मंगलवार, जून 02, 2026
हाफ और फुल का चयनात्मक गणित: जब कानूनन न्याय, रंग और मजहब से तय होने लगे
लोकतंत्र की बुनियाद इस एक बुनियादी उसूल पर टिकी होती है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं। लेकिन हालिया दौर में न्याय का जो नया और खौफनाक मॉडल विकसित हुआ है, उसने इस उसूल को मटियामेट कर दिया है। अब न्याय अदालतों से नहीं, बल्कि पुलिस की बंदूकों की नली से तय हो रहा है; उससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि इन बंदूकों से निकलने वाली गोलियों की रफ्तार, उनकी दिशा और उनकी जगह (पैर या खोपड़ी) इस बात से तय होने लगी है कि आरोपी का नाम, उसकी जाति और उसका मजहब क्या है।
समाज का एक बड़ा हिस्सा इस चयनात्मक न्याय को देखकर न सिर्फ खामोश है, बल्कि इसमें एक वीभत्स किस्म का उत्सव भी मना रहा है। वर्तमान दौर में यह एक ऐसी खतरनाक मनोदशा है, जो किसी भी सभ्य समाज को बर्बरता की ओर धकेलने के लिए काफी है।
शासन और प्रशासन के इस नए न्याय शास्त्र को समझने के लिए कुछ हालिया उदाहरणों और उनके तरीकों को देखना जरूरी है-
इन दिनों सोशल मीडिया पर एक युवक एक मासूम बच्चे की बेरहमी से पटक-पटक कर हत्या करने वाले आरोपी जितेंद्र पाठक को पुलिस घटना के मात्र 7 घंटों के भीतर पकड़ती है। लेकिन यहां न्याय का हाफ मॉडल लागू होता है। पुलिस की गोली उसके पैर में लगती है, वह लंगड़ाता हुआ जेल जाता है और उसके जिंदा रहने तथा कानूनी प्रक्रिया का लाभ उठाने के सारे रास्ते खुले रहते हैं। सवाल यह उठता है कि ऐसे जघन्य अपराधी के मामले में पुलिस का निशाना सिर्फ पैर तक ही क्यों सीमित रहा? क्या उसकी सामाजिक या धार्मिक पृष्ठभूमि ने उसे सुरक्षा कवच दिया?
इसके विपरीत, जब बात दूसरे मजहब के अपराधियों की आती है, तो पुलिस का रवैया अचानक फुल एनकाउंटर में बदल जाता है। अतीक अहमद के बेटे असद और उसके साथी गुलाम का मामला हो, या फिर कई अन्य छोटे-मोटे मामलों में शामिल मुस्लिम आरोपी, वहां पुलिस की आत्मरक्षा की थ्योरी सीधे खोपड़ी या सीने पर जाकर खत्म होती है। वहां पैर में गोली मारकर आरोपी को जिंदा पकड़ने की फुर्सत या मंशा प्रशासन के पास नहीं दिखती।
क्या सत्ता और पुलिस महकमा यह समझाना चाहता है कि अपराधियों की क्रूरता का पैमाना उनके अपराध से नहीं, बल्कि उनके सरनेम से तय होगा?
संवैधानिक संस्थाओं और न्यायालयों का मौन
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ा सवालिया निशान न्याय संहिता और न्यायालयों पर खड़ा होता है। जब कार्यपालिका (सरकार) और प्रशासन (पुलिस) खुलेआम अदालतों के काम को अपने हाथ में ले रहे हैं, तो न्यायपालिका
मूकदर्शक क्यों बनी हुई है?
जब पुलिस ही जज, जूरी और जल्लाद बन जाएगी, तो करोड़ों रुपये की लागत से बनीं अदालतें और कानून की मोटी किताबें सिर्फ सजावट की वस्तु बनकर रह जाएंगी।
सच्चाई यह है कि आज जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग और संवैधानिक संस्थाएं भी इस त्वरित न्याय की लोकप्रियता के आगे नतमस्तक नजर आ रही हैं। जो अदालतें नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षक थीं, वे एनकाउंटर की इन स्क्रिप्टेड कहानियों पर स्वतः संज्ञान लेने में हिचकिचा रही हैं।
प्रशासन का यह रवैया बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं है। सत्ता में बैठे लोग अपराधियों की सूची भी चश्मे का रंग बदलकर देखते हैं। एक खास वर्ग के अपराधी को भटके हुए युवक या हाफ एनकाउंटर का शिकार बनाकर सुधरने का मौका दिया जाता है, जबकि दूसरे वर्ग के लिए सीधे ठोक दो की नीति अपनाई जाती है। यह शासन नहीं, बल्कि बहुसंख्यकवाद को खुश करने की एक सुनियोजित राजनीति है।
जब समाज किसी अपराधी की मौत पर उसके मजहब को देखकर उत्सव मनाने लगे और तालियां बजाने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि न्याय की अवधारणा मर चुकी है। आज सत्ता और व्यवस्था हमसे एक बेहद अमानवीय सवाल पूछ रही है कि आप हाफ वाले हैं या फुल? यानी आप पैर में गोली मारने के समर्थक हैं या खोपड़ी में?
लेकिन एक सजग नागरिक और लोकतांत्रिक समाज के नाते हमारा जवाब होना चाहिए कि हम न हाफ वाले हैं, न फुल वाले हैं—हम संविधान वाले हैं। अपराधी चाहे जितेंद्र हो या जावेद, उसे कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का काम कानून की स्थापित प्रक्रिया (Due Process of Law) के तहत अदालत का है, न कि किसी चौराहे पर खड़े पुलिसकर्मी का। अगर आज हम मजहब देखकर एनकाउंटर पर खामोश रहे या जश्न मनाते रहे, तो याद रखिए कि कानूनविहीनता की यह आग एक दिन हर उस घर तक पहुंचेगी जो आज इस तमाशे को देखकर मुस्कुरा रहा है।
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