सूर्यांश श्री समाचार
आत्म चिंतन और मंथन पर आधारित एक सोच...
शुक्रवार, मई 15, 2026
जिन्दगी और मौत की जद्दोजहद के बीच भगवान की आवश्यकता
जिंदगी, जिसके लिए शरीर चाहिए... और यह शरीर पांच तत्वों—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर (भगवान)—से मिलकर बना है। इनमें से किसी एक तत्व की कमी हमें चित्रगुप्त को अधिकृत कर देती है यमराज के पास भेजने के लिए। लेकिन मजाल है किसी की कि हम इंसानी शरीर और फितरत वालों को कोई समझा सके? जब व्यक्तिगत तौर पर हमारे या हमारे अपनों पर कोई संकट आता है, तो हमें भगवान याद आता है (जो वास्तव में भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर होना चाहिए, लेकिन हमारे लिए वह होता बिल्कुल नहीं है)। उस समय हमें भूला-बिसरा, अपना-पराया और ऊंच-नीच सब याद आने लगता है, और जैसे ही वह संकट खत्म होता है, फिर हमें भगवान की कोई जरूरत नहीं होती। फिर चाहे कोई उस 'भगवान' का नाश करे, उसे क्षतिग्रस्त करे या दूषित करे—हमें क्या फर्क पड़ता है? और वैसे भी, ऐसे ही लोग कहते हैं कि "उसकी (पता नहीं किसकी) मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता!" आधुनिकता और दिखावे का दौर, मंदिरों-मस्जिदों की विशालता और आधुनिक सुख-सुविधाओं की संलिप्तता उसे कुछ भी याद रखने नहीं देती।
भूमि, जो 'भगवान' शब्द का आगाज करती है, उसका क्षरण और दोहन किसी से छिपा नहीं है। अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए हम अवैध खनन से बाज नहीं आ रहे हैं। विज्ञान का आधुनिक स्वरूप, जो विकास का छलावा दिखाते हुए नमकीन, कुरकुरे, पानी की बोतलें, थर्माकोल के पत्तल और गिलास आदि परोस रहा है, वह भूमि को कचरे का ढेर बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा। इसका परिणाम यह है कि बगैर रसायनों के खेती करना नामुमकिन हो गया है; फलस्वरूप बीमारियों की आमद बढ़ रही है और हमारी शारीरिक संरचना की बनावट व क्षमता निरंतर प्रभावित होती जा रही है।
भगवान का दूसरा पायदान 'गगन' है, जो कहने या सुनने के लिए शायद कोई खास मायने न रखता हो, लेकिन यह वह अनंत विस्तार है जो समस्त जीवन को अपनी छत्रछाया में समेटे हुए है। यदि यह गगन सूर्य के प्रचंड ताप को नियंत्रित न करे और वाष्प को अपने असीम आँचल में समाहित कर बादलों का रूप न दे, तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि धरती का अस्तित्व कितनी जल्दी राख हो जाएगा? हम गगन को केवल एक शून्य या खाली स्थान समझते हैं, परंतु यह ओजोन की वह सुरक्षा परत है जो हमें ब्रह्मांडीय विनाश और घातक विकिरणों से बचाती है। सूक्ष्म होने के बावजूद, उपयोगिता के आधार पर जीवन का वास्तविक सूत्रधार गगन ही है, जिसे हमने आज वायु प्रदूषण और कृत्रिम उपग्रहों के मलबे से पाट दिया है।
सभी कहते हैं कि सांसें गिनती की मिली हैं, और इन सांसों का आधार हवा यानी 'वायु' है। वायु के लिए हमें हरे-भरे पेड़ चाहिए, लेकिन हम विलासितापूर्ण विकास की दौड़ में उनका लगातार कटान (हसदेव, बेंगलुरु के जंगल, अरावली की पहाड़ियां, बिजवासन रेल टर्मिनल परियोजना, ग्रेट निकोबार) करने में नाममात्र का संकोच नहीं करते। जो लोग इसे बचाने की बात करते हैं या इस लड़ाई को लड़ते हैं, उन्हें हम नक्सली या माओवादी बताकर तथाकथित रक्षा इकाइयों का उपयोग करते हुए, साम-दाम-दंड-भेद से सीधे मौत के घाट उतारने में कोताही नहीं बरतते। वर्ष 2019-20 में कोविड का विकराल रूप सभी ने देखा; ऑक्सीजन की कमी से मौत का नंगा नाच किसी से छिपा नहीं है। सिलेंडरों में बंद हवा के लिए दाम देने के साथ-साथ लोग गिड़गिड़ाने और नतमस्तक होने पर मजबूर हुए थे, लेकिन इस भयावह घटना के बाद भी हम सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। हम उन सभी विनाशकारी नीतियों का समर्थन 'जय श्री राम' के शोर के साथ कर रहे हैं जो अंततः हमारा ही विनाश करेंगी। आखिर किसका और कैसा भगवान है हमारे जहन में?
वैश्विक स्तर पर आग का तांडव, जो सिर्फ विनाश का परिचायक है, उससे सभी परिचित हैं; लेकिन इस पर नियंत्रण का कोई भी सफलतम उपाय हमारे पास नहीं है। विकास के नाम पर हम अग्नि-जनित उत्पादों को ही सर्वश्रेष्ठ मान बैठे हैं। यही विकास जब अपनी 'गजराज' रूपी मदमस्त चाल में चलता है, तो सबको एक ही पलड़े में तौलता है और उसी भगवान (पंचतत्व) में विलीन कर देता है।
'जल से ही जीवन है और जल ही प्रलय'—यह बात सभी दृष्टियों से शत-प्रतिशत सही है, लेकिन हम जीवन के मूल रूप 'नीर' को समझना ही नहीं चाहते। धनाढ्य होने पर हम आरओ (RO) या फिल्टर वाटर को अपनी प्रतिष्ठा बनाने में देर नहीं करते, जिसके लिए हम लाखों लीटर पेयजल सिर्फ दिखावे में बर्बाद कर देते हैं। करोड़ों की इमारत बनाने में पैसों की कोई कमी नहीं होती, लेकिन बरसात के पानी को संरक्षित करने वाले संयंत्र (Rainwater Harvesting) के लिए हम कंगाल हो जाते हैं। चिलचिलाती धूप में राह चलते राहगीर को पानी पिलाने में हमारा रुतबा कम हो जाता है, लेकिन वहीं शाम को पाइप लगाकर बेवजह गाड़ियाँ धोने और सड़कों को तर करने में हम गौरवान्वित महसूस करते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, आगरा और कानपुर जैसे महानगरों में भूमिगत जल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और हमें वह पेयजल खरीदकर प्रयोग करना पड़ रहा है जिसे प्रकृति ने मुफ्त दिया था। क्या यही भगवान की साधना है? क्या इसी विकास के लिए हम प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर दोहन कर रहे हैं?
इक्कीसवीं सदी में मानव ने भगवान के मूल स्वरूप को नकारते हुए सिर्फ कंकड़-पत्थर और मनचाहे आकारों को अपना आराध्य मान लिया है, जो मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सरासर गलत है। ऐसे आराध्य अक्सर राजनीतिक उपज होते हैं। वैसे भी, हम भारतीयों ने जिसे 'सम्मानित' करने की संज्ञा दी है, उसका सीधा सा अर्थ यह निकलता है कि हम सिर्फ उसका उपहास करते हैं और अपना मतलब सीधा करते हैं। हमने नदियों को 'माँ' कहा, पर उनकी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं; हमने गाय को 'माता' कहा, पर नेताओं के स्लॉटर हाउस (बूचड़खाने) उन्हीं के दम पर चल रहे हैं; हमने धरती को 'माँ' बोला और उसे कचरे के ढेर में बदल डाला। पागलपन की हद तो देखिए कि हमने चाँद को भी मजहबों में बाँट डाला। क्या ऐसे में भगवान हमारी सुनेगा या हमारा साथ देगा?
हमारे पूर्वजों ने सूर्य, चंद्रमा, वृक्ष, नदी और धरती को अपना भगवान मानकर उनकी उपासना की थी; और हम क्या कर रहे हैं? क्या जिन्दगी और मौत की जद्दोजहद के बीच भगवान की आवश्यकता इस तरह पूर्ण मूर्त और साकार रूप ले पाएगी? यह सवाल है सभी तरह के धार्मिक ठेकेदारों और उनके पिछलग्गुओं से!
मंगलवार, मई 12, 2026
सिस्टम हुआ 'लीक' और युवाओं की निकली चीख; आखिर कब तक बिकेगा भविष्य?
ारत में परीक्षा अब केवल योग्यता का पैमाना नहीं, बल्कि अनिश्चितता का दूसरा नाम बन चुकी है। साल 2024 में नीट (NEET) के महा-घोटाले ने पूरे देश को झकझोर दिया था, लेकिन उम्मीद थी कि शायद हुक्मरानों की नींद खुलेगी। मगर 2026 की पुनरावृत्ति ने यह सिद्ध कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में संवेदनशीलता का अकाल पड़ा है।
पेपर लीक अब कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि हज़ारों करोड़ों का संगठित उद्योग बन चुका है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि 2024 में पटना के लर्न बॉयज हॉस्टल से लेकर गुजरात के गोधरा और हरियाणा के झज्जर तक भ्रष्टाचार के जो तार जुड़े थे, वे आज भी पूरी तरह नहीं काटे जा सके हैं। पिछले पांच वर्षों में 50 से अधिक बड़ी परीक्षाएं रद्द हुई हैं, जिससे लगभग 2 करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित हुए। परीक्षा फॉर्म की फीस के नाम पर सरकारें जो राजस्व इकट्ठा करती हैं, उसका एक अंश भी फुल-प्रूफ तकनीकी सुरक्षा पर खर्च नहीं करतीं। यह युवाओं से लिया गया वह वित्तीय बोझ है जिससे सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का तंत्र फल-फूल रहा है।
सरकारी उपक्रमों और बिचौलियों की सांठ-गांठ यह प्रमाणित करती है कि यह केवल घरेलू प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि इससे भारत की वैश्विक छवि को भी धूमिल किया जा रहा है। एक समय था जब भारत को ग्लोबल टैलेंट हब कहा जाता था, लेकिन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं की लापरवाही और गिरती साख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय छात्रों की डिग्रियों और योग्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि हमारी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं ही संदेह के घेरे में रहेंगी, तो क्या विदेशी विश्वविद्यालय और कंपनियां भारतीय प्रतिभाओं पर वैसा ही भरोसा कर पाएंगी? सरकार खुद अपने हाथों से अपने 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' को 'डेमोग्राफिक डिजास्टर' में बदल रही है। इसकी ताज़ा और शर्मनाक बानगी 3 मई 2026 को हुई परीक्षा है, जिसे पेपर लीक की भेंट चढ़ने के कारण रद्द कर दिया गया। अब लाखों अभ्यर्थियों को फिर से उसी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से गुजरते हुए पुनः परीक्षा देनी होगी। सवाल है कि क्या छात्र की मेहनत की कोई कीमत नहीं है?
पिछले 10-12 वर्षों में सरकारी मशीनरी द्वारा कार्यवाहियों का एक तय पैटर्न सुनिश्चित कर लिया गया है, जिसमें किसी प्रिंटिंग प्रेस के मामूली कर्मचारी या छोटे दलाल को गिरफ्तार कर हेडलाइन बना दी जाती है। असली खिलाड़ी सेफ ज़ोन में सुरक्षित रहते हुए अगले लीक की तैयारी में लग जाते हैं। सवाल यह है कि क्या बिना इनसाइडर मदद के किसी सुरक्षित सर्वर या स्ट्रॉन्ग रूम से पेपर बाहर आना संभव है? जब तक नीति निर्माताओं और उच्चाधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेगा। 2024 का 'एंटी-पेपर लीक कानून' केवल कागजों पर सजावटी वस्तु बनकर रह गया है, जिसका प्रमाण 2026 की ये घटना है।
तथाकथित 'रामराज' के दावों के बीच नौजवान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। सालों की तपस्या जब एक लीक की भेंट चढ़ जाती है, तो केवल एक पेपर नहीं जलता, बल्कि एक गरीब परिवार की उम्मीदें जलती हैं और जलता है नव युवकों सुरक्षित और सुनहरा भविष्य। ऐसे में क्या भारत का भविष्य इतना सस्ता हो गया है कि उसे चंद रुपयों के लिए नीलाम कर दिया जाए? सत्ता के लोभी और दलाल क्या जानें इस मेहनत रूपी तपस्या को! क्या सत्ता में बैठे लोगों को उन आंसुओं की कीमत पता है जो एक छात्र रिजल्ट के बजाय परीक्षा रद्द होने की खबर पढ़कर बहाता है?
अगर सरकारें ठोस उपाय करने और सकारात्मक कदम उठाने में नाकाम हैं, तो उन्हें कुर्सी पर बने रहने का नैतिक अधिकार भी नहीं है। जब व्यवस्था बहरी हो जाए, तो आवाज बुलंद करनी पड़ती है। यदि सरकारें युवाओं के भविष्य को ठंडे बस्ते में डाल रही हैं, तो युवाओं को भी ऐसी सरकारों को इतिहास के बस्ते में डालने पर विचार करना होगा। निकलना होगा उन्हें उस संकीर्ण तालाब से जहाँ सिर्फ वैचारिक कीचड़ है। नौजवानों को यह समझना होगा कि सिर्फ पाँच किलो राशन उनकी जिंदगी का मकसद नहीं है और न ही किसी के कहने पर बार-बार लाइन में लगना उनका काम। लोकतंत्र में उखाड़ फेंकने की ताकत केवल नारों में नहीं, बल्कि सही समय पर सही सवाल पूछने और वोट की चोट में होती है। यह लड़ाई अब सिर्फ एक नौकरी की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और राष्ट्र की गरिमा की है।
#अतुल_कुमार_श्रीवास्तव
#Atul_Kumar_Srivastava
रविवार, मई 10, 2026
बॉक्स ऑफिस से बैलेट बॉक्स तक: क्या सुशासन के लिए भी चलेंगे स्पेशल इफेक्ट्स?
कल तक जो प्रशंसक थिएटर की बालकनी से सिक्के उछाल रहे थे, अब वे सचिवालय की जालीदार खिड़कियों के बाहर शासनादेश की तलाश में खड़े होंगे। विजय भाई अब स्क्रीन के थलपति नहीं, बल्कि राज्य के सारथी हैं। पर अफ़सोस, यहां क्लाइमेक्स के बाद द एंडनहीं होता, बल्कि यहाँ से तो असली पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन शुरू होती है।
फिल्मों में हमने देखा था कि विजय भाई बस हाथ हिलाते थे और गुंडे हवा में ऐसे उड़ते थे जैसे बिना डोर की पतंग। समर्थकों को उम्मीद है कि शपथ लेते ही भ्रष्टाचार के विलेन भी वैसे ही हवा में उछलेंगे। पर यहाँ तो पता चला कि एक अदद चपरासी का ट्रांसफर करने के लिए भी तीन कमेटियों की रिपोर्ट और सर्विस रूल की पेचीदगियों से गुजरना पड़ता है। प्रशंसक हैरान हैं कि जिस सुपरस्टार ने स्क्रीन पर एक घंटे में पूरा सिस्टम बदल दिया था, उसे एक छोटी सी फाइल पर अप्रूव्ड लिखने के लिए भी कानूनी सलाहकारों की पूरी फौज क्यों चाहिए?
सत्ता की गलियों में सबसे बड़ी कमी है बैकग्राउंड म्यूजिक की। जब विजय भाई मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, तो समर्थकों को लगा था कि कोई दमदार बीट बजेगी और कैमरा 360 डिग्री घूमेगा। पर यहाँ तो सिर्फ पंखे की चरमराहट और टाइपराइटर की खटखट सुनाई दे रही है। सिनेमा में स्लो-मोशन वॉक टशन लगती थी, पर प्रशासन में जब फाइलें स्लो-मोशन में चलती हैं, तो उसे रेड टेपिज्म यानी की लालफीताशाही कहते हैं और यहां कोई एडिटर नहीं है जो इस बोरियत को काटकर सीधे हैप्पी एंडिंग दिखा सके।
फिल्मों में विलेन को पहचानना आसान था उसकी आंखें लाल होती थीं और अट्टहास करता था। पर यहां तो विलेन कभी बजट घाटे की शक्ल में आता है, तो कभी विपक्ष के वाकआउट के रूप में। यहां हीरो को अपनी हर चाल चलने से पहले सेंसर बोर्ड बोले तो सत्ता के सहयोगी और केंद्र सरकार से एनओसी नहीं, बल्कि फंड्स की मंजूरी लेनी पड़ती है। समर्थक सोच रहे हैं कि भाई ने "I am waiting" तो बोल दिया, पर शायद उन्हें ये नहीं पता था कि यहां लाइन में उनसे पहले राजस्व घाटा और बेरोजगारी के आंकड़े खड़े हैं।
प्रशंसकों को अब यह समझना होगा कि यह ₹500 करोड़ की फिल्म नहीं, बल्कि ₹5 लाख करोड़ के कर्ज में डूबा राज्य है। यहां स्पेशल इफेक्ट्स से गड्ढे नहीं भरते और न ही डायलॉग मारने से बिजली के बिल कम होते हैं।
विजय भाई के लिए अब असली चुनौती यह है कि वे सुपरस्टार की छवि से बाहर निकलकर एक सामान्य नागरिक की तरह सोचें। क्योंकि सिनेमा के थिएटर में तो तीन घंटे बाद लाइट जल जाती है और लोग घर चले जाते हैं, लेकिन लोकतंत्र के इस थिएटर में लाइट हमेशा जलती रहती है और जनता की नजरें पलक झपकाए बिना सिर्फ परफॉरमेंस देख रही होती हैं।
विजय जी अब आपके रीटेक का समय खत्म हुआ, अब सीधा लाइव टेलीकास्ट है!
शनिवार, मई 09, 2026
जनादेश का अपहरण और संस्थागत क्षरण: 2026 में किस दहलीज पर खड़ा हमारा लोकतंत्र
मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणाम चाहे वे पश्चिम बंगाल के हों, तमिलनाडु के या केरल के। भारतीय लोकतंत्र के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम सिद्ध नहीं हुए हैं। इन चुनावों ने न केवल राजनीतिक दलों के बीच की कटुता को सतह पर ला दिया है, बल्कि हमारे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक नैतिकता की नींव को भी झकझोर दिया है। आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि सत्ता के शीर्ष पर कौन आसीन होगा, बल्कि यक्ष प्रश्न यह है कि क्या चुनाव के बाद की राजनीतिक रस्साकस्सी में जनता द्वारा किया गया मतदान सुरक्षित है?
चुनावी नतीजे आते ही पराजित दलों द्वारा धांधली के आरोप लगाना और मतगणना प्रक्रिया को चुनौती देना अब एक मानक प्रक्रिया बन गई है। इस प्रवृत्ति का विश्लेषण दोतरफा होना चाहिए। एक ओर, यह प्रवृत्ति चुनावी इनकार के उस खतरनाक वैश्विक चलन का हिस्सा है, जहां राजनीतिक दल बिना ठोस साक्ष्यों के अपनी हार स्वीकार करने के बजाय विक्टिम कार्ड खेलते हैं। ऐसा करके वे सीधे तौर पर मतदाताओं के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यह व्यवहार लोकतंत्र की जड़ों में संदेह का विष घोलता है, जिससे आम नागरिक का विश्वास चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं से डिगने लगता है।
परंतु, सिक्के का दूसरा पहलू सत्ता पक्ष और चुनाव प्रबंधन की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्षी दल बार-बार धांधली का शोर मचा रहे हैं, तो इसका एक बड़ा कारण सत्ता पक्ष द्वारा प्रशासनिक मशीनरी का कथित दुरुपयोग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में परिलक्षित होता झुकाव भी है। जब ईवीएम की सुरक्षा, वीवीपैट पर्चियों के मिलान और चुनाव की लंबी समय-सारणी पर पूर्ण स्पष्टता नहीं होती, तो संदेह को बल मिलता है। यह केवल हारने वाले की हताशा नहीं, बल्कि एक विश्वास का संकट है, जहां समान अवसर नदारद नजर आता है।
संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल के पद की कल्पना केंद्र और राज्य के बीच एक सेतु के रूप में की थी, लेकिन 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में यह पद एक अवरोधक के रूप में अधिक दिखाई दिया। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जिस तरह निर्वाचित सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव हुआ है, उसने संघीय मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर देने में मनमानी करना या विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए रोके रखना; ये कृत्य लोकतंत्र के अवरोध और संतुलन के सिद्धांत के विरुद्ध हैं। जब राजभवन राजनीतिक रणनीतियों का केंद्र बन जाता है, तो संघीय ढांचा केवल कागजों तक सीमित रह जाता है।
राजनीतिक नैतिकता का पतन उस समय चरम पर दिखता है, जब बहुमत न होने की स्थिति में जनादेश की चोरी को चाणक्य नीति का नाम देकर महिमा मंडन किया जाता है। विधायकों की खरीद-फरोख्त, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव के माध्यम से कराया गया दलबदल अब राजनीति की संज्ञा बन गई है। पिछले एक दशक में चुनावों के बाद जिस तरह से छोटे दलों और निर्दलीयों की नीलामी की खबरें आई हैं, वह मतदाताओं के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है।
भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां उसे आत्ममंथन की नितांत आवश्यकता है। समय की मांग है कि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को न केवल अक्षुण्ण रखे, बल्कि वह निष्पक्ष दिखे भी। राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या अनिवार्य है ताकि वे राजनीतिक मोहरे न बन सकें।
अंततः, हमें यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल संख्या बल का अंक गणित नहीं, बल्कि लोक-लाज और संवैधानिक नैतिकता की सतत परंपरा है। यदि संस्थाओं की गरिमा राजनीतिक विजय की वेदी पर बलि चढ़ा दी जाएगी, तो हम एक ऐसी चुनावी तानाशाही की ओर अग्रसर होंगे जहां मतदान तो होगा, परंतु जन-विश्वास अनुपस्थित रहेगा।यदि 2026 के ये चुनाव हमें कोई सबक देते हैं, तो वह यही है कि संस्थाओं की शुचिता किसी भी राजनीतिक जीत से ऊपर होनी चाहिए; अन्यथा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का गौरव केवल एक खोखला दावा बनकर रह जाएगा।
#अतुल_कुमार_श्रीवास्तव
#Atul_Kumar_Srivastava
सृजन, संरक्षण और क्रांति का त्रिकोण: मां
क्या मातृत्व केवल एक सुकोमल भावना है? या यह उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पुंज है जिसे दर्शन ने आदि-शक्ति के रूप में परिभाषित किया है? मई माह का दूसरा रविवार कैलेंडर का कोई सामान्य पृष्ठ पर अंकित दिन मात्र नहीं, अपितु उस अदृश्य धुरी के प्रति कृतज्ञता अर्पण करने का क्षण है, जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व परिक्रमा करता है। जिसे संपूर्ण विश्व 'मदर्स डे' के रूप में मनाता है, वह केवल औपचारिक उपहारों या शुभकामनाओं का विनिमय नहीं, बल्कि उस असीम और अजेय ऊर्जा के उत्सव का दिन है जिसे हम 'माँ' कहते हैं। 1907 में अन्ना जार्विस ने जिस स्मृति-परंपरा की नींव रखी, वह भारत की चेतना में समाहित होकर और भी अधिक गहन और बहुआयामी हो गई है। भारतीय मनीषा में माँ केवल एक पारिवारिक इकाई नहीं, बल्कि आदि-शक्ति का मूर्त स्वरूप है।
भारतीय दर्शन में नारी को 'शक्ति' के रूप में स्वीकार किया गया है। शक्ति जो सृजन, पोषण और संहार का त्रिवेणी संगम है। जब हम माँ को आदि-शक्ति की संज्ञा देते हैं, तो हमारा मंतव्य उस चेतन ऊर्जा से होता है जिसके अभाव में शिव भी शव तुल्य हैं। यह वही ऊर्जा है जो घरों की चारदीवारी में ममत्व की वर्षा करती है और धर्म की रक्षा हेतु आवश्यकता पड़ने पर रणचंडी बनकर अधर्म का उच्छेदन भी करती है।
भारत में मातृत्व का एक अत्यंत गौरवशाली और दिलों पर राज करने का उदाहरण इतिहास में पन्नाधाय के रूप में सुरक्षित है। उनका परोपकार और त्याग विश्व इतिहास में अद्वितीय है। चित्तौड़ के उत्तराधिकारी उदयसिंह को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े चंदन को काल के गाल में समर्पित कर दिया। पन्नाधाय का यह युगांतरकारी त्याग सिद्ध करता है कि माँ केवल जन्मदात्री नहीं, अपितु राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए अपनी कोख का उत्सर्ग करने वाली महामाता भी है। उनका यह कृत्य मातृत्व को व्यक्तिगत मोह के संकुचित घेरे से निकालकर कर्तव्य के उच्चतम शिखर पर प्रतिष्ठित करता है। इतिहास साक्षी है कि यह माँ का ही अदम्य मार्गदर्शन था जिसने एक बालक के भीतर छत्रपति बनने के स्वप्न को रोपित किया।
लोक-मानस में कैकेयी को प्रायः नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाता है, किंतु उनके चरित्र का एक विद्रोहात्मक और रणनीतिक पक्ष भी है। उनका राम को वनवास भेजना केवल पुत्र-मोह का परिणाम नहीं, अपितु तत्कालीन जड़ व्यवस्था के विरुद्ध एक साहसिक विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने नियति के उस चक्र को गति प्रदान की जिसके बिना रावण का दलन और राम का मर्यादा पुरुषोत्तम बनना असंभव था। यदि हम पूर्वाग्रहों को त्याग कर देखें, तो कैकेयी एक क्रांतदर्शी माँ के रूप में उभरती हैं, जिन्होंने स्वयं पर कलंक का विषपान करना स्वीकार किया ताकि राम को वह वनवास मिल सके जो उन्हें ईश्वरत्व की ओर ले जाने वाला मार्ग था। एक माँ जब अपनी सामाजिक छवि की चिंता किए बिना कोई कठोर निर्णय लेती है, तो वह समकालीन समाज के लिए अप्रिय हो सकती है, किंतु वह इतिहास की दिशा को आमूल-चूल बदलने की क्षमता रखती है।
इस मदर्स डे पर हमें माँ के केवल सौम्य और शांत स्वरूप की ही वंदना नहीं करनी, बल्कि उनके ओजस्वी, त्यागमय और विद्रोही रूप को भी नमन करना चाहिये। मातृत्व का हर रंग वंदनीय है: चाहे वह अन्ना जार्विस का आदर्श हो, पन्नाधाय का अनुपम बलिदान हो या कैकेयी का दृढ़ संकल्प। आइए, हम अपनी अंतरात्मा से उस आदि-शक्ति का साक्षात्कार करें जो करुणा और शौर्य का शाश्वत प्रतीक है। हमें याद रखना होगा कि, "जिन सुकोमल हाथों से पालने को झूला झुलाने की कला होती है, समय आने पर वही सुकोमल हाथ तलवार थामकर इतिहास के प्रवाह को मोड़ने का सामर्थ्य भी रखते हैं।
अतुल कुमार श्रीवास्तव
गुरुवार, मई 07, 2026
लोकतंत्र में लापता होता मतदाता और संकट में लोकतंत्र
साथियों, लोकतंत्र की विशाल अट्टालिका की नींव जनता का मत और उसकी भागीदारी पर टिकी होती है। भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि देश के भविष्य का ब्लूप्रिंट होती है। लेकिन जब इस सूची से लाखों नाम संदिग्ध रूप से गायब होने लगें, तो यह केवल एक तकनीकी चूक (Technical Glitch) नहीं बल्कि एक गहरे संवैधानिक संकट की आहट है। वर्तमान समय में बिना पारदर्शिता और जवाबदेही के चुनावी प्रक्रिया महज एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह गई है, जो जनमत के साथ सबसे बड़ा क्रूर मजाक है।
हाल ही में चुनाव आयोग व प्रशासनिक कार्यप्रणाली ने डिजिटल इंडिया के दावों के बीच एक नया शब्द उछाल दिया है डिलीट इंडिया..! लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे पवित्र इकाई मतदाता है; लेकिन जब 64 लाख में से 27 लाख जैसे भारी-भरकम संख्या में मतदाताओं के नाम गायब होने के दावे सामने आये हैं, जिससे देश के सर्वोच्च संस्थानों भारतीय चुनाव आयोग और न्यायपालिका की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। प्रशासनिक लापरवाही का यह स्वरूप अक्सर एक सोची-समझी रणनीति जैसी प्रतीत हो रही है, जहां Standard Inspection Report (SIR) और पुनरीक्षण प्रक्रिया कागजों पर तो पुख्ता दिखती है, किंतु धरातल पर पूरी तरह खोखली साबित होती है।
मतदाता सूची में हेरफेर और विलोपन का सबसे चिंताजनक उदाहरण विधानसभा चुनाव -2026 में पश्चिम बंगाल में देखने को मिला है। बंगाल के चुनावी परिदृश्य में मतदाता सूची हमेशा से विवादों के केंद्र में रही है। विभिन्न स्वतंत्र नागरिक समूहों की रिपोर्ट बताती है कि बंगाल के कई निर्वाचन क्षेत्रों, विशेषकर सीमावर्ती जिलों (जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना) में नाम काटने की दर राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक रही है। इसके पहले भी 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले, बंगाल में आधार कार्ड को डी-एक्टिवेट करने और उसे मतदाता पहचान पत्र से लिंक करने की प्रक्रिया के दौरान हजारों नागरिकों ने शिकायत की कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना या कारण बताओ नोटिस के चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। यह सीधे तौर पर नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का हनन है।
यदि इतने बड़े पैमाने पर नाम काटे गए हैं, तो इसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं: बंगाल में बीएलओ (BLO) की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक दखल ने यह साबित किया है कि चुनावी प्रक्रिया को सत्ता के अनुकूल ढालने के लिए सत्यापन प्रक्रिया की अनदेखी की गई। या नाम काटने से पहले उचित सत्यापन और कारण बताओ नोटिस की कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया? इन कारणों पर संस्थानों की चुप्पी जनता का संशय मजबूत कर देती है।
लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ चुनाव आयोग और न्यायपालिका आज कटघरे में हैं। जब एक आम नागरिक इन संस्थानों की ओर उम्मीद से देखता है और उसे वहां से केवल प्रक्रियात्मक देरी या तकनीकी दलीलें मिलती हैं, तो व्यवस्था से भरोसा उठना एक स्वाभाविक परिणति बन जाती है। भारत का वर्तमान दौर जिस प्रशासनिक मनमानी की ओर बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र को सीरिया या पाकिस्तान जैसी अराजकता की ओर धकेल सकता है, जहां संस्थाएं संविधान के बजाय व्यक्ति-विशेष या सत्ता के अधीन हो जाती हैं।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक भी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटना केवल एक व्यक्ति का अधिकार छिनना नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की सूक्ष्म हत्या का प्रयास है। इससे बचने और लोकतंत्र को बचाने के लिए मतदाता सूची से नाम हटाने (Deletion) की प्रक्रिया का एक स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट होना चाहिए, ताकि डिजिटल हेरफेर पकड़ी जा सके। साथ ही यदि तकनीक के माध्यम से नाम हटाए जा सकते हैं, तो मतदाता को 'SMS' या 'ईमेल' के जरिए तत्काल सूचित किया जाना चाहिए? क्या पारदर्शिता केवल सरकार की व्यक्तिगत सुविधा और मनमानी तक ही सीमित होनी चाहिए? समय की मांग है कि देश का सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को स्वतः संज्ञान (Suo Moto) में लेते हुए सख्त मानक तय करे।
लोकतंत्र भले ही संख्या का खेल हो, लेकिन इसका प्राण तत्व जनता का विश्वास है। लाखों मतदाताओं का सूची से बाहर होना एक गंभीर चेतावनी है। यदि आज हम इस संस्थागत ढिलाई और प्रशासनिक तानाशाही पर मौन रहे, तो भविष्य में वोट की चोट शब्द केवल राजनीतिक मुहावरों और इतिहास की किताबों तक सीमित रह जाएगा। वक्त आ गया है कि व्यवस्था से तीखे सवाल पूछे जाएं, क्योंकि सवाल पूछना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार व लोकतांत्रिक धर्म है।
#अतुल_कुमार_श्रीवास्तव
#Atul_Kumar_Srivastava
मंगलवार, मई 05, 2026
लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और चुनावी निष्पक्षता
आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद से राजनीतिक दल अपनी नीतियों के आधार पर चुनाव लड़ते आए हैं, और आदर्श रूप में नीतियों पर ही चुनाव लड़ा जाना चाहिए। लेकिन पिछले लगभग दो दशकों से केंद्र की सत्ता पर काबिज दल द्वारा सरकारी मशीनरी और संस्थाओं के कंधों पर बंदूक रखकर परिणामों को प्रभावित करने की कोशिशों के आरोप लगते रहे हैं। 2026 के पश्चिम बंगाल के परिणाम, आम आदमी पार्टी में फूट और फिर विशिष्ट दल का दामन थामना, बिहार में सत्ता परिवर्तन, और मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना, ये तथ्य यही संदेश देते हैं कि सरकारी दबाव के शोर में जनता की अपनी आवाज को पहचान पाना मुश्किल होता जा रहा है।
सत्तारूढ़ दल का पूरी शक्ति से चुनाव लड़ना सराहनीय हो सकता है, लेकिन पूरी सरकारी मशीनरी को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना अनैतिक और अलोकतांत्रिक है। लोकतंत्र में साधन (Means) उतने ही पवित्र होने चाहिए जितना कि साध्य (Goal)। यदि व्यक्तिगत चेहरे को सर्वोपरि दिखाने के लिए संस्थाओं को पंगु बनाकर सत्ता हासिल की जाती है, तो वह वास्तव में लोकतंत्र की जीत नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की तानाशाही है।
किसी भी लोकतांत्रिक देश में यदि सरकारी मशीनरी किसी एक व्यक्ति या दल के लिए चुनावी हथियार की तरह काम करने लगती है, तो जनता का भरोसा टूटने लगता है। आम नागरिक यह सोचने पर विवश हो जाता है कि वोट देने से क्या लाभ, जब मशीनरी ही पक्षपाती है? यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की मृत्यु के पथ पर अग्रसर होने का पहला चरण होता है। जब संवैधानिक रास्ते बंद या पक्षपाती महसूस होते हैं, तो लोग सड़कों पर उतरते हैं या हिंसा का सहारा लेते हैं, जो राज्य और जनमानस के लिए अत्यंत घातक है। मणिपुर और असम के घटनाक्रम इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।
सत्ता पक्ष द्वारा केंद्रीय बलों की तैनाती को सुरक्षा का नाम दिया जाता है। लेकिन यदि इन बलों का उपयोग मतदाताओं को हतोत्साहित करने या किसी विशेष दल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए होने लगे, तो यह सुरक्षा नहीं बल्कि रणनीतिक घेराबंदी है। यह सीधे तौर पर मतदाता के स्वतंत्र विवेक पर प्रहार है। लोकतंत्र की सुंदरता शक्ति के संतुलन में है। जब सत्ता का सारा केंद्र एक ही ओर झुकने लगे, तो नागरिक सतर्कता ही उसे वापस पटरी पर ला सकती है।
पिछले कुछ वर्षों से निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के निर्णयों को लेकर विवाद गहराया है। कई चरणों में चुनाव कराने की लंबी प्रक्रिया ने विपक्षी दलों को यह आरोप लगाने का अवसर दिया कि यह सत्ताधारी दल को लाभ पहुँचाने की कोशिश है। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब संस्थाएं न केवल निष्पक्ष हों, बल्कि निष्पक्ष दिखें भी।
ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में न्यायपालिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल के वर्षों में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और चुनावी बॉण्ड (Electoral Bonds) पर ऐतिहासिक निर्णय यह दर्शाते हैं कि जब संस्थाएं अपनी रीढ़ खोने लगती हैं, तब न्यायपालिका ही शक्ति के असंतुलन को रोकने का अंतिम प्रयास करती है। हालांकि, न्यायपालिका की भी एक सीमा है; वह नीतिगत हस्तक्षेप तो कर सकती है, लेकिन धरातल पर प्रशासनिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना अंततः संवैधानिक संस्थाओं की अपनी जवाबदेही है।
लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं है, बल्कि यह उन मर्यादाओं और संस्थागत मूल्यों का संगम है जो अल्पसंख्यक और विपक्षी स्वरों को भी समान स्थान देते हैं। यदि चुनावी जीत को ही एकमात्र लक्ष्य मान लिया जाए, तो उसके साधन अक्सर अनैतिकता की भेंट चढ़ जाते हैं।
संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की परिकल्पना एक तटस्थ प्रहरी के रूप में की थी, न कि किसी दल के विस्तारवादी औजार के रूप में। लोकतंत्र की नींव मतपेटी में नहीं, बल्कि उस विश्वास पर टिकी है कि मतपेटी तक पहुँचने वाला हर नागरिक भयमुक्त और स्वतंत्र है। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए केवल सजग नागरिक ही नहीं, बल्कि एक निर्भीक और स्वतंत्र न्यायपालिका का होना भी अनिवार्य है जो सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगा सके।
#अतुल_कुमार_श्रीवास्तव
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