बुधवार, मई 20, 2026

रेलवे या 'रील-वे'? विज्ञापनों की चमक के पीछे दम तोड़ती रेल सुरक्षा

आज देश का आम नागरिक जब सुबह उठकर अखबार खोलता है या टीवी स्क्रीन देखता है, तो उसे रेल यात्रा के सुहाने विज्ञापनों से ज्यादा पटरियों पर मचे हाहाकार की खबरें दिखाई देती हैं। पिछले कुछ ही दिनों के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों से आई तीन तस्वीरों ने भारतीय रेल के सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है: रतलाम: देश की सबसे वीआईपी और सुरक्षित मानी जाने वाली 'राजधानी एक्सप्रेस' के एसी कोच (B-1) में अचानक भीषण आग लग जाती है। सासाराम: बिहार के सासाराम स्टेशन पर खड़ी एक पैसेंजर ट्रेन धू-धू कर जल उठती है और यात्रियों में अफरातफरी मच जाती है। ऋषिकेश: योग नगरी ऋषिकेश के पास उज्जैनी एक्सप्रेस के तीन कोच पटरी से उतर जाते हैं। ये तीन घटनाएं कोई इक्का-दुक्का हादसे नहीं हैं, बल्कि यह उस मरणासन्न सुरक्षा तंत्र की गवाही हैं, जिसे मौजूदा केंद्र सरकार ने शायद अपनी प्राथमिकताओं से ही बाहर कर दिया है। ऐसे में जनता का यह सोचना शत-प्रतिशत सही है कि देश में प्रचार 'हाई-टेक' का है, लेकिन बुनियादी ढांचा 'राम भरोसे' है। केंद्र सरकार हर दिन वंदे भारत, बुलेट ट्रेन और रेलवे स्टेशनों के "विश्व स्तरीय" कायाकल्प का ढिंढोरा पीटती नहीं थकती। सोशल मीडिया पर चमचमाती ट्रेनों की रील्स और तस्वीरें पोस्ट करके ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो भारतीय रेलवे का पूरी तरह कायाकल्प हो चुका हो। लेकिन हकीकत यह है कि जब जमीन पर ट्रेनें चलती हैं, तो वे कभी शॉर्ट सर्किट से धधक उठती हैं तो कभी तकनीकी खामियों के कारण पटरी से उतर जाती हैं। आज का सबसे बड़ा सवाल है कि जिस देश में प्रीमियम राजधानी एक्सप्रेस तक सुरक्षित नहीं है, वहां आम आदमी की जान की क्या कीमत है? क्या रेल मंत्रालय का काम सिर्फ पुराने ढांचे का रंग-रोगन कर दिखावा करना, नई (वास्तविकता में पुरानी) ट्रेनों को हरी झंडी दिखाना और सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर करना ही रह गया है? संसद से लेकर सड़कों तक प्रधानमंत्री और रेलमंत्री ने 'कवच' (एंटी-कोलिजन सिस्टम) और अत्याधुनिक फायर सेफ्टी ऑडिट का बढ़-चढ़कर प्रचार किया था। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज भी देश के अधिकांश रूटों पर यात्री अपनी जान हथेली पर रखकर सफर कर रहे हैं। विडंबना यह है कि हादसों के बाद भी सरकार और मंत्रालय 'आपदा में अवसर' तलाशने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखते। हकीकत साफ है और घिनौना चसच सामने कि जब सरकार की सारी ऊर्जा और बजट सिर्फ रील बनाने, इवेंट मैनेजमेंट और ब्रांडिंग करने में खपा दिया जाएगा, तो ग्राउंड लेवल पर मेंटेनेंस, ट्रैकों की मरम्मत और कोचों की सुरक्षा के लिए संसाधन कहां से बचेंगे? लगातार हो रहे हादसों के बाद सरकार और रेल मंत्रालय की तरफ से सिर्फ एक रटा-रटाया बयान आता है: "जांच के आदेश दे दिए गए हैं।" लेकिन आज तक न तो किसी जांच का ठोस परिणाम सामने आया और न ही किसी शीर्ष जिम्मेदार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दिया। देश अब इन खोखली जांच रिपोर्टों और बयानों से थक चुका है। जब रेलवे का पूरा फोकस सिर्फ पीआर (PR) कैंपेन पर है, तो सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? क्या करोड़ों यात्रियों को हर सफर पर भेजने वाली भारतीय रेलवे वाकई अब सिर्फ राम भरोसे चल रही है? सरकार को यह समझना होगा कि पटरियों पर देश के हाड़-मांस के नागरिक चलते हैं, कोई डिजिटल विज्ञापन नहीं। अब खोखले दावों को बंद कर सुरक्षा के मोर्चे पर सीधी जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। चमचमाते विज्ञापनों के पीछे खोखली होती रेल सुरक्षा में लगातार हो रही इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? क्या केंद्र सरकार की नजर में रेलवे अब सिर्फ 'रेलवे' नहीं, बल्कि 'रील-वे' बन गया है..?

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