Tuesday, May 05, 2026

लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा और चुनावी निष्पक्षता

आजाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद से राजनीतिक दल अपनी नीतियों के आधार पर चुनाव लड़ते आए हैं, और आदर्श रूप में नीतियों पर ही चुनाव लड़ा जाना चाहिए। लेकिन पिछले लगभग दो दशकों से केंद्र की सत्ता पर काबिज दल द्वारा सरकारी मशीनरी और संस्थाओं के कंधों पर बंदूक रखकर परिणामों को प्रभावित करने की कोशिशों के आरोप लगते रहे हैं। 2026 के पश्चिम बंगाल के परिणाम, आम आदमी पार्टी में फूट और फिर विशिष्ट दल का दामन थामना, बिहार में सत्ता परिवर्तन, और मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार का गिरना, ये तथ्य यही संदेश देते हैं कि सरकारी दबाव के शोर में जनता की अपनी आवाज को पहचान पाना मुश्किल होता जा रहा है। सत्तारूढ़ दल का पूरी शक्ति से चुनाव लड़ना सराहनीय हो सकता है, लेकिन पूरी सरकारी मशीनरी को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना अनैतिक और अलोकतांत्रिक है। लोकतंत्र में साधन (Means) उतने ही पवित्र होने चाहिए जितना कि साध्य (Goal)। यदि व्यक्तिगत चेहरे को सर्वोपरि दिखाने के लिए संस्थाओं को पंगु बनाकर सत्ता हासिल की जाती है, तो वह वास्तव में लोकतंत्र की जीत नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की तानाशाही है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में यदि सरकारी मशीनरी किसी एक व्यक्ति या दल के लिए चुनावी हथियार की तरह काम करने लगती है, तो जनता का भरोसा टूटने लगता है। आम नागरिक यह सोचने पर विवश हो जाता है कि वोट देने से क्या लाभ, जब मशीनरी ही पक्षपाती है? यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की मृत्यु के पथ पर अग्रसर होने का पहला चरण होता है। जब संवैधानिक रास्ते बंद या पक्षपाती महसूस होते हैं, तो लोग सड़कों पर उतरते हैं या हिंसा का सहारा लेते हैं, जो राज्य और जनमानस के लिए अत्यंत घातक है। मणिपुर और असम के घटनाक्रम इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। सत्ता पक्ष द्वारा केंद्रीय बलों की तैनाती को सुरक्षा का नाम दिया जाता है। लेकिन यदि इन बलों का उपयोग मतदाताओं को हतोत्साहित करने या किसी विशेष दल के पक्ष में माहौल बनाने के लिए होने लगे, तो यह सुरक्षा नहीं बल्कि रणनीतिक घेराबंदी है। यह सीधे तौर पर मतदाता के स्वतंत्र विवेक पर प्रहार है। लोकतंत्र की सुंदरता शक्ति के संतुलन में है। जब सत्ता का सारा केंद्र एक ही ओर झुकने लगे, तो नागरिक सतर्कता ही उसे वापस पटरी पर ला सकती है। पिछले कुछ वर्षों से निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग के निर्णयों को लेकर विवाद गहराया है। कई चरणों में चुनाव कराने की लंबी प्रक्रिया ने विपक्षी दलों को यह आरोप लगाने का अवसर दिया कि यह सत्ताधारी दल को लाभ पहुँचाने की कोशिश है। लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है जब संस्थाएं न केवल निष्पक्ष हों, बल्कि निष्पक्ष दिखें भी। ऐसी चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में न्यायपालिका की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। हाल के वर्षों में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां और चुनावी बॉण्ड (Electoral Bonds) पर ऐतिहासिक निर्णय यह दर्शाते हैं कि जब संस्थाएं अपनी रीढ़ खोने लगती हैं, तब न्यायपालिका ही शक्ति के असंतुलन को रोकने का अंतिम प्रयास करती है। हालांकि, न्यायपालिका की भी एक सीमा है; वह नीतिगत हस्तक्षेप तो कर सकती है, लेकिन धरातल पर प्रशासनिक निष्पक्षता सुनिश्चित करना अंततः संवैधानिक संस्थाओं की अपनी जवाबदेही है। लोकतंत्र केवल बहुमत का खेल नहीं है, बल्कि यह उन मर्यादाओं और संस्थागत मूल्यों का संगम है जो अल्पसंख्यक और विपक्षी स्वरों को भी समान स्थान देते हैं। यदि चुनावी जीत को ही एकमात्र लक्ष्य मान लिया जाए, तो उसके साधन अक्सर अनैतिकता की भेंट चढ़ जाते हैं। संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन आयोग और केंद्रीय बलों की परिकल्पना एक तटस्थ प्रहरी के रूप में की थी, न कि किसी दल के विस्तारवादी औजार के रूप में। लोकतंत्र की नींव मतपेटी में नहीं, बल्कि उस विश्वास पर टिकी है कि मतपेटी तक पहुँचने वाला हर नागरिक भयमुक्त और स्वतंत्र है। लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए केवल सजग नागरिक ही नहीं, बल्कि एक निर्भीक और स्वतंत्र न्यायपालिका का होना भी अनिवार्य है जो सत्ता की निरंकुशता पर अंकुश लगा सके। #अतुल_कुमार_श्रीवास्तव #Atul_Kumar_Srivastava

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