Saturday, May 09, 2026

जनादेश का अपहरण और संस्थागत क्षरण: 2026 में किस दहलीज पर खड़ा हमारा लोकतंत्र

मई 2026 के विधानसभा चुनाव परिणाम चाहे वे पश्चिम बंगाल के हों, तमिलनाडु के या केरल के। भारतीय लोकतंत्र के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम सिद्ध नहीं हुए हैं। इन चुनावों ने न केवल राजनीतिक दलों के बीच की कटुता को सतह पर ला दिया है, बल्कि हमारे संघीय ढांचे और लोकतांत्रिक नैतिकता की नींव को भी झकझोर दिया है। आज प्रश्न केवल यह नहीं है कि सत्ता के शीर्ष पर कौन आसीन होगा, बल्कि यक्ष प्रश्न यह है कि क्या चुनाव के बाद की राजनीतिक रस्साकस्सी में जनता द्वारा किया गया मतदान सुरक्षित है? चुनावी नतीजे आते ही पराजित दलों द्वारा धांधली के आरोप लगाना और मतगणना प्रक्रिया को चुनौती देना अब एक मानक प्रक्रिया बन गई है। इस प्रवृत्ति का विश्लेषण दोतरफा होना चाहिए। एक ओर, यह प्रवृत्ति चुनावी इनकार के उस खतरनाक वैश्विक चलन का हिस्सा है, जहां राजनीतिक दल बिना ठोस साक्ष्यों के अपनी हार स्वीकार करने के बजाय विक्टिम कार्ड खेलते हैं। ऐसा करके वे सीधे तौर पर मतदाताओं के विवेक पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। यह व्यवहार लोकतंत्र की जड़ों में संदेह का विष घोलता है, जिससे आम नागरिक का विश्वास चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं से डिगने लगता है। परंतु, सिक्के का दूसरा पहलू सत्ता पक्ष और चुनाव प्रबंधन की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्षी दल बार-बार धांधली का शोर मचा रहे हैं, तो इसका एक बड़ा कारण सत्ता पक्ष द्वारा प्रशासनिक मशीनरी का कथित दुरुपयोग और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में परिलक्षित होता झुकाव भी है। जब ईवीएम की सुरक्षा, वीवीपैट पर्चियों के मिलान और चुनाव की लंबी समय-सारणी पर पूर्ण स्पष्टता नहीं होती, तो संदेह को बल मिलता है। यह केवल हारने वाले की हताशा नहीं, बल्कि एक विश्वास का संकट है, जहां समान अवसर नदारद नजर आता है। संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल के पद की कल्पना केंद्र और राज्य के बीच एक सेतु के रूप में की थी, लेकिन 2026 के राजनीतिक परिदृश्य में यह पद एक अवरोधक के रूप में अधिक दिखाई दिया। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जिस तरह निर्वाचित सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव हुआ है, उसने संघीय मर्यादाओं को तार-तार कर दिया है। सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का अवसर देने में मनमानी करना या विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को अनिश्चित काल के लिए रोके रखना; ये कृत्य लोकतंत्र के अवरोध और संतुलन के सिद्धांत के विरुद्ध हैं। जब राजभवन राजनीतिक रणनीतियों का केंद्र बन जाता है, तो संघीय ढांचा केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। राजनीतिक नैतिकता का पतन उस समय चरम पर दिखता है, जब बहुमत न होने की स्थिति में जनादेश की चोरी को चाणक्य नीति का नाम देकर महिमा मंडन किया जाता है। विधायकों की खरीद-फरोख्त, रिसॉर्ट पॉलिटिक्स और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव के माध्यम से कराया गया दलबदल अब राजनीति की संज्ञा बन गई है। पिछले एक दशक में चुनावों के बाद जिस तरह से छोटे दलों और निर्दलीयों की नीलामी की खबरें आई हैं, वह मतदाताओं के साथ किया गया सबसे बड़ा विश्वासघात है। भारतीय लोकतंत्र आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां उसे आत्ममंथन की नितांत आवश्यकता है। समय की मांग है कि चुनाव आयोग अपनी निष्पक्षता को न केवल अक्षुण्ण रखे, बल्कि वह निष्पक्ष दिखे भी। राज्यपाल के विवेकाधीन अधिकारों की स्पष्ट व्याख्या अनिवार्य है ताकि वे राजनीतिक मोहरे न बन सकें। अंततः, हमें यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल संख्या बल का अंक गणित नहीं, बल्कि लोक-लाज और संवैधानिक नैतिकता की सतत परंपरा है। यदि संस्थाओं की गरिमा राजनीतिक विजय की वेदी पर बलि चढ़ा दी जाएगी, तो हम एक ऐसी चुनावी तानाशाही की ओर अग्रसर होंगे जहां मतदान तो होगा, परंतु जन-विश्वास अनुपस्थित रहेगा।यदि 2026 के ये चुनाव हमें कोई सबक देते हैं, तो वह यही है कि संस्थाओं की शुचिता किसी भी राजनीतिक जीत से ऊपर होनी चाहिए; अन्यथा दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का गौरव केवल एक खोखला दावा बनकर रह जाएगा। #अतुल_कुमार_श्रीवास्तव #Atul_Kumar_Srivastava

No comments:

Post a Comment