रविवार, सितंबर 22, 2013

वीरान थी दुनिया मेरी तेरे बगैर

एक दोस्त सचिन कचेहरवी  की सोच अपनी प्यारी पत्नी के लिए :
 हुश्न को ग़ज़लों में बयाँ कर दिया,
दिल के जज्बातों को अयाँ कर दिया.
वीरान थी दुनिया मेरी तेरे बगैर,
तुने आकर गुलिस्ताँ कर दिया.
याद माज़ी है तुम्हारा शुक्रिया,
जीना मेरा तुने आसाँ कर दिया.
मै था अदना एक मुसाफिर राह का,
सबने मिलकर कारवां कर दिया.
जुबां खामोश थी शब् था निशां,
अश्कों ने सब बयाँ कर दिया. 

बुधवार, जून 12, 2013

भ्रष्टाचार की लौ, नौनिहालों का भविष्य ढ़केल रही है अँधेरे की गर्त में.



भ्रष्टाचार और प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता जनपद में शिक्षा व्यवसायियो के हौसलें बुलंद कर रही है। प्रशासनिक अधिकारियों की उदासीनता के कारण जनपद में उच्चस्तरीय शिक्षा के माध्यम से बच्चों के भविष्य के साथ खुल्ला खेल फरुक्खाबादी खेला जा रहा है। ऐसे में विद्यालय संचालकों के हौसले इतने बुलंद हैं की प्रशासन और शासनादेश का कोई मतलब और खौफ नहीं है।
बाराबंकी  जनपद में डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्व विद्यालय की संबद्धता से संचालित गुलाब देई प्रोफेसनल स्टडीज बुधेडा में महाविद्यालय प्रशासन द्वारा स्नातक की परीक्षाओं में अनुसूचित जाति के बच्चों को बी० ए० प्रथम वर्ष के परीक्षार्थियों को प्रवेश पत्र नहीं दिया गया। कारण इनकी फीस शासन से महाविद्यालय को मिलनी थी उसके बाद भी बच्चों से रुपये ३ हज़ार शुल्क के और २ सौ प्रवेश पत्र के लिए जाने थे। शासनादेश के बावजूद अनुसूचित जाति के बच्चों से  फीस वसूली गयी और जिनके पास  पैसे नहीं थे या उनकी आर्थिक स्थिति नहीं थी फीस दे पाने की उन्हें परीक्षा नहीं देने दिया गया।
भ्रष्टाचार की कुछ ऐसी ही कहानी जहांगीराबाद एजुकेशनल ट्रस्ट द्वारा संचालित जहांगीराबाद मीडिया संस्थान की है जो जिले में पिछले  वर्षों से संचालित होकर बच्चों से फीस के रूप में एक से ढेड लाख रुपये वसूल रहा है और जिला प्रशासन की उदासीनता के चलते बिना की विवि की संबद्धता के फल&फूल रहा है। जहांगीराबाद मीडिया संस्थान द्वारा जारी प्रमाण&पत्र छात्रों को बहकाने और बरगलाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर रहा है] क्यूँकि जहांगीराबाद मीडिया संस्थान की किसी सरकारी@a अर्द्धसरकारी कार्यों में कोई मान्यता नहीं है। जिसकी सूचना] जन सूचना अधिकार के तहत मांग कर जिला प्रशासन को दी गयी है] लेकिन शिक्षा व्यवसायियों के बढ़ते कद के आगे जिला प्रशासन मूक दर्शक बना हुआ है।
विद्यार्थीयों के भविष्य के साथ] शिक्षा माफिया और जिला प्रशासन खेल रहे हैं आँख मिचौली का घिनौना खेल। ऐसे में अधिकारियों की भ्रष्टाचार के प्रति निष्ठा इन विद्यार्थियों के भविष्य को अँधेरे की गर्त में ले जाने के प्रति कटिबद्ध सी प्रतीत हो रही है। 
सभार
स्वतंत्र चेतना  एवं चेतना विचार धारा हिंदी दैनिक

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शुक्रवार, फ़रवरी 22, 2013

अमरत्व के लिए चाहिए बुलंद हौसले और सशक्त उद्देश्य

           भारतीय स्वतंत्रता संग्राम आधुनिक दुनिया के सबसे बड़े जन आन्दोलनों में से एक था। जिसने भारत के निर्माण में सबसे अहम् भूमिका निभाई। आन्दोलानोपरांत उपनिवेशवादी सामराज्य का पतन हुआ। विभिन्न धर्मों, वर्गों और विचारधाराओं के लोग एक जुट हुए, लेकिन एकजुटता का यह विचार किसी एक भाषा, धर्म या संस्कृति पर आधारित न होकर विविधता और मिश्रित संस्कृति पर आधारित थ. इसी विविधता में जो एक नाम मुझे सर्वोपरि नजर आता है वह है शहीद-ए -आज़म सरदार  सिंह का। तेईस (२३) वर्ष छह (६) माह और सोलह (१६) की जिंदगी में इन्होंने उपनिवेशवादियों को यह बता दिया कि अमर होने के लिए लम्बी जिंदगी नहीं बल्कि बुलंद हौसले और सशक्त उद्देश्य की दरकार होनी चहिये।
          उपनिवेशवादियों की नींद उचाटने वाले सरदार भगत सिंह के ८२वें शहीद दिवस पर सज़ा से पहले न्यायालय में न्यायाधीश से अपने और अपने साथियों के लिए की गयी बहस में कैसे उन्होंने यह प्रमाणित किया कि अमरत्व के लिए चाहिए बुलंद हौसले और सशक्त उद्देश्य न की उद्देश्य विहीन जिंदगी।
          "माई लार्ड हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिग्रियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाये। हमारी विनती है कि हमारे बयान की भाषा सम्बन्धी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तविक अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाये। दुसरे तमाम मुद्दों को हम अपने वकील पर छोड़ते हुए मै स्वयं इस मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूँगा। यह मुद्दा इस मुकद्दमे में बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं।
          विचारणीय यह है कि असेम्बली में हमने जो दो बम फेंके, उनसे किसी व्यक्ति को शारीरिक या आर्थिक हानि नहीं हुई। इस दृष्टिकोण से हमे सज़ा दी गयी है, वह कठोरतम ही नहीं, बदला लेने की भावना से दी गयी है। यदि दूसरे दृष्टिकोण से देखा जाये तो जब तक अभियुक्त की मनोभावना का पता न लगाया जाये उसके असली उद्देश्य का पता नहीं चल सकता। यदि उद्देश्य को पूरी तरह से भुला दिया जाये तो किसी के साथ न्याय नहीं हो सकता, क्योंकि उद्देश्य को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति भी हत्यारे नज़र आयेंगे। सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखाई देंगे और न्यायाधीशों पर भी क़त्ल करने का अभियोग लगेगा। इस तरह सामाजिक व्यवस्था और सभ्यता खून-खराबा, चोरी और जालसाजी बनकर रह जाएगी। यदि उद्देश्य की उपेक्षा की जाये तो हर धर्म प्रचारक झूठ का प्रचारक दिखाई देगा, और हर पैगम्बर पर अभियोग लगेगा की उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया। यदि उद्देश्य को भुला दिया जाये, तो हज़रत ईसा मसीह गड़बड़ी फ़ैलाने वाले, शांति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में वह खतरनाक व्यक्ति माने जायेंगे. अगर ऐसा हो, तो मानना पड़ेगा की इंसानियत की कुर्बानियां, शहीदों के प्रयत्न, सब बेकार रहे और आज भी हम उसी स्थान पर खड़े हैं, जहाँ पर आज से बीसियों शताब्दी पहले थे। क़ानून की दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न खासा महत्त्व रखता है।
          माई लार्ड इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाये कि जो हुकुमत इन कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के कुदरती अधिकार छीनती है, उसे जिवीत रहने का कोई अधिकार नहीं है। अगर यह कायम है, तो आरजी तौर पर और हजारों बेगुनाहों का खून इसकी गर्दन पर है। यदि कानून उद्देश्य नहीं देखता तो न्याय नहीं हो सकता और न ही स्थाई शांति स्थापित हो सकती है। आटे में संखिया मिलाना जुर्म नहीं, यदि उसका उद्देश्य चूहे मारना हो, लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाये, तो क़त्ल का अपराध बन जाता है। लिहाज़ा ऐसे कानूनों को, जो युक्ति पर आधारित नहीं और न्याय सिद्धांत के विरुद्ध हैं, उन्हें समाप्त कर देना चाहिए। ऐसे ही न्याय विरोधी कानूनों के कारण बड़े-बड़े श्रेष्ठ बौद्धिक लोगों ने बगावत के कार्य किये हैं।
          हमारे मुकद्दमे के तथ्य बिलकुल सादे हैं। ८ अप्रैल १९२९ को हमने असेम्बली में दो बम फेंके। उनके धमाके से चंद लोगों को मामूली खरोंचे आई। चेंबर में हंगामा हुआ, सैकड़ों दर्शक और सदस्य बाहर निकल गए, कुछ देर बाद ख़ामोशी के साथ दर्शक गैलरी में बैठे रहे और हमने स्वयं अपने को प्रस्तुत किया की हमें गिरफ्तार कर लिया जाये। हमें गिरफ्तार कर लिया गया। अभियोग लगाये गये और हत्या करने के प्रयत्न में हमे सज़ा दी गयी। लेकिन बमों से ४-५ आदमियों को मामूली नुकसान पहुंचा. जिन्होंने यह अपराध किया, उन्होंने बिना किसी किस्म के हस्तक्षेप के अपने आपको गिरफ़्तारी के लिए पेश कर दिया। सेशन जज ने स्वीकार किया है कि यदि हम भागना चाहते, तो भागने में सफल हो सकते थे। हमने अपना अपराध स्वीकार किया और अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए बयान दिया। हमे सज़ा का भय नही है। लेकिन हम यह नहीं चाहते की हमे गलत समझा जाये। हमारे बयान से कुछ पैराग्राफ काट दिए गए हैं, यह वास्तविकता की दृष्टि से हानिकारक है।
          समग्र रूप से हमारे व्यक्तव्य के अपराध से साफ होता है की हमारे दृष्टिकोण से हमारा देश एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा है। इस दशा में काफी उंची आवाज़ में चेतावनी देने की जरुरत थी और हमने अपने विचारानुसार चेतावनी दी है। संभव है कि हम गलती कर रहे हों, हमारा सोचने का ढंग जज महोदय के सोचने के ढंग से भिन्न हो, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमे अपने विचार प्रकट करने की स्वीकृति न दी जाये और गलत बातें हमारे साथ जोड़ी जायें।
          'इंकलाब जिंदाबाद और सामराज्य मुर्दाबाद ' के सम्बन्ध में हमने जो व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उडा दिया गया है हलाकि यह हमारे उद्देश्य का खास भाग है। इंकलाब जिंदाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था जो आम-तौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इंकलाब नहीं लाते बल्कि इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है और यही चीज थी, जिसे हम प्रकट करना चाहते थे। हमारे इंकलाब का अर्थ पूँजीवादी युद्धों की मुसीबतों का अंत करना है। मुख्य उद्देश्य और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया समझे बिना किसी के सम्बन्ध में निर्णय देना उचित नहीं है। गलत बातें हमारे साथ जोड़ना अन्याय है।
          इसकी चेतावनी देना बहुत आवश्यक था। बेचैनी रोज़-रोज़ बढ रही है। यदि उचित इलाज न किया गया, तो रोग खतरनाक रूप ले लेगा। कोई भी मानवीय शक्ति इसकी रोकथाम न कर सकेगी। अब हमने इस तूफ़ान का रुख बदलने के लिए यह कार्यवाही की। हम इतिहास के गंभीर अध्येता हैं। हमारा विश्वास है की यदि सत्ताधारी शक्तियां ठीक समय पर सही कार्यवाही करतीं, तो  फ़्रांस और रूस की खूनी क्रांतियाँ न बरस पड़ती। दुनिया की कई बड़ी-बड़ी हुकूमतें विचारों के तूफानों को रोकते हुए खून-खराबे के वातावरण में डूब गयी। सत्ताधारी लोग परिस्थितियों के प्रवाह को बदल सकते हैं। हम पहले चेतावनी देना चाहते थे। यदि हम कुछ व्यक्तियों की हत्या करने के इच्छुक होते, तो हम अपने मुख्य उद्देश्य में विफल हो जाते।
          माई लार्ड, इस नीयत और उद्देश्य को दृष्टि में रखते हुए हमने कार्यवाही की और इस कार्यवाही के परिणाम हमारे बयान का समर्थन करते हैं। एक और नुक्ता स्पष्ट करना आवश्यक है। यदि हमे बमों की ताकत के सम्बन्ध में कत्तई ज्ञान न होता, तो हम पण्डित मोती लाल नेहरू, श्री केलकर, श्री जेकर और श्री जिन्ना जैसे सम्माननीय राष्ट्रिय व्यक्तियों की उपस्थिति में क्यों बम फेंकते? हम नेताओं के जीवन को किस तरह खतरे में डाल सकते थे? हम पागल तो नहीं हैं? और अगर पागल होते, तो जेल में बंद करने के बजाय हमें पागल खाने में बंद किया जाता। बमों के सम्बन्ध में हमें निश्चित रूप से पूर्ण जानकारी थी। उसी कारण हमने ऐसा साहस किया। जिन बेंचों पर लोग बैठे थे, उन पर बम फेंकना कहीं आसन काम था, खाली जगह पर बमों को फेंकना निहायत मुश्किल था। अगर बम फेंकने वाले सही दिमागों के न होते या वे परेशान होते, तो बम खाली जगहों के बजाय बेंचों पर गिरते। तो मैं कहूँगा कि खाली जगह के चुनाव के लिए जो हिम्मत हमने दिखाई, उसके लिए हमें इनाम मिलना चाहिए। इन हालत में माई लार्ड हम सोचते हैं की हमे ठीक तरह समझा नहीं गया। आपकी सेवा में हम सजाओं में कमी कराने नहीं आये, बल्कि अपनी स्थिति स्पष्ट करने आये हैं। हम चाहते हैं की न तो हमसे अनुचित व्यवहार किया जाये, न ही हमारे सम्बन्ध में अनुचित राय दी जाये,. और रही बात हमारे लिए सज़ा की, तो हम तो मार्गदर्शक का काम करने आये थे हमारे लिए सज़ा या मौत कोई मायने नहीं रखती।"
          इन अमर शब्दों में हताशा का बोध कहीं महसूस भी नहीं होता, सिवाय बुलंद हौसलों के। यदि वह महान क्रन्तिकारी चाहता तो मौत की माफ़ी की बात करता लेकिन नहीं। भगत सिंह संभावनाओं के जननायक थे। वे हमारे अधिकारिक, औपचारिक नेता तो नहीं बन पाए शायद यही वह वजह है की सब चाहे वह अंग्रेज हुक्मरान रहें हो या फिर भारतीय दोनों उनसे खौफ खाते प्रतीत होते है. आज जरूरत है उनके विचारों को क्रियान्वित करने की, लेकिन उनके विचारों को क्रियान्वित करने में सरकारी कानूनों की घिगघी है बंध जाती है। भगत सिंह ने इतने अनछुए सवालों को स्पर्श किया है की उन पर वृहद् शोध की जरूरत है साथ ही साथ उनके विचारों पर हम कैसे चले इसके लिए बौधिक और जन आन्दोलनों की जरूरत है। जिससे उनकी अमरता और बलिदान का अमरत्व हम सभी को मार्गदर्शित करता रहे।

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Atul Kumar
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शनिवार, सितंबर 15, 2012

Hindi Diwas aur Humari bhasha ka wajood....


१४ सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में भारत में मनाया जाता है... क्या हमने ये कभी सोचने कि जरुरत समझने कि कोशिश की दूसरे मुल्कों में, किसी दूसरी भाषा का भी दिवस मनाया जाता है...? जैसे कि इंग्लिश दिवस, उर्दू  दिवस, फारसी दिवस आदि. हम दूसरों के पीछे चलने वाले पिछलग्गू बनने से बाज़ नहीं सकते... कारण की ७०० वर्षों तक मुगलों/तुर्कों की गुलामी और फिर उसके बाद ३०० वर्षों तक अंग्रेजो की गुलामी, १९४७ में अंग्रेजों से आज़ादी मिलने के बाद परिस्थितियां वही ढाक के तीन पात... लेकिन जिस देश में बहुतायत में हिंदी भाषा का प्रयोग किया जाता है उसे देश की राजभाषा की संज्ञा दे दी गयी... यह कहाँ तक सही है...?
भारत किसी एक सभ्यता या संस्कृति का नहीं वरण कई सभ्यताओं, संस्कृतियों और धर्मानुयायियों का एक विशाल संग्रह का परिचायक है. ऐसे में भारत जैसे देश में किसी भाषा को राष्ट्र भाषा का दर्जा नहीं दिया जा सकता लेकिन एक विडम्बना है की हिंदी को राज भाषा का दर्जा दे दिया गया. लेकिन न तो क्षेत्रीय भाषाओँ के लिए कोई कानून बना बना और न ही लोगों की अभिव्यक्ति को जानने की की कोशिश की गयी. इन सारी बातों के बावजूद भी लोगों ने नारा बना डाला "हिंदी-हिन्दू-हिन्दुस्तान." शायद यही वजह है की हिंदी भाषा ने सम्पूर्ण भारत को एक माले की मोतियों को पिरो कर रखा है.
वैसे तो भाषा अभिव्यक्ति की एक पद्धति है जो की हर देश में, हर प्रान्त में, हर क्षेत्र में अलग-अलग होती है. समय परिवर्तन के साथ भाषा में भी परिवर्तन होता रहता है. भाषा मानवों की, पशुओं की, पक्षियों की भिन्न होती है. यहाँ हम बात कर रहें हैं भाषा की... भारत की राष्ट्र भाषा की... हिंदी की... हिंदी! इसके इतिहास के बारे में हम जाने की कोशिश करते हैं तो हम पाते हैं कि हिंदी भाषा संस्कृत और पॉली भाषा से उद्गम स्वरुप से मणि जाती है. भाषा! किसी देश कि उन्नति और प्रगति में उस देश के नागरिकों का जितना योगदान होता है उससे कहीं ज्यादा योगदान भाषा का होता है. किसी कवि ने सही कहा है कि: "निज भाषा उन्नति अहै, सब मन्त्रों कै मूल."
आज जब भारत विकास के पथ पर पल-प्रतिपल अग्रसर है तो भाषा कि भूमिका किसी से छिपी नहीं है. पहले यहाँ कि जानता ने रजा-महाराजाओं कि गुलामी झेली, तुर्कों ने इस देश पर राज किया, अंग्रेजों ने इस देश को अपनी सफलता कि सीढ़ी बनाकर इस्तेमाल किया. १२०० वर्षों तक दूसरी सस्कृति और परम्परा की गुलामी झेलने के बाद भी हमने अपनी भाषा को नहीं छोड़ा, हाँ ऐसे में हम अनेक भाषाओँ से परिचित जरूर हुए उनमें उर्दू, अरबी, फारसी और अंग्रेजी मुख्य है, फिर हमने इन भाषाओँ की जानकारी करनी शुरू कर दी और इस आपाधापी में हम भूल गए की हमारी भी अपनी कोई भाषा है, जिसके माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति जताते आयें हैं. हमने दूसरी अन्य भाषाओँ को जानने और समझने में जो दिलचस्पी दिखाई वह उनके नियमों, कानूनों को जानने और समझने के लिए नहीं थी; वह दिलचस्पी तो थी अपने जीवन स्तर में भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए थी.
अंग्रेजों की गुलामी और उनके जुल्मों-सितम से बचने के लिए कुछ महापुरषों ने अपनी मातृ भाषा हिंदी को माध्यम से लोगों को जागरूक करने का काम किया और क्षेत्रीय भाषा में अपनी अभिव्यक्ति और विचारों से आम-जन मानस को अवगत कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उन महापुरषों की मेहनत रंग भी लायी, देश आज़ाद हो गया अंग्रेजों की गुलामी से. विश्व के सबसे बड़े और लोकतान्त्रिक देश का संविधान बना जिसे संग्रहित करने का कार्य डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने किया, लेकिन यह कार्य उन्होंने मराठी भाषा में में सम्पादित किया जिसे बाद में हिंदी में अनुवादित किया गया. इतने बड़े देश में जहाँ यह कहावत कही जाती जाती है की "कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर वाणी." लेकिन फिर भी संविधान का अनुवाद हिंदी में किया गया.
देश की आज़ादी के बाद हमारे देश के प्रधानमंत्री ने हिंदी को राज भाषा घोषित किया, और यह बयान दिया की हमारी राष्ट्र भाषा का प्रयोग किया जायेगा, ऐसे में जो क्षेत्र हिंदी भाषा की पकड़ से दूर हैं वहाँ पर सरकारी काम-काज क्षेत्रीय भाषाओँ के साथ-साथ अंग्रेजी में होने चाहिए. आज देश प्रत्यक्ष रूप से आज़ाद है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से गुलामी की बात हमारे प्रधानमत्री जी ने कह डाली है.  आज हम भाषा की गुलामी झेल रहें हैं.... जिसका परिचायक है "हिंदी दिवस" .
मै ये जानना चाहता हूँ की जब हिंदी देश की राज भाषा है तो हमारी न्यायपालिका... हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट में हिंदी में पैरवी की इजाजत क्यूँ नहीं दी गयी है? क्यूँ सैन्य सुरक्षा का कोई भी फरमान हिंदी भाषा में नहीं दिया जाता...? जबकि हमारे संविधान में ऐसी कोई धारा ऐसा कोई अनुछेद नहीं है फिर भी अपनी भाषा का इतना अपमान क्यूँ?
आप लोग सोच रहे होंगे कल था हिंदी दिवस और आज मै ये बातें क्यूँ लिख रहा हूँ...? कारण एकदम स्पष्ट है का दिन भर क्या चला और लोगों के या हिंदी के सेवकों की क्या राय थी को जानने की... 
पर अफ़सोस लोगों की अभिव्यक्ति हिंदी दिवस मनाने तक ही सीमित सी लगी... देश की नीति स्वार्थों के बलबूते पर कदापि नहीं चला करती. एक देश, एक ध्वज, एक संविधान और एक भाषा प्रत्येक नागरिक का नारा होना चाहिए... लेकिन जिस देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ही अपनी राष्ट्र भाषा की इज्ज़त नहीं करती, उसे आदर नहीं देती, वह भाषा उस देश की राज भाषा कैसे हो सकती है? और कैसे दूसरे देशों से आये हुए घुसपैठिये हिंदी को अपने भाषा स्वीकार करेंगे...? आखिर कैसे...? और कब तक हम करते रहेंगे अपनी ही भाषा का दिवस मनाने का दिखावा...? आखिर कब तक...?
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शुक्रवार, जून 08, 2012

पर्यावरण की दशा और दिशा


परि-आवरण। परि अर्थात् चारों ओर, आवरण अर्थात् ढका हुआ या रुका हुआ।
आज पर्यावरण की दशा और दिशा को समझने के लिए प्रकृति को समझना बहुत जरुरी हो गया है. पर्यावरण और प्रकृति दोनों एक ही सिक्के के दो पहलु हैं, लेकिन आज के दौर में लोगों ने इसे अलग-अलग नजरिये से देखना शुरू कर दिया है. जो कि बहुत ही भ्रमात्मक और भयावह है.
आज हर व्यक्ति पर्यावरण की बात करता है, प्रदूषण से बचाव के उपाय सोचता है। व्यक्ति स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण में रहने के अधिकारों के प्रति सजग होने लगा है और अपने दायित्वों को समझने लगा है। वर्तमान में विश्व ग्लोबल वार्मिंग के सवालों से जूझ रहा है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए विश्व के अनेक देशों में वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग और खोजें हुई हैं। उनके अनुसार अगर प्रदूषण फैलने की रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही तो अगले दो दशकों में धरती की औसत तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक के दर से बढ़ेगा। यह चिंताजनक है।
तापमान की इस वृद्धि में विश्व के सारे जीव-जंतु बेहाल हो जाएँगे और उनका जीवन खतरे में पड़ जाएगा। पेड़-पौधों में भी इसी तरह का बदलाव आएगा। सागर के आस-पास रहने वाली आबादी पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। जल स्तर ऊपर उठने के कारण सागर तट पर बसे ज्यादातर शहर इन्हीं सागरों में समा जाएंगे। हाल ही में कुछ वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि जलवायु में बिगाड़ का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो कुपोषण और विषाणुजनित रोगों से होने वाली मौतों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हो सकती है। जलवायु परिवर्तन से हर साल पचास लाख लोग बीमार पड़ रहे हैं।
 इस पारिस्थितिक संकट से निपटने के लिए मानव को सचेत रहने की जरूरत है। दुनिया भर की राजनीतिक शक्तियां इस बहस में उलझी हैं कि गरमाती धरती के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए। अधिकतर राष्ट्र यह मानते हैं कि उनकी वजह से ग्लोबल वार्मिग नहीं हो रही है। लेकिन सच यह है कि इसके लिए कोई भी जिम्मेदार हो भुगतना सबको है।
 यह बहस जारी रहेगी लेकिन ऐसी कई छोटी पहल है जिसे अगर हम शुरू करें तो धरती को बचाने में बूंद भर योगदान कर सकते हैं। हम अगर अपने बचपन में वापस लौट कर देखें तो हम पाते हैं कि ये सारी चीजें जिस रूप में और जितनी मात्रा में पहले पाई जाती थीं, वैसे अब नहीं मिलती। पुराने जमाने में अपने देश में ढेर सारे जंगल थे। जंगलों में ऋषि-मुनियों के आश्रम हुआ करते थे। इन आश्रमों के आस-पास शिकार खेलना मना था। अनेक प्रकार के पशु-पक्षी और मृग निर्भय होकर घूमा करते थे। गांवों और कस्बों के मनोरम बागों में चिड़ियाँ चहचहाया करती थीं, बुलबुल और कोयलें गाया करती थीं। पेड़ के नीचे कि शीतल छाया और गर्मी में भी ठण्ड का एहसास जो आज सिर्फ कल्पनाओं, फिल्मों और ए. सी. कमरों में सिमट के रह गया है कोयल की कूक सुनने को मन तरस जाता है, मोर का नाच देखे बिना ही बरसात बीत जाती है। बाघ, चीता, हिरन, खरगोश आदि जंगलों के बजाय चिड़ियाघरों की शोभा बढ़ाने लगे हैं। हम ‘सुरसा’ राक्षसी के मुह की तरह बढ़ती अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जंगल काट डाले हैं, वन्य-जीवों का आवास उजाड़ दिया है। सब कुछ बदल चुका है क्या हमने कभी सोचा है की इतना बदलाव क्यूँ और कैसे हो गया? या ऐसे परिवर्तन जो हमे पल-प्रतिपल विनाश और मृत्यु की तरफ ले जा रहें हैं कब तक होते रहेंगे…?
जिस गति से विश्व का तापमान बढ रहा है उस आधार पर यह कहना गलत नहीं होगा कि अब पृथ्वी की  आयु ज्यादा नहीं रही.. अगर हम अब भी नहीं चेते तो सम्पूर्ण मानव सभ्यता नष्ट हो जाएगी बढ़ते उच्च ताप और पिघलते ग्लेशियर से सारी पृथ्वी जल-मग्न हो जाएगी तब दुनिया के निर्माण के लिए कोई श्रद्धा-मनु नहीं होंगे… न ही आदम और हौव्वा आयेंगे इस पृथ्वी को बचने... अगर हम अपने आपको और अपने वातावरण को बचाना चाहते हैं तो अब समय आ गया है बदलाव का… हमे बदलाव लाना है वृक्षों की कटाई पर रोक लगाकर नये वृक्षों को रोपने की और उन्हें पोषित करने के लिए... बदलाव हमे लाना होगा भौतिकवादी युग से निकलने के लिए और प्रकृति के संरक्षण और उस पर निर्भरता के लिए… 
आज का युग पर्यावरणीय चेतना का युग है। हर व्यक्ति अपने पर्यावरण के प्रति चिन्तित है। ज्ञान और विज्ञान की हर शाखा के विद्वान, चिन्तक पर्यावरण की सुरक्षा और संचालन के प्रति जागरुक हैं। आज हर व्यक्ति स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण में रहने के अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगा है और अपने दायित्वों को समझने लगा है। यही कारण है कि आज ज्ञान-विज्ञान की ऐसी कोई भी विषय-शाखा नहीं है, जिसमें पर्यावरण संबंधी समस्याओं की चर्चा न हो।
 वे सारी स्थितियाँ, परिस्थितियाँ का प्रभाव जो किसी भी प्राणी या प्राणियों के विकास पर चारों ओर से प्रभाव डालते हैं, वह उसका पर्यावरण है। वास्तव में पर्यावरण में वह सब कुछ सम्मिलित है, जिसे हम अपने चारों ओर देखते हैं,  जल, स्थल, वाय़ु, मनुष्य, पशु (जलचर, थलचर, नभचर), वृक्ष, पहा़ड़, घाटियाँ एवं भू-दृश्य आदि सभी पर्यावरण के भाग हैं। अगर पर्यावरण के एकीकृत रूप को देखा जाए तो हम देख सकते हैं कि प्रत्येक पर्यावरण घटक में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा का उपयोग निश्चित है। तालिका में पर्यावरण के विभिन्न घटकों को दर्शाया गया है।
 जरा सोचिये, हमारे चारों ओर किस चीज़ का आवरण है ? वे कौन-कौन सी चीज़ें हैं, जिनसे हम घिरे हैं ? हमारे चारों ओर हवा है, पेड़-पौधे हैं, पशु–पक्षी हैं, मिट्टी है, पानी है, और ऊपर चाँद-सितारें हैं। अतः ये सारी चीजें हमारे पर्यावरण के अंग हैं और इन्हीं से मिलकर बना है हमारा पर्यावरण। जब बड़े लोग पर्यावरण की बात करते हैं, उसके सुरक्षा और संतुलन के प्रति चिंता व्यक्त करते हैं, तो उनका तात्पर्य इन सारी चीजों से होता है।
 हमे ऐसा लगता है कि ये सारी चीजें तो हमारे आस-पास सदियों से पाई जाती हैं, और पाई जाती रहेंगी तो फिर हमे  चिंता किस बात की है ?
दरअसल, चिंता की बात यह है कि हमारी जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ अन्य जीवों, पशु-पक्षियों और पौधों के विलुप्त हो जाने की आशंका बढ़ती जा रही है। जैसे-जैसे हमारी जनसंख्या बढ़ रही है, उद्योग-धंधों का विकास हो रहा है, वैसे-वैसे हमारे पर्यावरण को खतरा बढ़ रहा है।
 कल-कारखानों से निकलने वाली विषैली गैसें हमारे वायुमण्डल को जहरीला बना रही हैं। इन कारखानों से निकलने वाले व्यर्थ पदार्थ हमारे नदी-नालों और मिट्टी को प्रदूषित कर रहे हैं। इस प्रकार हम मनुष्यों के ही स्वास्थ्य और जीवन के लिए खतरा होता जा रहा है। चिंता की बात यही है।
 पर्यावरण का विषय-क्षेत्र इन सारी चिंताओं को अपने-आप में समेटे हुए है। पर्यावरण संबंधी चिंताओं ने समूचे मानव समुदाय को झकझोर कर रखा दिया है। कहा जाता है कि मानव इस जीवन जगत् में सबसे बुद्धिमान प्राणी है। शायद यह कहना सच भी है, लेकिन पर्यावरण की समस्या ने मानव बुद्धि को चकरा दिया है।
सारी मानव जाति आज के ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहाँ से सामने की दिशा में पूर्वत्तर आगे बढ़ते जाना अपने को मौत के मुंह में ढकेलने के बराबर है। लेकिन लौटकर पीछे जाना स्वयं ही जंगली आदम-सभ्यता को स्वीकार लेना होगा। समस्या सचमुच बड़ी जटिल है। पीछे लेना होगा। पीछे लौटकर न तो हम मानव सभ्यता के गौरवपूर्ण इतिहास को झुठलाना चाहेंगे और न ही आगे बढ़ते हुए अपनी सुंदर सभ्यता नष्ट करना पसंद करेंगे।
 ‘इधर मौत उधर खाई, के इस द्वंद्व को मिटाने का एक ही उपाय है। एक नये रास्ते का निर्माण, एक नई दिशा में प्रस्थान, इसी नई दिशा की खोज का प्रयास है पर्यावरण विज्ञान। लेकिन हम किसी भी दिशा में तो चल नहीं सकते। प्रकृति का संतुलन बड़ा नाजुक है।
 इस नाजुक संतुलन को बनाए रखते हुए ही हम अपनी नई दिशा तलाश सकते हैं। कभी भी अगर हम चूके तो पहाड़ी से फिसलते हुए व्यक्ति की तरह कहाँ जा गिरेंगे, कोई ठिकाना नहीं।


Atul Kumar
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शनिवार, मार्च 24, 2012

Shaheede-Aazam-Bhagatsingh



23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाने के लिए देश भर में लोगों ने काम कर डाले हैं   किसी ने एन जी ओ के माध्यम से तो किसी ने ट्रस्ट बना कर... बस किसी तरह से सरकारी धन के लूट के  रास्ते बनते रहें, चाहे वह रास्ता किसी की शहादत का हो या किसी भी तरह का... लोगों को सिर्फ एक ढाल चाहिए वो सभी को शहीद बता कर पैसे कमा लेंगे... हलाकि ये बातें इस समय कोई मायने नहीं रखती हैं; जब हम एक ऐसे व्यक्तित्व की बात कर रहे हैं जोकि अपने आपमें में एक आग था, एक तूफान था जिसके सामने अंग्रेजी शासन ने घुटने टेक दिए थे... हमारे राष्ट्रपिता को भी उसके बढ़ते हुए कद से खौफ का अहसास होने लगा था आज मै बात करना चाहता हूँ शहीदे-आज़म-भगतसिंह जी कि...
मै एक साधारण आदमी और भारतीय होने के नाते इस विभूति पर बात करने के लायक तो नहीं हूँ पर मै ही अधिकृत व्यक्ति हूँ, जो की शहीदे-आज़म-भगतसिंह के बारे में, उनके जीवन से जुड़े हर पहलू पर बात कर सके  भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण भारतीय लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? मैं किसी भावुकता या तार्किकता की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करना चाहता इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना उचित नहीं होगा
पहली बात यह कि "दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो पाई, उनसे बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है?" उस शहीदे-आज़म-भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कार्य भारत की सरकारी और गैर-सरकारी मशीनरी सहित भगतसिंह के प्रशंसक ने भी नहीं किया जो की भगतसिंह की असली पहचान है
भगत सिंह को किताबों में ही कैदी बना कर रख दिया गया है उनको किताबों से बाहर लाना ही उस नौजवान देशभक्त के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी भगतसिंह विचारों के तहखाने में कैद है। उनको बहस के केन्द्र में लाएं भगतसिंह ने कहा था कि “ये बड़े बड़े अखबार तो बिके हुए हैं, इनके चक्कर में क्यों पड़ते हो?” भगतसिंह और उनके साथी छोटे छोटे ट्रैक्ट 16 और 24 पृष्ठों की पत्रिकाएं छाप कर आपस में बांटते थे यदि हम यही कर सकें तो इतनी ही सेवा भगतसिंह के लिए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बहुत है विचारों की शान पर अगर कोई चीज चढ़ेगी तो वह तलवार बन जाती है, और जो सारी भ्रांतियों को निस्त-नाबुत कर देगी यह भगतसिंह ने हमको सिखाया था ऐसी कुछ बुनियादी बातें हैं जिनकी तरफ हम सभी को अब ध्यान देना ही होगा
भगतसिंह की उम्र का कोई भी व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु नहीं बन पाया महात्मा गांधी, विवेकानन्द भी नहीं औरों की तो बात ही छोड़ दें पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अपरिचित और अप्रचारित है इस उज्जवल चेहरे को वे लोग भी देखना नहीं चाहते जो की अपने को सरस्वती के सच्चे साधक मानते हैं ऐसे लोग भी शहीदे-आज़म-भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं
मैं डॉ. राम मनोहर लोहिया के शब्दों में महात्मा गांधी से भी शिकायत करता हूँ कि 'हिन्द स्वराज' नाम की आपने जो अमर कृति 1909 में लिखी वह अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी उसे आप देवनागरी में भी लिख सकते थे जो काम गांधी और टैगोर नहीं कर सके जो काम हिन्दी के वरिष्ठ लेखक ठीक से नहीं कर सके, उस पर साहसपूर्वक बात को कह कर भगतसिंह जैसे 17 साल के तरुण ने भारत के इतिहास में दीपक का कार्य किया और हमारा मार्ग प्रशस्त किया उनके ज्ञान-पक्ष की तरफ हम पूरी तौर से अज्ञान बने हैं फिर भी भगतसिंह की जय बोलने में हमारा कोई मुकाबला नहीं है

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है कि 1928 का वर्ष भारी उथलपुथल का, भारी राजनीतिक हलचल का वर्ष था 1930 में कांग्रेस का रावी अधिवेशन हुआ, 1928 से 1930 के बीच ही कांग्रेस की हालत बदल गई जो कांग्रेस केवल निवेदन करती थी, अंग्रेज से यहां से जाने की बातें करती थी उसको मजबूर होकर लगभग अर्ध-हिंसक आंदोलनों में भी अपने आपको कभी-कभी झोंकना पड़ा यह भगतसिंह का कांग्रेस की नैतिक ताकत पर मर्दाना प्रभाव था हिन्दुस्तान की राजनीति में कांग्रेस में पहली बार युवा नेतृत्व अगर कहीं उभर कर आया है तो सुभाष चन्द्र बोष और जवाहरलाल नेहरू के रूप में है कांग्रेस में 1930 में जवाहरलाल नेहरू नेता बनकर 39 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय अध्यक्ष बने उनके हाथों तिरंगा झंडा फहराया गया और उन्होंने कहा- "पूर्ण स्वतंत्रता ही हमारा लक्ष्य है।" भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का यह चरित्र मुख्यत: भगतसिंह की वजह से बदला
भगतसिंह भारत के पहले नागरिक, विचारक और नेता हैं, जिन्होंने ने कहा था "भारत केवल किसान और मजदूर के दम पर नहीं आगे बढ सकता, जब तक नौजवान उसमें शामिल नहीं होंगे, तब तक कोई क्रांति नहीं हो सकती भगतसिंह ने पहली बार कुछ ऐसे बुनियादी मौलिक प्रयोग भारत की राजनीतिक प्रयोगशाला में किए हैं जिसकी जानकारी तक लोगों को नहीं है भगतसिंह के मित्र कॉमरेड सोहन सिंह उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे, लेकिन भगतसिंह ने मना कर दिया जो आदमी कट्टर मार्क्सवादी था, जो रूस के तमाम विद्वानों की पुस्तकों को पढ़ते रहते थे आप कल्पना करेंगे कि जिन्हें कुछ हफ्ता पहले, कुछ दिनों पहले, यह मालूम पड़े कि उसको फांसी होने वाली है। उसके बाद भी रोज किताबें पढ़े? लेकिन भगतसिंह का व्यक्तित्व ऐसा ही था, भगतसिंह मृत्युंजय थे भारत के इतिहास में गिने-चुने ही मृत्युंजय हुए हैं.
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।



इसी जोशीले गीत के साथ 23  मार्च 1931  को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन जैसे वक्ता की नहीं बल्कि "राम प्रसाद बिस्मिल" की जीवनी पढ़ रहे थे। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।" फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाए इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए तथा फिर इसे बोरियों में भर कर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आए । इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंककर भाग जाना ही उचित समझा। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये।
भगतसिंह संभावनाओं के जननायक थे  वे हमारे अधिकारिक, औपचारिक नेता बन नहीं पाए इसलिए सब लोग भगतसिंह से डरते हैं- अंग्रेज और भारतीय हुक्मरान दोनों उनके विचारों को क्रियान्वित करने में सरकारी कानूनों की घिग्गी बंध जाती है संविधान पोषित राज्य व्यवस्थाओं में यदि कानून ही अजन्मे रहेंगे तो लोकतंत्र की प्रतिबद्धताओं का क्या होगा? भगतसिंह ने इतने अनछुए सवालों को र्स्पश किया है कि उन पर अब भी शोध होना बाकी है भगतसिंह के विचार केवल प्रशंसा के योग्य नहीं हैं, उन पर क्रियान्वयन कैसे हो-इसके लिए बौद्धिक और जन आन्दोलनों की जरूरत है
भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के उद्योगपतियो एक हो जाओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि अपनी बीवी के जन्म-दिन पर हवाई जहाज तोहफे में भेंट करो और उसको देश का गौरव बताओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि वकीलों एक हो जाओ क्योंकि वकीलों को एक रखना और मेंढकों को तराजू पर रखकर तौलना बराबर है भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के डॉक्टरों को एक करो। उनको मालूम था कि अधिकतर डॉक्टर केवल मरीज के जिस्म और उसके प्राणों से खेलते हैं उनका सारा ध्येय इस बात का होता है कि उनको फीस ज्यादा से ज्यादा कैसे मिले? अपवाद जरूर हैं; लेकिन अपवाद नियम को ही सिद्ध करते हैं इसलिए भगतसिंह ने कहा था दुनिया के मजदूरो एक हो। इसलिए भगतसिंह ने कहा था कि किसान मजदूर और नौजवान की एकता होनी चाहिए भगतसिंह पर राष्ट्रवाद का नशा छाया हुआ था उनका रास्ता मार्क्स के रास्ते से निकल कर आता था एक अजीब तरह का राजनीतिक प्रयोग भारत की राजनीति में होने वाला था लेकिन भगतसिंह काल कवलित हो गए, असमय चले गए हमारे देश में तार्किकता, बहस, लोकतांत्रिक आजादी, जनप्रतिरोध, सरकारों के खिलाफ अराजक होकर खड़े हो जाने का अधिकार छिन रहा है हमारे देश में मूर्ख राजा हैं वे सत्ता पर लगातार बैठ रहे हैं, जिन्हें ठीक से हस्ताक्षर भी करना नहीं आता ऐसे लोग देश के राजनीतिक चेक पर हस्ताक्षर कर रहे हैं हमारे यहां "आई एम सॉरी" जैसी एक सर्विस आ गई है. आई.ए.एस. आई.पी.एस.  की नौकरशाही है उसमें अब भ्रष्ट अधिकारी इतने ज्यादा हैं कि अच्छे अधिकारी ढूंढ़ना मुश्किल है हमारे देश में निकम्मे साधुओं की जमात है, वे निकम्मे हैं लेकिन मलाई खाते हैं इस देश के मेहनतकश मजदूर के लिए अगर कुछ रुपयों के बढ़ने की बात होती है, सब उनसे लड़ने बैठ जाते हैं हमारे देश में असंगठित मजदूरों का बहुत बड़ा दायरा है, हम उनको संगठित करने की कोशिश नहीं करते, हमारे देश में पहले से ही सुरक्षित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के कानून बने हुए हैं लेकिन भारत की संसद ने आज तक नहीं सोचा कि भारत के किसानों के भी अधिकार होने चाहिए भारतीय किसान अधिनियम जैसा कोई अधिनियम नहीं है किसान की फसल का कितना पैसा उसको मिले वह कुछ भी तय नहीं है एक किसान अगर सौ रुपये के बराबर का उत्पाद करता है तो बाजार में उपभोक्ता को वह वस्तु हजार रुपये में मिलती है आठ-नौ सौ रुपये बिचौलिए और दलाली में खाए जाते हैं। उनको भी सरकारी संरक्षण प्राप्त होता है, और सरकार खुद भी दलाली ही करती है ऐसे किसानों की रक्षा के लिए भगतसिंह खड़े हुए थे
भगतसिंह समाजवाद और धर्म को अलग-अलग समझते थे विवेकानंद समाजवाद और धर्म को समायोजित करते थे विवेकानंद समझते थे कि हिन्दुस्तान की धार्मिक जनता को धर्म के आधार पर समाजवाद की घुट्टी अगर पिलायी जाए तो शायद ठीक से समझ में बात आएगी गांधीजी भी लगभग इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते थे लेकिन भगतसिंह भारत के पहले रेशनल थिंकर, पहले विचारशील व्यक्ति थे, जो धर्म के दायरे से बाहर थे
श्रीमती दुर्गादेवी वोहरा को अंग्रेजी जल्लादों से बचाने के लिए जब भगतसिंह अपने केश काटकर प्रथम श्रेणी के डब्बे में कलकत्ता तक की यात्रा करनी पड़ी तो लोगों ने उनकी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सिख होकर अपने केश कटा लिए आपने? हमारे यहां तो पांच चीजें रखनी पड़ती हैं हर सिख को उसमें केश भी आता है यह आपने क्या किया? कैसे सिख हैं आप! जो सज्जन सवाल पूछ रहे थे वे शायद धार्मिक व्यक्ति थे भगतसिंह ने एक धार्मिक व्यक्ति की तरह जवाब दिया "मेरे भाई तुम ठीक कहते हो, मैं सिख हूं, गुरु गोविंद सिंह ने कहा है कि अपने धर्म की रक्षा करने के लिए अपने शरीर का अंग-अंग कटवा दो मैंने केश कटवा दिए, अब मौका मिलेगा तो अपनी गरदन कटवा दूंगा।" यह तार्किक विचारशीलता भगतसिंह की है उस नए भारत में वे 1931 के पहले कह रहे थे जिसमें भारत  के गरीब आदमी, इंकलाब और आर्थिक बराबरी के लिए, समाजवाद को पाने के लिए, देश और चरित्र को बनाने के लिए, दुनिया में भारत का झंडा बुलंद करने के लिए धर्म जैसी चीज की हमको जरूरत नहीं होनी चाहिए
भगतसिंह ने शहादत दे दी, फकत इतना कहना भगतसिंह के कद को छोटा करना है जितनी उम्र में भगतसिंह कुर्बान हो गए, इससे कम उम्र में मदनलाल धींगरा और शायद करतार सिंह सराभा चले गए थे भगतसिंह ने तो स्वयं मृत्यु का वरण किया यदि वे पंजाब की असेंबली में बम नहीं फेंकते तो क्या होता? कांग्रेस के इतिहास को भगतसिंह का ऋणी होना पड़ेगा लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल और बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस की अगुआई की थी, भगतसिंह लाला लाजपत राय के समर्थक और अनुयायी शुरू में थे
भूगोल और इतिहास से काटकर भगतसिंह के कद को एक बियाबान में नहीं देखा जा सकता जब लाला लाजपत राय की जलियावाला बाग की घटना के दौरान लाठियों से कुचले जाने की वजह से मृत्यु हो गई तो भगतसिंह ने केवल उस बात का बदला लेने के लिए एक सांकेतिक हिंसा की और सांडर्स की हत्या हुई भगतसिंह चाहते तो जी सकते थे, यहां वहां आजादी की अलख जगा सकते थे। बहुत से क्रांतिकारी भगतसिंह के साथी जिए ही लेकिन भगतसिंह ने सोचा कि यही वक्त है जब इतिहास की सलवटों पर शहादत की इस्तरी चलाई जा सकती है जिसमें वक्त के तेवर पढ़ने का मेधा  हो, ताकत हो, वही इतिहास पुरुष होता है
भगतसिंह ने कहा था जब तक भारत के नौजवान भारत के किसान के पास नहीं जाएंगे, गांव नहीं जाएंगे, उनके साथ पसीना बहाकर काम नहीं करेंगे तब तक भारत की आजादी का कोई मुकम्मिल अर्थ नहीं होगा मैं हताश तो नहीं हूं लेकिन निराश लोगों में से हूं, भारत के 18 वर्ष के नौजवान जो वोट देने का अधिकार रखते हैं उनको राजनीति की समझ नहीं है जब अस्सी-नब्बे वर्ष के लोग सत्ता की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ सकते तो नौजवान को भारत की राजनीति से अलग करना मुनासिब नहीं है लेकिन राजनीति का मतलब कुर्सी नहीं है
हम एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश का शिकार हैं हमको यही बताया जाता है कि डॉ. अम्बेडकर ने भारत के संविधान की रचना की भारत के स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों ने भारत के संविधान की रचना की संविधान की पोथी को बनाने वाली असेम्बली का इतिहास पढ़ें सेवानिवृत्त आई.सी.एस . अधिकारी, दीवान साहब और राय बहादुर और कई पश्चिमाभिमुख बुद्धिजीवियों ने मूल पाठ बनाया देशभक्तों ने उस पर बहस की, उस पर दस्तखत करके उसको पेश कर दिया संविधान की पोथी का अपमान नहीं होना चाहिए लेकिन जब हम रामायण, गीता, कुरान शरीफ, बाईबिल और गुरु ग्रंथ साहब पर बहस कर सकते हैं कि इनके सच्चे अर्थ क्या होने चाहिए तो हमको हिन्दुस्तान की उस पोथी की जिसकी वजह से सारा देश चल रहा है, आयतों को पढ़ने, समझने और उसके मर्म को बहस के केन्द्र में डालने का भी अधिकार मिलना चाहिए. यही भगतसिंह का रास्ता है
            बड़ी खुशनसीब रही होगी वह कोख और गर्व से चौडा हो गया होगा उस बाप का सीना जिस दिन देश की आजदी के खातिर उसका लाल फांसी चढ़ गया था। हॉं आज उसी माँ-बाप के लाल भगत सिंह का शहीद दिवस है। आज देश भगत सिंह की 81वीं शहादत वर्ष पर भावभीनी श्रद्धांजलि देने जा  रहा है, 23 मार्च 1931 को शहीदे-आज़म-भगतसिंह को राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी दे दी गयी थी। भगत सिंह का जन्‍म 28 सितंबर 1907 में एक देश भक्‍त क्रान्तिकारी परिवार में हुआ था। सही कह गया कि "शेर के घर शेर ही जन्‍म लेता है।" उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पंडित राम प्रसाद "बिस्मिल"  ने अपनी आत्म-कथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगतसिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये। फाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था -

"उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है  

हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है

दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।

सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।"




           इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्र शेखर "आज़ाद" से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।
हे देश के सच्चे सपूत आपको शत-शत नमन...
जय हिंद...


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Thanks and Regards
Atul Kumar
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