Saturday, May 09, 2026

जनादेश का अपहरण और संस्थागत क्षरण: 2026 में किस दहलीज पर खड़ा हमारा लोकतंत्र

मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणाम चाहे वे पश्चिम बंगाल के हों, तमिलनाडु के या केरल के। भारतीय लोकतंत्र के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम सिद्ध नहीं हुए हैं। इन चुनावों ने न केवल राजनीतिक दलों के बीच की कटुता को सतह पर ला दिया है, बल्कि हमारे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक नैतिकता की नींव को भी झकझोर दिया है। आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि सत्ता के शीर्ष पर कौन आसीन होगा, बल्कि यक्ष प्रश्न यह है कि क्या चुनाव के बाद की राजनीतिक रस्साकस्सी में जनता द्वारा किया गया मतदान सुरक्षित है? चुनावी नतीजे आते ही पराजित दलों द्वारा धांधली के आरोप लगाना और मतगणना प्रक्रिया को चुनौती देना अब एक मानक प्रक्रिया बन गई है। इस प्रवृत्ति का विश्लेषण दोतरफा होना चाहिए। एक ओर, यह प्रवृत्ति चुनावी इनकार के उस खतरनाक वैश्विक चलन का हिस्सा है, जहां राजनीतिक दल बिना ठोस साक्ष्यों के अपनी हार स्वीकार करने के बजाय विक्टिम कार्ड खेलते हैं। ऐसा करके वे सीधे तौर पर मतदाताओं के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यह व्यवहार लोकतंत्र की जड़ों में संदेह का विष घोलता है, जिससे आम नागरिक का विश्वास चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं से डिगने लगता है। परंतु, सिक्के का दूसरा पहलू सत्ता पक्ष और चुनाव प्रबंधन की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्षी दल बार-बार धांधली का शोर मचा रहे हैं, तो इसका एक बड़ा कारण सत्ता पक्ष द्वारा प्रशासनिक मशीनरी का कथित दुरुपयोग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में परिलक्षित होता झुकाव भी है। जब ईवीएम की सुरक्षा, वीवीपैट पर्चियों के मिलान और चुनाव की लंबी समय-सारणी पर पूर्ण स्पष्टता नहीं होती, तो संदेह को बल मिलता है। यह केवल हारने वाले की हताशा नहीं, बल्कि एक विश्वास का संकट है, जहां समान अवसर नदारद नजर आता है। संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल के पद की कल्पना केंद्र और राज्य के बीच एक सेतु के रूप में की थी, लेकिन 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में यह पद एक अवरोधक के रूप में अधिक दिखाई दिया। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जिस तरह निर्वाचित सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव हुआ है, उसने संघीय मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर देने में मनमानी करना या विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए रोके रखना; ये कृत्य लोकतंत्र के अवरोध और संतुलन के सिद्धांत के विरुद्ध हैं। जब राजभवन राजनीतिक रणनीतियों का केंद्र बन जाता है, तो संघीय ढांचा केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। राजनीतिक नैतिकता का पतन उस समय चरम पर दिखता है, जब बहुमत न होने की स्थिति में जनादेश की चोरी को चाणक्य नीति का नाम देकर महिमा मंडन किया जाता है। विधायकों की खरीद-फरोख्त, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव के माध्यम से कराया गया दलबदल अब राजनीति की संज्ञा बन गई है। पिछले एक दशक में चुनावों के बाद जिस तरह से छोटे दलों और निर्दलीयों की नीलामी की खबरें आई हैं, वह मतदाताओं के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है। भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां उसे आत्ममंथन की नितांत आवश्यकता है। समय की मांग है कि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को न केवल अक्षुण्ण रखे, बल्कि वह निष्पक्ष दिखे भी। राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या अनिवार्य है ताकि वे राजनीतिक मोहरे न बन सकें। अंततः, हमें यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल संख्या बल का अंक गणित नहीं, बल्कि लोक-लाज और संवैधानिक नैतिकता की सतत परंपरा है। यदि संस्थाओं की गरिमा राजनीतिक विजय की वेदी पर बलि चढ़ा दी जाएगी, तो हम एक ऐसी चुनावी तानाशाही की ओर अग्रसर होंगे जहां मतदान तो होगा, परंतु जन-विश्वास अनुपस्थित रहेगा।यदि 2026 के ये चुनाव हमें कोई सबक देते हैं, तो वह यही है कि संस्थाओं की शुचिता किसी भी राजनीतिक जीत से ऊपर होनी चाहिए; अन्यथा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का गौरव केवल एक खोखला दावा बनकर रह जाएगा। #अतुल_कुमार_श्रीवास्तव #Atul_Kumar_Srivastava

सृजन, संरक्षण और क्रांति का त्रिकोण: मां

क्या मातृत्व केवल एक सुकोमल भावना है? या यह उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पुंज है जिसे दर्शन ने आदि-शक्ति के रूप में परिभाषित किया है? मई माह का दूसरा रविवार कैलेंडर का कोई सामान्य पृष्ठ पर अंकित दिन मात्र नहीं, अपितु उस अदृश्य धुरी के प्रति कृतज्ञता अर्पण करने का क्षण है, जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व परिक्रमा करता है। जिसे संपूर्ण विश्व 'मदर्स डे' के रूप में मनाता है, वह केवल औपचारिक उपहारों या शुभकामनाओं का विनिमय नहीं, बल्कि उस असीम और अजेय ऊर्जा के उत्सव का दिन है जिसे हम 'माँ' कहते हैं। 1907 में अन्ना जार्विस ने जिस स्मृति-परंपरा की नींव रखी, वह भारत की चेतना में समाहित होकर और भी अधिक गहन और बहुआयामी हो गई है। भारतीय मनीषा में माँ केवल एक पारिवारिक इकाई नहीं, बल्कि आदि-शक्ति का मूर्त स्वरूप है। भारतीय दर्शन में नारी को 'शक्ति' के रूप में स्वीकार किया गया है। शक्ति जो सृजन, पोषण और संहार का त्रिवेणी संगम है। जब हम माँ को आदि-शक्ति की संज्ञा देते हैं, तो हमारा मंतव्य उस चेतन ऊर्जा से होता है जिसके अभाव में शिव भी शव तुल्य हैं। यह वही ऊर्जा है जो घरों की चारदीवारी में ममत्व की वर्षा करती है और धर्म की रक्षा हेतु आवश्यकता पड़ने पर रणचंडी बनकर अधर्म का उच्छेदन भी करती है। भारत में मातृत्व का एक अत्यंत गौरवशाली और दिलों पर राज करने का उदाहरण इतिहास में पन्नाधाय के रूप में सुरक्षित है। उनका परोपकार और त्याग विश्व इतिहास में अद्वितीय है। चित्तौड़ के उत्तराधिकारी उदयसिंह को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े चंदन को काल के गाल में समर्पित कर दिया। पन्नाधाय का यह युगांतरकारी त्याग सिद्ध करता है कि माँ केवल जन्मदात्री नहीं, अपितु राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए अपनी कोख का उत्सर्ग करने वाली महामाता भी है। उनका यह कृत्य मातृत्व को व्यक्तिगत मोह के संकुचित घेरे से निकालकर कर्तव्य के उच्चतम शिखर पर प्रतिष्ठित करता है। इतिहास साक्षी है कि यह माँ का ही अदम्य मार्गदर्शन था जिसने एक बालक के भीतर छत्रपति बनने के स्वप्न को रोपित किया। लोक-मानस में कैकेयी को प्रायः नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाता है, किंतु उनके चरित्र का एक विद्रोहात्मक और रणनीतिक पक्ष भी है। उनका राम को वनवास भेजना केवल पुत्र-मोह का परिणाम नहीं, अपितु तत्कालीन जड़ व्यवस्था के विरुद्ध एक साहसिक विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने नियति के उस चक्र को गति प्रदान की जिसके बिना रावण का दलन और राम का मर्यादा पुरुषोत्तम बनना असंभव था। यदि हम पूर्वाग्रहों को त्याग कर देखें, तो कैकेयी एक क्रांतदर्शी माँ के रूप में उभरती हैं, जिन्होंने स्वयं पर कलंक का विषपान करना स्वीकार किया ताकि राम को वह वनवास मिल सके जो उन्हें ईश्वरत्व की ओर ले जाने वाला मार्ग था। एक माँ जब अपनी सामाजिक छवि की चिंता किए बिना कोई कठोर निर्णय लेती है, तो वह समकालीन समाज के लिए अप्रिय हो सकती है, किंतु वह इतिहास की दिशा को आमूल-चूल बदलने की क्षमता रखती है। इस मदर्स डे पर हमें माँ के केवल सौम्य और शांत स्वरूप की ही वंदना नहीं करनी, बल्कि उनके ओजस्वी, त्यागमय और विद्रोही रूप को भी नमन करना चाहिये। मातृत्व का हर रंग वंदनीय है: चाहे वह अन्ना जार्विस का आदर्श हो, पन्नाधाय का अनुपम बलिदान हो या कैकेयी का दृढ़ संकल्प। आइए, हम अपनी अंतरात्मा से उस आदि-शक्ति का साक्षात्कार करें जो करुणा और शौर्य का शाश्वत प्रतीक है। हमें याद रखना होगा कि, "जिन सुकोमल हाथों से पालने को झूला झुलाने की कला होती है, समय आने पर वही सुकोमल हाथ तलवार थामकर इतिहास के प्रवाह को मोड़ने का सामर्थ्य भी रखते हैं। अतुल कुमार श्रीवास्तव

Thursday, May 07, 2026

लोकतंत्र में लापता होता मतदाता और संकट में लोकतंत्र

साथियों, लोकतंत्र की विशाल अट्टालिका की नींव जनता का मत और उसकी भागीदारी पर टिकी होती है। भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि देश के भविष्य का ब्लूप्रिंट होती है। लेकिन जब इस सूची से लाखों नाम संदिग्ध रूप से गायब होने लगें, तो यह केवल एक तकनीकी चूक (Technical Glitch) नहीं बल्कि एक गहरे संवैधानिक संकट की आहट है। वर्तमान समय में बिना पारदर्शिता और जवाबदेही के चुनावी प्रक्रिया महज एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह गई है, जो जनमत के साथ सबसे बड़ा क्रूर मजाक है। हाल ही में चुनाव आयोग व प्रशासनिक कार्यप्रणाली ने डिजिटल इंडिया के दावों के बीच एक नया शब्द उछाल दिया है डिलीट इंडिया..! लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे पवित्र इकाई मतदाता है; लेकिन जब 64 लाख में से 27 लाख जैसे भारी-भरकम संख्या में मतदाताओं के नाम गायब होने के दावे सामने आये हैं, जिससे देश के सर्वोच्च संस्थानों भारतीय चुनाव आयोग और न्यायपालिका की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। प्रशासनिक लापरवाही का यह स्वरूप अक्सर एक सोची-समझी रणनीति जैसी प्रतीत हो रही है, जहां Standard Inspection Report (SIR) और पुनरीक्षण प्रक्रिया कागजों पर तो पुख्ता दिखती है, किंतु धरातल पर पूरी तरह खोखली साबित होती है। मतदाता सूची में हेरफेर और विलोपन का सबसे चिंताजनक उदाहरण विधानसभा चुनाव -2026 में पश्चिम बंगाल में देखने को मिला है। बंगाल के चुनावी परिदृश्य में मतदाता सूची हमेशा से विवादों के केंद्र में रही है। विभिन्न स्वतंत्र नागरिक समूहों की रिपोर्ट बताती है कि बंगाल के कई निर्वाचन क्षेत्रों, विशेषकर सीमावर्ती जिलों (जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना) में नाम काटने की दर राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक रही है। इसके पहले भी 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले, बंगाल में आधार कार्ड को डी-एक्टिवेट करने और उसे मतदाता पहचान पत्र से लिंक करने की प्रक्रिया के दौरान हजारों नागरिकों ने शिकायत की कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना या कारण बताओ नोटिस के चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। यह सीधे तौर पर नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का हनन है। यदि इतने बड़े पैमाने पर नाम काटे गए हैं, तो इसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं: बंगाल में बीएलओ (BLO) की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक दखल ने यह साबित किया है कि चुनावी प्रक्रिया को सत्ता के अनुकूल ढालने के लिए सत्यापन प्रक्रिया की अनदेखी की गई। या नाम काटने से पहले उचित सत्यापन और कारण बताओ नोटिस की कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया? इन कारणों पर संस्थानों की चुप्पी जनता का संशय मजबूत कर देती है। लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ चुनाव आयोग और न्यायपालिका आज कटघरे में हैं। जब एक आम नागरिक इन संस्थानों की ओर उम्मीद से देखता है और उसे वहां से केवल प्रक्रियात्मक देरी या तकनीकी दलीलें मिलती हैं, तो व्यवस्था से भरोसा उठना एक स्वाभाविक परिणति बन जाती है। भारत का वर्तमान दौर जिस प्रशासनिक मनमानी की ओर बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र को सीरिया या पाकिस्तान जैसी अराजकता की ओर धकेल सकता है, जहां संस्थाएं संविधान के बजाय व्यक्ति-विशेष या सत्ता के अधीन हो जाती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक भी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटना केवल एक व्यक्ति का अधिकार छिनना नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की सूक्ष्म हत्या का प्रयास है। इससे बचने और लोकतंत्र को बचाने के लिए मतदाता सूची से नाम हटाने (Deletion) की प्रक्रिया का एक स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट होना चाहिए, ताकि डिजिटल हेरफेर पकड़ी जा सके। साथ ही यदि तकनीक के माध्यम से नाम हटाए जा सकते हैं, तो मतदाता को 'SMS' या 'ईमेल' के जरिए तत्काल सूचित किया जाना चाहिए? क्या पारदर्शिता केवल सरकार की व्यक्तिगत सुविधा और मनमानी तक ही सीमित होनी चाहिए? समय की मांग है कि देश का सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को स्वतः संज्ञान (Suo Moto) में लेते हुए सख्त मानक तय करे। लोकतंत्र भले ही संख्या का खेल हो, लेकिन इसका प्राण तत्व जनता का विश्वास है। लाखों मतदाताओं का सूची से बाहर होना एक गंभीर चेतावनी है। यदि आज हम इस संस्थागत ढिलाई और प्रशासनिक तानाशाही पर मौन रहे, तो भविष्य में वोट की चोट शब्द केवल राजनीतिक मुहावरों और इतिहास की किताबों तक सीमित रह जाएगा। वक्त आ गया है कि व्यवस्था से तीखे सवाल पूछे जाएं, क्योंकि सवाल पूछना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार व लोकतांत्रिक धर्म है। #अतुल_कुमार_श्रीवास्तव #Atul_Kumar_Srivastava

Tuesday, May 05, 2026

लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और चुनावी निष्पक्षता

आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद से राजनीतिक दल अपनी नीतियों के आधार पर चुनाव लड़ते आए हैं, और आदर्श रूप में नीतियों पर ही चुनाव लड़ा जाना चाहिए। लेकिन पिछले लगभग दो दशकों से केंद्र की सत्ता पर काबिज दल द्वारा सरकारी मशीनरी और संस्थाओं के कंधों पर बंदूक रखकर परिणामों को प्रभावित करने की कोशिशों के आरोप लगते रहे हैं। 2026 के पश्चिम बंगाल के परिणाम, आम आदमी पार्टी में फूट और फिर विशिष्ट दल का दामन थामना, बिहार में सत्ता परिवर्तन, और मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना, ये तथ्य यही संदेश देते हैं कि सरकारी दबाव के शोर में जनता की अपनी आवाज को पहचान पाना मुश्किल होता जा रहा है। सत्तारूढ़ दल का पूरी शक्ति से चुनाव लड़ना सराहनीय हो सकता है, लेकिन पूरी सरकारी मशीनरी को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना अनैतिक और अलोकतांत्रिक है। लोकतंत्र में साधन (Means) उतने ही पवित्र होने चाहिए जितना कि साध्य (Goal)। यदि व्यक्तिगत चेहरे को सर्वोपरि दिखाने के लिए संस्थाओं को पंगु बनाकर सत्ता हासिल की जाती है, तो वह वास्तव में लोकतंत्र की जीत नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की तानाशाही है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में यदि सरकारी मशीनरी किसी एक व्यक्ति या दल के लिए चुनावी हथियार की तरह काम करने लगती है, तो जनता का भरोसा टूटने लगता है। आम नागरिक यह सोचने पर विवश हो जाता है कि वोट देने से क्या लाभ, जब मशीनरी ही पक्षपाती है? यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की मृत्यु के पथ पर अग्रसर होने का पहला चरण होता है। जब संवैधानिक रास्ते बंद या पक्षपाती महसूस होते हैं, तो लोग सड़कों पर उतरते हैं या हिंसा का सहारा लेते हैं, जो राज्य और जनमानस के लिए अत्यंत घातक है। मणिपुर और असम के घटनाक्रम इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। सत्ता पक्ष द्वारा केंद्रीय बलों की तैनाती को सुरक्षा का नाम दिया जाता है। लेकिन यदि इन बलों का उपयोग मतदाताओं को हतोत्साहित करने या किसी विशेष दल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए होने लगे, तो यह सुरक्षा नहीं बल्कि रणनीतिक घेराबंदी है। यह सीधे तौर पर मतदाता के स्वतंत्र विवेक पर प्रहार है। लोकतंत्र की सुंदरता शक्ति के संतुलन में है। जब सत्ता का सारा केंद्र एक ही ओर झुकने लगे, तो नागरिक सतर्कता ही उसे वापस पटरी पर ला सकती है। पिछले कुछ वर्षों से निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के निर्णयों को लेकर विवाद गहराया है। कई चरणों में चुनाव कराने की लंबी प्रक्रिया ने विपक्षी दलों को यह आरोप लगाने का अवसर दिया कि यह सत्ताधारी दल को लाभ पहुँचाने की कोशिश है। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब संस्थाएं न केवल निष्पक्ष हों, बल्कि निष्पक्ष दिखें भी। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में न्यायपालिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल के वर्षों में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और चुनावी बॉण्ड (Electoral Bonds) पर ऐतिहासिक निर्णय यह दर्शाते हैं कि जब संस्थाएं अपनी रीढ़ खोने लगती हैं, तब न्यायपालिका ही शक्ति के असंतुलन को रोकने का अंतिम प्रयास करती है। हालांकि, न्यायपालिका की भी एक सीमा है; वह नीतिगत हस्तक्षेप तो कर सकती है, लेकिन धरातल पर प्रशासनिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना अंततः संवैधानिक संस्थाओं की अपनी जवाबदेही है। लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं है, बल्कि यह उन मर्यादाओं और संस्थागत मूल्यों का संगम है जो अल्पसंख्यक और विपक्षी स्वरों को भी समान स्थान देते हैं। यदि चुनावी जीत को ही एकमात्र लक्ष्य मान लिया जाए, तो उसके साधन अक्सर अनैतिकता की भेंट चढ़ जाते हैं। संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की परिकल्पना एक तटस्थ प्रहरी के रूप में की थी, न कि किसी दल के विस्तारवादी औजार के रूप में। लोकतंत्र की नींव मतपेटी में नहीं, बल्कि उस विश्वास पर टिकी है कि मतपेटी तक पहुँचने वाला हर नागरिक भयमुक्त और स्वतंत्र है। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए केवल सजग नागरिक ही नहीं, बल्कि एक निर्भीक और स्वतंत्र न्यायपालिका का होना भी अनिवार्य है जो सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगा सके। #अतुल_कुमार_श्रीवास्तव #Atul_Kumar_Srivastava

गंगा एक्सप्रेसवे: आधुनिकता की रफ्तार, या उजाड़ होती विरासत और जीविका?

उत्तर प्रदेश का गंगा एक्सप्रेसवे विकास के उस मॉडल का उदाहरण है जिसे जबरन थोपा गया है। जब तक विकास की योजनाओं में स्थानीय पारिस्थितिकी, आम आदमी की सहमति और निविदाओं में पूर्ण पारदर्शिता नहीं होगी, तब तक इन्हें सार्थक प्रगति नहीं कहा जा सकता। पर्यावरण को तबाह करके और अपने करीबियों की तिजोरियां भरकर बनाया गया यह एक्सप्रेसवे आने वाली पीढ़ियों के लिए एक कर्ज और उजाड़ विरासत छोड़कर जाएगा। असली विकास कंक्रीट की सड़कों में नहीं, बल्कि सुरक्षित पर्यावरण और पारदर्शी शासन में बसता है। अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए सरकार दावा कर रही है कि एक्सप्रेसवे के किनारे इंडस्ट्रियल क्लस्टर बनेंगे और रोजगार मिलेगा। हकीकत से लगभग सभी परिचित हैं कि अब तक कितने इंडस्ट्रियल क्लस्टर बने और क्षेत्रीय लोगों को कितना रोजगार मिला? दूसरी हकीकत यह है कि इन उद्योगों का स्वामित्व भी उन्हीं बड़े समूहों के पास होगा जिन्हें निर्माण का ठेका मिला है। स्थानीय ग्रामीण यहाँ केवल न्यूनतम मजदूरी पर श्रमिक बनकर रह जाएंगे, जबकि उनकी जमीन का लाभ बड़े कॉर्पोरेट ही उठाएंगे। उत्तर प्रदेश के मानचित्र पर मेरठ से प्रयागराज तक खिंची 594 किलोमीटर लंबी लकीर को सरकार प्रगति का पथ बता रही है। गंगा एक्सप्रेसवे को राज्य के सबसे बड़े आर्थिक बुनियादी ढांचे के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन इसकी भव्यता के नीचे मेरठ, हापुड़, बुलंदशहर, अमरोहा, संभल, बदायूं, शाहजहांपुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली, प्रतापगढ़ और प्रयागराज जनपदों के आम नागरिकों की पीड़ा और प्रकृति की सिसकियां दबी हुई हैं। आज यह प्रश्न पूछना अनिवार्य हो गया है कि क्या यह एक्सप्रेसवे वाकई जनहित में है, या यह केवल क्रोनी कैपिटलिज्म और पर्यावरणीय अनदेखी का एक नया अध्याय है? विकास और प्रगति के नाम पर इस एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए प्रकृति की जो बलि दी गई है, उसकी भरपाई नामुमकिन है। मेरठ से प्रयागराज के बीच के हरे-भरे बेल्ट को पूरी तरह साफ कर दिया गया है। आंकड़ों के मुताबिक, एक्सप्रेसवे के निर्माण के लिए लगभग 6 लाख से अधिक पुराने और फलदार पेड़ों को काट दिया गया है। इनमें से अधिकांश पेड़ दशकों पुराने थे, जो न केवल ऑक्सीजन देते थे बल्कि स्थानीय तापमान को भी नियंत्रित रखते थे। क्या पारिस्थितिकी का विनाश ही आज विकास की परिभाषा है? एक्सप्रेसवे के निर्माण से वन्यजीवों के गलियारे नष्ट हो गए हैं और भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge) की प्राकृतिक प्रक्रिया बाधित हुई है। कंक्रीट की यह विशाल पट्टी 'हीट आइलैंड' प्रभाव पैदा कर रही है, जिससे आसपास के गांवों का तापमान बढ़ रहा है और जीवन दूभर होता जा रहा है। गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना की सबसे विवादास्पद कड़ी इसकी निविदा प्रक्रिया और ठेकों का वितरण रहा है। आरोप है कि इस मेगा प्रोजेक्ट का उपयोग जनसेवा से अधिक पूंजीपति मित्रों को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया। परियोजना के बड़े हिस्से के ठेके उन गिने-चुने कॉर्पोरेट घरानों को दिए गए, जो सत्ता के करीबी माने जाते हैं। प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता के अभाव और शर्तों को बड़े खिलाड़ियों के पक्ष में करने के कारण स्थानीय और मध्यम स्तर के ठेकेदारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। यह केवल एक सड़क का निर्माण नहीं है, बल्कि सार्वजनिक धन का बड़े कॉर्पोरेट समूहों के साथ साठगांठ कर हस्तांतरण करने की प्रक्रिया मात्र है। जब चुनिंदा समूहों को हज़ारों करोड़ के ठेके दिए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर एकाधिकार (Monopoly) को बढ़ावा देता है। यह न केवल भ्रष्टाचार की संभावनाओं को जन्म देता है, बल्कि उसका पोषण और संरक्षण भी करता है। जब उत्तर प्रदेश में पहले से मौजूद एक्सप्रेसवे (जैसे आगरा-लखनऊ और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे) अपनी पूर्ण क्षमता का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, तो एक और एक्सप्रेसवे के लिए हज़ारों करोड़ खर्च करना और लाखों पेड़ काटना कहाँ तक तर्कसंगत है? पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर की अनदेखी की जा रही है, जिसके परिणामस्वरूप राज्य के अधिकांश राष्ट्रीय और राज्य राजमार्ग (NH/SH) बदहाली का शिकार हैं। यदि सरकार की मंशा वास्तविक विकास की होती, तो नए विनाशकारी निर्माण के बजाय मौजूदा सड़क नेटवर्क को सुदृढ़ किया जा सकता था। भारी टोल टैक्स और वैकल्पिक मार्गों की मौजूदगी के कारण यह डर बना हुआ है कि यह एक्सप्रेसवे भी केवल 'सफेद हाथी' बनकर रह जाएगा, जबकि इसकी लागत का बोझ अंततः आम जनता पर ही पड़ेगा। गंगा एक्सप्रेसवे के लिए उपजाऊ कृषि भूमि के अधिग्रहण ने छोटे किसानों को भूमिहीन बना दिया है। मुआवजे की राशि से जीवनयापन और सुरक्षित भविष्य संभव नहीं है। यह राशि अक्सर शिक्षा या सही निवेश के अभाव में समाप्त हो जाती है और किसान व उसका परिवार दिहाड़ी मजदूर बनने को विवश हो जाता है। जबकि खेती से मिलने वाला अनाज परिवार के साथ-साथ समाज का भरण-पोषण करता है। भूमि से मिलने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी आजीविका हमेशा के लिए छिन गई है। एक्सप्रेसवे ने गांवों को दो हिस्सों में बांट दिया है। स्थानीय लोगों के लिए सड़क पार करना अब एक बड़ी चुनौती है, जिससे उनके सामाजिक रिश्ते और रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं। सरकारी चश्मे से गंगा एक्सप्रेसवे का निर्माण आधुनिक उत्तर प्रदेश की एक महत्वाकांक्षी तस्वीर पेश करता है, लेकिन इसके पीछे छिपे पर्यावरण विनाश, किसानों की बेबसी और पूंजीवादी हितों के गठजोड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि विकास का लाभ केवल उन बड़ी कंपनियों तक सीमित रह जाता है जिन्हें इसके ठेके मिले हैं और आम नागरिक केवल अपनी जमीन और हरियाली खोकर धूल फांकने पर मजबूर है, तो ऐसे विकास की सार्थकता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। असली प्रगति वह है जहाँ एक्सप्रेसवे की रफ़्तार के साथ-साथ स्थानीय पर्यावरण सुरक्षित रहे और निविदाओं में पारदर्शिता के जरिए जनता के धन का सही उपयोग हो, न कि इसे पसंदीदा समूहों की तिजोरियां भरने का माध्यम बनाया जाए। समृद्ध विरासत वह है जहां आधुनिकता और प्रकृति सह-अस्तित्व में हों और जहां की योजनाएं ऊपर से नीचे (Top-down) थोपने के बजाय नीचे से ऊपर (Bottom-up) यानी आम आदमी की सहभागिता से बनी हों। हम आने वाली पीढ़ी को रफ़्तार तो दे रहे हैं, लेकिन उनसे सांसें और जमीन छीन रहे हैं। विकास का पैमाना केवल जीडीपी नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और पारिस्थितिक स्थिरता होना चाहिए। अतुल कुमार श्रीवास्तव

Thursday, January 09, 2025

विपक्ष की परिभाषा से अंजान है कांग्रेस

साथियों जय हिन्द... हम पढ़ते आए हैं कि विपक्ष की मुख्य भूमिका मौजूदा सरकार से सवाल पूछना और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाना है। इससे सत्तारूढ़ दल को अपनी गलत नीतियों और गतिविधियों को सुधारने के लिए विवश होना पड़ता है। जिस कारण देश के लोगों के सर्वोत्तम हितों को बनाए रखने में विपक्ष भी समान रूप से जिम्मेदार है। लेकिन क्या आज ऐसा है? #विपक्ष क्या होता है और विपक्ष को कैसे काम करना चाहिए इस बात को गंभीरता से समझने के लिए हमको चलना होगा #यूपीए-2 के दौर में जब देश में #भारतीय_जनता_पार्टी और उसके सहयोगी दल जिसे #एनडीए के नाम से जाना जाता था और जब यही एनडीए विपक्ष में थी... उस #समय जनता से जुड़े छोटे से छोटे #मुद्दे पर उसके सारे बड़े-बड़े नेता सड़कों पर आंदोलन करते थे। कभी #गैस_सिलेंडर लेकर, कभी #प्याज ले कर तो कभी #पेट्रोल के बढ़ते दामों पर तो कभी #अरहर की दाल...तो कभी भ्रष्टाचार। #भाजपा द्वारा आयोजित ऐसे ही आन्दोलनों की वजह से लोगों को लगा ये हमारे #मुद्दे की बात करते हैं, जिसका परिणाम यह हुआ कि #2014 में इन्हें सरकार बना पाने में सफलता हासिल हुई और सारे तथाकथित आंदोलनकारी मंत्री बने... एक तो योगगुरु बनकर पूरा साम्राज्य बना डाला तो दूसरा कुंभकर्णी नींद में सो गया और कुछ बिजनेस ट्राईकून के रूप में पहचाने जाने लगे। लेकिन पिछले 10-11 वर्षों में #कांग्रेस को ले लीजिए... इनके सारे नेता सिर्फ #प्रेस_कांफ्रेंस करते हैं या बड़ी सभाओं में #भाषण देने के लिए मंच पर दिखाई देते हैं। जैसे #के _सी_वेणुगोपाल, #जय_राम_रमेश, #सुरजेवाला, #अलका_लांबा, #अधीर_रंजन_चौधरी, #अशोक_गहलोत, #अंबिका_सोनी, #मुकुल_वासनिक, #आनंद_शर्मा, #अजय_माकन, #कुमारी_शैलजा, #सलमान_खुर्शीद, #जितेंद्र_सिंह, #दीपक_बाबरिया जैसे सैकड़ों नेताओं की लंबी-चौड़ी लिस्ट है जिन्हें कभी भी जमीनी आंदोलन में जनता के हक के लिए लड़ते नहीं देखा गया... इसके इतर जब कांग्रेस सत्ता में आएगी तो यह सब मंत्री बनने के लिए सबसे पहली लाइन में खड़े दिखाई देंगे। इन सबने कांग्रेस की व जनता के हितों की, जन आंदोलन की सारी जिम्मेदारी #राहुल_गांधी को दे रखी है। आंदोलन कोई भी हो राहुल जाए, पीड़ितों से मिलने राहुल जाए, सड़क पर पैदल राहुल गांधी चले...यानी ये सिर्फ राहुल गांधी के सहारे सत्ता चाहते हैं। अगर ये नेता जनता से जुड़े छोटे से छोटे मुद्दे पर सड़कों पर उतर कर आन्दोलन करते या अब भी वक्त है करना आरंभ कर दें सिर्फ अपने-अपने ही क्षेत्र में तो राहुल गांधी की ताकत कम से कम 50 गुना अपने आप ही बढ़ जायेगी। लेकिन यह नेता वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत की सरकार लालफीताशाही की तर्ज पर विपक्ष मुक्त हो जाएगी। याद रखो कांग्रेसियों राहुल गांधी अकेले सत्ता नहीं दिला सकते, जो हालत तुम लोगों की गलत नीतियों की वजह से आज कांग्रेस की है इससे भी कई गुना बुरी हालत में पहुंचाने का सेहरा भी तुम एक दूसरे के सिर पर बांधते नजर आओगे या फिर बिना किसी संकोच के दल परिवर्तित अपना उल्लू सीधा करते दिखाई दोगे। वर्तमान अध्यक्ष @मल्लिकार्जुन_खरगे और राहुल गांधी को अभी तक समझ क्यों नहीं आ रहा की कांग्रेस इन सब नेताओं के नकारापन की वजह से हार रही है। लेकिन ये दोनों कठोर निर्णय क्यों नहीं ले पा रहे हैं, यह अत्यधिक महत्वपूर्ण प्रश्न है। जहां तक हमारा मानना है कि इन सभी नाकारा नेताओं से ज्यादा बड़े जिम्मेदार राहुल गांधी और खरगे स्वयं हैं। अगर यह बैठक में यह निर्णय ले लें कि महीने में हर नेता को कम से कम 2 आन्दोलन करने ही करने हैं तो देश में जरूरी मुद्दों पर आन्दोलन चालू हो जायेंगे। सरकार को जनहित के काम करने ही पड़ेंगे। लेकिन ना तो राहुल गांधी ना खरगे किसी को कुछ मतलब ही नहीं रह गया। अगर यह नेता सड़कों पर उतर कर विपक्ष का असली काम नहीं करेंगे तो कभी सत्ता में वापस नहीं आ सकते। यह विपक्ष का राजधर्म है और इस परिपाटी को ही कहते हैं विपक्ष... समझे कांग्रेसियों।

Saturday, December 18, 2021

वास्तविकता को नजरंदाज करते हमारे प्रधान

 भारत के लिए अभिशाप बनकर आया वह मनहूस जिसने वाडमेर रेलवे स्टेशन बनने से पहले ही चाय बेचनी शुरू कर दी थी वह भी दो रुपए में जब दिल्ली में 50 पैसे में भरपेट नाश्ता मिलता था। उसके इस झूठ पर हम भावनात्मक रूप से मुग्ध हो गये कि यह गरीब परिवार से है और बिना सत्य का आंकलन किये उसके झूठ को, उसके फरेब को सत्य मान बैठे, और अपने परिवार को, अपनी पत्नी को धोखा देने वाले को 2014 में सम्पूर्ण भारत की कमान दे दी और फिर मदारी ने वही राग अलापना, वही डमरू बजाना शुरू किया जिसके खिलाफ वह 2014 से पहले बोलता था। जिसने 2014 से पहले आधार को बकवास योजना बताई थी उसी को जरूरी करार दे दिया। जी एस टी के मूल स्वरूप को भ्रमात्मक व व्यवसायियों की कमर तोड़ने वाला बताया था उसको स्वीकार कर आर्थिकी स्थिति को मजबूत करने वाला बताकर जबरन थोप दिया। डीजल-पेट्रोल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों के बढ़ने पर उससे पड़ने वाले अधिभार पर सरकार की विफलता बताने वाला आज पिछले सात वर्षों से मुंह में दही जमाकर बैठा है। मंहगाई कम करना जिसका नारा था अब वह मंहगाई के लिए बेचारा है। अपनी विफलताओं को पिछले 70 साल की जुमलेबाजी में लपेटकर वाहवाही लूटने वाले लूटेरे ने 70 सालों में बने सरकारी संस्थाओं को बेंचकर लूटने का काम किया और उल्टा सवाल करता है कि पिछले 70 सालों में नेहरू और कांग्रेस ने किया क्या है? इतिहास की मानें तो मुगलों ने मंदिरों को लूटा लेकिन इसने तो चौकीदार बनकर अपने आकाओं के साथ बैंकों को लूटा और फिर सरकारी संस्थाओं को बेंच डाला और अब वह...

✍️आजकल वह मैं देश नहीं बिकने दूंगा, जैसी खुबसूरत बातें नहीं करता।


✍️अब वह स्विस बैंकों में जमा काला धन जो अब डबल हो चुका है, पर बात नहीं करता।


✍️अब वो सब के खाते में 15-15 लाख रुपए आने की बात नहीं करता


✍️अब वह डॉलर के मुकाबले गिरते रुपए पर बात नहीं करता, अब वह जिस देश का रुपया गिरता है उस देश के प्रधानमंत्री की इज्जत गिरती है, ऐसी बातें नहीं करता।


✍️अब वह देश की गिरी हुई जी. डी. पी. पर मुंह नहीं खोलता, न अब वह देश में हो रहे बलात्कारों व अत्याचारो पर बात करता है।


✍️अब वो दागी मंत्रियों व नेताओं पर बात नहीं करता।


✍️अब वह महिलाओं की सुरक्षा व जमाखोरी पर बात नहीं करता।


✍️अब वह मिलावटखोरी पर बात नहीं करता, न अब वह रिश्वतखोरी पर बात करता है।


✍️अब वह स्मार्ट सिटी बनाने की बात नहीं करता, न ही अब वो बुलेट ट्रेन की बात करता है। अब तो वह अच्छे दिनों की भी बात नहीं करता।


✍️अब वह किसानों की आय दोगुनी करने की बात नहीं करते, अब तो वह बेरोजगारों को रोजगार देने की भी बात नहीं करते। अब वो सबको शिक्षा सबको रोजगार की बात भूल ही गये हैं।


✍️अब वह डीजल-पेट्रोल पर बात नहीं करते, गैस सिलेंडर के आए दिनों बढ़ते दामों पर तो बात ही नहीं करना चाहते!


✍️अब वह रेलवे व अन्य यातायात के साधनों पर बढ़ते किराए पर बात नहीं करता, वह हवाई चप्पल पहनने वालों को हवाई यात्रा कराने की भी बात नहीं करता।


✍️अब वह खाद्य पदार्थों पर बेहताशा बढ़ती महंगाई पर नहीं करता, अब वह बढ़ती हुई महंगाई पर मौन व्रत धारण किए हुए हैं।


✍️अब वह देश में बढ़ती बेरोजगारी पर बात नहीं करता। अब वह साल में 2 करोड रोजगार देने की बात नहीं करता। 


✍️अब वह जनता को राहत देने की बात के लिए मुंह नहीं खोलते न ही अब वो सब को न्याय देने की बात करते हैं।


✍️अब वह चीन को लाल आंखें दिखाने की बात नहीं करते... अब तो वह एक के बदले 10 सिर लाने की बात भी नहीं करते।


सोचिए क्यों..? आखिर क्यों बात तक नहीं करते उन सभी मुद्दों पर जिनके बल पर देश की सर्वोपरि आसन पर बिठाया गया, आखिर क्यों? पहले भी उनकी कोई भी बात में गंभीरता न थी क्योंकि यह और इनका पितृ संगठन केवल भारत को साम्प्रदायिकता में झोंकने के लिए गंभीर रहा है। इनका मकसद सिर्फ सत्ता सुख हासिल करना है, वास्तविक मुद्दों और जमीनी हकीकत से इनका कोई लेना-देना नहीं है। जय हिन्द... जय भारत।