थे। पारिवारिक सूत्रों और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा हमेशा रही कि नेताजी के असहज होने के बावजूद प्रतीक यादव ने अपनी जिद और पसंद को आगे रखा। अपर्णा, प्रतीक से उम्र में बड़ी थीं और एक संभ्रांत उच्च-मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आती थीं। उनके पिता उत्तराखंड से ताल्लुक रखते थे और नौकरशाही के क्षेत्र में एक रसूखदार नाम थे।
शहादत और संघर्ष से बने इस कुनबे में शुरुआती दौर में सब कुछ सामान्य और शांत दिख रहा था। प्रतीक यादव ने खुद को हमेशा सक्रिय राजनीति की चकाचौंध से दूर रखा और अपना पूरा ध्यान रियल एस्टेट, जिम और बिजनेस एम्पायर खड़ा करने पर केंद्रित किया। दूसरी ओर, अपर्णा यादव ने धीरे-धीरे खुद को एक सामाजिक कार्यकर्ता और फिर राजनीति के एक उभरते चेहरे के रूप में स्थापित करना शुरू किया। मुलायम सिंह यादव के संरक्षण और यादव परिवार के रसूख के चलते उन्हें वह मंच और पहचान बहुत आसानी से मिल गई, जिसके लिए आम कार्यकर्ताओं को दशकों तक संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन, जब महत्वाकांक्षा की उड़ान को सीमाओं का बंधन स्वीकार न हो, तो वह अपने ही मूल को दांव पर लगाने से भी गुरेज नहीं करती। परिणामस्वरूप, साल 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यादव परिवार की यह दरार सार्वजनिक हो गई।
पारिवारिक सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अपर्णा यादव के भीतर राजनीतिक रूप से स्थापित होने और सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने की छटपटाहट इतनी बढ़ चुकी थी कि उन्होंने पारिवारिक सीमाओं की परवाह करना छोड़ दिया। इस पूरी बगावत की स्क्रिप्ट के पीछे उनके कुछ करीबियों और राजनीतिक सलाहकारों का हाथ बताया जाता है, जिन्होंने उन्हें यह मंत्र फूंका कि "सपा में रहकर तुम हमेशा अखिलेश यादव की छाया के नीचे ही रहोगी; अगर खुद की पहचान बनानी है, तो अलग रास्ता चुनना होगा।"
एक ऐसा परिवार जिसने राज्य को तीन मुख्यमंत्री दिए और जो राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष का एक मजबूत स्तंभ रहा, उसके भीतर से एक बहू का चुनाव के ठीक पहले विरोधी खेमे में चले जाना एक बहुत बड़ा राजनीतिक झटका था। अपर्णा यादव ने परिवार के बुजुर्गों, शुभचिंतकों और खुद नेताजी की समझाइश को दरकिनार करते हुए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया। अपर्णा यादव का यह कदम सिर्फ एक दल से दूसरे दल में जाने का नहीं था, बल्कि यह उस विचारधारा और उस पितामह (मुलायम सिंह यादव) के सिद्धांतों से विमुख होने जैसा था, जिसने उन्हें पहचान दी थी। राजनीतिक गलियारों में इस बात की पुरजोर चर्चा थी कि सत्ता के महत्वपूर्ण पद को पाने की चाह में अपर्णा ने उस घर की मर्यादा को ताक पर रख दिया, जिसने उन्हें अपनी पलकों पर बैठाया था।
भाजपा में शामिल होने के बाद अपर्णा यादव को वह तवज्जो या राजनीतिक कद कभी नहीं मिल सका, जिसकी उम्मीद लगाकर वह आई थीं। राजनीति का यह बुनियादी नियम है कि वैचारिक निष्ठा बदलने वालों पर विरोधी दल भी तुरंत और पूरी तरह भरोसा नहीं करते। उन्हें चुनाव में बड़ी उम्मीदें थीं, लेकिन पार्टी ने उन्हें न तो विधानसभा का टिकट दिया और न ही कोई बड़ा सांगठनिक पद तुरंत हासिल हुआ। वह सिर्फ एक स्टार प्रचारक और समाजवादी पार्टी पर हमला करने के एक राजनीतिक विकल्प के रूप में इस्तेमाल होकर रह गईं।
काफी लंबे इंतजार और राजनीतिक उठापटक के बाद, साल 2024 में भाजपा सरकार ने उन्हें उत्तर प्रदेश राज्य महिला आयोग का उपाध्यक्ष मनोनीत किया। हालांकि, इस पद के मिलने से भी उनके राजनीतिक रसूख की वह हसरतें पूरी नहीं हो सकीं, जो कभी 'नेताजी की बहू' के रूप में राज्य के सर्वोच्च प्रशासनिक हलकों में हुआ करती थीं। सत्ता का यह छोटा सा सम्मोहन उनके उस बड़े नुकसान की भरपाई नहीं कर सका, जो वह अपने ही परिवार से बगावत करके कर चुकी थीं।
इधर राजनीति में उम्मीदें बिखर रही थीं, तो उधर पारिवारिक मोर्चे पर भी दरारें गहरी होती जा रही थीं। प्रतीक यादव, जो हमेशा विवादों से दूर रहने वाले और अपने बिजनेस में रमे रहने वाले व्यक्ति थे, अपनी पत्नी के इस परिवार-विरोधी फैसले से भीतर ही भीतर टूट चुके थे। किसी भी व्यक्ति के लिए समाज में यह स्थिति बेहद असहज करने वाली होती है, जब उसकी जीवनसंगिनी सिर्फ अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के लिए पूरे खानदान की प्रतिष्ठा को दांव पर लगा दे। साल 2026 की शुरुआत में प्रतीक यादव ने सोशल मीडिया पर सरेआम अलगाव (तलाक) की बात तक कह दी थी, जिससे दोनों के बीच की गहरी कड़वाहट जगजाहिर हो गई थी। जो घर कभी खुशियों से चहकता था, वह वैचारिक मतभेदों और आपसी कलह का अखाड़ा बन चुका था।
13 मई 2026 में एक बेहद दुखद और चौंकाने वाली घटना सामने आई, जब मात्र 38 वर्ष की आयु में प्रतीक यादव का अचानक निधन हो गया। उनके आकस्मिक निधन के बाद जो सबसे बड़ा खुलासा हुआ, उसने इस पूरे घराने के आंतरिक अविश्वास और विवादों की कड़वी सच्चाई को पूरी तरह उजागर कर दिया। अपर्णा यादव के साथ लगातार होने वाले विवादों और उनके सीमाओं से परे राजनीतिक इरादों को भांपते हुए, प्रतीक यादव ने अपने जीवनकाल में ही एक बेहद सोची-समझी और कानूनी रूप से मजबूत वसीयत तैयार करवा ली थी।
पारिवारिक और कानूनी सूत्रों के अनुसार, प्रतीक यादव ने अपनी लगभग 4 से 5 हजार करोड़ रुपये की विशाल चल और अचल संपत्ति (जिसमें उनकी रियल एस्टेट कंपनियां, जिम एम्पायर, करोड़ों की लग्जरी गाड़ियां और जमीनें शामिल हैं) की वसीयत सीधे तौर पर अपनी दोनों बेटियों के नाम कर दी थी। इस वसीयत में सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक शर्त यह जोड़ी गई कि जब तक प्रतीक यादव की दोनों बेटियाँ 27 वर्ष की आयु पूरी नहीं कर लेतीं, तब तक इस संपत्ति पर न तो कोई मालिकाना अधिकार जता पाएगा और न ही इसे किसी अन्य उद्देश्य के लिए बेचा या हस्तांतरित किया जा सकेगा। प्रतीक यादव संभवतः यह समझ चुके थे कि जो वैचारिक भटकाव परिवार में आ चुका है, वह संपत्ति के विवाद का कारण भी बन सकता है। इस आशंका के चलते उन्होंने अपनी पत्नी को वित्तीय नियंत्रण से पूरी तरह दूर रखा। बेटियों के बालिग और परिपक्व (27 साल की उम्र) होने तक संपत्ति को कानूनी रूप से लॉक कर दिया गया, ताकि अपर्णा यादव या उनका कोई भी करीबी बेटियों पर दबाव बनाकर इस अकूत संपत्ति का राजनीतिक या व्यक्तिगत दुरुपयोग न कर सके। अपनी मृत्यु से पहले प्रतीक यादव द्वारा उठाया गया यह कानूनी कदम इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करता है कि पति-पत्नी के बीच अविश्वास किस चरम सीमा तक पहुंच चुका था।
प्रतीक यादव का अपने पीछे ऐसी वसीयत छोड़ जाना आज के दौर के समाज, विशेषकर उन लोगों के लिए एक बहुत बड़ी सीख और चेतावनी है, जो रिश्तों की पवित्रता, मर्यादा और परिवार के त्याग को अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के सामने बौना समझते हैं। यह घटनाक्रम आधुनिक समाज की उस कड़वी हकीकत को बयां करता है जहां 'शॉर्टकट' से सब कुछ हासिल करने की चाहत अंततः व्यक्ति को अकेलेपन और अंधकार के गर्त में धकेल देती है।
एक व्यक्ति के रूप में महत्वाकांक्षी होना कतई गलत नहीं है। आगे बढ़ने की चाह हर इंसान में होनी चाहिए, लेकिन जब वह चाहत लालच का रूप ले ले और उसकी सीमाएं परिवार के बिखराव की कीमत पर तय होने लगें, तो उसका अंत ऐसा ही होता है। अपर्णा यादव ने सोचा था कि वह भाजपा में जाकर सत्ता के नए शिखर छुएंगी, लेकिन नियति का न्याय देखिए—आज न तो उनके पास वह राजनीतिक रसूख है जो कभी सपा में रहते हुए था, और न ही आज उनके पास उस अथाह संपत्ति पर कोई अधिकार बचा है जिसके दम पर वह खुद को मजबूत समझती थीं। लेकिन अपर्णा ने साबित कर दिया कि "राजनीति और लालच में कोई सगा संबंधी नहीं होता, सत्ता का केवल एक ही सगा होता है—वो है 'वर्चस्व'
मुलायम सिंह यादव के परिवार की यह घटना केवल एक पारिवारिक विवाद नहीं है, बल्कि यह उन सभी के लिए एक दृष्टांत है जो रिश्तों की बुनियाद को कमजोर समझकर उस पर अपनी महत्वाकांक्षाओं का महल खड़ा करना चाहते हैं। प्रतीक यादव ने जाते-जाते अपनी बेटियों के नाम 27 वर्ष की समय सीमा के साथ संपत्ति की वसीयत करके यह स्पष्ट संदेश दे दिया है कि दौलत और रसूख से वफादारी और सम्मान नहीं खरीदा जा सकता। जब आप अपनों के साथ छल करते हैं, तो समय देर-सवेर आपसे उसकी पूरी कीमत वसूल कर लेता है।
आज अपर्णा यादव खुद को एक ऐसे दोराहे पर खड़ी पा रही होंगी जहां पीछे मुड़ने पर खोया हुआ परिवार और मान-सम्मान दिखता है, और आगे देखने पर एक सीमित राजनीतिक पद और आर्थिक रूप से बेदखल कर दी गई एक कड़वी हकीकत। राजनीति और व्यक्तिगत लालच के इस कॉकटेल ने एक और प्रतिष्ठित परिवार के घटनाक्रम को इतिहास के पन्नों में एक चेतावनी की तरह दर्ज कर दिया है।
शुक्रवार, मई 15, 2026
जिन्दगी और मौत की जद्दोजहद के बीच भगवान की आवश्यकता
जिंदगी, जिसके लिए शरीर चाहिए... और यह शरीर पांच तत्वों—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर (भगवान)—से मिलकर बना है। इनमें से किसी एक तत्व की कमी हमें चित्रगुप्त को अधिकृत कर देती है यमराज के पास भेजने के लिए। लेकिन मजाल है किसी की कि हम इंसानी शरीर और फितरत वालों को कोई समझा सके? जब व्यक्तिगत तौर पर हमारे या हमारे अपनों पर कोई संकट आता है, तो हमें भगवान याद आता है (जो वास्तव में भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर होना चाहिए, लेकिन हमारे लिए वह होता बिल्कुल नहीं है)। उस समय हमें भूला-बिसरा, अपना-पराया और ऊंच-नीच सब याद आने लगता है, और जैसे ही वह संकट खत्म होता है, फिर हमें भगवान की कोई जरूरत नहीं होती। फिर चाहे कोई उस 'भगवान' का नाश करे, उसे क्षतिग्रस्त करे या दूषित करे—हमें क्या फर्क पड़ता है? और वैसे भी, ऐसे ही लोग कहते हैं कि "उसकी (पता नहीं किसकी) मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता!" आधुनिकता और दिखावे का दौर, मंदिरों-मस्जिदों की विशालता और आधुनिक सुख-सुविधाओं की संलिप्तता उसे कुछ भी याद रखने नहीं देती।
भूमि, जो 'भगवान' शब्द का आगाज करती है, उसका क्षरण और दोहन किसी से छिपा नहीं है। अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए हम अवैध खनन से बाज नहीं आ रहे हैं। विज्ञान का आधुनिक स्वरूप, जो विकास का छलावा दिखाते हुए नमकीन, कुरकुरे, पानी की बोतलें, थर्माकोल के पत्तल और गिलास आदि परोस रहा है, वह भूमि को कचरे का ढेर बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा। इसका परिणाम यह है कि बगैर रसायनों के खेती करना नामुमकिन हो गया है; फलस्वरूप बीमारियों की आमद बढ़ रही है और हमारी शारीरिक संरचना की बनावट व क्षमता निरंतर प्रभावित होती जा रही है।
भगवान का दूसरा पायदान 'गगन' है, जो कहने या सुनने के लिए शायद कोई खास मायने न रखता हो, लेकिन यह वह अनंत विस्तार है जो समस्त जीवन को अपनी छत्रछाया में समेटे हुए है। यदि यह गगन सूर्य के प्रचंड ताप को नियंत्रित न करे और वाष्प को अपने असीम आँचल में समाहित कर बादलों का रूप न दे, तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि धरती का अस्तित्व कितनी जल्दी राख हो जाएगा? हम गगन को केवल एक शून्य या खाली स्थान समझते हैं, परंतु यह ओजोन की वह सुरक्षा परत है जो हमें ब्रह्मांडीय विनाश और घातक विकिरणों से बचाती है। सूक्ष्म होने के बावजूद, उपयोगिता के आधार पर जीवन का वास्तविक सूत्रधार गगन ही है, जिसे हमने आज वायु प्रदूषण और कृत्रिम उपग्रहों के मलबे से पाट दिया है।
सभी कहते हैं कि सांसें गिनती की मिली हैं, और इन सांसों का आधार हवा यानी 'वायु' है। वायु के लिए हमें हरे-भरे पेड़ चाहिए, लेकिन हम विलासितापूर्ण विकास की दौड़ में उनका लगातार कटान (हसदेव, बेंगलुरु के जंगल, अरावली की पहाड़ियां, बिजवासन रेल टर्मिनल परियोजना, ग्रेट निकोबार) करने में नाममात्र का संकोच नहीं करते। जो लोग इसे बचाने की बात करते हैं या इस लड़ाई को लड़ते हैं, उन्हें हम नक्सली या माओवादी बताकर तथाकथित रक्षा इकाइयों का उपयोग करते हुए, साम-दाम-दंड-भेद से सीधे मौत के घाट उतारने में कोताही नहीं बरतते। वर्ष 2019-20 में कोविड का विकराल रूप सभी ने देखा; ऑक्सीजन की कमी से मौत का नंगा नाच किसी से छिपा नहीं है। सिलेंडरों में बंद हवा के लिए दाम देने के साथ-साथ लोग गिड़गिड़ाने और नतमस्तक होने पर मजबूर हुए थे, लेकिन इस भयावह घटना के बाद भी हम सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। हम उन सभी विनाशकारी नीतियों का समर्थन 'जय श्री राम' के शोर के साथ कर रहे हैं जो अंततः हमारा ही विनाश करेंगी। आखिर किसका और कैसा भगवान है हमारे जहन में?
वैश्विक स्तर पर आग का तांडव, जो सिर्फ विनाश का परिचायक है, उससे सभी परिचित हैं; लेकिन इस पर नियंत्रण का कोई भी सफलतम उपाय हमारे पास नहीं है। विकास के नाम पर हम अग्नि-जनित उत्पादों को ही सर्वश्रेष्ठ मान बैठे हैं। यही विकास जब अपनी 'गजराज' रूपी मदमस्त चाल में चलता है, तो सबको एक ही पलड़े में तौलता है और उसी भगवान (पंचतत्व) में विलीन कर देता है।
'जल से ही जीवन है और जल ही प्रलय'—यह बात सभी दृष्टियों से शत-प्रतिशत सही है, लेकिन हम जीवन के मूल रूप 'नीर' को समझना ही नहीं चाहते। धनाढ्य होने पर हम आरओ (RO) या फिल्टर वाटर को अपनी प्रतिष्ठा बनाने में देर नहीं करते, जिसके लिए हम लाखों लीटर पेयजल सिर्फ दिखावे में बर्बाद कर देते हैं। करोड़ों की इमारत बनाने में पैसों की कोई कमी नहीं होती, लेकिन बरसात के पानी को संरक्षित करने वाले संयंत्र (Rainwater Harvesting) के लिए हम कंगाल हो जाते हैं। चिलचिलाती धूप में राह चलते राहगीर को पानी पिलाने में हमारा रुतबा कम हो जाता है, लेकिन वहीं शाम को पाइप लगाकर बेवजह गाड़ियाँ धोने और सड़कों को तर करने में हम गौरवान्वित महसूस करते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, आगरा और कानपुर जैसे महानगरों में भूमिगत जल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और हमें वह पेयजल खरीदकर प्रयोग करना पड़ रहा है जिसे प्रकृति ने मुफ्त दिया था। क्या यही भगवान की साधना है? क्या इसी विकास के लिए हम प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर दोहन कर रहे हैं?
इक्कीसवीं सदी में मानव ने भगवान के मूल स्वरूप को नकारते हुए सिर्फ कंकड़-पत्थर और मनचाहे आकारों को अपना आराध्य मान लिया है, जो मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सरासर गलत है। ऐसे आराध्य अक्सर राजनीतिक उपज होते हैं। वैसे भी, हम भारतीयों ने जिसे 'सम्मानित' करने की संज्ञा दी है, उसका सीधा सा अर्थ यह निकलता है कि हम सिर्फ उसका उपहास करते हैं और अपना मतलब सीधा करते हैं। हमने नदियों को 'माँ' कहा, पर उनकी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं; हमने गाय को 'माता' कहा, पर नेताओं के स्लॉटर हाउस (बूचड़खाने) उन्हीं के दम पर चल रहे हैं; हमने धरती को 'माँ' बोला और उसे कचरे के ढेर में बदल डाला। पागलपन की हद तो देखिए कि हमने चाँद को भी मजहबों में बाँट डाला। क्या ऐसे में भगवान हमारी सुनेगा या हमारा साथ देगा?
हमारे पूर्वजों ने सूर्य, चंद्रमा, वृक्ष, नदी और धरती को अपना भगवान मानकर उनकी उपासना की थी; और हम क्या कर रहे हैं? क्या जिन्दगी और मौत की जद्दोजहद के बीच भगवान की आवश्यकता इस तरह पूर्ण मूर्त और साकार रूप ले पाएगी? यह सवाल है सभी तरह के धार्मिक ठेकेदारों और उनके पिछलग्गुओं से!
मंगलवार, मई 12, 2026
सिस्टम हुआ 'लीक' और युवाओं की निकली चीख; आखिर कब तक बिकेगा भविष्य?
ारत में परीक्षा अब केवल योग्यता का पैमाना नहीं, बल्कि अनिश्चितता का दूसरा नाम बन चुकी है। साल 2024 में नीट (NEET) के महा-घोटाले ने पूरे देश को झकझोर दिया था, लेकिन उम्मीद थी कि शायद हुक्मरानों की नींद खुलेगी। मगर 2026 की पुनरावृत्ति ने यह सिद्ध कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में संवेदनशीलता का अकाल पड़ा है।
पेपर लीक अब कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि हज़ारों करोड़ों का संगठित उद्योग बन चुका है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि 2024 में पटना के लर्न बॉयज हॉस्टल से लेकर गुजरात के गोधरा और हरियाणा के झज्जर तक भ्रष्टाचार के जो तार जुड़े थे, वे आज भी पूरी तरह नहीं काटे जा सके हैं। पिछले पांच वर्षों में 50 से अधिक बड़ी परीक्षाएं रद्द हुई हैं, जिससे लगभग 2 करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित हुए। परीक्षा फॉर्म की फीस के नाम पर सरकारें जो राजस्व इकट्ठा करती हैं, उसका एक अंश भी फुल-प्रूफ तकनीकी सुरक्षा पर खर्च नहीं करतीं। यह युवाओं से लिया गया वह वित्तीय बोझ है जिससे सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का तंत्र फल-फूल रहा है।
सरकारी उपक्रमों और बिचौलियों की सांठ-गांठ यह प्रमाणित करती है कि यह केवल घरेलू प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि इससे भारत की वैश्विक छवि को भी धूमिल किया जा रहा है। एक समय था जब भारत को ग्लोबल टैलेंट हब कहा जाता था, लेकिन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं की लापरवाही और गिरती साख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय छात्रों की डिग्रियों और योग्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि हमारी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं ही संदेह के घेरे में रहेंगी, तो क्या विदेशी विश्वविद्यालय और कंपनियां भारतीय प्रतिभाओं पर वैसा ही भरोसा कर पाएंगी? सरकार खुद अपने हाथों से अपने 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' को 'डेमोग्राफिक डिजास्टर' में बदल रही है। इसकी ताज़ा और शर्मनाक बानगी 3 मई 2026 को हुई परीक्षा है, जिसे पेपर लीक की भेंट चढ़ने के कारण रद्द कर दिया गया। अब लाखों अभ्यर्थियों को फिर से उसी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से गुजरते हुए पुनः परीक्षा देनी होगी। सवाल है कि क्या छात्र की मेहनत की कोई कीमत नहीं है?
पिछले 10-12 वर्षों में सरकारी मशीनरी द्वारा कार्यवाहियों का एक तय पैटर्न सुनिश्चित कर लिया गया है, जिसमें किसी प्रिंटिंग प्रेस के मामूली कर्मचारी या छोटे दलाल को गिरफ्तार कर हेडलाइन बना दी जाती है। असली खिलाड़ी सेफ ज़ोन में सुरक्षित रहते हुए अगले लीक की तैयारी में लग जाते हैं। सवाल यह है कि क्या बिना इनसाइडर मदद के किसी सुरक्षित सर्वर या स्ट्रॉन्ग रूम से पेपर बाहर आना संभव है? जब तक नीति निर्माताओं और उच्चाधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेगा। 2024 का 'एंटी-पेपर लीक कानून' केवल कागजों पर सजावटी वस्तु बनकर रह गया है, जिसका प्रमाण 2026 की ये घटना है।
तथाकथित 'रामराज' के दावों के बीच नौजवान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। सालों की तपस्या जब एक लीक की भेंट चढ़ जाती है, तो केवल एक पेपर नहीं जलता, बल्कि एक गरीब परिवार की उम्मीदें जलती हैं और जलता है नव युवकों सुरक्षित और सुनहरा भविष्य। ऐसे में क्या भारत का भविष्य इतना सस्ता हो गया है कि उसे चंद रुपयों के लिए नीलाम कर दिया जाए? सत्ता के लोभी और दलाल क्या जानें इस मेहनत रूपी तपस्या को! क्या सत्ता में बैठे लोगों को उन आंसुओं की कीमत पता है जो एक छात्र रिजल्ट के बजाय परीक्षा रद्द होने की खबर पढ़कर बहाता है?
अगर सरकारें ठोस उपाय करने और सकारात्मक कदम उठाने में नाकाम हैं, तो उन्हें कुर्सी पर बने रहने का नैतिक अधिकार भी नहीं है। जब व्यवस्था बहरी हो जाए, तो आवाज बुलंद करनी पड़ती है। यदि सरकारें युवाओं के भविष्य को ठंडे बस्ते में डाल रही हैं, तो युवाओं को भी ऐसी सरकारों को इतिहास के बस्ते में डालने पर विचार करना होगा। निकलना होगा उन्हें उस संकीर्ण तालाब से जहाँ सिर्फ वैचारिक कीचड़ है। नौजवानों को यह समझना होगा कि सिर्फ पाँच किलो राशन उनकी जिंदगी का मकसद नहीं है और न ही किसी के कहने पर बार-बार लाइन में लगना उनका काम। लोकतंत्र में उखाड़ फेंकने की ताकत केवल नारों में नहीं, बल्कि सही समय पर सही सवाल पूछने और वोट की चोट में होती है। यह लड़ाई अब सिर्फ एक नौकरी की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और राष्ट्र की गरिमा की है।
#अतुल_कुमार_श्रीवास्तव
#Atul_Kumar_Srivastava
रविवार, मई 10, 2026
बॉक्स ऑफिस से बैलेट बॉक्स तक: क्या सुशासन के लिए भी चलेंगे स्पेशल इफेक्ट्स?
कल तक जो प्रशंसक थिएटर की बालकनी से सिक्के उछाल रहे थे, अब वे सचिवालय की जालीदार खिड़कियों के बाहर शासनादेश की तलाश में खड़े होंगे। विजय भाई अब स्क्रीन के थलपति नहीं, बल्कि राज्य के सारथी हैं। पर अफ़सोस, यहां क्लाइमेक्स के बाद द एंडनहीं होता, बल्कि यहाँ से तो असली पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन शुरू होती है।
फिल्मों में हमने देखा था कि विजय भाई बस हाथ हिलाते थे और गुंडे हवा में ऐसे उड़ते थे जैसे बिना डोर की पतंग। समर्थकों को उम्मीद है कि शपथ लेते ही भ्रष्टाचार के विलेन भी वैसे ही हवा में उछलेंगे। पर यहाँ तो पता चला कि एक अदद चपरासी का ट्रांसफर करने के लिए भी तीन कमेटियों की रिपोर्ट और सर्विस रूल की पेचीदगियों से गुजरना पड़ता है। प्रशंसक हैरान हैं कि जिस सुपरस्टार ने स्क्रीन पर एक घंटे में पूरा सिस्टम बदल दिया था, उसे एक छोटी सी फाइल पर अप्रूव्ड लिखने के लिए भी कानूनी सलाहकारों की पूरी फौज क्यों चाहिए?
सत्ता की गलियों में सबसे बड़ी कमी है बैकग्राउंड म्यूजिक की। जब विजय भाई मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, तो समर्थकों को लगा था कि कोई दमदार बीट बजेगी और कैमरा 360 डिग्री घूमेगा। पर यहाँ तो सिर्फ पंखे की चरमराहट और टाइपराइटर की खटखट सुनाई दे रही है। सिनेमा में स्लो-मोशन वॉक टशन लगती थी, पर प्रशासन में जब फाइलें स्लो-मोशन में चलती हैं, तो उसे रेड टेपिज्म यानी की लालफीताशाही कहते हैं और यहां कोई एडिटर नहीं है जो इस बोरियत को काटकर सीधे हैप्पी एंडिंग दिखा सके।
फिल्मों में विलेन को पहचानना आसान था उसकी आंखें लाल होती थीं और अट्टहास करता था। पर यहां तो विलेन कभी बजट घाटे की शक्ल में आता है, तो कभी विपक्ष के वाकआउट के रूप में। यहां हीरो को अपनी हर चाल चलने से पहले सेंसर बोर्ड बोले तो सत्ता के सहयोगी और केंद्र सरकार से एनओसी नहीं, बल्कि फंड्स की मंजूरी लेनी पड़ती है। समर्थक सोच रहे हैं कि भाई ने "I am waiting" तो बोल दिया, पर शायद उन्हें ये नहीं पता था कि यहां लाइन में उनसे पहले राजस्व घाटा और बेरोजगारी के आंकड़े खड़े हैं।
प्रशंसकों को अब यह समझना होगा कि यह ₹500 करोड़ की फिल्म नहीं, बल्कि ₹5 लाख करोड़ के कर्ज में डूबा राज्य है। यहां स्पेशल इफेक्ट्स से गड्ढे नहीं भरते और न ही डायलॉग मारने से बिजली के बिल कम होते हैं।
विजय भाई के लिए अब असली चुनौती यह है कि वे सुपरस्टार की छवि से बाहर निकलकर एक सामान्य नागरिक की तरह सोचें। क्योंकि सिनेमा के थिएटर में तो तीन घंटे बाद लाइट जल जाती है और लोग घर चले जाते हैं, लेकिन लोकतंत्र के इस थिएटर में लाइट हमेशा जलती रहती है और जनता की नजरें पलक झपकाए बिना सिर्फ परफॉरमेंस देख रही होती हैं।
विजय जी अब आपके रीटेक का समय खत्म हुआ, अब सीधा लाइव टेलीकास्ट है!
शनिवार, मई 09, 2026
जनादेश का अपहरण और संस्थागत क्षरण: 2026 में किस दहलीज पर खड़ा हमारा लोकतंत्र
मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणाम चाहे वे पश्चिम बंगाल के हों, तमिलनाडु के या केरल के। भारतीय लोकतंत्र के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम सिद्ध नहीं हुए हैं। इन चुनावों ने न केवल राजनीतिक दलों के बीच की कटुता को सतह पर ला दिया है, बल्कि हमारे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक नैतिकता की नींव को भी झकझोर दिया है। आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि सत्ता के शीर्ष पर कौन आसीन होगा, बल्कि यक्ष प्रश्न यह है कि क्या चुनाव के बाद की राजनीतिक रस्साकस्सी में जनता द्वारा किया गया मतदान सुरक्षित है?
चुनावी नतीजे आते ही पराजित दलों द्वारा धांधली के आरोप लगाना और मतगणना प्रक्रिया को चुनौती देना अब एक मानक प्रक्रिया बन गई है। इस प्रवृत्ति का विश्लेषण दोतरफा होना चाहिए। एक ओर, यह प्रवृत्ति चुनावी इनकार के उस खतरनाक वैश्विक चलन का हिस्सा है, जहां राजनीतिक दल बिना ठोस साक्ष्यों के अपनी हार स्वीकार करने के बजाय विक्टिम कार्ड खेलते हैं। ऐसा करके वे सीधे तौर पर मतदाताओं के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यह व्यवहार लोकतंत्र की जड़ों में संदेह का विष घोलता है, जिससे आम नागरिक का विश्वास चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं से डिगने लगता है।
परंतु, सिक्के का दूसरा पहलू सत्ता पक्ष और चुनाव प्रबंधन की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्षी दल बार-बार धांधली का शोर मचा रहे हैं, तो इसका एक बड़ा कारण सत्ता पक्ष द्वारा प्रशासनिक मशीनरी का कथित दुरुपयोग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में परिलक्षित होता झुकाव भी है। जब ईवीएम की सुरक्षा, वीवीपैट पर्चियों के मिलान और चुनाव की लंबी समय-सारणी पर पूर्ण स्पष्टता नहीं होती, तो संदेह को बल मिलता है। यह केवल हारने वाले की हताशा नहीं, बल्कि एक विश्वास का संकट है, जहां समान अवसर नदारद नजर आता है।
संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल के पद की कल्पना केंद्र और राज्य के बीच एक सेतु के रूप में की थी, लेकिन 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में यह पद एक अवरोधक के रूप में अधिक दिखाई दिया। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जिस तरह निर्वाचित सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव हुआ है, उसने संघीय मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर देने में मनमानी करना या विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए रोके रखना; ये कृत्य लोकतंत्र के अवरोध और संतुलन के सिद्धांत के विरुद्ध हैं। जब राजभवन राजनीतिक रणनीतियों का केंद्र बन जाता है, तो संघीय ढांचा केवल कागजों तक सीमित रह जाता है।
राजनीतिक नैतिकता का पतन उस समय चरम पर दिखता है, जब बहुमत न होने की स्थिति में जनादेश की चोरी को चाणक्य नीति का नाम देकर महिमा मंडन किया जाता है। विधायकों की खरीद-फरोख्त, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव के माध्यम से कराया गया दलबदल अब राजनीति की संज्ञा बन गई है। पिछले एक दशक में चुनावों के बाद जिस तरह से छोटे दलों और निर्दलीयों की नीलामी की खबरें आई हैं, वह मतदाताओं के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है।
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां उसे आत्ममंथन की नितांत आवश्यकता है। समय की मांग है कि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को न केवल अक्षुण्ण रखे, बल्कि वह निष्पक्ष दिखे भी। राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या अनिवार्य है ताकि वे राजनीतिक मोहरे न बन सकें।
अंततः, हमें यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल संख्या बल का अंक गणित नहीं, बल्कि लोक-लाज और संवैधानिक नैतिकता की सतत परंपरा है। यदि संस्थाओं की गरिमा राजनीतिक विजय की वेदी पर बलि चढ़ा दी जाएगी, तो हम एक ऐसी चुनावी तानाशाही की ओर अग्रसर होंगे जहां मतदान तो होगा, परंतु जन-विश्वास अनुपस्थित रहेगा।यदि 2026 के ये चुनाव हमें कोई सबक देते हैं, तो वह यही है कि संस्थाओं की शुचिता किसी भी राजनीतिक जीत से ऊपर होनी चाहिए; अन्यथा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का गौरव केवल एक खोखला दावा बनकर रह जाएगा।
#अतुल_कुमार_श्रीवास्तव
#Atul_Kumar_Srivastava
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