रविवार, मई 17, 2026

बढ़ता भीड़ तंत्र, घटती योग्यता के बीच विकास की अंधी दौड़

आधुनिक समाज का एक गंभीर संकट: आज का वैश्विक परिदृश्य दो बड़ी शक्तियों के प्रभाव में है: बेतहाशा बढ़ती आबादी और अंधाधुंध पूंजीवादी व्यवस्था। इस जुगलबंदी ने हमें गगनचुंबी इमारतें, बुलेट ट्रेनें और चमचमाते मॉल जैसे तथाकथित विकास के प्रतीक तो दिए हैं, लेकिन इसके समानांतर हर क्षेत्र में एक ऐसी अंधी भीड़ भी पैदा कर दी है जिसने योग्यता और उसकी गंभीरता को मटियामेट कर दिया है। आज विकास की परिभाषा केवल संख्या और पैसा बनकर रह गई है, जिसके मलबे के नीचे वास्तविक प्रतिभा, ज्ञान और नैतिक मूल्य मरणासन्न होते जा रहे हैं। आधुनिक समाज में पद, प्रतिष्ठा और रसूख की चाहत हर किसी को है। हर व्यक्ति शीर्ष पर बैठना चाहता है, लेकिन उस शीर्ष तक पहुँचने के लिए जिस कड़े परिश्रम, अनुशासन और वैचारिक परिपक्वता की आवश्यकता होती है, उससे आज की पीढ़ी कोसों दूर भाग रही है। इस व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहाँ शॉर्टकट को बुद्धिमानी और अनुभव को पुराने ख्यालात मान लिया गया है। कई बार युवा पीढ़ी वर्षों के कड़े अनुभव से तपे हुए जानकारों का मज़ाक उड़ाने से भी नहीं चूकती। वे भूल जाते हैं कि सूचना और ज्ञान में बहुत बड़ा अंतर होता है। भविष्य के सुनहरे सपने देखने वाली आज की पीढ़ी विभिन्न चमक-दमक वाले शिक्षण संस्थानों और पाठ्यक्रमों में दाखिला तो ले लेती है; वे रट-रटाकर, असाइनमेंट कॉपी करके या परीक्षा प्रणालियों की कमियों का फायदा उठाकर डिग्रियां भी हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब बात इस ज्ञान को व्यावहारिक धरातल पर उतारने की आती है, तो उनके भीतर की योग्यता का खोखलापन साफ नजर आने लगता है। आज हमारे पास डिग्री धारकों की एक फौजनुमा भीड़ खड़ी हो गई है। कहने को यह भीड़ अपने-अपने क्षेत्र में जोर-आजमाइश करने को तैयार है, लेकिन इसके परिणाम बेहद निराशाजनक आ रहे हैं। ज्ञहर गली-मोहल्ले में पत्रकार और दर्जनों 24 घंटे चलने वाले न्यूज चैनल्स व सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भीड़ हमें देखने को मिल रही है। रॉयटर्स इंस्टीट्यूट डिजिटल न्यूज रिपोर्ट और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के वैश्विक सूचकांकों पर नजर डालें, तो सनसनीखेज खबरों (Sensationalism) और टीआरपी की अंधी दौड़ के कारण पत्रकारिता की साख लगातार गिरी है। लेखन शैली, जो कभी हर मुद्दे का गहराई से मूल्यांकन कर सटीकता के साथ निष्पक्ष बात कहने और लिखने की क्षमता रखती थी, आज चीखने-चिल्लाने और चाटुकारिता में बदल चुकी है। टीआरपी और पूंजीपतियों के इशारे पर नाचते एंकरों के पास न तो भाषाई मर्यादा बची है और न ही किसी विषय पर गंभीर शोध करने की योग्यता। ऐसे ही शिक्षा के क्षेत्र में आने के लिए हर साल लाखों की संख्या में बीएड (B.Ed), नेट (NET) और पीएचडी (Ph.D) धारकों की फौज खड़ी दिखाई देती है। राष्ट्रीय स्तर के असर (ASER - Annual Status of Education Report) जैसे सर्वेक्षणों के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि उच्च डिग्रियां होने के बावजूद कई शिक्षक बुनियादी व्याकरण, गणित या अपने विषय की मूल अवधारणा तक छात्रों को नहीं समझा पाते। शिक्षा अब ज्ञान देने के बजाय सिर्फ अटेंडेंस और सिलेबस खत्म करने तथा क्रेडिट सिस्टम बटोरने का जरिया बन गई है। चिकित्सा के लिए गली-मोहल्लों में धड़ाधड़ खुलते निजी मेडिकल्स व कॉलेज और वहां से हर साल निकलने वाले हजारों डॉक्टरों की फौज तो होती है, लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और विभिन्न मेडिकल जर्नल के अध्ययन बताते हैं कि व्यावहारिक प्रशिक्षण (Clinical Exposure) की कमी के कारण बुनियादी डायग्नोसिस (रोग की पहचान) में भी भारी चूक होती रहती है। दवाओं के भारी-भरकम प्रिस्क्रिप्शन और गैर-जरूरी टेस्ट्स (Over-diagnosis) के पीछे अक्सर वास्तविक चिकित्सीय समझ की कमी, व्यावसायिक लालच और अज्ञानता साफ झलकती है। अभियांत्रिकी क्षेत्र की हालात भी ऐसी ही है। जहां देश में लाखों की संख्या में बी.टेक और आईटी ग्रेजुएट्स की भरमार है। नेशनल एम्प्लॉयबिलिटी रिपोर्ट (National Employability Report by Aspiring Minds) के ऐतिहासिक और वर्तमान ट्रेंड्स बताते हैं कि 80% से अधिक इंजीनियर्स उद्योग जगत की जरूरतों के मुताबिक रोजगार के काबिल (Employable) हैं ही नहीं। उनके पास थ्योरी की रटी-रटाई बातें तो हैं, लेकिन कोडिंग, डेटा एनालिसिस, डिजाइनिंग या वास्तविक समस्या को हल करने का कोई व्यावहारिक कौशल (Skill) नहीं है। विधि के क्षेत्र में नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि अदालतों में काले कोट और वकीलों की अनियंत्रित भीड़ के बीच डिग्रियों की भरमार है। विधि आयोग (Law Commission) की विभिन्न टिप्पणियों और कानूनी विश्लेषकों के अनुसार, बार काउंसिल की ढीली नियंत्रण प्रणाली के कारण इस भीड़ में ऐसे वकीलों की बड़ी तादाद आ गई है जो कानून की धाराओं की सही व्याख्या नहीं कर पाते या कोर्ट के सामने ठीक से जिरह (Argument) नहीं रख पाते। इसका परिणाम मुकदमों के अंतहीन खिंचाव और न्याय में देरी के रूप में सामने आता है। देश के भीतर इस संकट को गहरा करने में अनियंत्रित पूंजीवादी व्यवस्था का सबसे बड़ा हाथ है। पूंजीवाद ने हर विधा को साधना से बदलकर मुनाफे का व्यापार बना दिया है। कमर्शियलाइजेशन ऑफ एजुकेशन (शिक्षा का व्यवसायीकरण) के चलते निजी विश्वविद्यालय पैसे के बदले डिग्रियां बांटने वाले कारखाने बन गए हैं। इसी तरह मीडिया हाउस भी अब केवल कॉरपोरेट कंपनियां हैं जिन्हें जनसरोकार के मुद्दों से ज्यादा अपने विज्ञापनों और इन्वेस्टर रिटर्न की चिंता है। क्लिकबेट कल्चर, रील्स और सोशल मीडिया के इस दौर में गहराई से सोचना, निष्पक्ष रहना या किसी विषय पर वर्षों शोध करना घाटे का सौदा लगने लगा है। आज की भीड़ को त्वरित (जल्दी) परिणाम चाहिए, चाहे उसके लिए योग्यता और नैतिकता की बलि ही क्यों न चढ़ानी पड़े। और इन सभी विकृतियों की अंतिम मार देश के आम आदमी पर पड़ती है। कारण बिल्कुल स्पष्ट है: योग्यता की कमी और उसके प्रति गंभीरता का अभाव! जब तक समाज सफलता का पैमाना केवल कैमरे के सामने की चमक, कागज के टुकड़े (डिग्री) और बैंक बैलेंस को मानता रहेगा; तब तक यह संकट और गहराता जाएगा। यदि हमें एक मजबूत, जागरूक और दूरदर्शी समाज का निर्माण करना है, तो हमें इस फौजनुमा भीड़ को संख्या बल के बजाय योग्यता और नैतिकता की कसौटी पर कसना होगा। इसके लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे। जिनमें डिग्रियों की अनिवार्यता को कम करके व्यावहारिक कौशल और वास्तविक ज्ञान की परीक्षा को प्राथमिकता देने के साथ शॉर्टकट और हाइप के बजाय वर्षों के कड़े अनुभव व वरिष्ठता के प्रति सम्मान की भावना को समाज में पुनः स्थापित करना होगा। अन्यथा, यह तथाकथित विकास केवल एक रंगीन बुलबुला बनकर रह जाएगा, जिसके भीतर सिर्फ योग्यता का खोखलापन और अंतहीन निराशा होगी।

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