गुरुवार, मई 07, 2026

लोकतंत्र में लापता होता मतदाता और संकट में लोकतंत्र

साथियों, लोकतंत्र की विशाल अट्टालिका की नींव जनता का मत और उसकी भागीदारी पर टिकी होती है। भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल नामों का संग्रह नहीं, बल्कि देश के भविष्य का ब्लूप्रिंट होती है। लेकिन जब इस सूची से लाखों नाम संदिग्ध रूप से गायब होने लगें, तो यह केवल एक तकनीकी चूक (Technical Glitch) नहीं बल्कि एक गहरे संवैधानिक संकट की आहट है। वर्तमान समय में बिना पारदर्शिता और जवाबदेही के चुनावी प्रक्रिया महज एक प्रशासनिक औपचारिकता बनकर रह गई है, जो जनमत के साथ सबसे बड़ा क्रूर मजाक है। हाल ही में चुनाव आयोग व प्रशासनिक कार्यप्रणाली ने डिजिटल इंडिया के दावों के बीच एक नया शब्द उछाल दिया है डिलीट इंडिया..! लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे पवित्र इकाई मतदाता है; लेकिन जब 64 लाख में से 27 लाख जैसे भारी-भरकम संख्या में मतदाताओं के नाम गायब होने के दावे सामने आये हैं, जिससे देश के सर्वोच्च संस्थानों भारतीय चुनाव आयोग और न्यायपालिका की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। प्रशासनिक लापरवाही का यह स्वरूप अक्सर एक सोची-समझी रणनीति जैसी प्रतीत हो रही है, जहां Standard Inspection Report (SIR) और पुनरीक्षण प्रक्रिया कागजों पर तो पुख्ता दिखती है, किंतु धरातल पर पूरी तरह खोखली साबित होती है। मतदाता सूची में हेरफेर और विलोपन का सबसे चिंताजनक उदाहरण विधानसभा चुनाव -2026 में पश्चिम बंगाल में देखने को मिला है। बंगाल के चुनावी परिदृश्य में मतदाता सूची हमेशा से विवादों के केंद्र में रही है। विभिन्न स्वतंत्र नागरिक समूहों की रिपोर्ट बताती है कि बंगाल के कई निर्वाचन क्षेत्रों, विशेषकर सीमावर्ती जिलों (जैसे मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर 24 परगना) में नाम काटने की दर राष्ट्रीय औसत से कई गुना अधिक रही है। इसके पहले भी 2024 के आम चुनाव से ठीक पहले, बंगाल में आधार कार्ड को डी-एक्टिवेट करने और उसे मतदाता पहचान पत्र से लिंक करने की प्रक्रिया के दौरान हजारों नागरिकों ने शिकायत की कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना या कारण बताओ नोटिस के चुनावी प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया। यह सीधे तौर पर नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का हनन है। यदि इतने बड़े पैमाने पर नाम काटे गए हैं, तो इसके पीछे दो ही कारण हो सकते हैं: बंगाल में बीएलओ (BLO) की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक दखल ने यह साबित किया है कि चुनावी प्रक्रिया को सत्ता के अनुकूल ढालने के लिए सत्यापन प्रक्रिया की अनदेखी की गई। या नाम काटने से पहले उचित सत्यापन और कारण बताओ नोटिस की कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया? इन कारणों पर संस्थानों की चुप्पी जनता का संशय मजबूत कर देती है। लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ चुनाव आयोग और न्यायपालिका आज कटघरे में हैं। जब एक आम नागरिक इन संस्थानों की ओर उम्मीद से देखता है और उसे वहां से केवल प्रक्रियात्मक देरी या तकनीकी दलीलें मिलती हैं, तो व्यवस्था से भरोसा उठना एक स्वाभाविक परिणति बन जाती है। भारत का वर्तमान दौर जिस प्रशासनिक मनमानी की ओर बढ़ रहा है, वह लोकतंत्र को सीरिया या पाकिस्तान जैसी अराजकता की ओर धकेल सकता है, जहां संस्थाएं संविधान के बजाय व्यक्ति-विशेष या सत्ता के अधीन हो जाती हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक भी पात्र मतदाता का नाम सूची से हटना केवल एक व्यक्ति का अधिकार छिनना नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की सूक्ष्म हत्या का प्रयास है। इससे बचने और लोकतंत्र को बचाने के लिए मतदाता सूची से नाम हटाने (Deletion) की प्रक्रिया का एक स्वतंत्र और निष्पक्ष ऑडिट होना चाहिए, ताकि डिजिटल हेरफेर पकड़ी जा सके। साथ ही यदि तकनीक के माध्यम से नाम हटाए जा सकते हैं, तो मतदाता को 'SMS' या 'ईमेल' के जरिए तत्काल सूचित किया जाना चाहिए? क्या पारदर्शिता केवल सरकार की व्यक्तिगत सुविधा और मनमानी तक ही सीमित होनी चाहिए? समय की मांग है कि देश का सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे को स्वतः संज्ञान (Suo Moto) में लेते हुए सख्त मानक तय करे। लोकतंत्र भले ही संख्या का खेल हो, लेकिन इसका प्राण तत्व जनता का विश्वास है। लाखों मतदाताओं का सूची से बाहर होना एक गंभीर चेतावनी है। यदि आज हम इस संस्थागत ढिलाई और प्रशासनिक तानाशाही पर मौन रहे, तो भविष्य में वोट की चोट शब्द केवल राजनीतिक मुहावरों और इतिहास की किताबों तक सीमित रह जाएगा। वक्त आ गया है कि व्यवस्था से तीखे सवाल पूछे जाएं, क्योंकि सवाल पूछना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार व लोकतांत्रिक धर्म है। #अतुल_कुमार_श्रीवास्तव #Atul_Kumar_Srivastava

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें