रविवार, मई 10, 2026

बॉक्स ऑफिस से बैलेट बॉक्स तक: क्या सुशासन के लिए भी चलेंगे स्पेशल इफेक्ट्स?

कल तक जो प्रशंसक थिएटर की बालकनी से सिक्के उछाल रहे थे, अब वे सचिवालय की जालीदार खिड़कियों के बाहर शासनादेश की तलाश में खड़े होंगे। विजय भाई अब स्क्रीन के थलपति नहीं, बल्कि राज्य के सारथी हैं। पर अफ़सोस, यहां क्लाइमेक्स के बाद द एंड‌नहीं होता, बल्कि यहाँ से तो असली पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन शुरू होती है। फिल्मों में हमने देखा था कि विजय भाई बस हाथ हिलाते थे और गुंडे हवा में ऐसे उड़ते थे जैसे बिना डोर की पतंग। समर्थकों को उम्मीद है कि शपथ लेते ही भ्रष्टाचार के विलेन भी वैसे ही हवा में उछलेंगे। पर यहाँ तो पता चला कि एक अदद चपरासी का ट्रांसफर करने के लिए भी तीन कमेटियों की रिपोर्ट और सर्विस रूल की पेचीदगियों से गुजरना पड़ता है। प्रशंसक हैरान हैं कि जिस सुपरस्टार ने स्क्रीन पर एक घंटे में पूरा सिस्टम बदल दिया था, उसे एक छोटी सी फाइल पर अप्रूव्ड लिखने के लिए भी कानूनी सलाहकारों की पूरी फौज क्यों चाहिए? सत्ता की गलियों में सबसे बड़ी कमी है बैकग्राउंड म्यूजिक की। जब विजय भाई मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे, तो समर्थकों को लगा था कि कोई दमदार बीट बजेगी और कैमरा 360 डिग्री घूमेगा। पर यहाँ तो सिर्फ पंखे की चरमराहट और टाइपराइटर की खटखट सुनाई दे रही है। सिनेमा में स्लो-मोशन वॉक टशन लगती थी, पर प्रशासन में जब फाइलें स्लो-मोशन में चलती हैं, तो उसे रेड टेपिज्म यानी की लालफीताशाही कहते हैं और यहां कोई एडिटर नहीं है जो इस बोरियत को काटकर सीधे हैप्पी एंडिंग दिखा सके। फिल्मों में विलेन को पहचानना आसान था उसकी आंखें लाल होती थीं और अट्टहास करता था। पर यहां तो विलेन कभी बजट घाटे की शक्ल में आता है, तो कभी विपक्ष के वाकआउट के रूप में। यहां हीरो को अपनी हर चाल चलने से पहले सेंसर बोर्ड बोले तो सत्ता के सहयोगी और केंद्र सरकार से एनओसी नहीं, बल्कि फंड्स की मंजूरी लेनी पड़ती है। समर्थक सोच रहे हैं कि भाई ने "I am waiting" तो बोल दिया, पर शायद उन्हें ये नहीं पता था कि यहां लाइन में उनसे पहले राजस्व घाटा और बेरोजगारी के आंकड़े खड़े हैं। प्रशंसकों को अब यह समझना होगा कि यह ₹500 करोड़ की फिल्म नहीं, बल्कि ₹5 लाख करोड़ के कर्ज में डूबा राज्य है। यहां स्पेशल इफेक्ट्स से गड्ढे नहीं भरते और न ही डायलॉग मारने से बिजली के बिल कम होते हैं। विजय भाई के लिए अब असली चुनौती यह है कि वे सुपरस्टार की छवि से बाहर निकलकर एक सामान्य नागरिक की तरह सोचें। क्योंकि सिनेमा के थिएटर में तो तीन घंटे बाद लाइट जल जाती है और लोग घर चले जाते हैं, लेकिन लोकतंत्र के इस थिएटर में लाइट हमेशा जलती रहती है और जनता की नजरें पलक झपकाए बिना सिर्फ परफॉरमेंस देख रही होती हैं। विजय जी अब आपके रीटेक का समय खत्म हुआ, अब सीधा लाइव टेलीकास्ट है!