शुक्रवार, मई 15, 2026

जिन्दगी और मौत की जद्दोजहद के बीच भगवान की आवश्यकता

जिंदगी, जिसके लिए शरीर चाहिए... और यह शरीर पांच तत्वों—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर (भगवान)—से मिलकर बना है। इनमें से किसी एक तत्व की कमी हमें चित्रगुप्त को अधिकृत कर देती है यमराज के पास भेजने के लिए। लेकिन मजाल है किसी की कि हम इंसानी शरीर और फितरत वालों को कोई समझा सके? जब व्यक्तिगत तौर पर हमारे या हमारे अपनों पर कोई संकट आता है, तो हमें भगवान याद आता है (जो वास्तव में भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर होना चाहिए, लेकिन हमारे लिए वह होता बिल्कुल नहीं है)। उस समय हमें भूला-बिसरा, अपना-पराया और ऊंच-नीच सब याद आने लगता है, और जैसे ही वह संकट खत्म होता है, फिर हमें भगवान की कोई जरूरत नहीं होती। फिर चाहे कोई उस 'भगवान' का नाश करे, उसे क्षतिग्रस्त करे या दूषित करे—हमें क्या फर्क पड़ता है? और वैसे भी, ऐसे ही लोग कहते हैं कि "उसकी (पता नहीं किसकी) मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता!" आधुनिकता और दिखावे का दौर, मंदिरों-मस्जिदों की विशालता और आधुनिक सुख-सुविधाओं की संलिप्तता उसे कुछ भी याद रखने नहीं देती। भूमि, जो 'भगवान' शब्द का आगाज करती है, उसका क्षरण और दोहन किसी से छिपा नहीं है। अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए हम अवैध खनन से बाज नहीं आ रहे हैं। विज्ञान का आधुनिक स्वरूप, जो विकास का छलावा दिखाते हुए नमकीन, कुरकुरे, पानी की बोतलें, थर्माकोल के पत्तल और गिलास आदि परोस रहा है, वह भूमि को कचरे का ढेर बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा। इसका परिणाम यह है कि बगैर रसायनों के खेती करना नामुमकिन हो गया है; फलस्वरूप बीमारियों की आमद बढ़ रही है और हमारी शारीरिक संरचना की बनावट व क्षमता निरंतर प्रभावित होती जा रही है। भगवान का दूसरा पायदान 'गगन' है, जो कहने या सुनने के लिए शायद कोई खास मायने न रखता हो, लेकिन यह वह अनंत विस्तार है जो समस्त जीवन को अपनी छत्रछाया में समेटे हुए है। यदि यह गगन सूर्य के प्रचंड ताप को नियंत्रित न करे और वाष्प को अपने असीम आँचल में समाहित कर बादलों का रूप न दे, तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि धरती का अस्तित्व कितनी जल्दी राख हो जाएगा? हम गगन को केवल एक शून्य या खाली स्थान समझते हैं, परंतु यह ओजोन की वह सुर
क्षा परत है जो हमें ब्रह्मांडीय विनाश और घातक विकिरणों से बचाती है। सूक्ष्म होने के बावजूद, उपयोगिता के आधार पर जीवन का वास्तविक सूत्रधार गगन ही है, जिसे हमने आज वायु प्रदूषण और कृत्रिम उपग्रहों के मलबे से पाट दिया है। सभी कहते हैं कि सांसें गिनती की मिली हैं, और इन सांसों का आधार हवा यानी 'वायु' है। वायु के लिए हमें हरे-भरे पेड़ चाहिए, लेकिन हम विलासितापूर्ण विकास की दौड़ में उनका लगातार कटान (हसदेव, बेंगलुरु के जंगल, अरावली की पहाड़ियां, बिजवासन रेल टर्मिनल परियोजना, ग्रेट निकोबार) करने में नाममात्र का संकोच नहीं करते। जो लोग इसे बचाने की बात करते हैं या इस लड़ाई को लड़ते हैं, उन्हें हम नक्सली या माओवादी बताकर तथाकथित रक्षा इकाइयों का उपयोग करते हुए, साम-दाम-दंड-भेद से सीधे मौत के घाट उतारने में कोताही नहीं बरतते। वर्ष 2019-20 में कोविड का विकराल रूप सभी ने देखा; ऑक्सीजन की कमी से मौत का नंगा नाच किसी से छिपा नहीं है। सिलेंडरों में बंद हवा के लिए दाम देने के साथ-साथ लोग गिड़गिड़ाने और नतमस्तक होने पर मजबूर हुए थे, लेकिन इस भयावह घटना के बाद भी हम सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। हम उन सभी विनाशकारी नीतियों का समर्थन 'जय श्री राम' के शोर के साथ कर रहे हैं जो अंततः हमारा ही विनाश करेंगी। आखिर किसका और कैसा भगवान है हमारे जहन में? वैश्विक स्तर पर आग का तांडव, जो सिर्फ विनाश का परिचायक है, उससे सभी परिचित हैं; लेकिन इस पर नियंत्रण का कोई भी सफलतम उपाय हमारे पास नहीं है। विकास के नाम पर हम अग्नि-जनित उत्पादों को ही सर्वश्रेष्ठ मान बैठे हैं। यही विकास जब अपनी 'गजराज' रूपी मदमस्त चाल में चलता है, तो सबको एक ही पलड़े में तौलता है और उसी भगवान (पंचतत्व) में विलीन कर देता है। 'जल से ही जीवन है और जल ही प्रलय'—यह बात सभी दृष्टियों से शत-प्रतिशत सही है, लेकिन हम जीवन के मूल रूप 'नीर' को समझना ही नहीं चाहते। धनाढ्य होने पर हम आरओ (RO) या फिल्टर वाटर को अपनी प्रतिष्ठा बनाने में देर नहीं करते, जिसके लिए हम लाखों लीटर पेयजल सिर्फ दिखावे में बर्बाद कर देते हैं। करोड़ों की इमारत बनाने में पैसों की कोई कमी नहीं होती, लेकिन बरसात के पानी को संरक्षित करने वाले संयंत्र (Rainwater Harvesting) के लिए हम कंगाल हो जाते हैं। चिलचिलाती धूप में राह चलते राहगीर को पानी पिलाने में हमारा रुतबा कम हो जाता है, लेकिन वहीं शाम को पाइप लगाकर बेवजह गाड़ियाँ धोने और सड़कों को तर करने में हम गौरवान्वित महसूस करते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, आगरा और कानपुर जैसे महानगरों में भूमिगत जल स्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है और हमें वह पेयजल खरीदकर प्रयोग करना पड़ रहा है जिसे प्रकृति ने मुफ्त दिया था। क्या यही भगवान की साधना है? क्या इसी विकास के लिए हम प्राकृतिक संसाधनों का निरंतर दोहन कर रहे हैं? इक्कीसवीं सदी में मानव ने भगवान के मूल स्वरूप को नकारते हुए सिर्फ कंकड़-पत्थर और मनचाहे आकारों को अपना आराध्य मान लिया है, जो मानसिक और आध्यात्मिक रूप से सरासर गलत है। ऐसे आराध्य अक्सर राजनीतिक उपज होते हैं। वैसे भी, हम भारतीयों ने जिसे 'सम्मानित' करने की संज्ञा दी है, उसका सीधा सा अर्थ यह निकलता है कि हम सिर्फ उसका उपहास करते हैं और अपना मतलब सीधा करते हैं। हमने नदियों को 'माँ' कहा, पर उनकी दुर्दशा किसी से छिपी नहीं; हमने गाय को 'माता' कहा, पर नेताओं के स्लॉटर हाउस (बूचड़खाने) उन्हीं के दम पर चल रहे हैं; हमने धरती को 'माँ' बोला और उसे कचरे के ढेर में बदल डाला। पागलपन की हद तो देखिए कि हमने चाँद को भी मजहबों में बाँट डाला। क्या ऐसे में भगवान हमारी सुनेगा या हमारा साथ देगा? हमारे पूर्वजों ने सूर्य, चंद्रमा, वृक्ष, नदी और धरती को अपना भगवान मानकर उनकी उपासना की थी; और हम क्या कर रहे हैं? क्या जिन्दगी और मौत की जद्दोजहद के बीच भगवान की आवश्यकता इस तरह पूर्ण मूर्त और साकार रूप ले पाएगी? यह सवाल है सभी तरह के धार्मिक ठेकेदारों और उनके पिछलग्गुओं से!

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