रविवार, नवंबर 13, 2011

यादों का एक सफ़र....

               यादें जिंदगी के सफ़र का वो खुशनुमा मोड़ होती हैं, जो हमें  बताती हैं कि हम कल क्या थे, आज क्या हैं. यादों के इस सफ़र में ढेरों खुशियाँ होती हैं तो ढेरों गम भी...... लेकिन फिर भी यादें होती बहुत प्यारी हैं . इन्ही यादों का एक मंजर, एक वाकया जो एक सफ़र के दौरान हुआ वो मैं बताने/लिखने कि कोशिश कर रहा हूँ....
               ये खुबसूरत वाकया है पहली बार पैसेंजर ट्रेन से ०८/०४/२००७ को "बाराबंकी से राम जन्म भूमि यानी अयोध्या तक कि दूरी जो लगभग 107 किलोमीटर की है" के सफ़र का... इस सफ़र के दौरान मिलन हुआ ज़मीन से अपने आपको ऊपर उठाते हुए,  प्रकृति को एक नये रंग देने और उसके पोषण के लिए अपनी दैनिक दिनचर्या के लिए और अपने कर्तव्यों को अंजाम देने के लिए तैयार सूरज से...... जिससे मुलाकात तो प्रत्येक दिन होती थी लेकिन आज इसके साथ सफ़र करते हुए एक न्य एहसास और सुखद अनुभूति कि प्राप्ति हो रही थी...
               इन एहसासों में अनेकों सवाल हैं तो उन सवालों के बदले उनसे कहीं ज्यादा ऐसे जवाब जिनके प्रति सवाल करना एक बेवकूफी सी लगती है.... प्रकृति के इस नए रूप से आज पहली बार रूबरू होने का मौका मिला. इसको देखने के पश्चात् जो एहसास हुए उन्हें बयाँ कर पाना मेरे लिए मुश्किल ही नहीं वरन नामुमकिन सा लग रहा था... फिर भी मैंने ब्याने सफ़र कि एक छोटी सी कोशिश कर रहा हूँ.....
               इस सफ़र के दौरान हमने अपनी सरज़मी को सोने की चादर से लिपटा हुआ पाया... जिसे सूरज की रौशनी ने और भी ज्यादा चमकीला कर रखा है, कंही पेड़ों की कतारें साथ में दौड़ लगा रही थीं... तो कहीं पेड़ों के झुण्ड एक साथ होकर हमे पकड़ने की कोशिश कर रहे थे.... लेकिन गाड़ी की रफ़्तार के आगे इनकी दौड़ बहुत धीमी सी महसूस हो रही थी.... कहीं उसर ज़मीन अपने आपको कोसती और अपने सीने में ग़मों का सागर छिपाए हुए हमसे रूबरू हो रही थी तो कहीं तो कहीं लहलहाते खेत ये बयाँ कर रहे थे कि, ये ज़मीन दुखी नहीं है और न उसर रूपी कलंक ने इसे कलंकित कर रखा है.....
               आपके जहन में एक बात बार-बार कौंध रही होगी कि ये सफ़र कर रहा है या फिर किसी खेत-खलिहान के बीच दौड़ लगाकर कोई कहानी करने कि कोशिश कर रहा है, इसके सफ़र में इंसानों का कोई जिक्र ही नहीं है..... मेरा अपना ये सोचना है कि आज के दौर में इंसान है ही नहीं. देखने में हमे जो इन्सान कि शक्ल लिए दिखाई देते हैं दरअसल ये बन चुके हैं काम करने कि एक मशीन, अपना मतलब सीधा करने कि एक मशीन, राजनीति का एक अध्याय और इंसानियत को शर्मसार करने वाले हैवान.....
               आप ये सोच कर परेशां बिलकुल न हों कि दूसरों पर ऊँगली उठाने वाले और इतने बड़े-बड़े लांछन लगाने वाले इन्सान का गिरेबां कितना साफ़ है? मेरा जवाब जवाब बड़ा सीधा सा है बिलकुल भी नहीं.... क्योंकि जब हम अपनी जिंदगी को अच्छे तरीके से नहीं जी पा रहे हैं, अपने मतलब को दूसरों कि सहायता के लिए नहीं छोड़ प् रहे हैं, जब हम किसी जरुरत मंद कि मदद नहीं कर सकते हैं और जब हम इंसानियत के किसी काम को उसके अंजाम तक नहीं पहुंचा सकते तो हम इंसान कहाँ से रह गए? खैर छोड़ते हैं इस इंसान और इंसानियत को वापस आते हैं अपने सफ़र-ऐ--राम जन्म भूमि पर मै अपने गंतव्य तक पहुँच चूका हूँ..... ये सिर्फ एक सफ़र औए सफ़र के दौरान मुझे जो महसूस हुआ उनको आप तक पहुँचाने कि कोशिश की है........

अतुल कुमार
०९४५४०७१५०१, ०९५५४४६८५०२  

शनिवार, सितंबर 24, 2011

"रश्मियाँ ज्योतम हरे........."

कौन जगता इस धरा पर, कौन सपनों को सजोंता.
कौन पुष्पित पल्लवित हो, दुखों में भी मुस्कुराता......

कौन अपनी वेदना को, गीत सा है गुनगुनाता.
कौन अपनों को समर्पण, वेदिका पर है चढ़ता.......

कौन प्रिय के आंसुओं में, नेह की मुस्कान लाता.
कौन झीने से ह्रदय में, उतर कर फिर डूब जाता.....

कौन जीवन को समर्पित, कर परम संतोष पाता.
कौन अपने स्वार्थ की बलि, दे सभी अनुतोष पाता...

कौन मन को छू सका है, कौन तन को दूर पाता.
कौन अपनी सुरभि से ही, दूर से प्रिय को लुभाता.....

कौन मन नीरद सलिल से, ह्रदय मंजुल सींच जाता.
कौन अपने मधुर स्वर से, ह्रदय वीणा को बजाता.....

कौन अपनी रश्मियों से, इंदु को भी जगमगाता.
कौन अपनी धवलता से, मन कलुष सबको मिलाता.....

कौन दुःख में साथ रहता, कौन है धीरज बढाता.
कौन प्रिय की ज्योत्स्ना को, और भी उजला बनाता.....

कौन प्रिय सुख हित सदा, उन्मुक्त हो सब कुछ लुटाता.
कौन सपने चूर कर के भी, उसे सुख मय बनाता.....

कौन अपनी रागनी से, सदा ही मधुमय राग गाता.
कौन जग में दूर रह कर, भी ह्रदय के पास आता......

सदमित्र के अतिरिक्त ऐसा, कौन इस जग में करे.
दुःख ले सुख दे कर सारा, रश्मियाँ ज्योतम हरे.........


द्वारा किरण तिवारी
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गुरुवार, जुलाई 14, 2011

Guru Poornima aur Guru

               जैसा की आज गुरु पूर्णिमा है...... और इस अवसर पर दुनिया के कोने-कोने से लोग अपने गुरु की अनुकम्पा पाने के लिए आतुर होते हैं...... क्या आज का दिन (गुरु पूर्णिमा) ही गुरु के लिए बनाया गया है? बाकी के दिनों में क्या गुरु का आदर और सत्कार नहीं होना चाहिए? हम अपनी संस्कृति इतनी आसानी से क्यूँ भूल जाना चाहते हैं? जब की दुनिया के अन्य देशों के लोग हमारी संस्कृति को अपनाने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं..... हमारी ही संस्कृति ने कहा है की:
                                   "गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वरः,
                                     गुरु साक्षात् परब्रहम तस्मै श्री गुरुवे नमः."
                जब गुरु ही हमारे लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं तो फिर हम क्यूँ भूल जाते हैं की आज हम जो भी है वह सब गुरु की महिमा से है...... इंसान बचपन से लेकर जब तक अपने शरीर का त्याग नहीं कर देता तब तक वह सीखता रहता है.... पर जिंदगी में  कोई ऐसा पल आता है जब इंसान की सोच, उसके कार्य उसकी परिपक्वता का रूप ले लेते हैं....... उसके पीछे करण किसी न किसी से सीख पाना होता है..... जिसे हम गुरु कह सकते हैं. गुरु ही वह सर्श्रेष्ठ सत्ता होती है जो शिष्य को अपने बराबर ले जाकर प्रतिष्ठित करती है जहाँ वह स्वयं प्रतिष्ठित होती है...... हमारी युवा पीढी इस बात को समझना ही नहीं चाहती है कि आज दुनिया में जो कुछ भी है वह सब गुरु के ही संरक्षण से संभव है...... क्यूंकि कबीर जी ने भी कहा था कि:
                                        "गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूँ पावँ.
                                         बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द देव बताय."
                      युवा पीढी कि सोच शायद यह हो कि ये उदाहरण जब के दिए गए हैं जब  गुरुकुल में गुरु छात्रों को सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान, शिल्प, धनुर्विद्या, ज्योतिष, अध्यात्मिक, राजनीति तथा सभी प्रकार की नीति ज्ञान की शिक्षा प्रदान करते थे. गुरु को मात्र शिक्षित करने का अधिकार था परन्तु व्यावहारिक रूप से कर सकने की सामर्थ्य उन्हें प्रदान नहीं की गयी थी. जैसे वह ज्योतिष पढ़ा सकता था पर ज्योतिषी नहीं बन सकता था. पर आज के दौर में गुरु प्रत्येक क्षेत्र में अपने को व्यावहारिक रूप से लाना चाहता है और गुरु नाम कि गरिमा से आज के गुरु का कोई लेना नहीं है...... वह सिर्फ और सिर्फ अपने बारे में सोचने की क्षमता पर ध्यान देता है......
               युवा पीढी भी करे तो क्या करे? जब गुरु की सोच यही है तो से कहाँ तक बदला जा सकता है? हमे इन बातों से लेना देना नहीं है क्यूँ की हमारी संस्कृति ने हमे बड़े बुजुर्गों का आदर और सत्कार करना सिखाया है..... तो ऐसे में जब गुरु को गोविन्द से ऊँचा बताया गया है तो उनका आदर हम कैसे भूल सकते हैं?कैसे भूल सकते हैं हम अपनी संस्कृति को?


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Atul Kumar
Mob. +91-9454071501, 9554468502
Blog: http://suryanshsri.blogspot.com/


शुक्रवार, मई 27, 2011

History of “Vande Maatram”


          "शब्दों एवं संगीत 'जन-गन-मन' के रूप में ज्ञात रचना भारत का राष्ट्र गीत है, जिसे सरकार उपस्थित अवसर के अनुसार शब्दों में परिवर्तन का अधिकार दे सकती है तथा 'वन्दे मातरम्' का जिसने स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक निभाई, 'जन-गन-मन' के समान मान्यता प्राप्त होगी." ये बोल भारत के संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद जी के हैं. भारतीय संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष का यह वक्तव्य, इस तथ्य को स्पष्ट करता है की यद्यपि भारतीय संविधान ने "जन-गण-मन" को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकारा, मगर "वन्दे मातरम्" की भी उपेक्षा नहीं की. वन्दे मातरम् को सामान आदर और महत्व प्रदान किया गया है.
          वन्दे मातरम् के रचयिता सुप्रसिद्ध बंगला उपन्यासकार श्री बंकिम चटर्जी जी थे. यह गीत उनके प्रसिद्ध उपन्यास "आनंद मठ" से लिया गया था, जिसे १९वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और २०वीं शताब्दी के प्रारंभ में "राष्ट्रीयता की गीता" के नाम से पुकारा जाता था. अतः यह कहने में बिलकुल अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए की देश में राष्ट्रीयता के जागरण में "आनंद मठ" का उल्लेखनीय योगदान रहा. यह उपन्यास १८८० से १८८२ तक 'बंगदर्शन' नामक मासिक पत्रिका में धारावाहिक के रूप में छपी और इसके बाद पुस्तक के रूप में पाठकों के सामने आ गयी. उपन्यास के क्रांतिकारी स्वरुप से अंग्रेजी सरकार इतनी अधिक आतंकित हुई की आगे चल कर उसे इस उपन्यास पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा.
          अनुमान है कि 'वन्दे मातरम्' गीत की रचना, 'आनंदमठ' के प्रकाशन से बहुत पहले हो चुकी थी. वन्दे मातरम् के रचना काल के बारे में निश्चित रूप कुछ कह पाना बहुत कठिन है. मगर प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर 'वन्दे मातरम्' का रचना काल १८७२ से १८७५ के बीच माना जाता है.
          'वन्दे मातरम्' में जिस "माँ" की वंदना की गई है वह कोई साधारण माँ नहीं है. यद्यपि श्री बंकिम चन्द्र जी दुर्गा देवी के भक्त थे; मगर इस गीत में जिस माँ की वंदना है वह दुर्गादेवी भी नहीं है, वह तो मातृभूमि  है "जननी जन्मभूमि भारत माँ". लेखक ने इस सन्दर्भ में आपने एक पात्र भवानंद से 'आनंद मठ' में कहलाया भी है, "यह दुर्गादेवी का नहीं, देश का वर्णन है. हमारी एक माता है- मातृभूमि. हमारी एक ही माता सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम- देशमाता- महाजननी है."
          कहा जाता है कि 'वन्दे मातरम्' गीत के सृजन का श्रेय श्री बंकिम चन्द्र जी की सुपुत्री को है. श्री बंकिम चन्द्र जी अक्सर ही अपने परिजनों तथा मित्रों के सम्मुख मातृभूमि की प्रशंसा करते और उसके आगे अपना मस्तक झुकाते थे. ऐसे ही किसी अवसर पर उनकी सुपुत्री ने बालसुलभ जिज्ञासावस अपने पिता से पूछ लिया, "कैसी है वह मातृभूमि जिसकी आप इतनी प्रशंसा करते हैं? मुझे भी बतलाइये ना!" तभी संभवतः अपनी पुत्री की जिज्ञासा शांत करने के लिए ही लेखक महोदय ने इस गीत का सृजन किया. 'वन्दे मातरम्' की रचना कब हुई और कैसे हुई, इस विषय पर मतभेद हो सकता है; मगर यह तथ्य सर्वमान्य और सर्वस्वीकृत है की इस गीत ने आगे चल कर अत्यधिक लोकप्रियता अर्जित की है, और करता भी  रहेगा.
          १९०५ में बंगाल विभाजन के समय बंगाल की सरकार ने इस गीत पर प्रतिबन्ध लगा दिया था; मगर फिर भी इस गीत का गायन रुका नहीं. अनेक वीर नव युवक 'वन्दे मातरम्' गीत गाते हुए फांसी के तख्तों पर चढ़ गए. वन्दे मातरम् को कांग्रेस मंच से सर्वप्रथम १८९६ में प्रस्तुत किया गया. १९०६ में गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर जी ने स्वयं अपनी बनाई धुन पर कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में इसे प्रस्तुत किया. जिससे सभी श्रोता झूम उठे. उसके बाद तो इसे अनेक अवसरों पर गया गया, सदैव इस गीत को भूरी-भूरी प्रशंसा मिलती रही. १९३७ में कांग्रेस कार्यसमिति ने 'राष्ट्र गीत' पर विचार करने के लिए एक समिति नियुक्त की थी, जिसमें मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद, पंडित जवाहर लाल नेहरु, नेता जी  सुभाष चन्द्र बोस, आचार्य नरेन्द्र देव आदि सदस्य थे. इस समिति के सिफारिश के अनुसार कांग्रेस ने 'वन्दे मातरम्' को सभी राष्ट्रिय उत्सवों पर गाने के लिए स्वीकार किया. इस गीत में कुल  ४ पद हैं; मगर समय की दृष्टि से प्रथम २ पद ही गाने के लिए स्वीकार किये गए. इस गीत के प्रशंसकों में स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविन्द भी शामिल थे. मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इस गीत को अनेक बार गया था... कांग्रेस मंच के साथ ही सेवा दल और प्रजामंडलों में भी यह गीत गया जाता रहा है. १९६१ में सम्पूर्णानन्द-शिक्षा समिति ने सुझाव दिया की विद्यार्थियों को राष्ट्रगीत 'वन्दे मातरम्' याद होना चाहिए.
          भारत सरकार से सन २००२ में हिंदी साहित्य में अतिविशिष्ट अनुसन्धान के लिए सीनियर फैलोशिप प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार मदनलाल वर्मा 'क्रान्त' ने इस गीत का हिंदी में, स्वाधीनता संग्राम के स्वदेशी आन्दोलन से लेकर साहित्य व आध्यात्मिक साधना के अद्भुत व्यक्तित्व महर्षि अरविन्द ने इस गीत का अंग्रेजी में और वर्तमान में राजनीति के ध्वजवाहक आरिफ मोहम्मद खान के इसका उर्दू में अनुवाद किया है.
          सन १८८२ में प्रकाशित इस गीत को सर्वप्रथम ७ सितम्बर १९०५ के कांग्रेस अधिवेशन में राष्ट्र गीत का दर्जा दिया गया था. इसलिए सन २००५ में इसके १०० वर्ष पूर्ण होने पर वर्ष भर समारोह का आयोजन किया गया. ७ सितम्बर २००६ को इस समारोह के समापन के अवसर पर मानव संसाधन मंत्रालय ने इस गीत को स्कूलों में गाये जाने पर विशेष बल दिया. कुछ आत्मघातियों द्वारा वन्दे मातरम् का विरोध करने पर तात्कालिक मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने संसद में बोला कि 'वन्दे मातरम्' गीत गाना किसी के लिए आवश्यक नहीं किया गया है, यह व्यक्ति कि स्वेच्छा पर निर्भर करता है कि वह इसे गाये या ना गाये...
          अपने इस गीत की लोकप्रियता के बारे में स्वयं बंकिम बाबू आश्वस्त थे. इसीलिये तो उन्होंने एक बार कहा था, 'वन्दे मातरम्' महान है, यह अमिट है. यह देश के हृदय पर राज करेगा. एक अन्य अवसर पर उन्होंने अपनी पुत्री से कहा था, "इस गीत से बंग भूमि पागल होकर नाचेगी और सम्पूर्ण भारत वर्ष इससे प्रेरणा लेगा." 'वन्दे मातरम्' ने अपने रचयिता के इस विश्वास को सत्य प्रमाणित किया.

शनिवार, मई 07, 2011

Mother vs Mother's Day

  ”Mother "a word which takes courage to protect us from all troubles .... And be successful in life we pray it is the mother of the word.... "Mother" who gathers in his lap to take all our troubles ... To erase your night's sleep to forget the day relaxed and comfortable, the moment - the moment gives us new life ... The question is whether we have it? Year (365) days to 1 day..... Mothers Day!!!!!!!!!!! Is it enough?
             In modern times the word even Mom mother, mother, etc. Names have been changed......... The term had not lost their identity, their responsibilities, their duty ... Today mother completely its full responsibility to maintain the dignity of the word mother.... Today's her mother's existence and love.......
               We have seen the pain and sufferings of the moment or the moment of joy "mother" only comes out of our mouth, the sound of our souls..... Mother doesn’t think bad for her children any condition.... "Mom" to pronounce the word as heart swell with joy and is Glad ... "Mother" is indescribable glory of...... Mother's love is selfless.... Our men ever to serve society mother can not upon....
           Woman "mother" as the protector, friend and mentor to us as the motivator of good works.... The women has been given highest rank in Indian society ... Over time in each relationship is bound to come to a standstill...... Makes us realize that a stranger of yourself and ... The money this world - those who have wealth..... That is to say if we have money - the whole world his wealth, and if we so poor at this point and only "mother" play well ... Why play with no rest?
             Hmar's existence, the borrower only "mother" of the......And we turn it 365 days of my life have a day..... This is what our moral responsibility? If this thinking "mother" then she's convinced that the 1 day "Children Day" takes its responsibilities and face turn....... What happens to us and we exist? What is needed is to think.........

माँ और मदर्स डे

              "माँ" एक ऐसा शब्द जो हमे हर मुसीबतों से बचाने की रखता है हिम्मत.... और जिंदगी में हम हो कामयाब ये होती है इस माँ शब्द की दुआ.... "माँ" जो अपने आँचल में समेट लेती है हमारी सारी परेशानियों को... अपनी रातों की नींद को मिटा कर दिन का सुकून और आराम को भुला कर, पल-पल देती है हमे नई जिंदगी... पर सवाल यह है की हमने उसे क्या दिया? साल भर (365) दिन से १ दिन का समय..... मदर्स डे !!!!!!!!!!! क्या यह काफी है?
             आधुनिक दौर में माँ शब्द को भले ही माम, मम्मी आदि नामों में परिवर्तित कर दिया गया हो......... पर इस शब्द ने नहीं खोई है अपनी पहचान, अपनी जिम्मेदारियां, अपने कर्त्तव्य... आज माँ अपनी पूर्ण रूपेण इस जिम्मेदारी को इस माँ शब्द की गरिमा को बनाये रखने में तत्पर्य है.... आज भी माँ का अस्तित्व और प्यार वही है.......
               हमने देखा है की दुःख और कष्टों के पल हों या खुशी का पल "माँ" ही निकलता है हमारे मुँह से हमारी आत्मा की आवाज से..... माँ किसी भी दशा में हम बच्चों का बुरा नहीं सोचती.... "माँ" इस शब्द का उच्चारण करते ही हृदय आनंद से गदगद और प्रफुल्लित हो जाता है... "माँ" की  महिमा  अवर्णनीय है...... माँ का प्रेम निःस्वार्थ होता है.... हमारा पुरुष समाज माँ की सेवा से कभी भी उऋण नहीं हो सकता....
           नारी "माँ" के रूप में रक्षक, मित्र और गुरु के रूप में हमारे लिए शुभ कार्यों की प्रेरक है.... भारतीय जन-मानस में मातृरूपा नारी को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित किया गया है... समय के साथ प्रत्येक रिश्ते में एक ठहराव आ ही जाता है...... जो हमे एहसास करता है अपने और पराये का... ये दुनिया तो धन-दौलत वालों की है..... कहने का मतलब बस इतना है की अगर हमारे पास धन-दौलत है तो सारी दुनिया अपनी है, और यदि हम निर्धन है तो इस मोड़ पर सिर्फ और सिर्फ "माँ" ही साथ निभाती है... बाकी कोई साथ क्यूँ निभाएगा?
             हमार वजूद अगर कर्जदार है तो सिर्फ "माँ" का...... और हमने उसे इसके बदले अपनी जिंदगी के ३६५ दिन में से दिया है १ दिन....... क्या यही है हमारी नैतिक जिम्मेदारी? अगर यही सोच "माँ" की होती तो वह भी १ दिन मना लिया करती "चिल्ड्रेन डे" और मुँह मोड़ लेती अपनी जिम्मेदारियों से....... तब क्या होता हमारा और हमारे वजूद का? क्या यह सोचने की जरुरत है है.........

शनिवार, अप्रैल 30, 2011

1st May aur Majdoor Diwas

         अगर मजदूर खुश होगा तो उत्पादन बढ़िया होगा... देश और समाज उन्नति करेगा... पंक्ति तो शायद बहुत अच्छी है... पर हम अमल कितना कर पाते है? सवाल यह है..... श्रम को मानव की पूंजी की संज्ञा दी गयी है... और श्रम  होता भी है मजदूरों का गहना.... १ मई या यूँ कहूँ की अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस मजदूरों की इसी पूंजी या गहने को सुरक्षित रखने के लिए करता है संघर्ष...... १८८६ में मजदूर संगठनों ने एक प्रस्ताव पारित किया की १ मई १८८६ से प्रतिदिन ८ घंटे काम की अवधि निर्धारित की गयी..... इस अवधि तक लगभग २.५ लाख लोग इस संगठन में जुड़ चुके थे....१८८६ से १८८९ के मध्य कई देशों में श्रमिक आन्दोलनों की लहर फ़ैल गयी. इन सारी शर्तों को १८८९ में हुए मजदूर संघ के गठन के बाद यह पूर्ण रूपेण लागू भी कर दिया गया....
           गठन के १२२ वर्षों के बाद भी भारत में यह कानून व्यापारियों के सामने, पूंजी पतियों के सामने और हमारे देश के पोलिशी मेकरों के सामने औंधे मुह पड़ा है.... न तो प्राइवेट कंपनियों में मजदूरों की मासिक मजदूरी निर्धारित है और न ही काम के घंटों का उनके लिए कोई क़ानून.....  भारत चूँकि किसानों और मजदूर का देश है... लेकिन फिर भी हमारी सरकार ने अभी तक फसलों का न्यूनतम मूल्य लागू नहीं किया है.... अगर लागू भी है तो सिर्फ और सिर्फ बड़े व्यापारियों के लिए... क्या यह उचित है? कहने के लिए हम गांधी के पद चिन्हों पर चलने वाले हैं.... और गांधी के देश के रहने वाले हैं...  गांधी की खादी नीति और हथकरघा नीति आज पूरी तरह से बेजान हो चुकी है... बुनकारी का काम करने वाले बुनकर न तो भर पेट खाना खा पाते हैं... और न ही अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पाते है... बुनकरी की कला बड़ी व्यापारियों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गयी है....
             भारत का वजूद अगर कंही से  आत्म सम्मानित है, तो वो हैं सिर्फ हमारे किसान और मजदूर भाइयों की वजह से. और हमने या हमारी सरकार ने उनके लिए क्या किया है? क्या यही है मजदूर दिवस की कहानी? भारत में इंटक, एटक, सीटू, बीएमस और न जाने कितने संगठन कार्यरत हैं... पर इनकी दशा में क्या कोई परिवर्तन हुआ है? क्या मजदूरों और किसानों का दोहन ही है १ मई?