बुधवार, मई 20, 2026

रेलवे या 'रील-वे'? विज्ञापनों की चमक के पीछे दम तोड़ती रेल सुरक्षा

आज देश का आम नागरिक जब सुबह उठकर अखबार खोलता है या टीवी स्क्रीन देखता है, तो उसे रेल यात्रा के सुहाने विज्ञापनों से ज्यादा पटरियों पर मचे हाहाकार की खबरें दिखाई देती हैं। पिछले कुछ ही दिनों के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों से आई तीन तस्वीरों ने भारतीय रेल के सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है: रतलाम: देश की सबसे वीआईपी और सुरक्षित मानी जाने वाली 'राजधानी एक्सप्रेस' के एसी कोच (B-1) में अचानक भीषण आग लग जाती है। सासाराम: बिहार के सासाराम स्टेशन पर खड़ी एक पैसेंजर ट्रेन धू-धू कर जल उठती है और यात्रियों में अफरातफरी मच जाती है। ऋषिकेश: योग नगरी ऋषिकेश के पास उज्जैनी एक्सप्रेस के तीन कोच पटरी से उतर जाते हैं। ये तीन घटनाएं कोई इक्का-दुक्का हादसे नहीं हैं, बल्कि यह उस मरणासन्न सुरक्षा तंत्र की गवाही हैं, जिसे मौजूदा केंद्र सरकार ने शायद अपनी प्राथमिकताओं से ही बाहर कर दिया है। ऐसे में जनता का यह सोचना शत-प्रतिशत सही है कि देश में प्रचार 'हाई-टेक' का है, लेकिन बुनियादी ढांचा 'राम भरोसे' है। केंद्र सरकार हर दिन वंदे भारत, बुलेट ट्रेन और रेलवे स्टेशनों के "विश्व स्तरीय" कायाकल्प का ढिंढोरा पीटती नहीं थकती। सोशल मीडिया पर चमचमाती ट्रेनों की रील्स और तस्वीरें पोस्ट करके ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो भारतीय रेलवे का पूरी तरह कायाकल्प हो चुका हो। लेकिन हकीकत यह है कि जब जमीन पर ट्रेनें चलती हैं, तो वे कभी शॉर्ट सर्किट से धधक उठती हैं तो कभी तकनीकी खामियों के कारण पटरी से उतर जाती हैं। आज का सबसे बड़ा सवाल है कि जिस देश में प्रीमियम राजधानी एक्सप्रेस तक सुरक्षित नहीं है, वहां आम आदमी की जान की क्या कीमत है? क्या रेल मंत्रालय का काम सिर्फ पुराने ढांचे का रंग-रोगन कर दिखावा करना, नई (वास्तविकता में पुरानी) ट्रेनों को हरी झंडी दिखाना और सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करना ही रह गया है? संसद से लेकर सड़कों तक प्रधानमंत्री और रेलमंत्री ने 'कवच' (एंटी-कोलिजन सिस्टम) और अत्याधुनिक फायर सेफ्टी ऑडिट का बढ़-चढ़कर प्रचार किया था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी देश के अधिकांश रूटों पर यात्री अपनी जान हथेली पर रखकर सफर कर रहे हैं। विडंबना यह है कि हादसों के बाद भी सरकार और मंत्रालय 'आपदा में अवसर' तलाशने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखते। हकीकत साफ है और घिनौना चसच सामने कि जब सरकार की सारी ऊर्जा और बजट सिर्फ रील बनाने, इवेंट मैनेजमेंट और ब्रांडिंग करने में खपा दिया जाएगा, तो ग्राउंड लेवल पर मेंटेनेंस, ट्रैकों की मरम्मत और कोचों की सुरक्षा के लिए संसाधन कहां से बचेंगे? लगातार हो रहे हादसों के बाद सरकार और रेल मंत्रालय की तरफ से सिर्फ एक रटा-रटाया बयान आता है: "जांच के आदेश दे दिए गए हैं।" लेकिन आज तक न तो किसी जांच का ठोस परिणाम सामने आया और न ही किसी शीर्ष जिम्मेदार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया। देश अब इन खोखली जांच रिपोर्टों और बयानों से थक चुका है। जब रेलवे का पूरा फोकस सिर्फ पीआर (PR) कैंपेन पर है, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या करोड़ों यात्रियों को हर सफर पर भेजने वाली भारतीय रेलवे वाकई अब सिर्फ राम भरोसे चल रही है? सरकार को यह समझना होगा कि पटरियों पर देश के हाड़-मांस के नागरिक चलते हैं, कोई डिजिटल विज्ञापन नहीं। अब खोखले दावों को बंद कर सुरक्षा के मोर्चे पर सीधी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। चमचमाते विज्ञापनों के पीछे खोखली होती रेल सुरक्षा में लगातार हो रही इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? क्या केंद्र सरकार की नजर में रेलवे अब सिर्फ 'रेलवे' नहीं, बल्कि 'रील-वे' बन गया है..?

मंगलवार, मई 19, 2026

आईना जब ढाल बन जाए..!

भारतीय मीडिया का बदलता चरित्र और नागरिक जिम्मेदारी लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जो केवल हर पांच साल में वोट डाल देने से सुरक्षित रहे; यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को जीवित रखने के लिए 'जागरूक नागरिक' ईंधन का काम करते हैं और 'स्वतंत्र मीडिया' उस इंजन को सही दिशा में बनाए रखने वाली धुरी है। यदि यह धुरी जाम हो जाए या सिर्फ एक ही दिशा में, वह भी सत्ता पक्ष की ओर घूमने लगे, तो लोकतंत्र का पतन तय है। लोकतंत्र की इमारत चार खंभों पर टिकी होती है: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता। जब पहले तीनों स्तंभ निरंकुश होने लगते हैं, तो चौथा स्तंभ समाज के साथ-साथ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को आईना दिखाकर उन्हें उनकी जिम्मेदारी याद दिलाता है। लेकिन वर्तमान समय में भारत में यह धारणा मजबूत हुई है कि चौथा स्तंभ अब आईना दिखाने के बजाय सत्ता की ढाल बन गया है। वैश्विक सूचकांकों से लेकर रोज टीवी स्क्रीनों पर होने वाली बहसों तक में भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता अपने सबसे निचले स्तर पर खड़ी नजर आती है। 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' (RSF) की मानें तो विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान लगातार नीचे खिसकना गंभीर चिंता का विषय है। भारत का स्थान इस बात का प्रमाण है कि यहां पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल कठिन होता जा रहा है। आम तौर पर भारतीय जनमानस में यह माना जाता है कि पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे देशों में लोकतांत्रिक जड़ें बहुत कमजोर हैं। लेकिन जब प्रेस स्वतंत्रता में ये देश भारत के समकक्ष या कभी-कभी बेहतर स्थिति में दिखते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र और यहां की विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के लिए एक बड़ा झटका होना चाहिए। इसके विपरीत, यहां की शासन-व्यवस्था इस कड़वे सच को स्वीकार करने से बचती है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में पत्रकारों पर कानूनी शिकंजे (जैसे UAPA या देशद्रोह के कानून), धमकियों और कॉरपोरेट दबाव में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण मुख्यधारा का मीडिया खुद में सुधार नहीं करना चाहता। नॉर्वे और अन्य नॉर्डिक देश सालों से इस सूची में शीर्ष पर रहते हैं। वहां की सरकारें पारदर्शी हैं, और प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक को पत्रकारों के तीखे व असहज करने वाले सवालों के जवाब देने ही पड़ते हैं। इसके विपरीत, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शीर्ष नेतृत्व का मीडिया से दूरी बनाना एक नई प्रशासनिक संस्कृति को दर्शाता है। भारतीय राजनीति में 'विश्व गुरु' या वैश्विक महाशक्ति बनने की आकांक्षा एक बड़ा नैरेटिव (विमर्श) रही है। ऐसे में क्या एक जीवंत लोकतंत्र का नेता बिना किसी पूर्व-निर्धारित स्क्रिप्ट के, पत्रकारों के खुले और तीखे सवालों का सामना करने से बच सकता है? पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। अब संवाद द्विपक्षीय न रहकर एकतरफा हो गया है। रेडियो कार्यक्रमों (जैसे: मन की बात), सोशल मीडिया पोस्ट्स और रैलियों के जरिए जनता तक अपनी बात सीधे पहुंचाई जाती है। इसमें जनता और सरकार के बीच का माध्यम, यानी पत्रकार गायब हो गया है। इंटरव्यू के बदलते स्वरूप में जो इक्का-दुक्का साक्षात्कार होते भी हैं, उन पर अक्सर चुनिंदा या सॉफ्ट होने के आरोप लगते हैं जो सही भी है। जब देश के मुखिया से बेरोजगारी, महंगाई, सीमा विवाद या सांप्रदायिक तनाव पर तीखे सवाल पूछने के बजाय उनकी जीवनशैली या आम खाने के तरीकों पर बात होने लगे, तो पत्रकारिता की साख का गिरना स्वाभाविक है। पिछले एक दशक से भारतीय पत्रकारिता जगत पर यह आरोप लग रहा है कि मुख्यधारा का मीडिया (विशेषकर हिंदी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल) सत्ताधारी दल के आईटी सेल या प्रवक्ता की तरह काम कर रहा है, जो कई मायनों में सच प्रतीत होता है। यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक मीडिया कोई चैरिटी नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यवसाय है, जिसके संचालन में अरबों का खर्च आता है। न्यूज चैनलों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया सरकारी विज्ञापन और बड़े कॉरपोरेट घरानों से मिलने वाला फंड है। चूंकि सरकार विज्ञापन रोकने की ताकत रखती है, इसलिए चैनलों के मालिक ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते जिससे सत्ता नाराज हो। नतीजा यह होता है कि चैनल सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से सवाल पूछता है। साथ ही, टीवी मीडिया ने यह समझ लिया है कि जटिल आर्थिक या सामाजिक मुद्दों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) पर गंभीर चर्चा से टीआरपी (TRP) नहीं मिलती। टीआरपी मिलती है हिंदू-मुस्लिम डिबेट, पाकिस्तान-विरोधी विमर्श और राष्ट्रवाद के शोर से। यह विमर्श न केवल सत्ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल है, बल्कि चैनलों की जेबें भी भरता है। यही वजह है कि जनता ने इस मीडिया को 'गोदी मीडिया' का नाम दिया है। इस संस्थागत पतन का एक बड़ा कारण भारत में मीडिया नियामक ढांचे (Regulatory Framework) का कमजोर होना भी है।'प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) जैसी वैधानिक संस्थाएं आज के दौर में दंतविहीन बाघ (Toothless Tiger) साबित हो रही हैं, जिनका अधिकार क्षेत्र केवल प्रिंट मीडिया तक सीमित है। टीवी और डिजिटल मीडिया के नियमन के लिए कोई सख्त सरकारी या स्वतंत्र ढांचा नहीं है; वहां स्व-नियमन (Self-regulation) के नाम पर औपचारिकता निभाई जा रही है। जब तक क्रॉस-मीडिया ओनरशिप (कॉरपोरेट एकाधिकार) को रोकने और नियामक संस्थाओं को वित्तीय जुर्माना या लाइसेंस रद्द करने जैसी दंडात्मक शक्तियां देने वाले कड़े कानूनी सुधार नहीं किए जाते, तब तक इस व्यवस्था में प्रशासनिक सुदृढ़ता लाना असंभव है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब मीडिया अपनी निष्पक्षता खो देता है, तो उसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार को घेरना होता है, लेकिन जब मीडिया खुद ही विपक्ष पर हमलावर हो जाए, तो सरकार पूरी तरह निरंकुश हो जाती है। उसे किसी नीति की विफलता का डर नहीं रहता, क्योंकि मीडिया उस विफलता को भी 'मास्टरस्ट्रोक' साबित करने में जुट जाता है। प्राइम-टाइम डिबेट्स में जिस तरह की भाषा और नफरत परोसी जाती है, उसने भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को गहरा नुकसान पहुंचाया है। पड़ोसी, पड़ोसी पर शक करने लगा है और यह सब सिर्फ कुछ रेटिंग्स और राजनीतिक फायदों के लिए किया जा किया जा रहा है। भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भले ही आज सत्ता की चाटुकारिता में लीन हो, लेकिन पूरी तस्वीर इतनी धुंधली भी नहीं है। मुख्यधारा के टेलीविजन से निराश होकर आज भारत का जागरूक नागरिक डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों और खोजी पत्रकारिता पोर्टल्स (जैसे द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, स्क्रॉल, सूर्यांशश्री समाचार आदि) की तरफ मुड़ रहा है। कई स्वतंत्र पत्रकार आज भी अपनी जान और करियर को जोखिम में डालकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं। भारत को 'विश्व गुरु' बनने के लिए सिर्फ आर्थिक या सैन्य ताकत की जरूरत नहीं है, बल्कि एक ऐसे स्वतंत्र और निडर मीडिया की जरूरत है जो सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सच बोल सके। जब तक भारतीय दर्शक खुद नफरत के तमाशे को देखना बंद नहीं करेंगे और गंभीर पत्रकारिता के लिए आर्थिक रूप से भुगतान (पे/सब्सक्राइब) नहीं करेंगे, तब तक भारत में मीडिया का यह 'आईटी सेल' वाला अवतार बदलना मुश्किल होगा। थॉमस जेफरसन (अमेरिकी राष्ट्रपति और विचारक) ने कहा था: "सतर्कता ही स्वतंत्रता की शाश्वत कीमत है।" एक जागरूक नागरिक वह नहीं है जो केवल खबरें देखता है, बल्कि वह है जो यह समझता है कि कौन सी खबर दिखाई जा रही है और कौन सी छिपाई जा रही है। जब मीडिया सत्ता की चाटुकारिता पर उतर आए, तब नागरिकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे फैक्ट-चेक करें, वैकल्पिक स्रोतों से जानकारी जुटाएं और खुद को प्रोपेगैंडा (दुष्प्रचार) का शिकार होने से बचाएं। जागरूक नागरिक कभी भी धर्म, जाति या राष्ट्रवाद के नाम पर आंख मूंदकर ताली नहीं बजाएगा। वह सरकार से स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और अपने अधिकारों पर सवाल पूछता रहेगा। रोमन कवि जुवेनल का एक प्रसिद्ध कथन है: "Quis custodiet ipsos custodes?" अर्थात "पहरेदारों पर पहरा कौन रखेगा? लोकतंत्र में मीडिया जनता का पहरेदार है जो सत्ता पर नजर रखता है। लेकिन जब पहरेदार ही सत्ता का वेतनभोगी या मित्र बन जाए, तो पहरा देने की जिम्मेदारी खुद मालिक यानी जनता को उठानी पड़ती है। यदि भारत या दुनिया का कोई भी लोकतंत्र आज खोखला होने की कगार पर है, तो उसका कारण सिर्फ चाटुकार मीडिया नहीं है, बल्कि वह दर्शक वर्ग भी है जो इस चाटुकारिता को चुपचाप स्वीकार कर रहा है। जब तक नागरिक 'दिखाए जा रहे सच' और 'वास्तविक सच' के अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक लोकतंत्र का लिबास तो लोकतांत्रिक रहेगा, लेकिन उसके अंदर की आत्मा तानाशाही की हो जाएगी। अतः लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी जितनी पत्रकारों की है, उतनी ही इसे देखने, सुनने और पढ़ने वाली जनता की भी है।

रविवार, मई 17, 2026

बढ़ता भीड़ तंत्र, घटती योग्यता के बीच विकास की अंधी दौड़

आधुनिक समाज का एक गंभीर संकट: आज का वैश्विक परिदृश्य दो बड़ी शक्तियों के प्रभाव में है: बेतहाशा बढ़ती आबादी और अंधाधुंध पूंजीवादी व्यवस्था। इस जुगलबंदी ने हमें गगनचुंबी इमारतें, बुलेट ट्रेनें और चमचमाते मॉल जैसे तथाकथित विकास के प्रतीक तो दिए हैं, लेकिन इसके समानांतर हर क्षेत्र में एक ऐसी अंधी भीड़ भी पैदा कर दी है जिसने योग्यता और उसकी गंभीरता को मटियामेट कर दिया है। आज विकास की परिभाषा केवल संख्या और पैसा बनकर रह गई है, जिसके मलबे के नीचे वास्तविक प्रतिभा, ज्ञान और नैतिक मूल्य मरणासन्न होते जा रहे हैं। आधुनिक समाज में पद, प्रतिष्ठा और रसूख की चाहत हर किसी को है। हर व्यक्ति शीर्ष पर बैठना चाहता है, लेकिन उस शीर्ष तक पहुँचने के लिए जिस कड़े परिश्रम, अनुशासन और वैचारिक परिपक्वता की आवश्यकता होती है, उससे आज की पीढ़ी कोसों दूर भाग रही है। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ शॉर्टकट को बुद्धिमानी और अनुभव को पुराने ख्यालात मान लिया गया है। कई बार युवा पीढ़ी वर्षों के कड़े अनुभव से तपे हुए जानकारों का मज़ाक उड़ाने से भी नहीं चूकती। वे भूल जाते हैं कि सूचना और ज्ञान में बहुत बड़ा अंतर होता है। भविष्य के सुनहरे सपने देखने वाली आज की पीढ़ी विभिन्न चमक-दमक वाले शिक्षण संस्थानों और पाठ्यक्रमों में दाखिला तो ले लेती है; वे रट-रटाकर, असाइनमेंट कॉपी करके या परीक्षा प्रणालियों की कमियों का फायदा उठाकर डिग्रियां भी हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब बात इस ज्ञान को व्यावहारिक धरातल पर उतारने की आती है, तो उनके भीतर की योग्यता का खोखलापन साफ नजर आने लगता है। आज हमारे पास डिग्री धारकों की एक फौजनुमा भीड़ खड़ी हो गई है। कहने को यह भीड़ अपने-अपने क्षेत्र में जोर-आजमाइश करने को तैयार है, लेकिन इसके परिणाम बेहद निराशाजनक आ रहे हैं। ज्ञहर गली-मोहल्ले में पत्रकार और दर्जनों 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल्स व सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भीड़ हमें देखने को मिल रही है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट डिजिटल न्यूज रिपोर्ट और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वैश्विक सूचकांकों पर नजर डालें, तो सनसनीखेज खबरों (Sensationalism) और टीआरपी की अंधी दौड़ के कारण पत्रकारिता की साख लगातार गिरी है। लेखन शैली, जो कभी हर मुद्दे का गहराई से मूल्यांकन कर सटीकता के साथ निष्पक्ष बात कहने और लिखने की क्षमता रखती थी, आज चीखने-चिल्लाने और चाटुकारिता में बदल चुकी है। टीआरपी और पूंजीपतियों के इशारे पर नाचते एंकरों के पास न तो भाषाई मर्यादा बची है और न ही किसी विषय पर गंभीर शोध करने की योग्यता। ऐसे ही शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए हर साल लाखों की संख्या में बीएड (B.Ed), नेट (NET) और पीएचडी (Ph.D) धारकों की फौज खड़ी दिखाई देती है। राष्ट्रीय स्तर के असर (ASER - Annual Status of Education Report) जैसे सर्वेक्षणों के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि उच्च डिग्रियां होने के बावजूद कई शिक्षक बुनियादी व्याकरण, गणित या अपने विषय की मूल अवधारणा तक छात्रों को नहीं समझा पाते। शिक्षा अब ज्ञान देने के बजाय सिर्फ अटेंडेंस और सिलेबस खत्म करने तथा क्रेडिट सिस्टम बटोरने का जरिया बन गई है। चिकित्सा के लिए गली-मोहल्लों में धड़ाधड़ खुलते निजी मेडिकल्स व कॉलेज और वहां से हर साल निकलने वाले हजारों डॉक्टरों की फौज तो होती है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न मेडिकल जर्नल के अध्ययन बताते हैं कि व्यावहारिक प्रशिक्षण (Clinical Exposure) की कमी के कारण बुनियादी डायग्नोसिस (रोग की पहचान) में भी भारी चूक होती रहती है। दवाओं के भारी-भरकम प्रिस्क्रिप्शन और गैर-जरूरी टेस्ट्स (Over-diagnosis) के पीछे अक्सर वास्तविक चिकित्सीय समझ की कमी, व्यावसायिक लालच और अज्ञानता साफ झलकती है। अभियांत्रिकी क्षेत्र की हालात भी ऐसी ही है। जहां देश में लाखों की संख्या में बी.टेक और आईटी ग्रेजुएट्स की भरमार है। नेशनल एम्प्लॉयबिलिटी रिपोर्ट (National Employability Report by Aspiring Minds) के ऐतिहासिक और वर्तमान ट्रेंड्स बताते हैं कि 80% से अधिक इंजीनियर्स उद्योग जगत की जरूरतों के मुताबिक रोजगार के काबिल (Employable) हैं ही नहीं। उनके पास थ्योरी की रटी-रटाई बातें तो हैं, लेकिन कोडिंग, डेटा एनालिसिस, डिजाइनिंग या वास्तविक समस्या को हल करने का कोई व्यावहारिक कौशल (Skill) नहीं है। विधि के क्षेत्र में नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि अदालतों में काले कोट और वकीलों की अनियंत्रित भीड़ के बीच डिग्रियों की भरमार है। विधि आयोग (Law Commission) की विभिन्न टिप्पणियों और कानूनी विश्लेषकों के अनुसार, बार काउंसिल की ढीली नियंत्रण प्रणाली के कारण इस भीड़ में ऐसे वकीलों की बड़ी तादाद आ गई है जो कानून की धाराओं की सही व्याख्या नहीं कर पाते या कोर्ट के सामने ठीक से जिरह (Argument) नहीं रख पाते। इसका परिणाम मुकदमों के अंतहीन खिंचाव और न्याय में देरी के रूप में सामने आता है। देश के भीतर इस संकट को गहरा करने में अनियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा हाथ है। पूंजीवाद ने हर विधा को साधना से बदलकर मुनाफे का व्यापार बना दिया है। कमर्शियलाइजेशन ऑफ एजुकेशन (शिक्षा का व्यवसायीकरण) के चलते निजी विश्वविद्यालय पैसे के बदले डिग्रियां बांटने वाले कारखाने बन गए हैं। इसी तरह मीडिया हाउस भी अब केवल कॉरपोरेट कंपनियां हैं जिन्हें जनसरोकार के मुद्दों से ज्यादा अपने विज्ञापनों और इन्वेस्टर रिटर्न की चिंता है। क्लिकबेट कल्चर, रील्स और सोशल मीडिया के इस दौर में गहराई से सोचना, निष्पक्ष रहना या किसी विषय पर वर्षों शोध करना घाटे का सौदा लगने लगा है। आज की भीड़ को त्वरित (जल्दी) परिणाम चाहिए, चाहे उसके लिए योग्यता और नैतिकता की बलि ही क्यों न चढ़ानी पड़े। और इन सभी विकृतियों की अंतिम मार देश के आम आदमी पर पड़ती है। कारण बिल्कुल स्पष्ट है: योग्यता की कमी और उसके प्रति गंभीरता का अभाव! जब तक समाज सफलता का पैमाना केवल कैमरे के सामने की चमक, कागज के टुकड़े (डिग्री) और बैंक बैलेंस को मानता रहेगा; तब तक यह संकट और गहराता जाएगा। यदि हमें एक मजबूत, जागरूक और दूरदर्शी समाज का निर्माण करना है, तो हमें इस फौजनुमा भीड़ को संख्या बल के बजाय योग्यता और नैतिकता की कसौटी पर कसना होगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। जिनमें डिग्रियों की अनिवार्यता को कम करके व्यावहारिक कौशल और वास्तविक ज्ञान की परीक्षा को प्राथमिकता देने के साथ शॉर्टकट और हाइप के बजाय वर्षों के कड़े अनुभव व वरिष्ठता के प्रति सम्मान की भावना को समाज में पुनः स्थापित करना होगा। अन्यथा, यह तथाकथित विकास केवल एक रंगीन बुलबुला बनकर रह जाएगा, जिसके भीतर सिर्फ योग्यता का खोखलापन और अंतहीन निराशा होगी।