मंगलवार, मई 19, 2026
आईना जब ढाल बन जाए..!
भारतीय मीडिया का बदलता चरित्र और नागरिक जिम्मेदारी
लोकतंत्र कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जो केवल हर पांच साल में वोट डाल देने से सुरक्षित रहे; यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को जीवित रखने के लिए 'जागरूक नागरिक' ईंधन का काम करते हैं और 'स्वतंत्र मीडिया' उस इंजन को सही दिशा में बनाए रखने वाली धुरी है। यदि यह धुरी जाम हो जाए या सिर्फ एक ही दिशा में, वह भी सत्ता पक्ष की ओर घूमने लगे, तो लोकतंत्र का पतन तय है।
लोकतंत्र की इमारत चार खंभों पर टिकी होती है: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और पत्रकारिता। जब पहले तीनों स्तंभ निरंकुश होने लगते हैं, तो चौथा स्तंभ समाज के साथ-साथ विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को आईना दिखाकर उन्हें उनकी जिम्मेदारी याद दिलाता है। लेकिन वर्तमान समय में भारत में यह धारणा मजबूत हुई है कि चौथा स्तंभ अब आईना दिखाने के बजाय सत्ता की ढाल बन गया है। वैश्विक सूचकांकों से लेकर रोज टीवी स्क्रीनों पर होने वाली बहसों तक में भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता अपने सबसे निचले स्तर पर खड़ी नजर आती है।
'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' (RSF) की मानें तो विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का स्थान लगातार नीचे खिसकना गंभीर चिंता का विषय है। भारत का स्थान इस बात का प्रमाण है कि यहां पत्रकारों के लिए काम करने का माहौल कठिन होता जा रहा है। आम तौर पर भारतीय जनमानस में यह माना जाता है कि पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे देशों में लोकतांत्रिक जड़ें बहुत कमजोर हैं। लेकिन जब प्रेस स्वतंत्रता में ये देश भारत के समकक्ष या कभी-कभी बेहतर स्थिति में दिखते हैं, तो यह भारतीय लोकतंत्र और यहां की विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका के लिए एक बड़ा झटका होना चाहिए। इसके विपरीत, यहां की शासन-व्यवस्था इस कड़वे सच को स्वीकार करने से बचती है। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत में पत्रकारों पर कानूनी शिकंजे (जैसे UAPA या देशद्रोह के कानून), धमकियों और कॉरपोरेट दबाव में भारी बढ़ोतरी हुई है, जिसके कारण मुख्यधारा का मीडिया खुद में सुधार नहीं करना चाहता।
नॉर्वे और अन्य नॉर्डिक देश सालों से इस सूची में शीर्ष पर रहते हैं। वहां की सरकारें पारदर्शी हैं, और प्रधानमंत्री से लेकर मंत्रियों तक को पत्रकारों के तीखे व असहज करने वाले सवालों के जवाब देने ही पड़ते हैं। इसके विपरीत, भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शीर्ष नेतृत्व का मीडिया से दूरी बनाना एक नई प्रशासनिक संस्कृति को दर्शाता है। भारतीय राजनीति में 'विश्व गुरु' या वैश्विक महाशक्ति बनने की आकांक्षा एक बड़ा नैरेटिव (विमर्श) रही है। ऐसे में क्या एक जीवंत लोकतंत्र का नेता बिना किसी पूर्व-निर्धारित स्क्रिप्ट के, पत्रकारों के खुले और तीखे सवालों का सामना करने से बच सकता है?
पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव आया है। अब संवाद द्विपक्षीय न रहकर एकतरफा हो गया है। रेडियो कार्यक्रमों (जैसे: मन की बात), सोशल मीडिया पोस्ट्स और रैलियों के जरिए जनता तक अपनी बात सीधे पहुंचाई जाती है। इसमें जनता और सरकार के बीच का माध्यम, यानी पत्रकार गायब हो गया है। इंटरव्यू के बदलते स्वरूप में जो इक्का-दुक्का साक्षात्कार होते भी हैं, उन पर अक्सर चुनिंदा या सॉफ्ट होने के आरोप लगते हैं जो सही भी है। जब देश के मुखिया से बेरोजगारी, महंगाई, सीमा विवाद या सांप्रदायिक तनाव पर तीखे सवाल पूछने के बजाय उनकी जीवनशैली या आम खाने के तरीकों पर बात होने लगे, तो पत्रकारिता की साख का गिरना स्वाभाविक है।
पिछले एक दशक से भारतीय पत्रकारिता जगत पर यह आरोप लग रहा है कि मुख्यधारा का मीडिया (विशेषकर हिंदी और अंग्रेजी के राष्ट्रीय न्यूज चैनल) सत्ताधारी दल के आईटी सेल या प्रवक्ता की तरह काम कर रहा है, जो कई मायनों में सच प्रतीत होता है। यह स्वीकार करना होगा कि आधुनिक मीडिया कोई चैरिटी नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यवसाय है, जिसके संचालन में अरबों का खर्च आता है। न्यूज चैनलों की कमाई का सबसे बड़ा जरिया सरकारी विज्ञापन और बड़े कॉरपोरेट घरानों से मिलने वाला फंड है। चूंकि सरकार विज्ञापन रोकने की ताकत रखती है, इसलिए चैनलों के मालिक ऐसा कोई जोखिम नहीं उठाना चाहते जिससे सत्ता नाराज हो। नतीजा यह होता है कि चैनल सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से सवाल पूछता है। साथ ही, टीवी मीडिया ने यह समझ लिया है कि जटिल आर्थिक या सामाजिक मुद्दों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि) पर गंभीर चर्चा से टीआरपी (TRP) नहीं मिलती। टीआरपी मिलती है हिंदू-मुस्लिम डिबेट, पाकिस्तान-विरोधी विमर्श और राष्ट्रवाद के शोर से। यह विमर्श न केवल सत्ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे के अनुकूल है, बल्कि चैनलों की जेबें भी भरता है। यही वजह है कि जनता ने इस मीडिया को 'गोदी मीडिया' का नाम दिया है।
इस संस्थागत पतन का एक बड़ा कारण भारत में मीडिया नियामक ढांचे (Regulatory Framework) का कमजोर होना भी है।'प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) जैसी वैधानिक संस्थाएं आज के दौर में दंतविहीन बाघ (Toothless Tiger) साबित हो रही हैं, जिनका अधिकार क्षेत्र केवल प्रिंट मीडिया तक सीमित है। टीवी और डिजिटल मीडिया के नियमन के लिए कोई सख्त सरकारी या स्वतंत्र ढांचा नहीं है; वहां स्व-नियमन (Self-regulation) के नाम पर औपचारिकता निभाई जा रही है। जब तक क्रॉस-मीडिया ओनरशिप (कॉरपोरेट एकाधिकार) को रोकने और नियामक संस्थाओं को वित्तीय जुर्माना या लाइसेंस रद्द करने जैसी दंडात्मक शक्तियां देने वाले कड़े कानूनी सुधार नहीं किए जाते, तब तक इस व्यवस्था में प्रशासनिक सुदृढ़ता लाना असंभव है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जब मीडिया अपनी निष्पक्षता खो देता है, तो उसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है। लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार को घेरना होता है, लेकिन जब मीडिया खुद ही विपक्ष पर हमलावर हो जाए, तो सरकार पूरी तरह निरंकुश हो जाती है। उसे किसी नीति की विफलता का डर नहीं रहता, क्योंकि मीडिया उस विफलता को भी 'मास्टरस्ट्रोक' साबित करने में जुट जाता है। प्राइम-टाइम डिबेट्स में जिस तरह की भाषा और नफरत परोसी जाती है, उसने भारतीय समाज के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को गहरा नुकसान पहुंचाया है। पड़ोसी, पड़ोसी पर शक करने लगा है और यह सब सिर्फ कुछ रेटिंग्स और राजनीतिक फायदों के लिए किया जा किया जा रहा है।
भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भले ही आज सत्ता की चाटुकारिता में लीन हो, लेकिन पूरी तस्वीर इतनी धुंधली भी नहीं है। मुख्यधारा के टेलीविजन से निराश होकर आज भारत का जागरूक नागरिक डिजिटल मीडिया, स्वतंत्र यूट्यूब चैनलों और खोजी पत्रकारिता पोर्टल्स (जैसे द वायर, न्यूज़लॉन्ड्री, स्क्रॉल, सूर्यांशश्री समाचार आदि) की तरफ मुड़ रहा है। कई स्वतंत्र पत्रकार आज भी अपनी जान और करियर को जोखिम में डालकर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे हैं।
भारत को 'विश्व गुरु' बनने के लिए सिर्फ आर्थिक या सैन्य ताकत की जरूरत नहीं है, बल्कि एक ऐसे स्वतंत्र और निडर मीडिया की जरूरत है जो सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सच बोल सके। जब तक भारतीय दर्शक खुद नफरत के तमाशे को देखना बंद नहीं करेंगे और गंभीर पत्रकारिता के लिए आर्थिक रूप से भुगतान (पे/सब्सक्राइब) नहीं करेंगे, तब तक भारत में मीडिया का यह 'आईटी सेल' वाला अवतार बदलना मुश्किल होगा।
थॉमस जेफरसन (अमेरिकी राष्ट्रपति और विचारक) ने कहा था: "सतर्कता ही स्वतंत्रता की शाश्वत कीमत है।" एक जागरूक नागरिक वह नहीं है जो केवल खबरें देखता है, बल्कि वह है जो यह समझता है कि कौन सी खबर दिखाई जा रही है और कौन सी छिपाई जा रही है। जब मीडिया सत्ता की चाटुकारिता पर उतर आए, तब नागरिकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे फैक्ट-चेक करें, वैकल्पिक स्रोतों से जानकारी जुटाएं और खुद को प्रोपेगैंडा (दुष्प्रचार) का शिकार होने से बचाएं। जागरूक नागरिक कभी भी धर्म, जाति या राष्ट्रवाद के नाम पर आंख मूंदकर ताली नहीं बजाएगा। वह सरकार से स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और अपने अधिकारों पर सवाल पूछता रहेगा।
रोमन कवि जुवेनल का एक प्रसिद्ध कथन है:
"Quis custodiet ipsos custodes?" अर्थात "पहरेदारों पर पहरा कौन रखेगा? लोकतंत्र में मीडिया जनता का पहरेदार है जो सत्ता पर नजर रखता है। लेकिन जब पहरेदार ही सत्ता का वेतनभोगी या मित्र बन जाए, तो पहरा देने की जिम्मेदारी खुद मालिक यानी जनता को उठानी पड़ती है।
यदि भारत या दुनिया का कोई भी लोकतंत्र आज खोखला होने की कगार पर है, तो उसका कारण सिर्फ चाटुकार मीडिया नहीं है, बल्कि वह दर्शक वर्ग भी है जो इस चाटुकारिता को चुपचाप स्वीकार कर रहा है। जब तक नागरिक 'दिखाए जा रहे सच' और 'वास्तविक सच' के अंतर को नहीं समझेंगे, तब तक लोकतंत्र का लिबास तो लोकतांत्रिक रहेगा, लेकिन उसके अंदर की आत्मा तानाशाही की हो जाएगी। अतः लोकतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी जितनी पत्रकारों की है, उतनी ही इसे देखने, सुनने और पढ़ने वाली जनता की भी है।
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