Tuesday, May 05, 2026

लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और चुनावी निष्पक्षता

आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद से राजनीतिक दल अपनी नीतियों के आधार पर चुनाव लड़ते आए हैं, और आदर्श रूप में नीतियों पर ही चुनाव लड़ा जाना चाहिए। लेकिन पिछले लगभग दो दशकों से केंद्र की सत्ता पर काबिज दल द्वारा सरकारी मशीनरी और संस्थाओं के कंधों पर बंदूक रखकर परिणामों को प्रभावित करने की कोशिशों के आरोप लगते रहे हैं। 2026 के पश्चिम बंगाल के परिणाम, आम आदमी पार्टी में फूट और फिर विशिष्ट दल का दामन थामना, बिहार में सत्ता परिवर्तन, और मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना, ये तथ्य यही संदेश देते हैं कि सरकारी दबाव के शोर में जनता की अपनी आवाज को पहचान पाना मुश्किल होता जा रहा है। सत्तारूढ़ दल का पूरी शक्ति से चुनाव लड़ना सराहनीय हो सकता है, लेकिन पूरी सरकारी मशीनरी को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना अनैतिक और अलोकतांत्रिक है। लोकतंत्र में साधन (Means) उतने ही पवित्र होने चाहिए जितना कि साध्य (Goal)। यदि व्यक्तिगत चेहरे को सर्वोपरि दिखाने के लिए संस्थाओं को पंगु बनाकर सत्ता हासिल की जाती है, तो वह वास्तव में लोकतंत्र की जीत नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की तानाशाही है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में यदि सरकारी मशीनरी किसी एक व्यक्ति या दल के लिए चुनावी हथियार की तरह काम करने लगती है, तो जनता का भरोसा टूटने लगता है। आम नागरिक यह सोचने पर विवश हो जाता है कि वोट देने से क्या लाभ, जब मशीनरी ही पक्षपाती है? यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की मृत्यु के पथ पर अग्रसर होने का पहला चरण होता है। जब संवैधानिक रास्ते बंद या पक्षपाती महसूस होते हैं, तो लोग सड़कों पर उतरते हैं या हिंसा का सहारा लेते हैं, जो राज्य और जनमानस के लिए अत्यंत घातक है। मणिपुर और असम के घटनाक्रम इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। सत्ता पक्ष द्वारा केंद्रीय बलों की तैनाती को सुरक्षा का नाम दिया जाता है। लेकिन यदि इन बलों का उपयोग मतदाताओं को हतोत्साहित करने या किसी विशेष दल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए होने लगे, तो यह सुरक्षा नहीं बल्कि रणनीतिक घेराबंदी है। यह सीधे तौर पर मतदाता के स्वतंत्र विवेक पर प्रहार है। लोकतंत्र की सुंदरता शक्ति के संतुलन में है। जब सत्ता का सारा केंद्र एक ही ओर झुकने लगे, तो नागरिक सतर्कता ही उसे वापस पटरी पर ला सकती है। पिछले कुछ वर्षों से निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के निर्णयों को लेकर विवाद गहराया है। कई चरणों में चुनाव कराने की लंबी प्रक्रिया ने विपक्षी दलों को यह आरोप लगाने का अवसर दिया कि यह सत्ताधारी दल को लाभ पहुँचाने की कोशिश है। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब संस्थाएं न केवल निष्पक्ष हों, बल्कि निष्पक्ष दिखें भी। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में न्यायपालिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल के वर्षों में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और चुनावी बॉण्ड (Electoral Bonds) पर ऐतिहासिक निर्णय यह दर्शाते हैं कि जब संस्थाएं अपनी रीढ़ खोने लगती हैं, तब न्यायपालिका ही शक्ति के असंतुलन को रोकने का अंतिम प्रयास करती है। हालांकि, न्यायपालिका की भी एक सीमा है; वह नीतिगत हस्तक्षेप तो कर सकती है, लेकिन धरातल पर प्रशासनिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना अंततः संवैधानिक संस्थाओं की अपनी जवाबदेही है। लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं है, बल्कि यह उन मर्यादाओं और संस्थागत मूल्यों का संगम है जो अल्पसंख्यक और विपक्षी स्वरों को भी समान स्थान देते हैं। यदि चुनावी जीत को ही एकमात्र लक्ष्य मान लिया जाए, तो उसके साधन अक्सर अनैतिकता की भेंट चढ़ जाते हैं। संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की परिकल्पना एक तटस्थ प्रहरी के रूप में की थी, न कि किसी दल के विस्तारवादी औजार के रूप में। लोकतंत्र की नींव मतपेटी में नहीं, बल्कि उस विश्वास पर टिकी है कि मतपेटी तक पहुँचने वाला हर नागरिक भयमुक्त और स्वतंत्र है। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए केवल सजग नागरिक ही नहीं, बल्कि एक निर्भीक और स्वतंत्र न्यायपालिका का होना भी अनिवार्य है जो सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगा सके। #अतुल_कुमार_श्रीवास्तव #Atul_Kumar_Srivastava

गंगा एक्सप्रेसवे: आधुनिकता की रफ्तार, या उजाड़ होती विरासत और जीविका?

उत्तर प्रदेश का गंगा एक्सप्रेसवे विकास के उस मॉडल का उदाहरण है जिसे जबरन थोपा गया है। जब तक विकास की योजनाओं में स्थानीय पारिस्थितिकी, आम आदमी की सहमति और निविदाओं में पूर्ण पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक इन्हें सार्थक प्रगति नहीं कहा जा सकता। पर्यावरण को तबाह करके और अपने करीबियों की तिजोरियां भरकर बनाया गया यह एक्सप्रेसवे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक कर्ज और उजाड़ विरासत छोड़कर जाएगा। असली विकास कंक्रीट की सड़कों में नहीं, बल्कि सुरक्षित पर्यावरण और पारदर्शी शासन में बसता है। अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए सरकार दावा कर रही है कि एक्सप्रेसवे के किनारे इंडस्ट्रियल क्लस्टर बनेंगे और रोजगार मिलेगा। हकीकत से लगभग सभी परिचित हैं कि अब तक कितने इंडस्ट्रियल क्लस्टर बने और क्षेत्रीय लोगों को कितना रोजगार मिला? दूसरी हकीकत यह है कि इन उद्योगों का स्वामित्व भी उन्हीं बड़े समूहों के पास होगा जिन्हें निर्माण का ठेका मिला है। स्थानीय ग्रामीण यहाँ केवल न्यूनतम मजदूरी पर श्रमिक बनकर रह जाएंगे, जबकि उनकी जमीन का लाभ बड़े कॉर्पोरेट ही उठाएंगे। उत्तर प्रदेश के मानचित्र पर मेरठ से प्रयागराज तक खिंची 594 किलोमीटर लंबी लकीर को सरकार प्रगति का पथ बता रही है। गंगा एक्सप्रेसवे को राज्य के सबसे बड़े आर्थिक बुनियादी ढांचे के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन इसकी भव्यता के नीचे मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज जनपदों के आम नागरिकों की पीड़ा और प्रकृति की सिसकियां दबी हुई हैं। आज यह प्रश्न पूछना अनिवार्य हो गया है कि क्या यह एक्सप्रेसवे वाकई जनहित में है, या यह केवल क्रोनी कैपिटलिज्म और पर्यावरणीय अनदेखी का एक नया अध्याय है? विकास और प्रगति के नाम पर इस एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए प्रकृति की जो बलि दी गई है, उसकी भरपाई नामुमकिन है। मेरठ से प्रयागराज के बीच के हरे-भरे बेल्ट को पूरी तरह साफ कर दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए लगभग 6 लाख से अधिक पुराने और फलदार पेड़ों को काट दिया गया है। इनमें से अधिकांश पेड़ दशकों पुराने थे, जो न केवल ऑक्सीजन देते थे बल्कि स्थानीय तापमान को भी नियंत्रित रखते थे। क्या पारिस्थितिकी का विनाश ही आज विकास की परिभाषा है? एक्सप्रेसवे के निर्माण से वन्यजीवों के गलियारे नष्ट हो गए हैं और भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge) की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हुई है। कंक्रीट की यह विशाल पट्टी 'हीट आइलैंड' प्रभाव पैदा कर रही है, जिससे आसपास के गांवों का तापमान बढ़ रहा है और जीवन दूभर होता जा रहा है। गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना की सबसे विवादास्पद कड़ी इसकी निविदा प्रक्रिया और ठेकों का वितरण रहा है। आरोप है कि इस मेगा प्रोजेक्ट का उपयोग जनसेवा से अधिक पूंजीपति मित्रों को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया। परियोजना के बड़े हिस्से के ठेके उन गिने-चुने कॉर्पोरेट घरानों को दिए गए, जो सत्ता के करीबी माने जाते हैं। प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव और शर्तों को बड़े खिलाड़ियों के पक्ष में करने के कारण स्थानीय और मध्यम स्तर के ठेकेदारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यह केवल एक सड़क का निर्माण नहीं है, बल्कि सार्वजनिक धन का बड़े कॉर्पोरेट समूहों के साथ साठगांठ कर हस्तांतरण करने की प्रक्रिया मात्र है। जब चुनिंदा समूहों को हज़ारों करोड़ के ठेके दिए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर एकाधिकार (Monopoly) को बढ़ावा देता है। यह न केवल भ्रष्टाचार की संभावनाओं को जन्म देता है, बल्कि उसका पोषण और संरक्षण भी करता है। जब उत्तर प्रदेश में पहले से मौजूद एक्सप्रेसवे (जैसे आगरा-लखनऊ और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे) अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, तो एक और एक्सप्रेसवे के लिए हज़ारों करोड़ खर्च करना और लाखों पेड़ काटना कहाँ तक तर्कसंगत है? पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर की अनदेखी की जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप राज्य के अधिकांश राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग (NH/SH) बदहाली का शिकार हैं। यदि सरकार की मंशा वास्तविक विकास की होती, तो नए विनाशकारी निर्माण के बजाय मौजूदा सड़क नेटवर्क को सुदृढ़ किया जा सकता था। भारी टोल टैक्स और वैकल्पिक मार्गों की मौजूदगी के कारण यह डर बना हुआ है कि यह एक्सप्रेसवे भी केवल 'सफेद हाथी' बनकर रह जाएगा, जबकि इसकी लागत का बोझ अंततः आम जनता पर ही पड़ेगा। गंगा एक्सप्रेसवे के लिए उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण ने छोटे किसानों को भूमिहीन बना दिया है। मुआवजे की राशि से जीवनयापन और सुरक्षित भविष्य संभव नहीं है। यह राशि अक्सर शिक्षा या सही निवेश के अभाव में समाप्त हो जाती है और किसान व उसका परिवार दिहाड़ी मजदूर बनने को विवश हो जाता है। जबकि खेती से मिलने वाला अनाज परिवार के साथ-साथ समाज का भरण-पोषण करता है। भूमि से मिलने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी आजीविका हमेशा के लिए छिन गई है। एक्सप्रेसवे ने गांवों को दो हिस्सों में बांट दिया है। स्थानीय लोगों के लिए सड़क पार करना अब एक बड़ी चुनौती है, जिससे उनके सामाजिक रिश्ते और रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं। सरकारी चश्मे से गंगा एक्सप्रेसवे का निर्माण आधुनिक उत्तर प्रदेश की एक महत्वाकांक्षी तस्वीर पेश करता है, लेकिन इसके पीछे छिपे पर्यावरण विनाश, किसानों की बेबसी और पूंजीवादी हितों के गठजोड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि विकास का लाभ केवल उन बड़ी कंपनियों तक सीमित रह जाता है जिन्हें इसके ठेके मिले हैं और आम नागरिक केवल अपनी जमीन और हरियाली खोकर धूल फांकने पर मजबूर है, तो ऐसे विकास की सार्थकता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। असली प्रगति वह है जहाँ एक्सप्रेसवे की रफ़्तार के साथ-साथ स्थानीय पर्यावरण सुरक्षित रहे और निविदाओं में पारदर्शिता के जरिए जनता के धन का सही उपयोग हो, न कि इसे पसंदीदा समूहों की तिजोरियां भरने का माध्यम बनाया जाए। समृद्ध विरासत वह है जहां आधुनिकता और प्रकृति सह-अस्तित्व में हों और जहां की योजनाएं ऊपर से नीचे (Top-down) थोपने के बजाय नीचे से ऊपर (Bottom-up) यानी आम आदमी की सहभागिता से बनी हों। हम आने वाली पीढ़ी को रफ़्तार तो दे रहे हैं, लेकिन उनसे सांसें और जमीन छीन रहे हैं। विकास का पैमाना केवल जीडीपी नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और पारिस्थितिक स्थिरता होना चाहिए। अतुल कुमार श्रीवास्तव

Thursday, January 09, 2025

विपक्ष की परिभाषा से अंजान है कांग्रेस

साथियों जय हिन्द... हम पढ़ते आए हैं कि विपक्ष की मुख्य भूमिका मौजूदा सरकार से सवाल पूछना और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है। इससे सत्तारूढ़ दल को अपनी गलत नीतियों और गतिविधियों को सुधारने के लिए विवश होना पड़ता है। जिस कारण देश के लोगों के सर्वोत्तम हितों को बनाए रखने में विपक्ष भी समान रूप से जिम्मेदार है। लेकिन क्या आज ऐसा है? #विपक्ष क्या होता है और विपक्ष को कैसे काम करना चाहिए इस बात को गंभीरता से समझने के लिए हमको चलना होगा #यूपीए-2 के दौर में जब देश में #भारतीय_जनता_पार्टी और उसके सहयोगी दल जिसे #एनडीए के नाम से जाना जाता था और जब यही एनडीए विपक्ष में थी... उस #समय जनता से जुड़े छोटे से छोटे #मुद्दे पर उसके सारे बड़े-बड़े नेता सड़कों पर आंदोलन करते थे। कभी #गैस_सिलेंडर लेकर, कभी #प्याज ले कर तो कभी #पेट्रोल के बढ़ते दामों पर तो कभी #अरहर की दाल...तो कभी भ्रष्टाचार। #भाजपा द्वारा आयोजित ऐसे ही आन्दोलनों की वजह से लोगों को लगा ये हमारे #मुद्दे की बात करते हैं, जिसका परिणाम यह हुआ कि #2014 में इन्हें सरकार बना पाने में सफलता हासिल हुई और सारे तथाकथित आंदोलनकारी मंत्री बने... एक तो योगगुरु बनकर पूरा साम्राज्य बना डाला तो दूसरा कुंभकर्णी नींद में सो गया और कुछ बिजनेस ट्राईकून के रूप में पहचाने जाने लगे। लेकिन पिछले 10-11 वर्षों में #कांग्रेस को ले लीजिए... इनके सारे नेता सिर्फ #प्रेस_कांफ्रेंस करते हैं या बड़ी सभाओं में #भाषण देने के लिए मंच पर दिखाई देते हैं। जैसे #के _सी_वेणुगोपाल, #जय_राम_रमेश, #सुरजेवाला, #अलका_लांबा, #अधीर_रंजन_चौधरी, #अशोक_गहलोत, #अंबिका_सोनी, #मुकुल_वासनिक, #आनंद_शर्मा, #अजय_माकन, #कुमारी_शैलजा, #सलमान_खुर्शीद, #जितेंद्र_सिंह, #दीपक_बाबरिया जैसे सैकड़ों नेताओं की लंबी-चौड़ी लिस्ट है जिन्हें कभी भी जमीनी आंदोलन में जनता के हक के लिए लड़ते नहीं देखा गया... इसके इतर जब कांग्रेस सत्ता में आएगी तो यह सब मंत्री बनने के लिए सबसे पहली लाइन में खड़े दिखाई देंगे। इन सबने कांग्रेस की व जनता के हितों की, जन आंदोलन की सारी जिम्मेदारी #राहुल_गांधी को दे रखी है। आंदोलन कोई भी हो राहुल जाए, पीड़ितों से मिलने राहुल जाए, सड़क पर पैदल राहुल गांधी चले...यानी ये सिर्फ राहुल गांधी के सहारे सत्ता चाहते हैं। अगर ये नेता जनता से जुड़े छोटे से छोटे मुद्दे पर सड़कों पर उतर कर आन्दोलन करते या अब भी वक्त है करना आरंभ कर दें सिर्फ अपने-अपने ही क्षेत्र में तो राहुल गांधी की ताकत कम से कम 50 गुना अपने आप ही बढ़ जायेगी। लेकिन यह नेता वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत की सरकार लालफीताशाही की तर्ज पर विपक्ष मुक्त हो जाएगी। याद रखो कांग्रेसियों राहुल गांधी अकेले सत्ता नहीं दिला सकते, जो हालत तुम लोगों की गलत नीतियों की वजह से आज कांग्रेस की है इससे भी कई गुना बुरी हालत में पहुंचाने का सेहरा भी तुम एक दूसरे के सिर पर बांधते नजर आओगे या फिर बिना किसी संकोच के दल परिवर्तित अपना उल्लू सीधा करते दिखाई दोगे। वर्तमान अध्यक्ष @मल्लिकार्जुन_खरगे और राहुल गांधी को अभी तक समझ क्यों नहीं आ रहा की कांग्रेस इन सब नेताओं के नकारापन की वजह से हार रही है। लेकिन ये दोनों कठोर निर्णय क्यों नहीं ले पा रहे हैं, यह अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है। जहां तक हमारा मानना है कि इन सभी नाकारा नेताओं से ज्यादा बड़े जिम्मेदार राहुल गांधी और खरगे स्वयं हैं। अगर यह बैठक में यह निर्णय ले लें कि महीने में हर नेता को कम से कम 2 आन्दोलन करने ही करने हैं तो देश में जरूरी मुद्दों पर आन्दोलन चालू हो जायेंगे। सरकार को जनहित के काम करने ही पड़ेंगे। लेकिन ना तो राहुल गांधी ना खरगे किसी को कुछ मतलब ही नहीं रह गया। अगर यह नेता सड़कों पर उतर कर विपक्ष का असली काम नहीं करेंगे तो कभी सत्ता में वापस नहीं आ सकते। यह विपक्ष का राजधर्म है और इस परिपाटी को ही कहते हैं विपक्ष... समझे कांग्रेसियों।

Saturday, December 18, 2021

वास्तविकता को नजरंदाज करते हमारे प्रधान

 भारत के लिए अभिशाप बनकर आया वह मनहूस जिसने वाडमेर रेलवे स्टेशन बनने से पहले ही चाय बेचनी शुरू कर दी थी वह भी दो रुपए में जब दिल्ली में 50 पैसे में भरपेट नाश्ता मिलता था। उसके इस झूठ पर हम भावनात्मक रूप से मुग्ध हो गये कि यह गरीब परिवार से है और बिना सत्य का आंकलन किये उसके झूठ को, उसके फरेब को सत्य मान बैठे, और अपने परिवार को, अपनी पत्नी को धोखा देने वाले को 2014 में सम्पूर्ण भारत की कमान दे दी और फिर मदारी ने वही राग अलापना, वही डमरू बजाना शुरू किया जिसके खिलाफ वह 2014 से पहले बोलता था। जिसने 2014 से पहले आधार को बकवास योजना बताई थी उसी को जरूरी करार दे दिया। जी एस टी के मूल स्वरूप को भ्रमात्मक व व्यवसायियों की कमर तोड़ने वाला बताया था उसको स्वीकार कर आर्थिकी स्थिति को मजबूत करने वाला बताकर जबरन थोप दिया। डीजल-पेट्रोल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों के बढ़ने पर उससे पड़ने वाले अधिभार पर सरकार की विफलता बताने वाला आज पिछले सात वर्षों से मुंह में दही जमाकर बैठा है। मंहगाई कम करना जिसका नारा था अब वह मंहगाई के लिए बेचारा है। अपनी विफलताओं को पिछले 70 साल की जुमलेबाजी में लपेटकर वाहवाही लूटने वाले लूटेरे ने 70 सालों में बने सरकारी संस्थाओं को बेंचकर लूटने का काम किया और उल्टा सवाल करता है कि पिछले 70 सालों में नेहरू और कांग्रेस ने किया क्या है? इतिहास की मानें तो मुगलों ने मंदिरों को लूटा लेकिन इसने तो चौकीदार बनकर अपने आकाओं के साथ बैंकों को लूटा और फिर सरकारी संस्थाओं को बेंच डाला और अब वह...

✍️आजकल वह मैं देश नहीं बिकने दूंगा, जैसी खुबसूरत बातें नहीं करता।


✍️अब वह स्विस बैंकों में जमा काला धन जो अब डबल हो चुका है, पर बात नहीं करता।


✍️अब वो सब के खाते में 15-15 लाख रुपए आने की बात नहीं करता


✍️अब वह डॉलर के मुकाबले गिरते रुपए पर बात नहीं करता, अब वह जिस देश का रुपया गिरता है उस देश के प्रधानमंत्री की इज्जत गिरती है, ऐसी बातें नहीं करता।


✍️अब वह देश की गिरी हुई जी. डी. पी. पर मुंह नहीं खोलता, न अब वह देश में हो रहे बलात्कारों व अत्याचारो पर बात करता है।


✍️अब वो दागी मंत्रियों व नेताओं पर बात नहीं करता।


✍️अब वह महिलाओं की सुरक्षा व जमाखोरी पर बात नहीं करता।


✍️अब वह मिलावटखोरी पर बात नहीं करता, न अब वह रिश्वतखोरी पर बात करता है।


✍️अब वह स्मार्ट सिटी बनाने की बात नहीं करता, न ही अब वो बुलेट ट्रेन की बात करता है। अब तो वह अच्छे दिनों की भी बात नहीं करता।


✍️अब वह किसानों की आय दोगुनी करने की बात नहीं करते, अब तो वह बेरोजगारों को रोजगार देने की भी बात नहीं करते। अब वो सबको शिक्षा सबको रोजगार की बात भूल ही गये हैं।


✍️अब वह डीजल-पेट्रोल पर बात नहीं करते, गैस सिलेंडर के आए दिनों बढ़ते दामों पर तो बात ही नहीं करना चाहते!


✍️अब वह रेलवे व अन्य यातायात के साधनों पर बढ़ते किराए पर बात नहीं करता, वह हवाई चप्पल पहनने वालों को हवाई यात्रा कराने की भी बात नहीं करता।


✍️अब वह खाद्य पदार्थों पर बेहताशा बढ़ती महंगाई पर नहीं करता, अब वह बढ़ती हुई महंगाई पर मौन व्रत धारण किए हुए हैं।


✍️अब वह देश में बढ़ती बेरोजगारी पर बात नहीं करता। अब वह साल में 2 करोड रोजगार देने की बात नहीं करता। 


✍️अब वह जनता को राहत देने की बात के लिए मुंह नहीं खोलते न ही अब वो सब को न्याय देने की बात करते हैं।


✍️अब वह चीन को लाल आंखें दिखाने की बात नहीं करते... अब तो वह एक के बदले 10 सिर लाने की बात भी नहीं करते।


सोचिए क्यों..? आखिर क्यों बात तक नहीं करते उन सभी मुद्दों पर जिनके बल पर देश की सर्वोपरि आसन पर बिठाया गया, आखिर क्यों? पहले भी उनकी कोई भी बात में गंभीरता न थी क्योंकि यह और इनका पितृ संगठन केवल भारत को साम्प्रदायिकता में झोंकने के लिए गंभीर रहा है। इनका मकसद सिर्फ सत्ता सुख हासिल करना है, वास्तविक मुद्दों और जमीनी हकीकत से इनका कोई लेना-देना नहीं है। जय हिन्द... जय भारत।

Saturday, June 06, 2020

बच्चों और पत्नी की हत्या कर खुद को लगाती फांसी।


👉  तीन मासूमों और पत्नी की हत्या कर पति ने आखिर क्योंकि आ




त्महत्या?
✍️ इन हत्याओं का आखिर गुनहगार कौन?
✍️ घर का मुख्य दरवाजा एक फिर भी अपने बेटे-बहू और मासूम बच्चों से मतलब क्यों नहीं?
✍️ आखिर 30-35 लाख की कर्जदारी किसकी और किस आधार पर दिया?
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से सटे  बाराबंकी जिले सफेदाबाद कस्बे में जहां एक पिता ने अपनी तीन मासूम बच्चों और पत्नी की हत्या करने के बाद खुद को फांसी पर लटका कर जीवन लीला को समाप्त कर लिया। मौके पर पहुंची फॉरेंसिक टीम और पुलिस ने टूटा हुआ मोबाइल फोन, चाकू और शराब की बोतलें बरामद की है। इसके अलावा पुलिस प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करने वाले मृतक विवेक शुक्ला के तार प्रॉपर्टी कारोबार के सूत्रों को भी ढूंढ रही हैं। बरामद सुसाइड नोट में पति-पत्नी के एक साथ हस्ताक्षर होने की बात कही जा रही है, जो कि जांच का विषय है। यदि ऐसा था तो विवेक अपनी पूरी समस्या पत्नी को बताता था जहाँ कर्ज का शोर उसके परिवार में अंदरूनी कलह उन दोनों को झकझोर रही थी। इसलिए शायद विवेक ने ऐसा कदम उठाया।
विवेक शुक्ला की फंदे से लटकती लाश और बेड पर पड़े मासूमों और पत्नी की लाशों की पुलिस जांच कर रही है। वहीं इस वारदात के फौरन बाद मृतक के पिता ने विवेक शुक्ला पर ही प्राथमिकी दर्ज करा दी है। घर में पसरे सन्नाटे का शोर और गांव में चहल कदमी करती सनसनी से लोग हैरत में पड़ गए हैं। विवेक की जिंदगी किसी ड्रामे से कम नहीं थी, सोचकर देखिये जो कभी नोटों के बिस्तर पर सोता हो, जिसकी एक खूबसूरत पत्नी और फूल जैसे तीन मासूम बच्चे, जिनमे 2 बेटियां और एक बेटा, इतना सबकुछ होने के बावजूद क्या कोई अपने परिवार को आसानी से खत्म कर देगा? करता परिवार की माली हालत इतनी खराब हो गयी कि सब कुछ मिटा देना विवेक को आसान लगा? हालांकि पुलिस गहनता से मामले की जांच में जुटी है।
विवेक के घर वालों के मुताबिक विवेक ने प्रेम विवाह किया था, जिनसे तीन बच्चे थे जिनकी पढ़ाई लखनऊ के हाई फाई स्कूल में चल रही थी। उधर पुलिस को मिले सुसाईड नोट के अनुसार विवेक ने लिखा है कि वह परिवार के लिए कुछ नहीं कर पाया इस लिए ऐसा कदम उठाया। वहीं पुलिस की माने तो सुसाइड नोट पर दंपती के हस्ताक्षर हैं। इसके अलावा कमरा बंद था एoसी0 चल रही थी। प्रथम दृष्टया मृतक विवेक ने पत्नी और 3बच्चों को मारने के बाद खुदकुशी की है। जबकि कर्ज कितना था, किससे लिया गया था इसका जिक्र सुसाईड नोट में नहीं है लेकिन करोड़ों रुपए के कर्ज की आशंका जरूर जताई जा रही है। वहीं मौक़े पर डॉग स्क्वॉयड वहाँ तक गया जहाँ मृतक विवेक आया-जाया करता था।
विवेक शुक्ला के इस खौफनाक कदम और बिस्तर पर पड़ी लाशें... कमरे की व्यवस्था देख ऐसा लग रहा है विवेक अपने परिवार से बहुत प्यार करता था। लग्जरी कमरा सारे ऐशोआराम। लेकिन सवाल यह है कि ऐसा क्या हुआ की अचानक सबकुछ तबाह हो गया।
घर में एक ही मेनगेट, आने जाने का एक ही दरवाजा, पूरे परिवार के सदस्यों का एक ही निकास था। फिर भी किसी को कुछ पता नहीं, ऐसी अनभिज्ञता... और इसी बीच उस घर में हरा-भरा परिवार जो अब खत्म हो चुका। कमरे के अंदर बिस्तर पर पड़ी पत्नी सहित तीन बच्चों लाशें, खुद रस्सी से लटकी विवेक की लाश। घर के बाहर जमा लोगों की भीड़, मौके पर जांच करती पुलिस डॉग स्क्वायड और फिंगर्स  प्रिंट एक्सपर्ट की टीम... एक तबाह परिवार की कहानी बयां कर रही है।
5 जून 2020 दिन शुक्रवार को घटना के बाद से पूरे इलाके में दहशत गमज़दी का माहौल है, घटना की सूचना पा मौके पर पहुँचकर पुलिस के आला अधिकारियों ने घटनास्थल का जायजा लिया।
अयोध्या परिक्षेत्र के डीआईजी संजीव गुप्ता, पुलिस अधीक्षक अरविंद चतुर्वेदी, जिलाधिकारी डॉक्टर आदर्श सिंह, सदर तहसील के एसडीएम अभय पांडे, सीओ सुशील कुमार सिंह सहित कोतवाल पंकज सिंह मौके पर पहुंचे।
बाराबंकी जिले की कोतवाली नगर सफेदाबाद कस्बे में घर के अंदर दाखिल पुलिस और एक साथ पांच लाशें... एक बड़ी वारदात का उदाहरण पेश कर गयी है। दरअसल एक शख्स जिसका हंसता खेलता परिवार तबाह हो गया, कोरोना महामारी और लॉक डाउन के बीच... लगातार बढ़ते कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे एक पिता ने अपने परिवार को दुनिया के सामने दर-दर की ठोकरें खाने से पहले ही मौत की नींद सुला खुद फांसी पर लटक जाना ज्यादा मुनासिब समझा।
कमरे के अंदर बेड पर पड़ी चार और पंखे के हुक से  न एक लटकती लाश आपको विचलित कर सकती हैं, और वारदात की हकीकत जानकर आपके पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी की विवेक शुक्ला जो अपनी पत्नी और बच्चों से बेहद प्यार करता था और जिस तरह से विवेक ने यह खौफनाक कदम उठाया उससे तो यही लग रहा है कि वह खुद अगर फांसी के फंदे से लटकता तो उसका परिवार और समाज उसे कोसता, जिस कारण उसने अपने परिवार को दर-दर की ठोकरें खाने से पहले ही पत्नी, पुत्र और 2 पुत्रियों को मार कर खुद फांसी पर लटक गया।
लोगों की माने तो विवेक शुक्ला बेहद खुश मिजाज और मिलनसार व्यक्ति था। जीवन यापन के लिए हाल ही में एक गैराज खोलकर अपने रोजगार की शुरुआत की इसके अलावा विवेक शुक्ला मोबाइल रिपेयरिंग के साथ-साथ अन्य कई निजी रोजगार करता था। विवेक शुक्ला ने लगभग 12-13 साल पहले थाना जहांगीराबाद के फैजुल्लागंज निवासी शेष कुमार वर्मा की पुत्री अनामिका से प्रेम विवाह किया था, जिनसे दो पुत्रियां एक पुत्र थे। परिवार में पांच लोग थे- मृतक विवेक शुक्ला, उसकी पत्नी अनामिका और उनकी दो बेटियां पोयम शुक्ला (10 वर्ष), रितु शुक्ला (7 वर्ष) और एक लड़का बबल शुक्ला (5 वर्ष)। मृतक के भाई ने बताया कि शादी के बाद से विवेक के रिश्ते माता-पिता और भाई से सामान्य नहीं थे। वह अपने परिवार के साथ अलग रहता था। विवेक की मां ने जब दो दिन से उन्हें बाहर नहीं देखा तो वो खुद ही उसके कमरे तक गयी, बेटे को फांसी पर झूलता देख उन्होंने बाकी परिवार को सूचना दी। दरवाजा तोड़ने के बाद का मंजर देखकर सब हैरान रह गए। उन्होंने तुरंत पुलिस को जानकारी दी और पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जांच-पड़ताल शुरू कर दी। मृतक विवेक के पिता के मुताबिक उसका कमरा दो दिन से बंद था, लेकिन कमरे का एसी चल रहा था। दरवाजा खटखटाने और आवाज देने के बाद भी जब कोई आहट नहीं हुई तो दरवाजा तोड़ा गया। विवेक के माता-पिता और परिवार का कहना है कि उसने ऐसा कदम क्यों उठाया, इस बारे में उन्हें किसी प्रकार की कोई जानकारी नहीं है।
विवेक के भाई के मुताबिक उन्हें आस-पास के लोगों से पता चला कि विवेक की माली हालत अच्छी नहीं थी, उन पर इस वक्त 30 से 35 लाख का कर्ज था। वहीं लोगों को आशंका है कि मृतक विवेक पर करोड़ों रुपए का कर्ज हो चुका था जिसे चुकाने में वह असमर्थ हो गया था। लॉकडाउन और कोरोना महामारी के बीच प्रॉपर्टी के बंद कारोबार को लेकर विवेक काफी हताश और निराश होने के साथ ही साथ अंदर से टूट भी चुका था। उसके परिवार को भी नहीं पता है कि इस वक्त वो क्या करता था। आशंका जताई जा रही है कि आर्थिक रूप से मुश्किल दौर से गुजर रहे दंपती ने बच्चों के साथ आत्महत्या का खौफनाक कदम उठाया है।
पुलिस इस मामले में सभी दृष्टिकोण से अलग-अलग जांच कर रही है। सुसाइड नोट की लिखावट की भी जांच की जा रही है। रिश्तेदारों से भी पूछताछ की जा रही है। साथ ही साथ पुलिस तथ्यों के आधार पर छानबीन में जुटी है।
मृतक की मां ने बताया कि उनके बेटे ने दूसरी कास्ट की लड़की से शादी की थी। लेकिन उससे घरवालों को कोई परेशानी नहीं थी। उनका लड़का शादी के बाद से ही अलग रहता था और घर से कोई मतलब नहीं रखता था। उसने ऐसा कदम क्यों उठाया, इसकी कोई जानकारी नहीं है। वहीं मृतक के पिता के मुताबिक दो दिनों से कमरा बंद था औऱ एसी चल रहा था। हमें चिंता हो रही थी कि आखिर ये लोग बाहर क्यों नहीं निकल रहे हैं। लेकिन वह हम लोगों से मतलब नहीं रखते थे। लेकिन शुक्रावार को सुबह छत से जाकर देखा कि लड़का फांसी से लटक रहा है। फिर हमारे दूसरे लड़के ने कमरे का दरवाजा तोड़कर सबको घटना की जानकारी दी।
एएसपी अरविंद चतुर्वेदी ने बताया कि परिवार के पांच लोगों की मौत हुई है। पति-पत्नी ने पहले तीन बच्चों को मारा फिर खुद भी आत्महत्या कर ली। मामले की जांच पुलिस कर रही है। जल्द ही घटना का खुलासा किया जाएगा।
✍️ RJ अतुल श्रीवास्तव
बाराबंकी।

Saturday, September 15, 2018

अवैध अवैध कमाई से अरबों का मुनाफा दिखाता है उत्तर प्रदेश का परिवहन निगम:


वैसे तो उत्तर प्रदेश परिवहन निगम यात्री देवो भव: का राग अलापता रहता है परंतु यात्रियों की सुविधाओं से कोई मतलब नहीं होता यह बात ठीक वैसे है जैसे कि हाथी के दिखाने वाले दांत। इसका ताजा उदाहरण कैसरबाग से बहराइच जा रही बाराबंकी डिपो की बस संख्या यूपी 75 ऍम 5729 मैं देखने को मिला जब एक यात्री की बस किसी कारण से छूट गई थी, जिसे 5729 के परिचालक ने गंतव्य का टिकट देख कर और उसकी आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए बिठा तो लिया परन्तु देवीपाटन पर क्षेत्र के यातायात निरीक्षक राम मनोरथ और उनके साथी के0 सोनकर सहकर्मियों ने कैसरगंज के आगे टोल प्लाजा पर लगभग 11:30 बजे बस निरीक्षण किया तो निरीक्षण के दौरान उस यात्री का टिकट देखने के बाद भी उस यात्री को बिना टिकट मानते हुए उसका टिकट बनवाया और उस पर जबरदस्ती ₹50 की पेनल्टी भी लगाई, वो भी गाड़ी में सवार 35 यात्रियों के दबाव में नहीं तो यह पेनाल्टी टिकट के 10 गुने की होती। उस बस के परिचालक ने बताया कि यदि यात्रियों के द्वारा बीच में नहीं बोला गया होता तो ₹748 मुझे जमा करने पड़ते और डब्लू टी का केस खत्म कराने के लिए अभी ₹500 डिपो पर और देने पड़ेंगे।
अब सवाल यह उठता है कि निगम की साधारण बसों में जब किराया एक समान होता है और धनराशि भी निगम कोष में ही  जमा होती है तो इस तरह की लालफीताशाही की मार यात्रियों और परिचालकों को क्यों झेलनी पड़ती है? वहीँ निगम अपनी बस बीच रास्ते में खराब हो जाने पर यात्रियों को घंटों इंतजार करवाता है और अगली बस के लिए बोलता है कि अगली बस आने दीजिए ट्रांसफर दिलवाया जाएगा। क्या उतनी ही सुविधा जो कि मात्र बैठने भर की होती है यात्रियों को मिल पाएगी पीछे से आने वाली बस में, वह तो पहले से ही यात्रियों से भरी होगी।
टिकट होने पर भी दूसरी बस में बैठने पर निगम के लाइसेंस धारी लुटेरे जिन्हें निगम प्रशासन ने यातायात निरिक्षण की जिम्मेदारी सौंपी है, यात्रियों को बिना टिकट मान लेते हैं, तो दूसरी बस में ट्रांसफर पर रोक क्यों नहीं लगाते? और क्यों नहीं दूसरीखाली बस का इंतजाम करवाते?
निगम प्रशासन से लेकर विभागीय मंत्री तक को सिर्फ यही लगता है कि परिचालक वो भी यदि संविदा का है तो चोर होता है और यात्री भी दस-बीस रुपये बचाने की कोशिश करता है, परन्तु वो यह नहीं जानना चाहते हैं डिपो में तैनात ड्यूटी रूम से लेकर सभी पटलों पर निगम के जो अपने सगे बेटे बैठे हैं बिना दाम लिए काम नहीं करना चाहते, और सड़क पर घूम रहे टी०यस०/ टी०आई० जिन्हें हाथों में डायरी थमा दी गई है, और जिम्मेदारी दी गई है कि यातायात व्यवस्था को सुगम बनाने और यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखे, सिर्फ वसूली का मकसद ध्यान रहता है। नहीं तो मनमाने ढंग से यात्रियों पर, संविदा परिचालकों पर दबाव बना कर निगम कोष में काली कमाई को जमा कराने का काम कारते हैं।
निगम प्रशासन की खास बात यह है कि इसे संविधान की, न्यायालयों के आदेशों की, श्रम नियमावली से कोई लेना-देना नहीं, इसके सारे के सारे नियम और कानून  अपने फायदे के लिए होते हैं। प्रदेश में हर 5-10 साल में सरकारें बदलती रहती हैं, जो सुधार और विकास के बड़े-बड़े दावे करती हैं चुनाव से पहले और सत्ता में आने के बाद उसी सरकार और सरकार के मंत्री सब कुछ जानने के बाद भी आँख और कान बंद कर सिर्फ माहवारी का इन्तजार करते हैं। इन्हें यात्रियों की सुवुधाओं से, संविदा परिचालकों के भविष्य से, संविदा परिचालक के जीवन स्तर से कोई लेना-देना नहीं। निगम प्रशासन और विभागीय मंत्री को सालाना अरबों की कमाई से मतलब है, बाकी चाहे वर मरे या कन्या वही कहावत को चरित्रार्थ होना है।

Thursday, January 08, 2015

आधुनिक मानव और यंत्र निर्भरता

आज के मानव की जो तस्वीर हमें सबसे अधिक दिखाई पड़ती है, वह मानव के पूर्ण रुपेण यांत्रिक निर्भरता की है। आज के दौर में बच्चों से लेकर बूढ़ों तक, सभी मानव यंत्रों से सुसज्जित हैं। एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं मोबाइल फोन का; हमें हर हाथ में मोबाइल फोन और मोबाइल फोन का विकसित रुप टैबलेट देखने को मिल जाता हैं; जो जितने छोटे हैं उतने ही तकनीकी सक्षमता लिए हुए हैं। यह एक छोटा सा यंत्र एक साथ कितने ही मषीनों का कार्य संपादित कर देता है- जो हमें अपनों से जोड़ता है, चाहे वे विष्व के किसी भी हिस्से में बैठे हों; छायाचित्रों को ले सकता है, चलचित्रों के निर्माण का काम कर देता है, मल्टीमीडिया के माध्यम से हम अपने संदेष, छायाचित्र, चलचित्र जहां चाहें भेज सकते हैं; रेडियो से गीत सुनना, अपने मन पसन्द संगीत-चलचित्र आदि को सुरक्षित करना। ऐसे अनेक कार्य हम इस एक छोटे से यंत्र के द्वारा करते हैं। मोबाइल फोन की सुविधाओं को देखते हुए इसके विज्ञापन भी कुछ ऐसे कहते हैं: कर लो दुनिया मुट्ठी में; अब अपनों से कैसी दूरी; आप जहां-जहां, हर पल आपके साथ। हाथ में एक छोटा-सा यंत्र हमें पूरी दुनिया से जोड़े रखता है, इसलिए देखने में यही आता है कि आज के आपा-धापी और तकनीकी युग में अधिकांष लोग सुबह से लेकर देर रात तक अपने मोबाइल फोन से चिपके हुए दिखाई पड़ते हैं। कुछ लोगों के लिए तो ऐसा ही प्रतीत होता है कि उनके लिए और सारी चीजें गौण हैं, बस मोबाइल पर बातें करना ही असली काम है।
         इस तरह सम्पूर्ण विष्व तो हमें हमारे आस-पास प्रतीत होता, लेकिन हम अपने आप से दूर हो गए हैं; हम अपनी मानसिक सोच से दूर हो गए हैं, मस्तिष्क विहीन से हो गए हैं। हम जितने निर्भर होते हैं यंत्रों पर उतने ही यंत्र हम पर सवार हो जाते हैं। जितनी हम उनकी सेवाएं लेते हैं उतनी ही वे हमें अपनी दासता से जकड़ते जाते हैं, गुलाम बना लेते हैं और हमें पता ही नहीं चलता कि हमारे साथ ऐसा कैसे हो गया। हम जिन भी चीजों का उपयोग करते हैं और पाते हैं कि वे सारी चीजें हमारा उपयोग करने लगी हैं; वे हमारी आदत बन जाती हैं, लत बन जाती हैं। फिर हम उनके बगैर नहीं रह सकते, हम उन पर पूरी तरह निर्भर हो जाते हैं, उनके बगैर अपंग से हो जाते हैं। हम यंत्रों का उपयोग करते-करते एक यंत्र हो गये हैं। कुछ ऐसा है हम पर यंत्रों के सत्संग का असर। जबकि और प्रकृति की चीजों पर दूसरों के संगत का असर नहीं पड़ता, शायद रहीम जी ने अक्षरषः सत्य कहा था-
‘‘जो रहीम उत्तम प्रकृति, का कर सकत कुसंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।’’
     लेकिन हम मनुष्य यंत्रों के सामने विवष प्रतीत होते हैं। उनकी संगति ने हमें अपना दास बना लिया है। ऐसा कैसे और क्यांे होता है? ऐसा शायद इसलिए होता है कि हम उपयोग करते-करते इसे अपनी आदत बना लेते हैं, अपनी नितचर्या बना लेते हैं। आदत की प्रक्रिया ऐसी होती है कि उसके लिए बहुत होष और विवेक की आवष्यकता नहीं रहती है, धीरे-धीरे हमारे होष और विवेक की मात्रा क्षीर्ण होती जाती है। एक समय ऐसा आता है कि होष और विवेक की क्षमता न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाती है। ऐसी दषा में कोई भी यंत्र हम पर पूरी तरह सवार हो जाता है; और हम यांत्रिक मानव बन जाते हैं।
      हम मानवों का मस्तिष्क भी कुछ ऐसा ही है, यह भी एक यंत्र है। जो सभी यंत्रों का राजा है। मस्तिष्क रूपी यंत्र ने सभी यंत्रों के निर्माण में प्रमुख भूमिका और दायित्व का निर्वाहन किया है। हम किसी और यंत्र का उपयोग करें या न करें, लेकिन मस्तिष्क के उपयोग के बिना तो बिलकुल जीवन संभव नहीं है। चूंकि हम अधिकांष समय इसी यंत्र का उपयोग करते रहते हैं तो यह स्वाभाविक ही है कि यह पूरी तरह हमें सम्मोहित करके हमारा मालिक बन जाता है। आज के समय में कोई ऐसा मनुष्य ढूढंना बहुत ही दुर्लभ है जो यंत्रों की गुलामी की जंजीरों में न जकड़ा हो।
      यंत्रों की गुलामी और इसकी दासता हमें पूर्ण रूप से अपंग बना रही है। अगर हमने अभी नहीं चेता तो हमारी आने वाली पीढ़ी पूरी तरह से यांत्रिकी पर ही निर्भर हो जाएगी। उसके लिए तो अपने-आपको समझना मुष्किल हो जाएगा, न ही वह अपनी मर्जी से खा सकेंगे न ही पी सकेंगे। हमें अपनी इस यंत्र निर्भरता को त्यागना ही होगा। हमने यंत्रों का निर्माण अपनी सुविधा के अनुसार किया है, यंत्रों को हम मानवों पर निर्भर होना चाहिए न कि हम मानव यंत्रों पर निर्भर हो जाएं।
       हमारी प्रगति ने यंत्रों की कुषलता बढ़ा दी है, लेकिन हमने यांत्रिकता से ऊपर उठने का कोई कदम नहीं उठाया, और न ही उठा पाने में सक्षम हैं, क्योंकि इन यंत्रों की सुविधाओं के दौर में हम, ‘‘अपने को, अपने विवेक को, अपने विचारों को भूल चुके हैं।’’ यही भूल अत्याधिक विनाषकारी है जो हमें विनाष की तरफ ढकेलती जा रही है।
       अब यह निर्णय हमें लेना है कि हम यंत्रों की गुलामी और इसकी दासता से मुक्त होना चाहते हैं या फिर अपनी ही आंखों से अपनी अपंगता अपनी विवषता के नजारे देखते हुए विनाष की तरफ अग्रसर होना चाहते हैं!

Thanks and Regards
Atul Kumar
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