सोमवार, मई 25, 2026

लोकतंत्र का प्रशासनिक सरेंडर: 2027 की घबराहट और वोट की चोट से डरी हुकूमत..!

उत्तर प्रदेश की राजनीति इस वक्त एक बेहद संवेदनशील और अलोकतांत्रिक दौर से गुजर रही है। सूबे की सरकार ने ग्राम पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होते ही जो दांव खेला है, उसने यह साफ कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में 2027 की हार का खौफ किस कदर घर कर चुका है। बैकडोर से बिना चुनाव कराए मौजूदा 57 हजार से अधिक ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त करने का अनैतिक व अजीबोगरीब फैसला लेना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि हुकूमत जनता का सामना करने की हिम्मत खो चुकी है। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के बहाने चुनावों को आगे खिसकाना रणनीतिक मजबूरी कम, योगी सत्ता की खुली चुनावी कायरता ज्यादा नजर आती है।
सरकार का यह तर्क कि पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही सीटें तय होंगी; एक ऐसा ढोंग है जिसे गांव का आम आदमी भी बखूबी समझ रहा है। असलियत यह है कि हालिया चुनावी परिणामों को हासिल करने के लिए प्रयोग किए गये साम-दाम-दंड-भेद और जमीनी फीडबैक ने लखनऊ से लेकर दिल्ली तक की चूलें हिला रखी हैं। सरकार को डर है कि अगर आज पंचायत चुनाव हुए और नतीजे विपरीत आए, तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ही सत्ता विरोधी लहर का ऐसा तूफान उठेगा जिसे संभालना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा। जिसकी खातिर योगी सरकार ने राजनीतिक आपदा से बचने के लिए लोकतंत्र की मर्यादा को ताक पर रखते हुए अफसरों की जगह पहली बार निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक की कुर्सी सौंप दी; ताकि 57 हजार प्रधानों को खुश रखा जा सके। लेकिन सत्ता के हुक्मरानों ने इस बार गणित का गलत चश्मा पहन लिया है। सरकार के इस आत्मघाती फैसले ने उत्तर प्रदेश के गांवों में ढाई लाख भावी दावेदारों की पीठ में छुरा मारने का काम किया है। सरकार इस मुगालते में है कि उसने 57 हजार प्रधानों को प्रशासक का लॉलीपॉप देकर अपनी गद्दी सुरक्षित कर ली। लेकिन वह इस कड़वे सच से मुंह चुरा रही है कि उत्तर प्रदेश के गांवों में इस पद के लिए चार गुना ज्यादा (लगभग ढाई लाख) भावी उम्मीदवार दिन-रात एक किए बैठे थे। यह फैसला इन जमीनी कार्यकर्ताओं के अरमानों का कत्ल है। प्रधान पद के ये दावेदार वो युवा और स्थानीय नेता हैं, जिन्होंने पिछले दो-ढाई साल से अपनी गाढ़ी कमाई, समय और उम्मीदें गांवों के विकास और प्रचार में फूंक दी थीं। कोई खेल टूर्नामेंट करा रहा था, कोई शादियों-तेरहवियों में अपनी हाजिरी लगा रहा था, तो कोई कर्ज लेकर जनता की सेवा में जुटा था। ऐन वक्त पर चुनाव टालकर और मौजूदा प्रधानों को ही फिर से चाबियां सौंपकर सरकार ने इन ढाई लाख कर्मठ दावेदारों और उनके समर्थकों के सपनों पर प्रशासनिक बुलडोजर चला दिया है। उनके सीने में सुलग रही यह पीड़ा और आक्रोश आने वाले समय में सरकार के लिए सबसे बड़ा नासूर बनेगा। उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (73वें संविधान संशोधन) की आत्मा पर सीधा प्रहार है। चुनाव टालने का सीधा मतलब है कि गांवों का विकास अब जनता की मर्जी से नहीं, बल्कि लखनऊ की फाइलों और मनोनीत प्रशासकों की वफादारी से तय होगा। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में, जहां विकास की नींव गांवों से होकर गुजरती है, वहां चुनावी प्रक्रिया को बंधक बना लेना यह दिखाता है कि सरकार जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों को अपनी पार्टी के नफा-नुकसान के तराजू में तौल रही है। हुकूमत यह न भूले कि जिन ढाई लाख दावेदारों को आज उसने दर्द दिया है, उनके पीछे करोड़ों ग्रामीण मतदाताओं का भरोसा और उनकी लामबंदी है। 57 हजार प्रधानों को मिला प्रशासक का यह पद, ढाई लाख दावेदारों के गुस्से की आग में घी डालने जैसा काम करेगा। शासन को यह मुगालता मुबारक हो कि उन्होंने चुनाव टालकर आने वाले संकट को टाल दिया है। हकीकत यह है कि यह गुस्सा खत्म नहीं हुआ है, बल्कि अंदर ही अंदर लावा बनकर सुलग रहा है। जिन ढाई लाख उम्मीदवारों के राजनीतिक करियर और मेहनत को आज सत्ता के गलियारों में बैठे हुक्मरानों ने एक झटके में ठंडे बस्ते में डाल दिया है, वे खामोश बैठने वाले नहीं हैं। यदि सरकार को लगता है कि वह 2027 के विधानसभा चुनाव तक पंचायत चुनाव टालकर बच जाएगी, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल होगी। यही शोषित और आक्रोशित दावेदार 2027 में हर बूथ पर सरकार की घेराबंदी करेंगे। तब सत्ता को समझ आएगा कि जनता के अधिकारों से खिलवाड़ करने की कीमत क्या होती है। सरकार कान खोलकर सुन ले... लोकतंत्र में जनता के फैसले को कुछ समय के लिए टाला तो जा सकता है, लेकिन वोट की चोट के अंतिम न्याय से बचाया नहीं जा सकता।

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