शनिवार, मई 30, 2026

बधाई हो! हम 157वें पायदान के विश्वगुरु के पत्रकार हैं!

आज 30 मई है... कैलेंडर चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस है। इस उत्साह में सुबह से ही सोशल मीडिया के तमाम चौराहों पर चौथे स्तंभ के सिपाहियों को बधाई देने का तांता लगा हुआ है। लोग एक से बढ़कर एक पोस्टर बनाकर शुभकामनाएं प्रेषित कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर तैरते इन रंग-बिरंगे पोस्टर्स में कलम की ताकत और निष्पक्षता के कसीदे गढ़े जा रहे हैं। तो चलिए, इसी भीड़ में औपचारिकता निभाते हुए हम भी अपनी पीठ ठोक लेते हैं और एक-दूसरे की भावनाओं से जुड़कर मुबारकबाद दे देते हैं—वह भी ऐसे ऐतिहासिक और गौरवशाली दौर में, जब वैश्विक प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में हम पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे दिग्गजों को पछाड़कर 157वें पायदान पर अपनी धाक जमा चुके हैं। यह है देश के विश्वगुरु होने का साक्षात प्रमाण। हिन्दी पत्रकारिता दिवस के इस पावन अवसर पर उन रीढ़ विहीन महाशक्तियों का अभिनंदन तो बनता ही है, जिन्होंने समय रहते समझ लिया कि पत्रकारिता का असली हुनर कलम चलाना नहीं, बल्कि चरण वंदन करना है। हिन्दी भाषी क्षेत्रों में तो यह विधा अब अपने चरम पर है। पत्रकारिता जगत में पिछले लगभग एक दशक से योग्यता की नई परिभाषाएँ गढ़ी जा चुकी हैं। अगर आप जमीनी मुद्दों को उठाने, जनता के सरोकारों पर बेबाक राय रखने या सत्ता से कड़े सवाल पूछने जैसी बीमारी है, तो बड़े-बड़े मीडिया प्रतिष्ठानों ने आपके इलाज की मुकम्मल व्यवस्था कर रखी है गेट आउट का बोर्ड दिखाकर! ज़मीनी हकीकत और जनता के दर्द को पन्नों पर उतारने वाले कलम के सिपाहियों को लगभग हर बड़े संस्थान ने बाहर का रास्ता दिखा दिया है। पुण्य प्रसून बाजपेयी, रवीश कुमार, अभिसार शर्मा और आशुतोष जैसे नाम इसके जीवंत उदाहरण हैं। बाज़ार को अब पत्रकार नहीं, दरबारी चाहिए। और दरबारी भी ऐसे, जो हुजूर के खांसने को भी मास्टरस्ट्रोक साबित कर सकें। ऐसे माहौल में जब अंदर का पत्रकार हर रोज़ घुट-घुट कर मर रहा हो, तब 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ' कहना किसी क्रूर मज़ाक जैसा लगता है। समझ नहीं आता कि बधाई किस बात की दें? क्या इस बात की बधाई दें कि अब खबरें खोजी नहीं, प्रायोजित होती हैं? या इस बात का जश्न मनाएँ कि जनता के बुनियादी सवाल रोटी, कपड़ा, मकान और रोज़गार अब मुख्यधारा के नैरेटिव से पूरी तरह गायब हो चुके हैं? या फिर 157वें स्थान पर आने की ख़ुशी में लड्डू बाँटें? कैसी बधाई और किस बात का उत्सव? हिन्दी पत्रकारिता का एक दौर वह था, जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने 'उदन्त मार्तण्ड' की शुरुआत कर बिना किसी भय के समाज को आईना दिखाया था। और आज का दौर वह है, जहाँ आईना साफ़ करने की बजाय, चेहरा बदलने का चौतरफा दबाव है। चाटुकारिता के रास्ते पर जो चल रहे हैं, वे पूरी तरह सुरक्षित हैं; क्योंकि उन्होंने समय रहते सीख लिया कि सच बोलने से सैलरी और साख दोनों खतरे में पड़ जाती है। इसलिए, आइए आज के दिन उन सभी दरबारियों की वंदना करें, जिन्होंने पत्रकारिता को एक नई ऊंचाई या यूं कहें कि रसातल की गहराइयां दी है। पत्रकारिता की गरिमा को तार-तार करके ही तो उन्होंने ये ऊंची अट्टालिकाएं और भारी-भरकम बैंक बैलेंस पाया है। बाकी, जो आज भी ज़मीन पर धूल फांक रहे हैं, जिनकी कलम में अब भी थोड़ी स्याही और ज़मीर बाकी है, उन्हें इस उपनिवेशी पत्रकारिता दिवस पर गहरी संवेदनाएँ! लिखते रहिए... क्या पता किसी दिन 157वें स्थान से फिसलकर हम और नीचे आ जाएँ, और हमारे पास उत्सव मनाने का बहाना और बड़ा हो जाए। फिलहाल, कागज़ी शुभकामनाओं का लुत्फ़ उठाइए, क्योंकि सच तो वैसे भी नॉट रीचेबल हो चुका है। जय हिन्द!

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