गुरुवार, मार्च 08, 2012

Mahila aur antarrashtriya mahila diwas

March 8th, 2012

          आज एक ऐसा अवसर है जब भारत भर में होली और विश्व में महिला दिवस मनाया जा रहा है....  होली हिरनकश्यप वध और प्रहलाद की सुरक्षा में मनाया जाता है.... और महिला दिवस महिलाओं को उनके सम्मान के लिए मनाया जाता है... महिला एक ऐसा शब्द है जिससे आज के दौर के यूँ  कहूँ की  हर  दौर के लोग परिचित रहे हैं और होते रहेंगे….तो शायद यह गलत नहीं होगा…हमने अपनी संस्कृति के अनुसार बहुत से रूपों में महिला को जाना और पहचाना है, जिसमे माँ, बहन, बेटी, बहु  और पत्नी  मुख्य  रूप  से हमे देखने को मिले हैं, लेकिन ये सारे रिश्ते पुरुषों के बिना बेईमानी लगते  हैं कुछ ऐसा समीकरण  बना हुआ है समाज का… क्या पुरुषों के बिना स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं है क्या …?
          भारत जैसा देश, जो अपनी विशालता, लोकतांत्रिकता और सर्वधर्म सम्मान के विधान के लिए जाना जाता है, जिस देश की पहचान रिश्तों की अनूठी कहानी को बयाँ करता है, जिस देश में स्त्री को दुर्गा, सरस्वती और काली जैसी आदि शक्तियों से संबोधित किया गया है, और ये संबोधन आज से नहीं आदि से होता आ रहा है. फिर भी हम आज तक स्त्री के सही मायनो को न तो खुद समझ पाए और न ही दूसरों को समझा पाने में सफल हो पाए हैं…..कारण भारत के धर्म ठेकेदारों की दोहरी नीति…..
          हमारे देश में एक तरफ तो स्त्री को माँ, बहन, बेटी, बहु, बेटी और देवी का स्थान दिया गया है जो की हमारे वेद-पुराणों और शास्त्रों में निहित है  और दूसरी तरफ राम चरित्र मानस में  हमारे महान रचयिता तुलसीदास जी ने लिख दिया है की:
“ढोल गवांर शुद्र पशु नारी, ये सब प्रताड़ना के अधिकारी.”
क्या मतलब है इस पंक्ति का...? शायद धर्माधिकारी इस बात को किसी अन्य पहलु से लें… लेकिन इन्होने भी यहाँ पर स्त्री को ही प्रताड़ना का अधिकारी बताया है… क्यूँ …? तुलसीदास जी इतने नाराज क्यूँ है स्त्रियों पर? ये शायद पूरी तरह से भूल गए थे की इनको इस लायक बनाने का श्रेय स्त्री, इनकी पत्नी रत्ना को ही जाता है… तुलसीदास जी ने न तो बढ़ी हुई नदी की चिंता की और न ही घनघोर अँधेरी रात की…. कामातुरता तो इतनी थी की इन्हें रस्सी और सांप में भी कोई फर्क नहीं दिखा… पत्नी (स्त्री) ने ही समझाया की अगर इतनी मोहब्बत और लगन तुम भगवान से करते तो सर्वस्व पा जाते, जितनी तुम मुझसे मोहब्बत करते हो… तुलसीदास लौट पड़े चोट खाकर… शायद उसी चोट का बदला ले रहे हैं... जिसने उन्हें स्वर्ग का रास्ता बताया, जिसने उन्हें दुनिया भर में अपनी पहचान का रास्ता दिखाया. उसी को इन साहब ने प्रताड़ना के लायक और नरक का द्वार बता डाला… स्त्री की गिनती ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, में कर रहे हैं, और साथ ही साथ यह भी कह रहे हैं की उसको पीटो…यह सब पीटने के ही लायक हैं.
हमारे देश में हर लड़की को एक ही बात बोली जाती है की बेटी सीता बनकर रहना,मै जानना चाहता हूँ की आखिर सीता बनकर ही क्यूँ? शायद उनके पति (राम) और समाज उन पर शक कर सके? क्या अग्नि परीक्षा के बाद भी इन्हें ही घर के बाहर निकाला जा सके?  क्या वन-वास के लिए ही इन्हें सृष्टि ने रचा है? क्या अग्नि परीक्षा और विरह की पीड़ा हमेशा लड़कियों (स्त्रियों) को ही झेलनी होगी...? क्या वनवास भोगने के बाद भी सीता को ही घर और राज का त्याग करना होगा…? क्या हमेशा उर्मिला को ही लक्षमण की विरहवेदना को स्वीकारना होगा? इन सारी बातों पर क्या सोचने की जरुरत नहीं है? क्या स्त्रियाँ शक नहीं कर सकती? क्या अपने को प्रमाणित करने के लिए पुरुषों को अग्नि परीक्षा नहीं देनी चाहिए? क्या त्याग करना सिर्फ स्त्रियो के ही पक्ष में है? शायद एक बात, “पति परमेश्वर होता है.” का जो सगुफा सदियों से इन्हें सिखाया जाता है वो इस बात की आज्ञा नहीं देता है स्त्रियों को.
क्या अजीब बिडम्बना है हमारे समाज की हमे स्त्रियों, को कभी अपने से आगे समझा ही नहीं है.... हमारी धारणा है की स्त्री पुरुष की संपत्ति है…! शादी से पहले माँ-बाप की और शादी में कन्या दान के बाद पति की… कन्या दान..! जैसे की स्त्री कोई वस्तु है जो दान कर दी जाये…
संपूर्ण विश्व में जब महिला दिवस का आयोजन स्त्री उत्थान के लिए गत 8 मार्च को किया जाता है, तो इस दिवस को मानाने की ललक और लोगों का रुझान देखने को मिलता है. यहाँ तक की अफगानिस्तान, इरान, इराक और पकिस्तान जैसे देशों में भी महिला दिवस का आयोजन देखने को मिलता है… बीते कुछ वर्षों में महिलायें भी अपने हक को लेकर जागरूक हुई हैं…
इसका प्रमाण हमे अफगानिस्तान में हुए मुस्लिम महिलाओं के साथ बर्बरता में देखने को मिला भी, महिलाएं भले ही नकाब/ बुर्के में सही... पर विरोध के लिए आयीं और यह नज़ारा लोगों ने भी देखा… भारत में पिछले कुछ वर्षों में यहाँ की सरकार या यूँ कहें विश्व के समस्त देशों ने महिला आरक्षण की बात पर भरपूर जोर दिया गया है… और इस के लिए देशों की समाज सेवी संस्थानों ने भी साथ में आवाज बुलंद की है... “की महिलाओं को आरक्षण मिलना ही चाहिए…” आप खुद ही सोचिये की यह कहाँ तक सही है …? मै ये जानना चाहता हूँ की आरक्षण किसको मिलता है…?
जहाँ तक मैंने जाना है की आरक्षण उनको मिलता है जो की समाज के सताए हुए हैं… जो की हमेशा से शोषित होते रहे हैं…. जब महिलाओं के लिए ये बोला गया है की महिलाएं पुरुषों के कंधे से कन्धा मिलकर चल रही हैं, और चलती रहेंगी… तो फिर किस बात के शोषित और किस बात के सताए हुए …? बात गलत है; लोग यहाँ पर ये बोलने से पीछे नहीं हटेंगे की“ महिलाओं के साथ अत्याचार तो होते रहे हैं… उनको आरक्षण मिलना ही चाहिए…” तो फिर हमारा समाज किस बात के लिए उनको अभी तक इतनी बड़ी-बड़ी उपमाओं से इंगित करता रहा है…? विशेष अधिकार सिर्फ कमजोरों को दिए जाते हैं, ताकतवरों को विशेष अधिकार की जरुरत नहीं होती है. क्यूंकि हम उनके शरीर के हिस्से से आज इस लायक बने हैं… और यह कडुवा सच है की वह हमसे ज्यादा ताकतवर हैं...
अगर हमारा समाज स्त्रियों को आरक्षण देता भी है तो मेरा ये सोचना है की “क्या आज के इस दौर में सिर्फ आरक्षण से काम चल जायेगा? क्या जब तक हमारी सोच नहीं बदलती तब तक हम इस बात को मान पाएंगे की महिलाएं हमसे ऊपर हैं, क्या हमारा मनोविज्ञान इस बात को स्वीकार कर पायेगा की पुरुष स्त्रिओं से पीछे रहें…”
अगर हम इन बातों को आत्मसात कर सकते हैं तो मुझे नहीं लगता है की आरक्षण होना चाहिए. आरक्षण से क्या हम उस प्रतिमा, उस श्रद्धा का अपमान नहीं कर रहे हैं जो कि महिलाओं को पूजनीय बनाता है…? जहाँ तक मेरा मानना है की जिस देश, प्रान्त और घर की स्त्री गर्व से नहीं रह सकती उस के आस-पास रहने वाले लोग भी गौरवान्वित नहीं हो सकते… क्यूंकि हर गौरवान्वित पुरुष का जन्म एक स्त्री से ही होता है… अब ये हमे सोचना है की हम जिसके लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं ये उसके लिए क्या ये आरक्षण शब्द सही है? क्या जिसने हमे जन्म दिया है वो इतनी दीन-हीन है की हम उसे आरक्षित करें… ये तो हमारे लिए बहुत बुरी और शर्म की बात है.
हम पुरुषों के पास एक क्षमता है विचार की, तर्क की और वैज्ञानिक पहलु से सोचने की, स्त्री के पास क्षमता है प्रेम की, ह्रदय की, भावना की… अतः यह कहना मुश्किल है की इनमे किसको श्रेष्ठ कहें ... पुरुष यही समझता है की वह श्रेष्ठ है और स्त्री की दीनता उसने स्वीकार कर ली है, जो कि समझ में आता है. पर स्त्रियों ने भी स्वीकार कर ली…? वे भी मन ही मन में इस बात को मानने के लिए राजी हो गयी हैं की कहीं न कहीं वे पुरुष से कुछ कम हैं...
आज अगर महिलाओं को अपने आपको प्रमाणित करना है तो उन्हें सवाल उठने ही होंगे, समाज के विरुद्ध विद्रोह करना ही होगा… साथ ही साथ ये भूलना होगा की यह हमारी बेटी है, इसे हमने जन्म दिया है, और जो दूसरे घर से आ रही है वो मेरी अपनी नहीं है…ये भेदभाव मिटाना होगा... जब तक स्त्रियों के बीच का ये भेदभाव नहीं मिटता, जब तक स्त्री-स्त्री की दुश्मन बनी रहेगी तब तक न तो ये धर्मग्रन्थ इनके हक को दिला पाएंगे, न ही आरक्षण किसी काम आयेंगा और न ही विश्व भर में चलाया जा रहा महिला  दिवस का ये कार्यक्रम किसी हद तक कारगर सिद्ध होगा… आज के इस दौर में स्त्री को यह घोषणा करनी ही होगी की हमारी पृष्ठ भूमि अलग है, हमारे पास जीवन का और बड़ा उद्देश्य है, और बड़ा संदेश है… हममे ही जीवन को आनंदित करने की क्षमता है…
नारी मुक्ति के सम्बन्ध में विश्व भर में जाग्रति की लहर अपने आप में शुभ सन्देश तो है, जिसका स्वागत है परन्तु ये पर्याप्त नहीं है.



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Atul Kumar
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सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

प्रेम vs अहंकार



         प्रेम वैसे तो अपनी अलग ही पहचान रखता है, लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के चलते हम भी इसे एक पर्व के रूप में मनाने लगे हैं. जिसका प्रमाण फरवरी माह में हमे देखने को मिला है.... फरवरी माह अब मुझे ऐसा लगता है की आने वाले कुछ सालों में प्रेम माह के नाम से न जाना जाने लगे.... प्रेम एक ऐसा शब्द जिसकी जिसकी न तो कोई परिभाषा है, न कोई सिद्धांत और न ही प्रेम को किसी शास्त्र में पिरोया गया है… कबीर जी ने शायद ठीक ही कहा है:
“पोथी पढ़ -पढ़  जग मुआ, पंडित भया न कोय.
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.”

आइये प्रेम के कुछ पहलुओं से रूबरू होने की कोशिश करते हैं शायद आज-कल का जो प्रेम है वह कुछ मायनों में सही रस्ते पर आ सके:
  1. बस प्रेम एक अनुभव है, प्रेम एक रस है जो हमेशा दूसरों को तृप्त करने पर विश्वास रखता है वहीँ दूसरी तरफ अहंकार एक खालीपन है जो कभी भी पूर्ण नहीं हो पाता.
  2. अहंकार हमेशा अपने से बड़ों को प्रेम करने की कोशिश करता है, अपने से बड़ों से ही सम्बन्ध जोड़ता है . प्रेम के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, जो आ जाये उसी से सम्बन्ध जोड़ लेता है… ऐसा होता है प्रेम.
  3. प्रेम हमेशा झुकने को राजी है, अहंकार कभी भी झुकने को राजी नहीं है . अहंकार के पास जायेंगे तो उसके हाथ और ऊपर उठ जाते हैं, ताकि हम उसे छू न पायें. क्यूंकि जिसे छू लिया जाये वह छोटा है, कुछ  इस तरह से परिभाषित करता है अहंकार अपने आपको.
  4. प्रेम जब कुछ दे पाता है तो उसे ख़ुशी मिलती है, वह खुश होता है लेकिन अहंकार जब भी कुछ ले पाता है, तभी खुश होता है… प्रेम जिसके  पास होता है वह अपने आपमें सम्राट होता है जबकि अहंकार दिन-प्रतिदिन दिन और दरिद्र हो जाता है… कुछ ऐसा अंतर होता है इन दोनों में.
  5. प्रेम जब भी किसी दूसरों के लिए छाया बनता है तो वह आनंदित होता है…. परन्तु अहंकार जब किसी से उसकी छाया को छीन लेता है तभी उसे आनंद आता है… ये नजरिया होता है प्रेम का.
  6. प्रेम निरंतर प्रतीक्षा करता है, प्रेम एक प्रतीक्षा है जबकि अहंकार महत्वकांक्षा..
  7. अहंकार एक प्रयोजन है, यदि प्रयोजन पूरा होता है तभी आना चाहता है नहीं तो नहीं… यद्यपि प्रेम निष्प्रयोजन है, प्रेम अपने में ही प्रयोजन है… उसे कोई लालसा नहीं होती.
  8. प्रेम कुछ रोकना नहीं चाहता, जो रोक ले वह प्रेम नहीं… अहंकार रोकता है. प्रेम तो बेशर्त देता है.
  9. अहंकार रुपया मांगता है, क्यूँकि रुपया शक्ति है. अहंकार शक्ति मांगता है. अहंकार पाकर भी आनंदित नहीं होता. प्रेम अपने आपको मिटा कर भी, टूटकर भी खुश होता है…
             प्रेम एक तड़प है, निराभार है जबकि अहंकार उसे पागलपन और बचकानी बातें समझता है... अंतत प्रेम दूसरों पर मिटने का नाम  है जबकि अहंकार दूसरों को मिटने का काम है, अहंकार सिर्फ लेना जानता है और प्रेम देने की भाषा है. प्रेम बटने पर आनंदित होता है, अहंकार पाकर भी खुश नहीं हो पाता. प्रेम जीवन के अंतिम क्षणों में भी नहीं भूलता, अहंकार कुछ पल भी याद नहीं रख पाता… शायद ऐसा है प्रेम और अहंकार…
             क्या हमने पूरे माह इसी प्रेम का उत्सव मनाया है? क्या हमारे प्रेम का यही मानक है...? अगर नहीं तो इतना दिखावा किस बात का...?


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Atul Kumar
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शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011

एक मुलाकात भारतीय शरणार्थियों से.......

                   जिन्दगी भी कैसे-कैसे इम्तिहान लेती है, शायद पंजाब से आये हुए शरणार्थियों को नहीं मालूम था. अगर कोई ऐसा इन्सान होता १९८३-८४ के समय पर जो की भविष्य बता पाता तो शायद २७-२८ साल पहले अपने प्रदेश और जिले को लोग छोड़ कर ये लोग दिल्ली न आते..... और न ही अपनी जिंदगी को बचाने के लिए भविष्य को गर्त में डालते...... लेकिन कौन जनता था की अपने ही देश के किसी दूसरे कोने में अपने आपको और परिवार को सुरक्षित रखने की इतनी बड़ी सजा मिल सकती है जहाँ न तो वर्तमान सुरक्षित होगा और न ही भविष्य की कोई किरण दिख रही होगी.
               जी हाँ मै बात कर रहा हूँ पीरागाढ़ी शरणार्थी कैम्प में रह रहे लोगो की, जिन्होंने १९८३-८४ के दंगों के दौरान पंजाब प्रान्त को छोड़ा था...... लालच यह थी की अभी यहाँ से बहार निकल जाते हैं तो शायद हमारा जीवन सुरक्षित हो जायेगा और जब हालत सुधर जायेंगे तो हम वापस अपने-अपने घरों को लौट आयेंगे...... लेकिन तब से आज तक पंजाब और देश के हालत तो सुधर गए लेकिन इनकी सुध किसी ने लेने की जहमत न उठानी चाही..... और ये शरणार्थी आज भी दिल्ली के पीरागाढ़ी शरणार्थी कैम्प में रह रहे हैं.... इन्हें न तो दिल्ली सरकार ने हालत के सुधरने के बाद पंजाब भेजने का प्रयत्न किया और न ही पंजाब प्रान्त की सरकार को अपने लोगों की याद आयी....
                १८/१२/२०११ को दिल्ली के पीरागाढ़ी कैम्प में जाने का मौका मिला तो आज के आधुनिक भारत और भारत सरकार का यह चेहरा जान पाया....... इस कैम्प में लगभग ३५०० शरणार्थी परिवार जो की पंजाब से आये थे रह रहे हैं..... पहले इन्हें रहने के लिए ५ सेक्टर सरकार ने बनवाए थे और इनकी उचित सुविधाओं का ख्याल भी रखा जाता था जैसे-जैसे राजनीति बदली सरकार बदली और सरकार की नियत भी बदल गयी..... सरकार ने धीरे-धीरे इनकी सुविधाओं को बंद करना शुरू किया और आज हालत यह हैं की जहाँ पर ३५०० परिवार ५ ब्लाक में रह रहे थे अब उन्हें ३ ब्लाक में रहने की जगह दी गयी है.... ब्लाक A और B को बड़े-बड़े व्यवसाइयों की मिली भगत के चलते दिल्ली सरकार ने वहां पर शापिंग माल और पार्क बनाने का प्रोजेक्ट तैयार कर डाला है.... दिल्ली सरकार के इस रवैये पर न तो वहां का क्षेत्रीय विधायक कुछ बोलने को तैयार है और न ही विपक्ष की तरफ से इन्हें कोई संतावना मिल रही है.
               जब दिल्ली सरकार इनके निवास की व्यवस्था नहीं कर पा रही है तो इनके लिए रोजगार कहाँ से लाएगी? इन सालों के दौरान इन शरणार्थियों ने स्वरोजगार के माध्यम से अपनी जीविका चलायी है.... कुछ ने सिलाई, सब्जी बेचना, लोगो के यहाँ पर काम करना इत्यादि...... २७-२८ सालों के दौरान किसी भी शरणार्थी को न तो कोई सरकारी नौकरी मिली है और न ही सरकारी नौकरी का किसी भी तरह का आश्वासन..... इनके रहने की अगर बात करें तो नालियां पानी से बहरी हुई बजबजाती रहती हैं जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है, १ फेस की लाइन पर पूरे कैम्प को बिजली मुहैय्या कराई जाती है..... इस कैम्प में नेताओं का आगमन चुनाव के समय ही होता है.... उस समय इनसे नेताओं की अपनी परम्परा के अनुसार बड़े बड़े वादे करने की रस्म को पूरा किया जाता है और चुनाव के बाद वही होता है जो की पूरे देश के साथ किया जाता है.....
               यहाँ के लोगो से बात करने पर उन्होंने बताया की हम अब वापस भी नहीं जा सकते... पंजाब की सरकार को कई बार पत्राचार करने पर भी उनका कोई जवाब नहीं आया और अब तो सब कुछ बदल भी गया होगा..... २७-२८ साल पहले वहां से यहाँ आये और फिर सब कुछ यहाँ से वहां ले जाना बहुत कठिन काम है.... और इतना भी कठिन नहीं है यदि सरकार हमे वहां पर वापस हमे भेज दे और हमारी जमीनों को हमे वापस कर दे या फिर उसके बदले हमे मुनासिब मुआवजा देदे..... अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो हमे कम से कम जो हमारी जरुरी आवश्कताएं हैं तो हमे प्रदान करे..... लेकिन सरकार यह भी करने को तैयार नहीं...... अगर हमे मालूम होता की सकरार हम लोगो के प्रति इतनी उदासीन हो जाएगी तो हम कभी भी पंजाब को छोड़ कर नहीं आते.... भले ही हम मरते या फिर मार दिए जाते..... कम से कम हालत के काबू होने के बाद भविष्य की कुछ तो संभावना रहती . आज हमने अपनी जिन्दगियाँ तो बचा ली हैं पर भविष्य पूर्ण-रूपेण अंधकारमय हो गया है.....  हमारी तो हालत ठीक वैसे ही हो गयी है जैसे की धोबी का कुत्ता....... न हम घर के रहे और न हीं घाट के.......
               जब हम भारतवासी होकर भारत में अधिकार पाने के पात्र नहीं हैं तब भारतीय सरकार विदेशी सरकारों को क्यूँ कोसती हैं? जब हम अपने लोगों की सुरक्षा और उनके जीवन-जीविका को सुरक्षित नहीं कर सकते हैं तो हम किस हक़ से विदेशी सरकार के ऊपर लांछन लगते हैं की वहां पर भारतीय सुरक्षित नहीं हैं..... ऐसे में क्या होगा लोकतंत्र का और क्या होगा भारत की जनता का......??????? यही सवाल लेकर मै वहां से निकल आया..... जवाब पाने का कोई रास्ता नहीं है और न ही जो इसका जवाब दे सकते हैं वो देना चाहते हैं......

Atul Kumar
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शनिवार, दिसंबर 03, 2011

कब तक उनके बेजांदिलों में अपनों के लिए हमदर्दी खोजते रहेंगे?


१९४७ भारत की आज़ादी के साथ-साथ भारत के दो टुकड़े.... जो की एक सियासी सोच का हिस्सा था.. एक को नाम दिया गया भारत और दूसरे को पाकिस्ता... भारत जिसका स्वरुप तैयार किया गया था सर्व धर्म सम्मान के हिसाब से, और दूसरे भाग जिसे  पाकिस्ता कहते हैं... को पूर्ण रूपेण मुस्लिम संप्रदाय के लोगों के लिए. स्वेच्छा से जो चाहे जहाँ चाहे रहने की बात को ध्यान में रखते हुए... लेकिन हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते कुछ सियासी लोगों ने अपनी सियासत के झंडे बुलंद करने के लिए स्वेच्छा की बात को दरकिनार करते हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे करा डाले... जिससे हिन्दू बहुतायत में भारत आ गए और मुस्लिम  पाकिस्ता की ओर पलायन कर गए... भारत में तो मुस्लिमों को भारतीय सरकार ने सारी सहूलियतें देते हुए अल्पसंख्यक के रूप आरक्षण भी दे दिया.... लेकिन पाकिस्ता में शायद ऐसा कुछ भी करने की जरुरत नहीं समझी पाकिस्तानी सरकार ने... जिसका खामियाजा आज तक लगभग 64 सालों बाद तक पाकिस्तानी हिन्दू भुगत रहे हैं.... 1972 में  पाकिस्ता के बटवारे के बाद जब पूर्वी  पाकिस्ता का निर्माण हुआ जिसे बंगला देश का नाम दिया गया... बंगला देश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है... जैसे-जैसे समय बीता और लोगों को सियासत की चाल समझ में आयी उन्होंने अपने धर्म से सम्बंधित देशों की ओर रुख करना शुरू कर दिया... १९४७ से आज तक (2010) लगभग २ लाख से ज्यादा शरणार्थियों ने भारत में आ कर पनाह ली है.... और भारत सरकार ने भी उन्हें भारतीय संविधान के अनुरूप यहाँ का नागरिक बना दिया... जिनमे पाकिस्तानी, नेपाली, तिबत्ती, और बंगलादेशी आदि हैं.... जो की भारत की संस्कृति और विशाल ह्रदय का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है..... लेकिन एक बड़ी बिडम्बना यह रही की हमने नेपाल, तिब्बत से आये लोगों को शरणार्थी का नाम दिया तो अपने ही देश के दूसरे टुकड़े से आये लोगों को घुसपैठ की संज्ञा से नवाजा....... यह कहाँ तक जायज है?
हाल ही में पाकिस्तान से आये कुछ हिन्दू परिवारों से मेरी मुलाकत दिल्ली के पास मजनू के टीले के पास हुई.... जो देवरा बाबा के आश्रम पर रह रहे हैं...... उनसे बात करने पर पता चल की उनका वीजा ख़त्म हो गया है..... और भारतीय सरकार से हिन्दू होने की वजह से यहाँ की नागरिकता पाने की बात कर रहे हैं..... करण जो दुनिया के तानाशाह नहीं जानना चाहते..... आज़ादी के ६४ सालों के बाद भी आज पाकिस्तान में हिन्दू परिवार बधुआ मजदूरी को मजबूर है.... पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के मुसलामानों ने आज भी वहाँ पर अपने घरों में जेल बना रखी है, जहाँ पर हिन्दुओं को रखा जाता है....  वे लोग इनसे दिन भर काम करवाते हैं और फिर शाम को इन्हें वँही उनके घर में बनी जेल में डाल दिया जाता है..... शादीशुदा औरतों को वहाँ पर सिंदूर लगाने की अनुमति वहाँ के मुसलमानों ने नहीं दी है.... घर से वे लोग हिन्दू लड़कियों को जबरदस्ती उठा ले जाते है और उनके साथ कुकृत्य करके उन्हें मुसलमान बनने पर मजबूर करते हैं इन्ही कारणों से पाकिस्तान के हिन्दू परिवार वाले अपनी बेटियों की शादी १२-१३ साल की उम्र में करने को मजबूर हैं.... और वे आपस के ही लोगों में शादी कर डालते हैं..... जो लोग स्वेच्छा से उनकी बात  मान लेते हैं उन्हें कुछ सुविधाए भी दी जाती हैं....  उन्होंने बताया की पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में अगर किसी हिन्दू के ज्यादा पैसा है तो वो लोग लूट पाट करके हिदुओं के पैसे ले लेते हैं अगर उनका बिजनेस अच्छा चाल रहा होता है तो उस पर जबरदस्ती कब्ज़ा भी कर लेते हैं....... और वहाँ का पुलिस प्रशासन भी उनकी एक नहीं सुनता....
हमारे यहाँ अगर किसी घर के घर कोई मौत होती है तो लोग दुखी होते हैं.... चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान.... किसी को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार अंतिम क्रिया कर्म करने में कोई मनाही नहीं है.... लेकिन  पाकिस्तान में अगर कोई हिन्दू मरता है तो उससे हिन्दू संस्कृति के अनुसार जलाने नहीं दिया जाता, और लाश को दफ़नाने के लिए उस पर हमेशा दबाव बनाया जाता है..... शायद इन्ही वजह से आये हुए शरणार्थियों में किसी का बेटा यहाँ पर मर गया तो वो लोग बहुत खुश हुए और बोले हम कम से कम भारत में अपने बेटे को अपनी संस्कृति के अनुसार क्रिया-कर्म कर सकेंगे.....
पाकिस्तान में हिन्दू परिवारों पर हो रहे अत्याचार शायद किसी को दिखाई नहीं दे रहे हैं.... और न ही भारत सरकार, पाकिस्तानी सरकार से कोई बात करना चाहती है... इन हिन्दू परिवार को लेकर...
एक लोकतान्त्रिक और धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होने नाते इन आये हुए हिन्दू परिवार को भारत में जगह तो मिलनी चाहिए.... लेकिन भारत भी कब तक लोगों को भारतीय नागरिकता बांटता रहेगा? कब तक पडोसी देश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को देख कर नजरंदाज करता रहेगा? कब तक हम  पाकिस्तान से आये मुसलमानों को पनाह देते रहेंगे और उनके बेजांदिलों में अपनों के लिए हमदर्दी खोजते रहेंगे? कब तक किसी धार्मिक देश में अन्य धर्म के लोगों के खिलाफ अत्याचार होते रहेंगे? आज ६४ सालो बाद भी हम अपने ही कटे हुए हिस्से के लोगों को न्याय नहीं दिला पा रहे हैं और बात कर रहे हैं विश्व शांति की..... क्या ऐसे लोगों को जीने का कोई हक नहीं है जो किसी दूसरे धार्मिक देश में रह रहे हैं? 
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Atul Kumar
Mob. +91-9454071501, 9554468502

मंगलवार, नवंबर 15, 2011

जिन्दगी की रहगुजर


               जिन्दगी की रहगुजर में जो लम्हें बीत जाते जाते हैं, वो हमेशा हमे याद बनकर सताते हैं.... और जब उन लम्हों की कहानी हमे दूसरों की जुबानी सुनने को मिलती है तो वे पल सिर्फ और सिर्फ दिल पर दस्तक देते हैं और देते हैं बीते हुए  पलों के जरिये कुछ दर्द.... शायद कुछ ऐसा ही है इन लाइनों में.... जिन्हें बीती हुई जिन्दगी का एक अनमोल हिस्सा अगर नहीं कहते हैं तो उन लम्हों की तौहीन होगी.... उनको इन पंक्तियों में समेटने की एक कोशिश.....

जिन्दगी के सफ़र के गुजरे हुए लम्हे,
हमे हर पल सताते हैं......
अब जिन्दगी मेरी थम सी गयी है,
हमे हर पल बताते हैं......
अब गुजरे हुए लम्हों की कसक,
हमे हर पल दुखते हैं....
मेरी जिन्दगी से जुड़े अब वो तमाम किस्से,
हमे अब लोग सुनते हैं.....
जिन्दगी के सफ़र के गुजरे हुए लम्हे,
हमे हर पल सताते हैं......
अब जिन्दगी मेरी थम सी गयी है,
हमे हर पल बताते हैं......


एक याद है 16 /12 /2003 की....
अतुल कुमार
09454071501, 09554468502 

रविवार, नवंबर 13, 2011

यादों का एक सफ़र....

               यादें जिंदगी के सफ़र का वो खुशनुमा मोड़ होती हैं, जो हमें  बताती हैं कि हम कल क्या थे, आज क्या हैं. यादों के इस सफ़र में ढेरों खुशियाँ होती हैं तो ढेरों गम भी...... लेकिन फिर भी यादें होती बहुत प्यारी हैं . इन्ही यादों का एक मंजर, एक वाकया जो एक सफ़र के दौरान हुआ वो मैं बताने/लिखने कि कोशिश कर रहा हूँ....
               ये खुबसूरत वाकया है पहली बार पैसेंजर ट्रेन से ०८/०४/२००७ को "बाराबंकी से राम जन्म भूमि यानी अयोध्या तक कि दूरी जो लगभग 107 किलोमीटर की है" के सफ़र का... इस सफ़र के दौरान मिलन हुआ ज़मीन से अपने आपको ऊपर उठाते हुए,  प्रकृति को एक नये रंग देने और उसके पोषण के लिए अपनी दैनिक दिनचर्या के लिए और अपने कर्तव्यों को अंजाम देने के लिए तैयार सूरज से...... जिससे मुलाकात तो प्रत्येक दिन होती थी लेकिन आज इसके साथ सफ़र करते हुए एक न्य एहसास और सुखद अनुभूति कि प्राप्ति हो रही थी...
               इन एहसासों में अनेकों सवाल हैं तो उन सवालों के बदले उनसे कहीं ज्यादा ऐसे जवाब जिनके प्रति सवाल करना एक बेवकूफी सी लगती है.... प्रकृति के इस नए रूप से आज पहली बार रूबरू होने का मौका मिला. इसको देखने के पश्चात् जो एहसास हुए उन्हें बयाँ कर पाना मेरे लिए मुश्किल ही नहीं वरन नामुमकिन सा लग रहा था... फिर भी मैंने ब्याने सफ़र कि एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ.....
               इस सफ़र के दौरान हमने अपनी सरज़मी को सोने की चादर से लिपटा हुआ पाया... जिसे सूरज की रौशनी ने और भी ज्यादा चमकीला कर रखा है, कंही पेड़ों की कतारें साथ में दौड़ लगा रही थीं... तो कहीं पेड़ों के झुण्ड एक साथ होकर हमे पकड़ने की कोशिश कर रहे थे.... लेकिन गाड़ी की रफ़्तार के आगे इनकी दौड़ बहुत धीमी सी महसूस हो रही थी.... कहीं उसर ज़मीन अपने आपको कोसती और अपने सीने में ग़मों का सागर छिपाए हुए हमसे रूबरू हो रही थी तो कहीं तो कहीं लहलहाते खेत ये बयाँ कर रहे थे कि, ये ज़मीन दुखी नहीं है और न उसर रूपी कलंक ने इसे कलंकित कर रखा है.....
               आपके जहन में एक बात बार-बार कौंध रही होगी कि ये सफ़र कर रहा है या फिर किसी खेत-खलिहान के बीच दौड़ लगाकर कोई कहानी करने कि कोशिश कर रहा है, इसके सफ़र में इंसानों का कोई जिक्र ही नहीं है..... मेरा अपना ये सोचना है कि आज के दौर में इंसान है ही नहीं. देखने में हमे जो इन्सान कि शक्ल लिए दिखाई देते हैं दरअसल ये बन चुके हैं काम करने कि एक मशीन, अपना मतलब सीधा करने कि एक मशीन, राजनीति का एक अध्याय और इंसानियत को शर्मसार करने वाले हैवान.....
               आप ये सोच कर परेशां बिलकुल न हों कि दूसरों पर ऊँगली उठाने वाले और इतने बड़े-बड़े लांछन लगाने वाले इन्सान का गिरेबां कितना साफ़ है? मेरा जवाब जवाब बड़ा सीधा सा है बिलकुल भी नहीं.... क्योंकि जब हम अपनी जिंदगी को अच्छे तरीके से नहीं जी पा रहे हैं, अपने मतलब को दूसरों कि सहायता के लिए नहीं छोड़ प् रहे हैं, जब हम किसी जरुरत मंद कि मदद नहीं कर सकते हैं और जब हम इंसानियत के किसी काम को उसके अंजाम तक नहीं पहुंचा सकते तो हम इंसान कहाँ से रह गए? खैर छोड़ते हैं इस इंसान और इंसानियत को वापस आते हैं अपने सफ़र-ऐ--राम जन्म भूमि पर मै अपने गंतव्य तक पहुँच चूका हूँ..... ये सिर्फ एक सफ़र औए सफ़र के दौरान मुझे जो महसूस हुआ उनको आप तक पहुँचाने कि कोशिश की है........

अतुल कुमार
०९४५४०७१५०१, ०९५५४४६८५०२  

शनिवार, सितंबर 24, 2011

"रश्मियाँ ज्योतम हरे........."

कौन जगता इस धरा पर, कौन सपनों को सजोंता.
कौन पुष्पित पल्लवित हो, दुखों में भी मुस्कुराता......

कौन अपनी वेदना को, गीत सा है गुनगुनाता.
कौन अपनों को समर्पण, वेदिका पर है चढ़ता.......

कौन प्रिय के आंसुओं में, नेह की मुस्कान लाता.
कौन झीने से ह्रदय में, उतर कर फिर डूब जाता.....

कौन जीवन को समर्पित, कर परम संतोष पाता.
कौन अपने स्वार्थ की बलि, दे सभी अनुतोष पाता...

कौन मन को छू सका है, कौन तन को दूर पाता.
कौन अपनी सुरभि से ही, दूर से प्रिय को लुभाता.....

कौन मन नीरद सलिल से, ह्रदय मंजुल सींच जाता.
कौन अपने मधुर स्वर से, ह्रदय वीणा को बजाता.....

कौन अपनी रश्मियों से, इंदु को भी जगमगाता.
कौन अपनी धवलता से, मन कलुष सबको मिलाता.....

कौन दुःख में साथ रहता, कौन है धीरज बढाता.
कौन प्रिय की ज्योत्स्ना को, और भी उजला बनाता.....

कौन प्रिय सुख हित सदा, उन्मुक्त हो सब कुछ लुटाता.
कौन सपने चूर कर के भी, उसे सुख मय बनाता.....

कौन अपनी रागनी से, सदा ही मधुमय राग गाता.
कौन जग में दूर रह कर, भी ह्रदय के पास आता......

सदमित्र के अतिरिक्त ऐसा, कौन इस जग में करे.
दुःख ले सुख दे कर सारा, रश्मियाँ ज्योतम हरे.........


द्वारा किरण तिवारी
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