शनिवार, जून 06, 2026

मुद्दों की बलि और नफरत की स्क्रिप्ट: आखिर देश के युवाओं से क्या छिपाया जा रहा है?

हाल के दिनों में बिहार के पटना में खान सर की कोचिंग में हुए हमले और उसके बाद उत्पन्न विवाद को लेकर तरह-तरह की बातें निकल कर आयीं कल तक जो खान सर थे, बिहार में शिक्षा की क्रांति जनक माने जा रहे थे के कारण बिहार ही नहीं देश के शिक्षा माफियाओं की कमर टूट गयी। लेकिन फिर क्या हुआ पेपर लीक मामले में खान सर ने अंजना ओम कश्यप से पंगा ले लिया या यूं कहें कुछ ज्यादा सच बोल दिया। जिसको लेकर सरकारी मीडिया द्वारा अंड छाप सरकार व उसके महकमों द्वारा रचे गए षणतंत्र का नतीजा सामने है एक और खास बात कल तक एक ही मुद्दा छाया हुआ था पेपर लीक पर गुस्सा और धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा। आज गोदी मीडिया की अपार सफलता से जो निर्देश ऊपर से मिलते हैं ये मुद्दा दिल्ली अग्निकांड सब गायब है अब सिर्फ ये समझाया जा रहा है कि खान सर मुस्लिम है और मुस्लिम होना आज की तारीख में क्या है बताने की जरूरत नहीं है। इस बात को लेकर देश की सामाजिक और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को छोड़कर एक गंभीर बहस छिड़ गई है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर हमारा सिस्टम (व्यवस्था) किन चीजों को अपने लिए खतरा मानता है और किनसे आंखें मूंद लेता है? जब गंभीर अपराधों के आरोपी, जनहित के मुद्दों पर विफलताएं और समाज को खोखला करने वाली कमियां व्यवस्था की रडार से बाहर दिखती हैं, लेकिन जनसेवा में लगे लोग निशाने पर आ जाते हैं, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और नागरिक समाज दोनों को आत्ममंथन करने की जरूरत होती है। एक स्वस्थ समाज की पहचान उसकी प्राथमिकताओं से होती है। आज हमारे सामने कई ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं जो तत्काल ध्यान और सख्त कार्रवाई की मांग करते हैं: इनमें कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां गंभीर आरोपों से घिरे रसूखदार लोग या कथित धर्मगुरु कानूनी दांव-पेंचों का फायदा उठाकर लंबे समय तक व्यवस्था को धता बताते रहे है। दूसरी नेता और माफिया प्रवृत्ति के लोगों द्वारा पेपर लीक की लगातार होती घटनाएं, बढ़ती बेरोजगारी और परीक्षा के दबाव में दम तोड़ते छात्रों की आत्महत्याएं समाज के लिए एक बड़ा अलार्म हैं। इक्कीसवीं सदी के दौर में देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी खराब स्वास्थ्य सेवाओं, खस्ताहाल सरकारी स्कूलों और पीने के साफ पानी जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। विडंबना यह है कि इन गंभीर और जनहित से जुड़े मुद्दों पर व्यवस्था की गति अक्सर धीमी या उदासीन दिखाई देती है। इसके विपरीत, जब कोई व्यक्ति या शिक्षक आगे बढ़कर इन कमियों को दूर करने का प्रयास करता है- जैसे लाखों गरीब बच्चों को मुफ्त या न्यूनतम फीस में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना, या किफायती दरों पर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना; तो वह समाज को अपने लिए एक उम्मीद की किरण दिखाई देती है। जो आज के चोरों अर्थात नेताओं (खासकर सत्ता पक्ष के) को यह फूटी आंख नहीं सुहाई देता है। समस्या तब शुरू होती है जब समाज सुधार के इन प्रयासों के साथ-साथ व्यवस्था की कमियों और मुख्यधारा के मीडिया के एक वर्ग की जवाबदेही पर भी सवाल उठाए जाने लगते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वस्थ आलोचना और सच को सामने लाना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन जब इस आलोचना के बदले संबंधित व्यक्ति को कानूनी या प्रशासनिक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, तो पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठने लगते हैं। इस पूरे परिदृश्य में दो और चिंताजनक पहलू उभरकर सामने आते हैं: अक्सर मुख्यधारा की मीडिया के एक हिस्से पर यह आरोप लगता रहा है कि वह जनता के असली मुद्दों (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) को उठाने के बजाय सत्ता के सुर में सुर मिलाना ज्यादा पसंद करता है। ऐसे में जब कोई उनके इस रवैये को बेनकाब करता है, तो निष्पक्षता की जगह व्यक्तिगत हमलों का दौर शुरू हो जाता है। दूसरा कि वर्तमान दौर में किसी भी मुद्दे को तुरंत धार्मिक या सांप्रदायिक रंग दे दिया जाता है। यदि जनसेवा करने वाला व्यक्ति किसी अल्पसंख्यक समुदाय से आता है, तो नफरती तत्वों और व्यवस्था के एक हिस्से द्वारा उसकी पहचान को ढाल बनाकर पूरे विमर्श को भटकाने की कोशिश की जाती है। यह प्रवृत्ति सामाजिक ताने-बाने और न्याय प्रणाली दोनों के लिए घातक है। यदि राष्ट्र निर्माण में लगे शिक्षकों, डॉक्टरों या समाजसेवियों को उनके काम, उनकी बेबाक राय या उनकी धार्मिक पहचान के कारण प्रताड़ित होना पड़े, तो यह पूरे समाज की हार होगी। व्यवस्था को यह समझना होगा कि उसका असली मुकाबला अपराध, अशिक्षा, और गरीबी से है, न कि उन लोगों से जो इन समस्याओं को हल करने में अपना जीवन लगा रहे हैं। समय आ गया है कि सिस्टम अपनी प्राथमिकताओं को सुधारे, ताकि देश का हर नागरिक सुरक्षित और गौरवान्वित महसूस कर सके। इसके साथ ही हमें यह ध्यान रखना होगा कि भविष्य में भी यदि युवाओं की ऊर्जा; हक मांगने के बजाय नफरत और खेमेबाजी में खर्च होने लगे, तो समझ जाना होगा कि स्क्रिप्ट लिखने वाले अपने मकसद में कामयाब हो गए हैं। और हम निश्चित रूप से असल मुद्दे से भटक चुके हैं। समाज को विशेषकर छात्रों को मैं यह चेतावनी देता हूं कि वे भावनाओं में बहकर आपस में लड़ने के बजाय ठंडे दिमाग से सोचें कि इस पूरे विवाद से अंततः फायदा किसका हो रहा है और नुकसान किसका? जब तक देश का युवा जाति, धर्म और मीडिया के इस चक्रव्यूह को चीरकर सीधे अपनी शिक्षा और भविष्य पर अड़ा नहीं रहेगा, तब तक समाज हितैषियों के साथ ऐसी ऑस्कर विनिंग स्क्रिप्ट्स लिखी जाती रहेगी और युवाओं की जवानी धरनों और सोशल मीडिया की जंग में ही जाति और धर्मवाद के गड़ासे में कटती रहेगी। आज इस भटकाव के खिलाफ एक मजबूत आवाज और एकजुटता बहुत ही जरूरी है जो आने वाले कल के लिए और भविष्य की कल्पना का मुख्य सूत्रधार होगी..! जय हिन्द

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