शनिवार, जून 06, 2026

मुद्दों की बलि और नफरत की स्क्रिप्ट: आखिर देश के युवाओं से क्या छिपाया जा रहा है?

हाल के दिनों में बिहार के पटना में खान सर की कोचिंग में हुए हमले और उसके बाद उत्पन्न विवाद को लेकर तरह-तरह की बातें निकल कर आयीं कल तक जो खान सर थे, बिहार में शिक्षा की क्रांति जनक माने जा रहे थे के कारण बिहार ही नहीं देश के शिक्षा माफियाओं की कमर टूट गयी। लेकिन फिर क्या हुआ पेपर लीक मामले में खान सर ने अंजना ओम कश्यप से पंगा ले लिया या यूं कहें कुछ ज्यादा सच बोल दिया। जिसको लेकर सरकारी मीडिया द्वारा अंड छाप सरकार व उसके महकमों द्वारा रचे गए षणतंत्र का नतीजा सामने है एक और खास बात कल तक एक ही मुद्दा छाया हुआ था पेपर लीक पर गुस्सा और धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा। आज गोदी मीडिया की अपार सफलता से जो निर्देश ऊपर से मिलते हैं ये मुद्दा दिल्ली अग्निकांड सब गायब है अब सिर्फ ये समझाया जा रहा है कि खान सर मुस्लिम है और मुस्लिम होना आज की तारीख में क्या है बताने की जरूरत नहीं है। इस बात को लेकर देश की सामाजिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को छोड़कर एक गंभीर बहस छिड़ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर हमारा सिस्टम (व्यवस्था) किन चीजों को अपने लिए खतरा मानता है और किनसे आंखें मूंद लेता है? जब गंभीर अपराधों के आरोपी, जनहित के मुद्दों पर विफलताएं और समाज को खोखला करने वाली कमियां व्यवस्था की रडार से बाहर दिखती हैं, लेकिन जनसेवा में लगे लोग निशाने पर आ जाते हैं, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और नागरिक समाज दोनों को आत्ममंथन करने की जरूरत होती है। एक स्वस्थ समाज की पहचान उसकी प्राथमिकताओं से होती है। आज हमारे सामने कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो तत्काल ध्यान और सख्त कार्रवाई की मांग करते हैं: इनमें कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां गंभीर आरोपों से घिरे रसूखदार लोग या कथित धर्मगुरु कानूनी दांव-पेंचों का फायदा उठाकर लंबे समय तक व्यवस्था को धता बताते रहे है। दूसरी नेता और माफिया प्रवृत्ति के लोगों द्वारा पेपर लीक की लगातार होती घटनाएं, बढ़ती बेरोजगारी और परीक्षा के दबाव में दम तोड़ते छात्रों की आत्महत्याएं समाज के लिए एक बड़ा अलार्म हैं। इक्कीसवीं सदी के दौर में देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी खराब स्वास्थ्य सेवाओं, खस्ताहाल सरकारी स्कूलों और पीने के साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। विडंबना यह है कि इन गंभीर और जनहित से जुड़े मुद्दों पर व्यवस्था की गति अक्सर धीमी या उदासीन दिखाई देती है। इसके विपरीत, जब कोई व्यक्ति या शिक्षक आगे बढ़कर इन कमियों को दूर करने का प्रयास करता है- जैसे लाखों गरीब बच्चों को मुफ्त या न्यूनतम फीस में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना, या किफायती दरों पर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना; तो वह समाज को अपने लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई देती है। जो आज के चोरों अर्थात नेताओं (खासकर सत्ता पक्ष के) को यह फूटी आंख नहीं सुहाई देता है। समस्या तब शुरू होती है जब समाज सुधार के इन प्रयासों के साथ-साथ व्यवस्था की कमियों और मुख्यधारा के मीडिया के एक वर्ग की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए जाने लगते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वस्थ आलोचना और सच को सामने लाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब इस आलोचना के बदले संबंधित व्यक्ति को कानूनी या प्रशासनिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, तो पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगते हैं। इस पूरे परिदृश्य में दो और चिंताजनक पहलू उभरकर सामने आते हैं: अक्सर मुख्यधारा की मीडिया के एक हिस्से पर यह आरोप लगता रहा है कि वह जनता के असली मुद्दों (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) को उठाने के बजाय सत्ता के सुर में सुर मिलाना ज्यादा पसंद करता है। ऐसे में जब कोई उनके इस रवैये को बेनकाब करता है, तो निष्पक्षता की जगह व्यक्तिगत हमलों का दौर शुरू हो जाता है। दूसरा कि वर्तमान दौर में किसी भी मुद्दे को तुरंत धार्मिक या सांप्रदायिक रंग दे दिया जाता है। यदि जनसेवा करने वाला व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक समुदाय से आता है, तो नफरती तत्वों और व्यवस्था के एक हिस्से द्वारा उसकी पहचान को ढाल बनाकर पूरे विमर्श को भटकाने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति सामाजिक ताने-बाने और न्याय प्रणाली दोनों के लिए घातक है। यदि राष्ट्र निर्माण में लगे शिक्षकों, डॉक्टरों या समाजसेवियों को उनके काम, उनकी बेबाक राय या उनकी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित होना पड़े, तो यह पूरे समाज की हार होगी। व्यवस्था को यह समझना होगा कि उसका असली मुकाबला अपराध, अशिक्षा, और गरीबी से है, न कि उन लोगों से जो इन समस्याओं को हल करने में अपना जीवन लगा रहे हैं। समय आ गया है कि सिस्टम अपनी प्राथमिकताओं को सुधारे, ताकि देश का हर नागरिक सुरक्षित और गौरवान्वित महसूस कर सके। इसके साथ ही हमें यह ध्यान रखना होगा कि भविष्य में भी यदि युवाओं की ऊर्जा; हक मांगने के बजाय नफरत और खेमेबाजी में खर्च होने लगे, तो समझ जाना होगा कि स्क्रिप्ट लिखने वाले अपने मकसद में कामयाब हो गए हैं। और हम निश्चित रूप से असल मुद्दे से भटक चुके हैं। समाज को विशेषकर छात्रों को मैं यह चेतावनी देता हूं कि वे भावनाओं में बहकर आपस में लड़ने के बजाय ठंडे दिमाग से सोचें कि इस पूरे विवाद से अंततः फायदा किसका हो रहा है और नुकसान किसका? जब तक देश का युवा जाति, धर्म और मीडिया के इस चक्रव्यूह को चीरकर सीधे अपनी शिक्षा और भविष्य पर अड़ा नहीं रहेगा, तब तक समाज हितैषियों के साथ ऐसी ऑस्कर विनिंग स्क्रिप्ट्स लिखी जाती रहेगी और युवाओं की जवानी धरनों और सोशल मीडिया की जंग में ही जाति और धर्मवाद के गड़ासे में कटती रहेगी। आज इस भटकाव के खिलाफ एक मजबूत आवाज और एकजुटता बहुत ही जरूरी है जो आने वाले कल के लिए और भविष्य की कल्पना का मुख्य सूत्रधार होगी..! जय हिन्द

बुधवार, जून 03, 2026

राष्ट्र का स्वाभिमान और कूटनीति: तस्वीरों से आगे की हकीकत हो स्पष्ट

वैश्विक इतिहास में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि भारतीय तिरंगे को इतनी बेइज्जती झेलनी पड़ी हो, 1947 से पहले यदि ऐसी परिस्थितियों से हम रूबरू हुए तो अंग्रेजी शासन का दौर जो कि दमनकारी नीतियों पर आधारित था और अपनी सत्ता में कोई किसी दूसरे का राष्ट्र ध्वज क्यों फहरने दे? 2014 में मोदी के सत्ता संभालने के बाद हम तथाकथित विश्वगुरु बन गये थे... मोदी द्वारा शायद ही कोई ऐसा कोना बचा हो विश्व के नक्शे पर जहां इनके नमूने हम सभी को न देखने को मिले और हर बार हम सिर्फ शर्मसार होते आए हैं, और हद तो तब हो गई जब विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का प्रधान दांत चियारते हुए मैलोडी पर अपनी गरिमा धूर धूमिल कर रहा और ठीक उसके बाद तिरंगे का दिख रहे इस वीडियो में अपमान शायद ही कभी हुआ, लेकिन मजाल है कि विश्वगुरु के मुंह से एक शब्द निकला हो। आपके दोस्त ट्रम्प के देश अमेरिका में भारत की शान और पहचान तिरंगा 🇮🇳 फाड़ कर देश का अपमान किया जा रहा है उस पर आपकी अब भी चुप्पी क्यों है? कभी ट्रम्प भारत को नरक बोल देता है, और कभी उसी के देश में हमारे सम्मान का प्रतीक अपमानित होता है फिर भी आपके रिश्तों में मिठास ही क्यों दिखाई देती है? देश अब पूछ रहा है आख़िर स्वाभिमान के मुद्दों पर सख्त और सीधा संदेश कब जाएगा, और कब सिर्फ तस्वीरों से आगे बात बढ़ेगी? हाल के वर्षों में वैश्विक राजनीति में भारत की उपस्थिति और उसकी विदेश नीति को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए हैं। विश्वगुरु और मजबूत भारत की इस छवि के बीच जब विदेशों से राष्ट्र के प्रतीकों के अपमान की खबरें या तस्वीरें सामने आती हैं, तो वह देशवासियों के आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचाती हैं। विशेष रूप से अमेरिका जैसे मित्र देशों में, जहाँ भारतीय प्रवासियों की एक बड़ी संख्या रहती है और जिसे भारत का एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार माना जाता है, वहाँ राष्ट्रीय ध्वज का अनादर होना बेहद चिंताजनक है। लोकतंत्र में जनता का यह पूछना स्वाभाविक है कि यदि द्विपक्षीय संबंध इतने प्रगाढ़ हैं, तो ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर तात्कालिक और कड़ी कार्रवाई क्यों दिखाई नहीं देती? एक तरफ जहाँ रणनीतिक साझेदारी की बात होती है, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी नेतृत्व द्वारा कभी-कभी भारत की आंतरिक परिस्थितियों को लेकर असहज करने वाली टिप्पणियाँ की जाती हैं। जब राष्ट्र के मान-सम्मान या तिरंगे के अपमान का मामला हो, तो देश की जनता सरकार से केवल पर्दे के पीछे की बातचीत (Backchannel Diplomacy) की उम्मीद नहीं करती, बल्कि एक स्पष्ट और कड़ा सार्वजनिक रुख देखना चाहती है। तस्वीरों से आगे बढ़कर ठोस संदेश की आवश्यकता है। भारत एक संप्रभु और स्वाभिमानी राष्ट्र है। वैश्विक नक्शे पर अपनी पैठ बनाना और हर देश से मजबूत आर्थिक संबंध रखना समय की मांग है, लेकिन यह सब राष्ट्रीय गरिमा की कीमत पर नहीं होना चाहिए। समय आ गया है कि भारत की विदेश नीति केवल द्विपक्षीय दौरों, भव्य स्वागत समारोहों और तस्वीरों तक ही सीमित न रहे। यदि कोई भी देश चाहे वह कितना भी बड़ा मित्र क्यों न हो भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों का अनादर करने वाले तत्वों को अपने यहाँ पनाह देता है या उन पर ढीला रुख अपनाता है, तो भारत सरकार को बिना किसी संकोच के एक सख्त और सीधा कूटनीतिक संदेश देना होगा। राष्ट्र का स्वाभिमान सर्वोपरि है, और कूटनीति में इसकी झलक साफ दिखनी चाहिए। जय हिन्द

मंगलवार, जून 02, 2026

हाफ और फुल का चयनात्मक गणित: जब कानूनन न्याय, रंग और मजहब से तय होने लगे

लोकतंत्र की बुनियाद इस एक बुनियादी उसूल पर टिकी होती है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं। लेकिन हालिया दौर में न्याय का जो नया और खौफनाक मॉडल विकसित हुआ है, उसने इस उसूल को मटियामेट कर दिया है। अब न्याय अदालतों से नहीं, बल्कि पुलिस की बंदूकों की नली से तय हो रहा है; उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इन बंदूकों से निकलने वाली गोलियों की रफ्तार, उनकी दिशा और उनकी जगह (पैर या खोपड़ी) इस बात से तय होने लगी है कि आरोपी का नाम, उसकी जाति और उसका मजहब क्या है। समाज का एक बड़ा हिस्सा इस चयनात्मक न्याय को देखकर न सिर्फ खामोश है, बल्कि इसमें एक वीभत्स किस्म का उत्सव भी मना रहा है। वर्तमान दौर में यह एक ऐसी खतरनाक मनोदशा है, जो किसी भी सभ्य समाज को बर्बरता की ओर धकेलने के लिए काफी है। शासन और प्रशासन के इस नए न्याय शास्त्र को समझने के लिए कुछ हालिया उदाहरणों और उनके तरीकों को देखना जरूरी है- इन दिनों सोशल मीडिया पर एक युवक एक मासूम बच्चे की बेरहमी से पटक-पटक कर हत्या करने वाले आरोपी जितेंद्र पाठक को पुलिस घटना के मात्र 7 घंटों के भीतर पकड़ती है। लेकिन यहां न्याय का हाफ मॉडल लागू होता है। पुलिस की गोली उसके पैर में लगती है, वह लंगड़ाता हुआ जेल जाता है और उसके जिंदा रहने तथा कानूनी प्रक्रिया का लाभ उठाने के सारे रास्ते खुले रहते हैं। सवाल यह उठता है कि ऐसे जघन्य अपराधी के मामले में पुलिस का निशाना सिर्फ पैर तक ही क्यों सीमित रहा? क्या उसकी सामाजिक या धार्मिक पृष्ठभूमि ने उसे सुरक्षा कवच दिया? इसके विपरीत, जब बात दूसरे मजहब के अपराधियों की आती है, तो पुलिस का रवैया अचानक फुल एनकाउंटर में बदल जाता है। अतीक अहमद के बेटे असद और उसके साथी गुलाम का मामला हो, या फिर कई अन्य छोटे-मोटे मामलों में शामिल मुस्लिम आरोपी, वहां पुलिस की आत्मरक्षा की थ्योरी सीधे खोपड़ी या सीने पर जाकर खत्म होती है। वहां पैर में गोली मारकर आरोपी को जिंदा पकड़ने की फुर्सत या मंशा प्रशासन के पास नहीं दिखती। क्या सत्ता और पुलिस महकमा यह समझाना चाहता है कि अपराधियों की क्रूरता का पैमाना उनके अपराध से नहीं, बल्कि उनके सरनेम से तय होगा? संवैधानिक संस्थाओं और न्यायालयों का मौन इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवालिया निशान न्याय संहिता और न्यायालयों पर खड़ा होता है। जब कार्यपालिका (सरकार) और प्रशासन (पुलिस) खुलेआम अदालतों के काम को अपने हाथ में ले रहे हैं, तो न्यायपालिका मूकदर्शक क्यों बनी हुई है? जब पुलिस ही जज, जूरी और जल्लाद बन जाएगी, तो करोड़ों रुपये की लागत से बनीं अदालतें और कानून की मोटी किताबें सिर्फ सजावट की वस्तु बनकर रह जाएंगी। सच्चाई यह है कि आज जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग और संवैधानिक संस्थाएं भी इस त्वरित न्याय की लोकप्रियता के आगे नतमस्तक नजर आ रही हैं। जो अदालतें नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षक थीं, वे एनकाउंटर की इन स्क्रिप्टेड कहानियों पर स्वतः संज्ञान लेने में हिचकिचा रही हैं। प्रशासन का यह रवैया बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं है। सत्ता में बैठे लोग अपराधियों की सूची भी चश्मे का रंग बदलकर देखते हैं। एक खास वर्ग के अपराधी को भटके हुए युवक या हाफ एनकाउंटर का शिकार बनाकर सुधरने का मौका दिया जाता है, जबकि दूसरे वर्ग के लिए सीधे ठोक दो की नीति अपनाई जाती है। यह शासन नहीं, बल्कि बहुसंख्यकवाद को खुश करने की एक सुनियोजित राजनीति है। जब समाज किसी अपराधी की मौत पर उसके मजहब को देखकर उत्सव मनाने लगे और तालियां बजाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि न्याय की अवधारणा मर चुकी है। आज सत्ता और व्यवस्था हमसे एक बेहद अमानवीय सवाल पूछ रही है कि आप हाफ वाले हैं या फुल? यानी आप पैर में गोली मारने के समर्थक हैं या खोपड़ी में? लेकिन एक सजग नागरिक और लोकतांत्रिक समाज के नाते हमारा जवाब होना चाहिए कि हम न हाफ वाले हैं, न फुल वाले हैं—हम संविधान वाले हैं। अपराधी चाहे जितेंद्र हो या जावेद, उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का काम कानून की स्थापित प्रक्रिया (Due Process of Law) के तहत अदालत का है, न कि किसी चौराहे पर खड़े पुलिसकर्मी का। अगर आज हम मजहब देखकर एनकाउंटर पर खामोश रहे या जश्न मनाते रहे, तो याद रखिए कि कानूनविहीनता की यह आग एक दिन हर उस घर तक पहुंचेगी जो आज इस तमाशे को देखकर मुस्कुरा रहा है।

शनिवार, मई 30, 2026

बधाई हो! हम 157वें पायदान के विश्वगुरु के पत्रकार हैं!

आज 30 मई है... कैलेंडर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है। इस उत्साह में सुबह से ही सोशल मीडिया के तमाम चौराहों पर चौथे स्तंभ के सिपाहियों को बधाई देने का तांता लगा हुआ है। लोग एक से बढ़कर एक पोस्टर बनाकर शुभकामनाएं प्रेषित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तैरते इन रंग-बिरंगे पोस्टर्स में कलम की ताकत और निष्पक्षता के कसीदे गढ़े जा रहे हैं। तो चलिए, इसी भीड़ में औपचारिकता निभाते हुए हम भी अपनी पीठ ठोक लेते हैं और एक-दूसरे की भावनाओं से जुड़कर मुबारकबाद दे देते हैं—वह भी ऐसे ऐतिहासिक और गौरवशाली दौर में, जब वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में हम पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे दिग्गजों को पछाड़कर 157वें पायदान पर अपनी धाक जमा चुके हैं। यह है देश के विश्वगुरु होने का साक्षात प्रमाण। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के इस पावन अवसर पर उन रीढ़ विहीन महाशक्तियों का अभिनंदन तो बनता ही है, जिन्होंने समय रहते समझ लिया कि पत्रकारिता का असली हुनर कलम चलाना नहीं, बल्कि चरण वंदन करना है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में तो यह विधा अब अपने चरम पर है। पत्रकारिता जगत में पिछले लगभग एक दशक से योग्यता की नई परिभाषाएँ गढ़ी जा चुकी हैं। अगर आप जमीनी मुद्दों को उठाने, जनता के सरोकारों पर बेबाक राय रखने या सत्ता से कड़े सवाल पूछने जैसी बीमारी है, तो बड़े-बड़े मीडिया प्रतिष्ठानों ने आपके इलाज की मुकम्मल व्यवस्था कर रखी है गेट आउट का बोर्ड दिखाकर! ज़मीनी हकीकत और जनता के दर्द को पन्नों पर उतारने वाले कलम के सिपाहियों को लगभग हर बड़े संस्थान ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। पुण्य प्रसून बाजपेयी, रवीश कुमार, अभिसार शर्मा और आशुतोष जैसे नाम इसके जीवंत उदाहरण हैं। बाज़ार को अब पत्रकार नहीं, दरबारी चाहिए। और दरबारी भी ऐसे, जो हुजूर के खांसने को भी मास्टरस्ट्रोक साबित कर सकें। ऐसे माहौल में जब अंदर का पत्रकार हर रोज़ घुट-घुट कर मर रहा हो, तब 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ' कहना किसी क्रूर मज़ाक जैसा लगता है। समझ नहीं आता कि बधाई किस बात की दें? क्या इस बात की बधाई दें कि अब खबरें खोजी नहीं, प्रायोजित होती हैं? या इस बात का जश्न मनाएँ कि जनता के बुनियादी सवाल रोटी, कपड़ा, मकान और रोज़गार अब मुख्यधारा के नैरेटिव से पूरी तरह गायब हो चुके हैं? या फिर 157वें स्थान पर आने की ख़ुशी में लड्डू बाँटें? कैसी बधाई और किस बात का उत्सव? हिन्दी पत्रकारिता का एक दौर वह था, जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने 'उदन्त मार्तण्ड' की शुरुआत कर बिना किसी भय के समाज को आईना दिखाया था। और आज का दौर वह है, जहाँ आईना साफ़ करने की बजाय, चेहरा बदलने का चौतरफा दबाव है। चाटुकारिता के रास्ते पर जो चल रहे हैं, वे पूरी तरह सुरक्षित हैं; क्योंकि उन्होंने समय रहते सीख लिया कि सच बोलने से सैलरी और साख दोनों खतरे में पड़ जाती है। इसलिए, आइए आज के दिन उन सभी दरबारियों की वंदना करें, जिन्होंने पत्रकारिता को एक नई ऊंचाई या यूं कहें कि रसातल की गहराइयां दी है। पत्रकारिता की गरिमा को तार-तार करके ही तो उन्होंने ये ऊंची अट्टालिकाएं और भारी-भरकम बैंक बैलेंस पाया है। बाकी, जो आज भी ज़मीन पर धूल फांक रहे हैं, जिनकी कलम में अब भी थोड़ी स्याही और ज़मीर बाकी है, उन्हें इस उपनिवेशी पत्रकारिता दिवस पर गहरी संवेदनाएँ! लिखते रहिए... क्या पता किसी दिन 157वें स्थान से फिसलकर हम और नीचे आ जाएँ, और हमारे पास उत्सव मनाने का बहाना और बड़ा हो जाए। फिलहाल, कागज़ी शुभकामनाओं का लुत्फ़ उठाइए, क्योंकि सच तो वैसे भी नॉट रीचेबल हो चुका है। जय हिन्द!

सोमवार, मई 25, 2026

लोकतंत्र का प्रशासनिक सरेंडर: 2027 की घबराहट और वोट की चोट से डरी हुकूमत..!

उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त एक बेहद संवेदनशील और अलोकतांत्रिक दौर से गुजर रही है। सूबे की सरकार ने ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होते ही जो दांव खेला है, उसने यह साफ कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में 2027 की हार का खौफ किस कदर घर कर चुका है। बैकडोर से बिना चुनाव कराए मौजूदा 57 हजार से अधिक ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त करने का अनैतिक व अजीबोगरीब फैसला लेना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि हुकूमत जनता का सामना करने की हिम्मत खो चुकी है। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के बहाने चुनावों को आगे खिसकाना रणनीतिक मजबूरी कम, योगी सत्ता की खुली चुनावी कायरता ज्यादा नजर आती है।
सरकार का यह तर्क कि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही सीटें तय होंगी; एक ऐसा ढोंग है जिसे गांव का आम आदमी भी बखूबी समझ रहा है। असलियत यह है कि हालिया चुनावी परिणामों को हासिल करने के लिए प्रयोग किए गये साम-दाम-दंड-भेद और जमीनी फीडबैक ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की चूलें हिला रखी हैं। सरकार को डर है कि अगर आज पंचायत चुनाव हुए और नतीजे विपरीत आए, तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही सत्ता विरोधी लहर का ऐसा तूफान उठेगा जिसे संभालना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा। जिसकी खातिर योगी सरकार ने राजनीतिक आपदा से बचने के लिए लोकतंत्र की मर्यादा को ताक पर रखते हुए अफसरों की जगह पहली बार निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक की कुर्सी सौंप दी; ताकि 57 हजार प्रधानों को खुश रखा जा सके। लेकिन सत्ता के हुक्मरानों ने इस बार गणित का गलत चश्मा पहन लिया है। सरकार के इस आत्मघाती फैसले ने उत्तर प्रदेश के गांवों में ढाई लाख भावी दावेदारों की पीठ में छुरा मारने का काम किया है। सरकार इस मुगालते में है कि उसने 57 हजार प्रधानों को प्रशासक का लॉलीपॉप देकर अपनी गद्दी सुरक्षित कर ली। लेकिन वह इस कड़वे सच से मुंह चुरा रही है कि उत्तर प्रदेश के गांवों में इस पद के लिए चार गुना ज्यादा (लगभग ढाई लाख) भावी उम्मीदवार दिन-रात एक किए बैठे थे। यह फैसला इन जमीनी कार्यकर्ताओं के अरमानों का कत्ल है। प्रधान पद के ये दावेदार वो युवा और स्थानीय नेता हैं, जिन्होंने पिछले दो-ढाई साल से अपनी गाढ़ी कमाई, समय और उम्मीदें गांवों के विकास और प्रचार में फूंक दी थीं। कोई खेल टूर्नामेंट करा रहा था, कोई शादियों-तेरहवियों में अपनी हाजिरी लगा रहा था, तो कोई कर्ज लेकर जनता की सेवा में जुटा था। ऐन वक्त पर चुनाव टालकर और मौजूदा प्रधानों को ही फिर से चाबियां सौंपकर सरकार ने इन ढाई लाख कर्मठ दावेदारों और उनके समर्थकों के सपनों पर प्रशासनिक बुलडोजर चला दिया है। उनके सीने में सुलग रही यह पीड़ा और आक्रोश आने वाले समय में सरकार के लिए सबसे बड़ा नासूर बनेगा। उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (73वें संविधान संशोधन) की आत्मा पर सीधा प्रहार है। चुनाव टालने का सीधा मतलब है कि गांवों का विकास अब जनता की मर्जी से नहीं, बल्कि लखनऊ की फाइलों और मनोनीत प्रशासकों की वफादारी से तय होगा। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में, जहां विकास की नींव गांवों से होकर गुजरती है, वहां चुनावी प्रक्रिया को बंधक बना लेना यह दिखाता है कि सरकार जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को अपनी पार्टी के नफा-नुकसान के तराजू में तौल रही है। हुकूमत यह न भूले कि जिन ढाई लाख दावेदारों को आज उसने दर्द दिया है, उनके पीछे करोड़ों ग्रामीण मतदाताओं का भरोसा और उनकी लामबंदी है। 57 हजार प्रधानों को मिला प्रशासक का यह पद, ढाई लाख दावेदारों के गुस्से की आग में घी डालने जैसा काम करेगा। शासन को यह मुगालता मुबारक हो कि उन्होंने चुनाव टालकर आने वाले संकट को टाल दिया है। हकीकत यह है कि यह गुस्सा खत्म नहीं हुआ है, बल्कि अंदर ही अंदर लावा बनकर सुलग रहा है। जिन ढाई लाख उम्मीदवारों के राजनीतिक करियर और मेहनत को आज सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों ने एक झटके में ठंडे बस्ते में डाल दिया है, वे खामोश बैठने वाले नहीं हैं। यदि सरकार को लगता है कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव तक पंचायत चुनाव टालकर बच जाएगी, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। यही शोषित और आक्रोशित दावेदार 2027 में हर बूथ पर सरकार की घेराबंदी करेंगे। तब सत्ता को समझ आएगा कि जनता के अधिकारों से खिलवाड़ करने की कीमत क्या होती है। सरकार कान खोलकर सुन ले... लोकतंत्र में जनता के फैसले को कुछ समय के लिए टाला तो जा सकता है, लेकिन वोट की चोट के अंतिम न्याय से बचाया नहीं जा सकता।

बुधवार, मई 20, 2026

रेलवे या 'रील-वे'? विज्ञापनों की चमक के पीछे दम तोड़ती रेल सुरक्षा

आज देश का आम नागरिक जब सुबह उठकर अखबार खोलता है या टीवी स्क्रीन देखता है, तो उसे रेल यात्रा के सुहाने विज्ञापनों से ज्यादा पटरियों पर मचे हाहाकार की खबरें दिखाई देती हैं। पिछले कुछ ही दिनों के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों से आई तीन तस्वीरों ने भारतीय रेल के सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है: रतलाम: देश की सबसे वीआईपी और सुरक्षित मानी जाने वाली 'राजधानी एक्सप्रेस' के एसी कोच (B-1) में अचानक भीषण आग लग जाती है। सासाराम: बिहार के सासाराम स्टेशन पर खड़ी एक पैसेंजर ट्रेन धू-धू कर जल उठती है और यात्रियों में अफरातफरी मच जाती है। ऋषिकेश: योग नगरी ऋषिकेश के पास उज्जैनी एक्सप्रेस के तीन कोच पटरी से उतर जाते हैं। ये तीन घटनाएं कोई इक्का-दुक्का हादसे नहीं हैं, बल्कि यह उस मरणासन्न सुरक्षा तंत्र की गवाही हैं, जिसे मौजूदा केंद्र सरकार ने शायद अपनी प्राथमिकताओं से ही बाहर कर दिया है। ऐसे में जनता का यह सोचना शत-प्रतिशत सही है कि देश में प्रचार 'हाई-टेक' का है, लेकिन बुनियादी ढांचा 'राम भरोसे' है। केंद्र सरकार हर दिन वंदे भारत, बुलेट ट्रेन और रेलवे स्टेशनों के "विश्व स्तरीय" कायाकल्प का ढिंढोरा पीटती नहीं थकती। सोशल मीडिया पर चमचमाती ट्रेनों की रील्स और तस्वीरें पोस्ट करके ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो भारतीय रेलवे का पूरी तरह कायाकल्प हो चुका हो। लेकिन हकीकत यह है कि जब जमीन पर ट्रेनें चलती हैं, तो वे कभी शॉर्ट सर्किट से धधक उठती हैं तो कभी तकनीकी खामियों के कारण पटरी से उतर जाती हैं। आज का सबसे बड़ा सवाल है कि जिस देश में प्रीमियम राजधानी एक्सप्रेस तक सुरक्षित नहीं है, वहां आम आदमी की जान की क्या कीमत है? क्या रेल मंत्रालय का काम सिर्फ पुराने ढांचे का रंग-रोगन कर दिखावा करना, नई (वास्तविकता में पुरानी) ट्रेनों को हरी झंडी दिखाना और सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करना ही रह गया है? संसद से लेकर सड़कों तक प्रधानमंत्री और रेलमंत्री ने 'कवच' (एंटी-कोलिजन सिस्टम) और अत्याधुनिक फायर सेफ्टी ऑडिट का बढ़-चढ़कर प्रचार किया था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी देश के अधिकांश रूटों पर यात्री अपनी जान हथेली पर रखकर सफर कर रहे हैं। विडंबना यह है कि हादसों के बाद भी सरकार और मंत्रालय 'आपदा में अवसर' तलाशने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखते। हकीकत साफ है और घिनौना चसच सामने कि जब सरकार की सारी ऊर्जा और बजट सिर्फ रील बनाने, इवेंट मैनेजमेंट और ब्रांडिंग करने में खपा दिया जाएगा, तो ग्राउंड लेवल पर मेंटेनेंस, ट्रैकों की मरम्मत और कोचों की सुरक्षा के लिए संसाधन कहां से बचेंगे? लगातार हो रहे हादसों के बाद सरकार और रेल मंत्रालय की तरफ से सिर्फ एक रटा-रटाया बयान आता है: "जांच के आदेश दे दिए गए हैं।" लेकिन आज तक न तो किसी जांच का ठोस परिणाम सामने आया और न ही किसी शीर्ष जिम्मेदार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया। देश अब इन खोखली जांच रिपोर्टों और बयानों से थक चुका है। जब रेलवे का पूरा फोकस सिर्फ पीआर (PR) कैंपेन पर है, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या करोड़ों यात्रियों को हर सफर पर भेजने वाली भारतीय रेलवे वाकई अब सिर्फ राम भरोसे चल रही है? सरकार को यह समझना होगा कि पटरियों पर देश के हाड़-मांस के नागरिक चलते हैं, कोई डिजिटल विज्ञापन नहीं। अब खोखले दावों को बंद कर सुरक्षा के मोर्चे पर सीधी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। चमचमाते विज्ञापनों के पीछे खोखली होती रेल सुरक्षा में लगातार हो रही इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? क्या केंद्र सरकार की नजर में रेलवे अब सिर्फ 'रेलवे' नहीं, बल्कि 'रील-वे' बन गया है..?

मंगलवार, मई 19, 2026

आईना जब ढाल बन जाए..!

भारतीय मीडिया का बदलता चरित्र और नागरिक जिम्मेदारी लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जो केवल हर पांच साल में वोट डाल देने से सुरक्षित रहे; यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को जीवित रखने के लिए 'जागरूक नागरिक' ईंधन का काम करते हैं और 'स्वतंत्र मीडिया' उस इंजन को सही दिशा में बनाए रखने वाली धुरी है। यदि यह धुरी जाम हो जाए या सिर्फ एक ही दिशा में, वह भी सत्ता पक्ष की ओर घूमने लगे, तो लोकतंत्र का पतन तय है। लोकतंत्र की इमारत चार खंभों पर टिकी होती है: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता। जब पहले तीनों स्तंभ निरंकुश होने लगते हैं, तो चौथा स्तंभ समाज के साथ-साथ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को आईना दिखाकर उन्हें उनकी जिम्मेदारी याद दिलाता है। लेकिन वर्तमान समय में भारत में यह धारणा मजबूत हुई है कि चौथा स्तंभ अब आईना दिखाने के बजाय सत्ता की ढाल बन गया है। वैश्विक सूचकांकों से लेकर रोज टीवी स्क्रीनों पर होने वाली बहसों तक में भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता अपने सबसे निचले स्तर पर खड़ी नजर आती है। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' (RSF) की मानें तो विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान लगातार नीचे खिसकना गंभीर चिंता का विषय है। भारत का स्थान इस बात का प्रमाण है कि यहां पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल कठिन होता जा रहा है। आम तौर पर भारतीय जनमानस में यह माना जाता है कि पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे देशों में लोकतांत्रिक जड़ें बहुत कमजोर हैं। लेकिन जब प्रेस स्वतंत्रता में ये देश भारत के समकक्ष या कभी-कभी बेहतर स्थिति में दिखते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र और यहां की विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के लिए एक बड़ा झटका होना चाहिए। इसके विपरीत, यहां की शासन-व्यवस्था इस कड़वे सच को स्वीकार करने से बचती है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में पत्रकारों पर कानूनी शिकंजे (जैसे UAPA या देशद्रोह के कानून), धमकियों और कॉरपोरेट दबाव में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण मुख्यधारा का मीडिया खुद में सुधार नहीं करना चाहता। नॉर्वे और अन्य नॉर्डिक देश सालों से इस सूची में शीर्ष पर रहते हैं। वहां की सरकारें पारदर्शी हैं, और प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक को पत्रकारों के तीखे व असहज करने वाले सवालों के जवाब देने ही पड़ते हैं। इसके विपरीत, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शीर्ष नेतृत्व का मीडिया से दूरी बनाना एक नई प्रशासनिक संस्कृति को दर्शाता है। भारतीय राजनीति में 'विश्व गुरु' या वैश्विक महाशक्ति बनने की आकांक्षा एक बड़ा नैरेटिव (विमर्श) रही है। ऐसे में क्या एक जीवंत लोकतंत्र का नेता बिना किसी पूर्व-निर्धारित स्क्रिप्ट के, पत्रकारों के खुले और तीखे सवालों का सामना करने से बच सकता है? पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। अब संवाद द्विपक्षीय न रहकर एकतरफा हो गया है। रेडियो कार्यक्रमों (जैसे: मन की बात), सोशल मीडिया पोस्ट्स और रैलियों के जरिए जनता तक अपनी बात सीधे पहुंचाई जाती है। इसमें जनता और सरकार के बीच का माध्यम, यानी पत्रकार गायब हो गया है। इंटरव्यू के बदलते स्वरूप में जो इक्का-दुक्का साक्षात्कार होते भी हैं, उन पर अक्सर चुनिंदा या सॉफ्ट होने के आरोप लगते हैं जो सही भी है। जब देश के मुखिया से बेरोजगारी, महंगाई, सीमा विवाद या सांप्रदायिक तनाव पर तीखे सवाल पूछने के बजाय उनकी जीवनशैली या आम खाने के तरीकों पर बात होने लगे, तो पत्रकारिता की साख का गिरना स्वाभाविक है। पिछले एक दशक से भारतीय पत्रकारिता जगत पर यह आरोप लग रहा है कि मुख्यधारा का मीडिया (विशेषकर हिंदी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल) सत्ताधारी दल के आईटी सेल या प्रवक्ता की तरह काम कर रहा है, जो कई मायनों में सच प्रतीत होता है। यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक मीडिया कोई चैरिटी नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यवसाय है, जिसके संचालन में अरबों का खर्च आता है। न्यूज चैनलों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया सरकारी विज्ञापन और बड़े कॉरपोरेट घरानों से मिलने वाला फंड है। चूंकि सरकार विज्ञापन रोकने की ताकत रखती है, इसलिए चैनलों के मालिक ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते जिससे सत्ता नाराज हो। नतीजा यह होता है कि चैनल सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से सवाल पूछता है। साथ ही, टीवी मीडिया ने यह समझ लिया है कि जटिल आर्थिक या सामाजिक मुद्दों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) पर गंभीर चर्चा से टीआरपी (TRP) नहीं मिलती। टीआरपी मिलती है हिंदू-मुस्लिम डिबेट, पाकिस्तान-विरोधी विमर्श और राष्ट्रवाद के शोर से। यह विमर्श न केवल सत्ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल है, बल्कि चैनलों की जेबें भी भरता है। यही वजह है कि जनता ने इस मीडिया को 'गोदी मीडिया' का नाम दिया है। इस संस्थागत पतन का एक बड़ा कारण भारत में मीडिया नियामक ढांचे (Regulatory Framework) का कमजोर होना भी है।'प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) जैसी वैधानिक संस्थाएं आज के दौर में दंतविहीन बाघ (Toothless Tiger) साबित हो रही हैं, जिनका अधिकार क्षेत्र केवल प्रिंट मीडिया तक सीमित है। टीवी और डिजिटल मीडिया के नियमन के लिए कोई सख्त सरकारी या स्वतंत्र ढांचा नहीं है; वहां स्व-नियमन (Self-regulation) के नाम पर औपचारिकता निभाई जा रही है। जब तक क्रॉस-मीडिया ओनरशिप (कॉरपोरेट एकाधिकार) को रोकने और नियामक संस्थाओं को वित्तीय जुर्माना या लाइसेंस रद्द करने जैसी दंडात्मक शक्तियां देने वाले कड़े कानूनी सुधार नहीं किए जाते, तब तक इस व्यवस्था में प्रशासनिक सुदृढ़ता लाना असंभव है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब मीडिया अपनी निष्पक्षता खो देता है, तो उसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार को घेरना होता है, लेकिन जब मीडिया खुद ही विपक्ष पर हमलावर हो जाए, तो सरकार पूरी तरह निरंकुश हो जाती है। उसे किसी नीति की विफलता का डर नहीं रहता, क्योंकि मीडिया उस विफलता को भी 'मास्टरस्ट्रोक' साबित करने में जुट जाता है। प्राइम-टाइम डिबेट्स में जिस तरह की भाषा और नफरत परोसी जाती है, उसने भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को गहरा नुकसान पहुंचाया है। पड़ोसी, पड़ोसी पर शक करने लगा है और यह सब सिर्फ कुछ रेटिंग्स और राजनीतिक फायदों के लिए किया जा किया जा रहा है। भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भले ही आज सत्ता की चाटुकारिता में लीन हो, लेकिन पूरी तस्वीर इतनी धुंधली भी नहीं है। मुख्यधारा के टेलीविजन से निराश होकर आज भारत का जागरूक नागरिक डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों और खोजी पत्रकारिता पोर्टल्स (जैसे द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, स्क्रॉल, सूर्यांशश्री समाचार आदि) की तरफ मुड़ रहा है। कई स्वतंत्र पत्रकार आज भी अपनी जान और करियर को जोखिम में डालकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। भारत को 'विश्व गुरु' बनने के लिए सिर्फ आर्थिक या सैन्य ताकत की जरूरत नहीं है, बल्कि एक ऐसे स्वतंत्र और निडर मीडिया की जरूरत है जो सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सच बोल सके। जब तक भारतीय दर्शक खुद नफरत के तमाशे को देखना बंद नहीं करेंगे और गंभीर पत्रकारिता के लिए आर्थिक रूप से भुगतान (पे/सब्सक्राइब) नहीं करेंगे, तब तक भारत में मीडिया का यह 'आईटी सेल' वाला अवतार बदलना मुश्किल होगा। थॉमस जेफरसन (अमेरिकी राष्ट्रपति और विचारक) ने कहा था: "सतर्कता ही स्वतंत्रता की शाश्वत कीमत है।" एक जागरूक नागरिक वह नहीं है जो केवल खबरें देखता है, बल्कि वह है जो यह समझता है कि कौन सी खबर दिखाई जा रही है और कौन सी छिपाई जा रही है। जब मीडिया सत्ता की चाटुकारिता पर उतर आए, तब नागरिकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे फैक्ट-चेक करें, वैकल्पिक स्रोतों से जानकारी जुटाएं और खुद को प्रोपेगैंडा (दुष्प्रचार) का शिकार होने से बचाएं। जागरूक नागरिक कभी भी धर्म, जाति या राष्ट्रवाद के नाम पर आंख मूंदकर ताली नहीं बजाएगा। वह सरकार से स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और अपने अधिकारों पर सवाल पूछता रहेगा। रोमन कवि जुवेनल का एक प्रसिद्ध कथन है: "Quis custodiet ipsos custodes?" अर्थात "पहरेदारों पर पहरा कौन रखेगा? लोकतंत्र में मीडिया जनता का पहरेदार है जो सत्ता पर नजर रखता है। लेकिन जब पहरेदार ही सत्ता का वेतनभोगी या मित्र बन जाए, तो पहरा देने की जिम्मेदारी खुद मालिक यानी जनता को उठानी पड़ती है। यदि भारत या दुनिया का कोई भी लोकतंत्र आज खोखला होने की कगार पर है, तो उसका कारण सिर्फ चाटुकार मीडिया नहीं है, बल्कि वह दर्शक वर्ग भी है जो इस चाटुकारिता को चुपचाप स्वीकार कर रहा है। जब तक नागरिक 'दिखाए जा रहे सच' और 'वास्तविक सच' के अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक लोकतंत्र का लिबास तो लोकतांत्रिक रहेगा, लेकिन उसके अंदर की आत्मा तानाशाही की हो जाएगी। अतः लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी जितनी पत्रकारों की है, उतनी ही इसे देखने, सुनने और पढ़ने वाली जनता की भी है।