Saturday, May 09, 2026

सृजन, संरक्षण और क्रांति का त्रिकोण: मां

क्या मातृत्व केवल एक सुकोमल भावना है? या यह उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पुंज है जिसे दर्शन ने आदि-शक्ति के रूप में परिभाषित किया है? मई माह का दूसरा रविवार कैलेंडर का कोई सामान्य पृष्ठ पर अंकित दिन मात्र नहीं, अपितु उस अदृश्य धुरी के प्रति कृतज्ञता अर्पण करने का क्षण है, जिसके इर्द-गिर्द संपूर्ण सृष्टि का अस्तित्व परिक्रमा करता है। जिसे संपूर्ण विश्व 'मदर्स डे' के रूप में मनाता है, वह केवल औपचारिक उपहारों या शुभकामनाओं का विनिमय नहीं, बल्कि उस असीम और अजेय ऊर्जा के उत्सव का दिन है जिसे हम 'माँ' कहते हैं। 1907 में अन्ना जार्विस ने जिस स्मृति-परंपरा की नींव रखी, वह भारत की चेतना में समाहित होकर और भी अधिक गहन और बहुआयामी हो गई है। भारतीय मनीषा में माँ केवल एक पारिवारिक इकाई नहीं, बल्कि आदि-शक्ति का मूर्त स्वरूप है। भारतीय दर्शन में नारी को 'शक्ति' के रूप में स्वीकार किया गया है। शक्ति जो सृजन, पोषण और संहार का त्रिवेणी संगम है। जब हम माँ को आदि-शक्ति की संज्ञा देते हैं, तो हमारा मंतव्य उस चेतन ऊर्जा से होता है जिसके अभाव में शिव भी शव तुल्य हैं। यह वही ऊर्जा है जो घरों की चारदीवारी में ममत्व की वर्षा करती है और धर्म की रक्षा हेतु आवश्यकता पड़ने पर रणचंडी बनकर अधर्म का उच्छेदन भी करती है। भारत में मातृत्व का एक अत्यंत गौरवशाली और दिलों पर राज करने का उदाहरण इतिहास में पन्नाधाय के रूप में सुरक्षित है। उनका परोपकार और त्याग विश्व इतिहास में अद्वितीय है। चित्तौड़ के उत्तराधिकारी उदयसिंह को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े चंदन को काल के गाल में समर्पित कर दिया। पन्नाधाय का यह युगांतरकारी त्याग सिद्ध करता है कि माँ केवल जन्मदात्री नहीं, अपितु राष्ट्र और संस्कृति की रक्षा के लिए अपनी कोख का उत्सर्ग करने वाली महामाता भी है। उनका यह कृत्य मातृत्व को व्यक्तिगत मोह के संकुचित घेरे से निकालकर कर्तव्य के उच्चतम शिखर पर प्रतिष्ठित करता है। इतिहास साक्षी है कि यह माँ का ही अदम्य मार्गदर्शन था जिसने एक बालक के भीतर छत्रपति बनने के स्वप्न को रोपित किया। लोक-मानस में कैकेयी को प्रायः नकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाता है, किंतु उनके चरित्र का एक विद्रोहात्मक और रणनीतिक पक्ष भी है। उनका राम को वनवास भेजना केवल पुत्र-मोह का परिणाम नहीं, अपितु तत्कालीन जड़ व्यवस्था के विरुद्ध एक साहसिक विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। उन्होंने नियति के उस चक्र को गति प्रदान की जिसके बिना रावण का दलन और राम का मर्यादा पुरुषोत्तम बनना असंभव था। यदि हम पूर्वाग्रहों को त्याग कर देखें, तो कैकेयी एक क्रांतदर्शी माँ के रूप में उभरती हैं, जिन्होंने स्वयं पर कलंक का विषपान करना स्वीकार किया ताकि राम को वह वनवास मिल सके जो उन्हें ईश्वरत्व की ओर ले जाने वाला मार्ग था। एक माँ जब अपनी सामाजिक छवि की चिंता किए बिना कोई कठोर निर्णय लेती है, तो वह समकालीन समाज के लिए अप्रिय हो सकती है, किंतु वह इतिहास की दिशा को आमूल-चूल बदलने की क्षमता रखती है। इस मदर्स डे पर हमें माँ के केवल सौम्य और शांत स्वरूप की ही वंदना नहीं करनी, बल्कि उनके ओजस्वी, त्यागमय और विद्रोही रूप को भी नमन करना चाहिये। मातृत्व का हर रंग वंदनीय है: चाहे वह अन्ना जार्विस का आदर्श हो, पन्नाधाय का अनुपम बलिदान हो या कैकेयी का दृढ़ संकल्प। आइए, हम अपनी अंतरात्मा से उस आदि-शक्ति का साक्षात्कार करें जो करुणा और शौर्य का शाश्वत प्रतीक है। हमें याद रखना होगा कि, "जिन सुकोमल हाथों से पालने को झूला झुलाने की कला होती है, समय आने पर वही सुकोमल हाथ तलवार थामकर इतिहास के प्रवाह को मोड़ने का सामर्थ्य भी रखते हैं। अतुल कुमार श्रीवास्तव

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