शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011

एक मुलाकात भारतीय शरणार्थियों से.......

                   जिन्दगी भी कैसे-कैसे इम्तिहान लेती है, शायद पंजाब से आये हुए शरणार्थियों को नहीं मालूम था. अगर कोई ऐसा इन्सान होता १९८३-८४ के समय पर जो की भविष्य बता पाता तो शायद २७-२८ साल पहले अपने प्रदेश और जिले को लोग छोड़ कर ये लोग दिल्ली न आते..... और न ही अपनी जिंदगी को बचाने के लिए भविष्य को गर्त में डालते...... लेकिन कौन जनता था की अपने ही देश के किसी दूसरे कोने में अपने आपको और परिवार को सुरक्षित रखने की इतनी बड़ी सजा मिल सकती है जहाँ न तो वर्तमान सुरक्षित होगा और न ही भविष्य की कोई किरण दिख रही होगी.
               जी हाँ मै बात कर रहा हूँ पीरागाढ़ी शरणार्थी कैम्प में रह रहे लोगो की, जिन्होंने १९८३-८४ के दंगों के दौरान पंजाब प्रान्त को छोड़ा था...... लालच यह थी की अभी यहाँ से बहार निकल जाते हैं तो शायद हमारा जीवन सुरक्षित हो जायेगा और जब हालत सुधर जायेंगे तो हम वापस अपने-अपने घरों को लौट आयेंगे...... लेकिन तब से आज तक पंजाब और देश के हालत तो सुधर गए लेकिन इनकी सुध किसी ने लेने की जहमत न उठानी चाही..... और ये शरणार्थी आज भी दिल्ली के पीरागाढ़ी शरणार्थी कैम्प में रह रहे हैं.... इन्हें न तो दिल्ली सरकार ने हालत के सुधरने के बाद पंजाब भेजने का प्रयत्न किया और न ही पंजाब प्रान्त की सरकार को अपने लोगों की याद आयी....
                १८/१२/२०११ को दिल्ली के पीरागाढ़ी कैम्प में जाने का मौका मिला तो आज के आधुनिक भारत और भारत सरकार का यह चेहरा जान पाया....... इस कैम्प में लगभग ३५०० शरणार्थी परिवार जो की पंजाब से आये थे रह रहे हैं..... पहले इन्हें रहने के लिए ५ सेक्टर सरकार ने बनवाए थे और इनकी उचित सुविधाओं का ख्याल भी रखा जाता था जैसे-जैसे राजनीति बदली सरकार बदली और सरकार की नियत भी बदल गयी..... सरकार ने धीरे-धीरे इनकी सुविधाओं को बंद करना शुरू किया और आज हालत यह हैं की जहाँ पर ३५०० परिवार ५ ब्लाक में रह रहे थे अब उन्हें ३ ब्लाक में रहने की जगह दी गयी है.... ब्लाक A और B को बड़े-बड़े व्यवसाइयों की मिली भगत के चलते दिल्ली सरकार ने वहां पर शापिंग माल और पार्क बनाने का प्रोजेक्ट तैयार कर डाला है.... दिल्ली सरकार के इस रवैये पर न तो वहां का क्षेत्रीय विधायक कुछ बोलने को तैयार है और न ही विपक्ष की तरफ से इन्हें कोई संतावना मिल रही है.
               जब दिल्ली सरकार इनके निवास की व्यवस्था नहीं कर पा रही है तो इनके लिए रोजगार कहाँ से लाएगी? इन सालों के दौरान इन शरणार्थियों ने स्वरोजगार के माध्यम से अपनी जीविका चलायी है.... कुछ ने सिलाई, सब्जी बेचना, लोगो के यहाँ पर काम करना इत्यादि...... २७-२८ सालों के दौरान किसी भी शरणार्थी को न तो कोई सरकारी नौकरी मिली है और न ही सरकारी नौकरी का किसी भी तरह का आश्वासन..... इनके रहने की अगर बात करें तो नालियां पानी से बहरी हुई बजबजाती रहती हैं जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है, १ फेस की लाइन पर पूरे कैम्प को बिजली मुहैय्या कराई जाती है..... इस कैम्प में नेताओं का आगमन चुनाव के समय ही होता है.... उस समय इनसे नेताओं की अपनी परम्परा के अनुसार बड़े बड़े वादे करने की रस्म को पूरा किया जाता है और चुनाव के बाद वही होता है जो की पूरे देश के साथ किया जाता है.....
               यहाँ के लोगो से बात करने पर उन्होंने बताया की हम अब वापस भी नहीं जा सकते... पंजाब की सरकार को कई बार पत्राचार करने पर भी उनका कोई जवाब नहीं आया और अब तो सब कुछ बदल भी गया होगा..... २७-२८ साल पहले वहां से यहाँ आये और फिर सब कुछ यहाँ से वहां ले जाना बहुत कठिन काम है.... और इतना भी कठिन नहीं है यदि सरकार हमे वहां पर वापस हमे भेज दे और हमारी जमीनों को हमे वापस कर दे या फिर उसके बदले हमे मुनासिब मुआवजा देदे..... अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो हमे कम से कम जो हमारी जरुरी आवश्कताएं हैं तो हमे प्रदान करे..... लेकिन सरकार यह भी करने को तैयार नहीं...... अगर हमे मालूम होता की सकरार हम लोगो के प्रति इतनी उदासीन हो जाएगी तो हम कभी भी पंजाब को छोड़ कर नहीं आते.... भले ही हम मरते या फिर मार दिए जाते..... कम से कम हालत के काबू होने के बाद भविष्य की कुछ तो संभावना रहती . आज हमने अपनी जिन्दगियाँ तो बचा ली हैं पर भविष्य पूर्ण-रूपेण अंधकारमय हो गया है.....  हमारी तो हालत ठीक वैसे ही हो गयी है जैसे की धोबी का कुत्ता....... न हम घर के रहे और न हीं घाट के.......
               जब हम भारतवासी होकर भारत में अधिकार पाने के पात्र नहीं हैं तब भारतीय सरकार विदेशी सरकारों को क्यूँ कोसती हैं? जब हम अपने लोगों की सुरक्षा और उनके जीवन-जीविका को सुरक्षित नहीं कर सकते हैं तो हम किस हक़ से विदेशी सरकार के ऊपर लांछन लगते हैं की वहां पर भारतीय सुरक्षित नहीं हैं..... ऐसे में क्या होगा लोकतंत्र का और क्या होगा भारत की जनता का......??????? यही सवाल लेकर मै वहां से निकल आया..... जवाब पाने का कोई रास्ता नहीं है और न ही जो इसका जवाब दे सकते हैं वो देना चाहते हैं......

Atul Kumar
Mob. +91-9454071501, 9554468502
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शनिवार, दिसंबर 03, 2011

कब तक उनके बेजांदिलों में अपनों के लिए हमदर्दी खोजते रहेंगे?


१९४७ भारत की आज़ादी के साथ-साथ भारत के दो टुकड़े.... जो की एक सियासी सोच का हिस्सा था.. एक को नाम दिया गया भारत और दूसरे को पाकिस्ता... भारत जिसका स्वरुप तैयार किया गया था सर्व धर्म सम्मान के हिसाब से, और दूसरे भाग जिसे  पाकिस्ता कहते हैं... को पूर्ण रूपेण मुस्लिम संप्रदाय के लोगों के लिए. स्वेच्छा से जो चाहे जहाँ चाहे रहने की बात को ध्यान में रखते हुए... लेकिन हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते कुछ सियासी लोगों ने अपनी सियासत के झंडे बुलंद करने के लिए स्वेच्छा की बात को दरकिनार करते हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे करा डाले... जिससे हिन्दू बहुतायत में भारत आ गए और मुस्लिम  पाकिस्ता की ओर पलायन कर गए... भारत में तो मुस्लिमों को भारतीय सरकार ने सारी सहूलियतें देते हुए अल्पसंख्यक के रूप आरक्षण भी दे दिया.... लेकिन पाकिस्ता में शायद ऐसा कुछ भी करने की जरुरत नहीं समझी पाकिस्तानी सरकार ने... जिसका खामियाजा आज तक लगभग 64 सालों बाद तक पाकिस्तानी हिन्दू भुगत रहे हैं.... 1972 में  पाकिस्ता के बटवारे के बाद जब पूर्वी  पाकिस्ता का निर्माण हुआ जिसे बंगला देश का नाम दिया गया... बंगला देश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है... जैसे-जैसे समय बीता और लोगों को सियासत की चाल समझ में आयी उन्होंने अपने धर्म से सम्बंधित देशों की ओर रुख करना शुरू कर दिया... १९४७ से आज तक (2010) लगभग २ लाख से ज्यादा शरणार्थियों ने भारत में आ कर पनाह ली है.... और भारत सरकार ने भी उन्हें भारतीय संविधान के अनुरूप यहाँ का नागरिक बना दिया... जिनमे पाकिस्तानी, नेपाली, तिबत्ती, और बंगलादेशी आदि हैं.... जो की भारत की संस्कृति और विशाल ह्रदय का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है..... लेकिन एक बड़ी बिडम्बना यह रही की हमने नेपाल, तिब्बत से आये लोगों को शरणार्थी का नाम दिया तो अपने ही देश के दूसरे टुकड़े से आये लोगों को घुसपैठ की संज्ञा से नवाजा....... यह कहाँ तक जायज है?
हाल ही में पाकिस्तान से आये कुछ हिन्दू परिवारों से मेरी मुलाकत दिल्ली के पास मजनू के टीले के पास हुई.... जो देवरा बाबा के आश्रम पर रह रहे हैं...... उनसे बात करने पर पता चल की उनका वीजा ख़त्म हो गया है..... और भारतीय सरकार से हिन्दू होने की वजह से यहाँ की नागरिकता पाने की बात कर रहे हैं..... करण जो दुनिया के तानाशाह नहीं जानना चाहते..... आज़ादी के ६४ सालों के बाद भी आज पाकिस्तान में हिन्दू परिवार बधुआ मजदूरी को मजबूर है.... पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के मुसलामानों ने आज भी वहाँ पर अपने घरों में जेल बना रखी है, जहाँ पर हिन्दुओं को रखा जाता है....  वे लोग इनसे दिन भर काम करवाते हैं और फिर शाम को इन्हें वँही उनके घर में बनी जेल में डाल दिया जाता है..... शादीशुदा औरतों को वहाँ पर सिंदूर लगाने की अनुमति वहाँ के मुसलमानों ने नहीं दी है.... घर से वे लोग हिन्दू लड़कियों को जबरदस्ती उठा ले जाते है और उनके साथ कुकृत्य करके उन्हें मुसलमान बनने पर मजबूर करते हैं इन्ही कारणों से पाकिस्तान के हिन्दू परिवार वाले अपनी बेटियों की शादी १२-१३ साल की उम्र में करने को मजबूर हैं.... और वे आपस के ही लोगों में शादी कर डालते हैं..... जो लोग स्वेच्छा से उनकी बात  मान लेते हैं उन्हें कुछ सुविधाए भी दी जाती हैं....  उन्होंने बताया की पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में अगर किसी हिन्दू के ज्यादा पैसा है तो वो लोग लूट पाट करके हिदुओं के पैसे ले लेते हैं अगर उनका बिजनेस अच्छा चाल रहा होता है तो उस पर जबरदस्ती कब्ज़ा भी कर लेते हैं....... और वहाँ का पुलिस प्रशासन भी उनकी एक नहीं सुनता....
हमारे यहाँ अगर किसी घर के घर कोई मौत होती है तो लोग दुखी होते हैं.... चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान.... किसी को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार अंतिम क्रिया कर्म करने में कोई मनाही नहीं है.... लेकिन  पाकिस्तान में अगर कोई हिन्दू मरता है तो उससे हिन्दू संस्कृति के अनुसार जलाने नहीं दिया जाता, और लाश को दफ़नाने के लिए उस पर हमेशा दबाव बनाया जाता है..... शायद इन्ही वजह से आये हुए शरणार्थियों में किसी का बेटा यहाँ पर मर गया तो वो लोग बहुत खुश हुए और बोले हम कम से कम भारत में अपने बेटे को अपनी संस्कृति के अनुसार क्रिया-कर्म कर सकेंगे.....
पाकिस्तान में हिन्दू परिवारों पर हो रहे अत्याचार शायद किसी को दिखाई नहीं दे रहे हैं.... और न ही भारत सरकार, पाकिस्तानी सरकार से कोई बात करना चाहती है... इन हिन्दू परिवार को लेकर...
एक लोकतान्त्रिक और धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होने नाते इन आये हुए हिन्दू परिवार को भारत में जगह तो मिलनी चाहिए.... लेकिन भारत भी कब तक लोगों को भारतीय नागरिकता बांटता रहेगा? कब तक पडोसी देश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को देख कर नजरंदाज करता रहेगा? कब तक हम  पाकिस्तान से आये मुसलमानों को पनाह देते रहेंगे और उनके बेजांदिलों में अपनों के लिए हमदर्दी खोजते रहेंगे? कब तक किसी धार्मिक देश में अन्य धर्म के लोगों के खिलाफ अत्याचार होते रहेंगे? आज ६४ सालो बाद भी हम अपने ही कटे हुए हिस्से के लोगों को न्याय नहीं दिला पा रहे हैं और बात कर रहे हैं विश्व शांति की..... क्या ऐसे लोगों को जीने का कोई हक नहीं है जो किसी दूसरे धार्मिक देश में रह रहे हैं? 
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Atul Kumar
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मंगलवार, नवंबर 15, 2011

जिन्दगी की रहगुजर


               जिन्दगी की रहगुजर में जो लम्हें बीत जाते जाते हैं, वो हमेशा हमे याद बनकर सताते हैं.... और जब उन लम्हों की कहानी हमे दूसरों की जुबानी सुनने को मिलती है तो वे पल सिर्फ और सिर्फ दिल पर दस्तक देते हैं और देते हैं बीते हुए  पलों के जरिये कुछ दर्द.... शायद कुछ ऐसा ही है इन लाइनों में.... जिन्हें बीती हुई जिन्दगी का एक अनमोल हिस्सा अगर नहीं कहते हैं तो उन लम्हों की तौहीन होगी.... उनको इन पंक्तियों में समेटने की एक कोशिश.....

जिन्दगी के सफ़र के गुजरे हुए लम्हे,
हमे हर पल सताते हैं......
अब जिन्दगी मेरी थम सी गयी है,
हमे हर पल बताते हैं......
अब गुजरे हुए लम्हों की कसक,
हमे हर पल दुखते हैं....
मेरी जिन्दगी से जुड़े अब वो तमाम किस्से,
हमे अब लोग सुनते हैं.....
जिन्दगी के सफ़र के गुजरे हुए लम्हे,
हमे हर पल सताते हैं......
अब जिन्दगी मेरी थम सी गयी है,
हमे हर पल बताते हैं......


एक याद है 16 /12 /2003 की....
अतुल कुमार
09454071501, 09554468502 

रविवार, नवंबर 13, 2011

यादों का एक सफ़र....

               यादें जिंदगी के सफ़र का वो खुशनुमा मोड़ होती हैं, जो हमें  बताती हैं कि हम कल क्या थे, आज क्या हैं. यादों के इस सफ़र में ढेरों खुशियाँ होती हैं तो ढेरों गम भी...... लेकिन फिर भी यादें होती बहुत प्यारी हैं . इन्ही यादों का एक मंजर, एक वाकया जो एक सफ़र के दौरान हुआ वो मैं बताने/लिखने कि कोशिश कर रहा हूँ....
               ये खुबसूरत वाकया है पहली बार पैसेंजर ट्रेन से ०८/०४/२००७ को "बाराबंकी से राम जन्म भूमि यानी अयोध्या तक कि दूरी जो लगभग 107 किलोमीटर की है" के सफ़र का... इस सफ़र के दौरान मिलन हुआ ज़मीन से अपने आपको ऊपर उठाते हुए,  प्रकृति को एक नये रंग देने और उसके पोषण के लिए अपनी दैनिक दिनचर्या के लिए और अपने कर्तव्यों को अंजाम देने के लिए तैयार सूरज से...... जिससे मुलाकात तो प्रत्येक दिन होती थी लेकिन आज इसके साथ सफ़र करते हुए एक न्य एहसास और सुखद अनुभूति कि प्राप्ति हो रही थी...
               इन एहसासों में अनेकों सवाल हैं तो उन सवालों के बदले उनसे कहीं ज्यादा ऐसे जवाब जिनके प्रति सवाल करना एक बेवकूफी सी लगती है.... प्रकृति के इस नए रूप से आज पहली बार रूबरू होने का मौका मिला. इसको देखने के पश्चात् जो एहसास हुए उन्हें बयाँ कर पाना मेरे लिए मुश्किल ही नहीं वरन नामुमकिन सा लग रहा था... फिर भी मैंने ब्याने सफ़र कि एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ.....
               इस सफ़र के दौरान हमने अपनी सरज़मी को सोने की चादर से लिपटा हुआ पाया... जिसे सूरज की रौशनी ने और भी ज्यादा चमकीला कर रखा है, कंही पेड़ों की कतारें साथ में दौड़ लगा रही थीं... तो कहीं पेड़ों के झुण्ड एक साथ होकर हमे पकड़ने की कोशिश कर रहे थे.... लेकिन गाड़ी की रफ़्तार के आगे इनकी दौड़ बहुत धीमी सी महसूस हो रही थी.... कहीं उसर ज़मीन अपने आपको कोसती और अपने सीने में ग़मों का सागर छिपाए हुए हमसे रूबरू हो रही थी तो कहीं तो कहीं लहलहाते खेत ये बयाँ कर रहे थे कि, ये ज़मीन दुखी नहीं है और न उसर रूपी कलंक ने इसे कलंकित कर रखा है.....
               आपके जहन में एक बात बार-बार कौंध रही होगी कि ये सफ़र कर रहा है या फिर किसी खेत-खलिहान के बीच दौड़ लगाकर कोई कहानी करने कि कोशिश कर रहा है, इसके सफ़र में इंसानों का कोई जिक्र ही नहीं है..... मेरा अपना ये सोचना है कि आज के दौर में इंसान है ही नहीं. देखने में हमे जो इन्सान कि शक्ल लिए दिखाई देते हैं दरअसल ये बन चुके हैं काम करने कि एक मशीन, अपना मतलब सीधा करने कि एक मशीन, राजनीति का एक अध्याय और इंसानियत को शर्मसार करने वाले हैवान.....
               आप ये सोच कर परेशां बिलकुल न हों कि दूसरों पर ऊँगली उठाने वाले और इतने बड़े-बड़े लांछन लगाने वाले इन्सान का गिरेबां कितना साफ़ है? मेरा जवाब जवाब बड़ा सीधा सा है बिलकुल भी नहीं.... क्योंकि जब हम अपनी जिंदगी को अच्छे तरीके से नहीं जी पा रहे हैं, अपने मतलब को दूसरों कि सहायता के लिए नहीं छोड़ प् रहे हैं, जब हम किसी जरुरत मंद कि मदद नहीं कर सकते हैं और जब हम इंसानियत के किसी काम को उसके अंजाम तक नहीं पहुंचा सकते तो हम इंसान कहाँ से रह गए? खैर छोड़ते हैं इस इंसान और इंसानियत को वापस आते हैं अपने सफ़र-ऐ--राम जन्म भूमि पर मै अपने गंतव्य तक पहुँच चूका हूँ..... ये सिर्फ एक सफ़र औए सफ़र के दौरान मुझे जो महसूस हुआ उनको आप तक पहुँचाने कि कोशिश की है........

अतुल कुमार
०९४५४०७१५०१, ०९५५४४६८५०२  

शनिवार, सितंबर 24, 2011

"रश्मियाँ ज्योतम हरे........."

कौन जगता इस धरा पर, कौन सपनों को सजोंता.
कौन पुष्पित पल्लवित हो, दुखों में भी मुस्कुराता......

कौन अपनी वेदना को, गीत सा है गुनगुनाता.
कौन अपनों को समर्पण, वेदिका पर है चढ़ता.......

कौन प्रिय के आंसुओं में, नेह की मुस्कान लाता.
कौन झीने से ह्रदय में, उतर कर फिर डूब जाता.....

कौन जीवन को समर्पित, कर परम संतोष पाता.
कौन अपने स्वार्थ की बलि, दे सभी अनुतोष पाता...

कौन मन को छू सका है, कौन तन को दूर पाता.
कौन अपनी सुरभि से ही, दूर से प्रिय को लुभाता.....

कौन मन नीरद सलिल से, ह्रदय मंजुल सींच जाता.
कौन अपने मधुर स्वर से, ह्रदय वीणा को बजाता.....

कौन अपनी रश्मियों से, इंदु को भी जगमगाता.
कौन अपनी धवलता से, मन कलुष सबको मिलाता.....

कौन दुःख में साथ रहता, कौन है धीरज बढाता.
कौन प्रिय की ज्योत्स्ना को, और भी उजला बनाता.....

कौन प्रिय सुख हित सदा, उन्मुक्त हो सब कुछ लुटाता.
कौन सपने चूर कर के भी, उसे सुख मय बनाता.....

कौन अपनी रागनी से, सदा ही मधुमय राग गाता.
कौन जग में दूर रह कर, भी ह्रदय के पास आता......

सदमित्र के अतिरिक्त ऐसा, कौन इस जग में करे.
दुःख ले सुख दे कर सारा, रश्मियाँ ज्योतम हरे.........


द्वारा किरण तिवारी
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गुरुवार, जुलाई 14, 2011

Guru Poornima aur Guru

               जैसा की आज गुरु पूर्णिमा है...... और इस अवसर पर दुनिया के कोने-कोने से लोग अपने गुरु की अनुकम्पा पाने के लिए आतुर होते हैं...... क्या आज का दिन (गुरु पूर्णिमा) ही गुरु के लिए बनाया गया है? बाकी के दिनों में क्या गुरु का आदर और सत्कार नहीं होना चाहिए? हम अपनी संस्कृति इतनी आसानी से क्यूँ भूल जाना चाहते हैं? जब की दुनिया के अन्य देशों के लोग हमारी संस्कृति को अपनाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं..... हमारी ही संस्कृति ने कहा है की:
                                   "गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः,
                                     गुरु साक्षात् परब्रहम तस्मै श्री गुरुवे नमः."
                जब गुरु ही हमारे लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तो फिर हम क्यूँ भूल जाते हैं की आज हम जो भी है वह सब गुरु की महिमा से है...... इंसान बचपन से लेकर जब तक अपने शरीर का त्याग नहीं कर देता तब तक वह सीखता रहता है.... पर जिंदगी में  कोई ऐसा पल आता है जब इंसान की सोच, उसके कार्य उसकी परिपक्वता का रूप ले लेते हैं....... उसके पीछे करण किसी न किसी से सीख पाना होता है..... जिसे हम गुरु कह सकते हैं. गुरु ही वह सर्श्रेष्ठ सत्ता होती है जो शिष्य को अपने बराबर ले जाकर प्रतिष्ठित करती है जहाँ वह स्वयं प्रतिष्ठित होती है...... हमारी युवा पीढी इस बात को समझना ही नहीं चाहती है कि आज दुनिया में जो कुछ भी है वह सब गुरु के ही संरक्षण से संभव है...... क्यूंकि कबीर जी ने भी कहा था कि:
                                        "गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूँ पावँ.
                                         बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द देव बताय."
                      युवा पीढी कि सोच शायद यह हो कि ये उदाहरण जब के दिए गए हैं जब  गुरुकुल में गुरु छात्रों को सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान, शिल्प, धनुर्विद्या, ज्योतिष, अध्यात्मिक, राजनीति तथा सभी प्रकार की नीति ज्ञान की शिक्षा प्रदान करते थे. गुरु को मात्र शिक्षित करने का अधिकार था परन्तु व्यावहारिक रूप से कर सकने की सामर्थ्य उन्हें प्रदान नहीं की गयी थी. जैसे वह ज्योतिष पढ़ा सकता था पर ज्योतिषी नहीं बन सकता था. पर आज के दौर में गुरु प्रत्येक क्षेत्र में अपने को व्यावहारिक रूप से लाना चाहता है और गुरु नाम कि गरिमा से आज के गुरु का कोई लेना नहीं है...... वह सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचने की क्षमता पर ध्यान देता है......
               युवा पीढी भी करे तो क्या करे? जब गुरु की सोच यही है तो से कहाँ तक बदला जा सकता है? हमे इन बातों से लेना देना नहीं है क्यूँ की हमारी संस्कृति ने हमे बड़े बुजुर्गों का आदर और सत्कार करना सिखाया है..... तो ऐसे में जब गुरु को गोविन्द से ऊँचा बताया गया है तो उनका आदर हम कैसे भूल सकते हैं?कैसे भूल सकते हैं हम अपनी संस्कृति को?


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Atul Kumar
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शुक्रवार, मई 27, 2011

History of “Vande Maatram”


          "शब्दों एवं संगीत 'जन-गन-मन' के रूप में ज्ञात रचना भारत का राष्ट्र गीत है, जिसे सरकार उपस्थित अवसर के अनुसार शब्दों में परिवर्तन का अधिकार दे सकती है तथा 'वन्दे मातरम्' का जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक निभाई, 'जन-गन-मन' के समान मान्यता प्राप्त होगी." ये बोल भारत के संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी के हैं. भारतीय संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष का यह वक्तव्य, इस तथ्य को स्पष्ट करता है की यद्यपि भारतीय संविधान ने "जन-गण-मन" को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकारा, मगर "वन्दे मातरम्" की भी उपेक्षा नहीं की. वन्दे मातरम् को सामान आदर और महत्व प्रदान किया गया है.
          वन्दे मातरम् के रचयिता सुप्रसिद्ध बंगला उपन्यासकार श्री बंकिम चटर्जी जी थे. यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास "आनंद मठ" से लिया गया था, जिसे १९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और २०वीं शताब्दी के प्रारंभ में "राष्ट्रीयता की गीता" के नाम से पुकारा जाता था. अतः यह कहने में बिलकुल अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए की देश में राष्ट्रीयता के जागरण में "आनंद मठ" का उल्लेखनीय योगदान रहा. यह उपन्यास १८८० से १८८२ तक 'बंगदर्शन' नामक मासिक पत्रिका में धारावाहिक के रूप में छपी और इसके बाद पुस्तक के रूप में पाठकों के सामने आ गयी. उपन्यास के क्रांतिकारी स्वरुप से अंग्रेजी सरकार इतनी अधिक आतंकित हुई की आगे चल कर उसे इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा.
          अनुमान है कि 'वन्दे मातरम्' गीत की रचना, 'आनंदमठ' के प्रकाशन से बहुत पहले हो चुकी थी. वन्दे मातरम् के रचना काल के बारे में निश्चित रूप कुछ कह पाना बहुत कठिन है. मगर प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर 'वन्दे मातरम्' का रचना काल १८७२ से १८७५ के बीच माना जाता है.
          'वन्दे मातरम्' में जिस "माँ" की वंदना की गई है वह कोई साधारण माँ नहीं है. यद्यपि श्री बंकिम चन्द्र जी दुर्गा देवी के भक्त थे; मगर इस गीत में जिस माँ की वंदना है वह दुर्गादेवी भी नहीं है, वह तो मातृभूमि  है "जननी जन्मभूमि भारत माँ". लेखक ने इस सन्दर्भ में आपने एक पात्र भवानंद से 'आनंद मठ' में कहलाया भी है, "यह दुर्गादेवी का नहीं, देश का वर्णन है. हमारी एक माता है- मातृभूमि. हमारी एक ही माता सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम- देशमाता- महाजननी है."
          कहा जाता है कि 'वन्दे मातरम्' गीत के सृजन का श्रेय श्री बंकिम चन्द्र जी की सुपुत्री को है. श्री बंकिम चन्द्र जी अक्सर ही अपने परिजनों तथा मित्रों के सम्मुख मातृभूमि की प्रशंसा करते और उसके आगे अपना मस्तक झुकाते थे. ऐसे ही किसी अवसर पर उनकी सुपुत्री ने बालसुलभ जिज्ञासावस अपने पिता से पूछ लिया, "कैसी है वह मातृभूमि जिसकी आप इतनी प्रशंसा करते हैं? मुझे भी बतलाइये ना!" तभी संभवतः अपनी पुत्री की जिज्ञासा शांत करने के लिए ही लेखक महोदय ने इस गीत का सृजन किया. 'वन्दे मातरम्' की रचना कब हुई और कैसे हुई, इस विषय पर मतभेद हो सकता है; मगर यह तथ्य सर्वमान्य और सर्वस्वीकृत है की इस गीत ने आगे चल कर अत्यधिक लोकप्रियता अर्जित की है, और करता भी  रहेगा.
          १९०५ में बंगाल विभाजन के समय बंगाल की सरकार ने इस गीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया था; मगर फिर भी इस गीत का गायन रुका नहीं. अनेक वीर नव युवक 'वन्दे मातरम्' गीत गाते हुए फांसी के तख्तों पर चढ़ गए. वन्दे मातरम् को कांग्रेस मंच से सर्वप्रथम १८९६ में प्रस्तुत किया गया. १९०६ में गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर जी ने स्वयं अपनी बनाई धुन पर कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में इसे प्रस्तुत किया. जिससे सभी श्रोता झूम उठे. उसके बाद तो इसे अनेक अवसरों पर गया गया, सदैव इस गीत को भूरी-भूरी प्रशंसा मिलती रही. १९३७ में कांग्रेस कार्यसमिति ने 'राष्ट्र गीत' पर विचार करने के लिए एक समिति नियुक्त की थी, जिसमें मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, पंडित जवाहर लाल नेहरु, नेता जी  सुभाष चन्द्र बोस, आचार्य नरेन्द्र देव आदि सदस्य थे. इस समिति के सिफारिश के अनुसार कांग्रेस ने 'वन्दे मातरम्' को सभी राष्ट्रिय उत्सवों पर गाने के लिए स्वीकार किया. इस गीत में कुल  ४ पद हैं; मगर समय की दृष्टि से प्रथम २ पद ही गाने के लिए स्वीकार किये गए. इस गीत के प्रशंसकों में स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविन्द भी शामिल थे. मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इस गीत को अनेक बार गया था... कांग्रेस मंच के साथ ही सेवा दल और प्रजामंडलों में भी यह गीत गया जाता रहा है. १९६१ में सम्पूर्णानन्द-शिक्षा समिति ने सुझाव दिया की विद्यार्थियों को राष्ट्रगीत 'वन्दे मातरम्' याद होना चाहिए.
          भारत सरकार से सन २००२ में हिंदी साहित्य में अतिविशिष्ट अनुसन्धान के लिए सीनियर फैलोशिप प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' ने इस गीत का हिंदी में, स्वाधीनता संग्राम के स्वदेशी आन्दोलन से लेकर साहित्य व आध्यात्मिक साधना के अद्भुत व्यक्तित्व महर्षि अरविन्द ने इस गीत का अंग्रेजी में और वर्तमान में राजनीति के ध्वजवाहक आरिफ मोहम्मद खान के इसका उर्दू में अनुवाद किया है.
          सन १८८२ में प्रकाशित इस गीत को सर्वप्रथम ७ सितम्बर १९०५ के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्र गीत का दर्जा दिया गया था. इसलिए सन २००५ में इसके १०० वर्ष पूर्ण होने पर वर्ष भर समारोह का आयोजन किया गया. ७ सितम्बर २००६ को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया. कुछ आत्मघातियों द्वारा वन्दे मातरम् का विरोध करने पर तात्कालिक मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने संसद में बोला कि 'वन्दे मातरम्' गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, यह व्यक्ति कि स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह इसे गाये या ना गाये...
          अपने इस गीत की लोकप्रियता के बारे में स्वयं बंकिम बाबू आश्वस्त थे. इसीलिये तो उन्होंने एक बार कहा था, 'वन्दे मातरम्' महान है, यह अमिट है. यह देश के हृदय पर राज करेगा. एक अन्य अवसर पर उन्होंने अपनी पुत्री से कहा था, "इस गीत से बंग भूमि पागल होकर नाचेगी और सम्पूर्ण भारत वर्ष इससे प्रेरणा लेगा." 'वन्दे मातरम्' ने अपने रचयिता के इस विश्वास को सत्य प्रमाणित किया.