शनिवार, मार्च 24, 2012

Shaheede-Aazam-Bhagatsingh



23 मार्च को शहीद दिवस के रूप में मनाने के लिए देश भर में लोगों ने काम कर डाले हैं   किसी ने एन जी ओ के माध्यम से तो किसी ने ट्रस्ट बना कर... बस किसी तरह से सरकारी धन के लूट के  रास्ते बनते रहें, चाहे वह रास्ता किसी की शहादत का हो या किसी भी तरह का... लोगों को सिर्फ एक ढाल चाहिए वो सभी को शहीद बता कर पैसे कमा लेंगे... हलाकि ये बातें इस समय कोई मायने नहीं रखती हैं; जब हम एक ऐसे व्यक्तित्व की बात कर रहे हैं जोकि अपने आपमें में एक आग था, एक तूफान था जिसके सामने अंग्रेजी शासन ने घुटने टेक दिए थे... हमारे राष्ट्रपिता को भी उसके बढ़ते हुए कद से खौफ का अहसास होने लगा था आज मै बात करना चाहता हूँ शहीदे-आज़म-भगतसिंह जी कि...
मै एक साधारण आदमी और भारतीय होने के नाते इस विभूति पर बात करने के लायक तो नहीं हूँ पर मै ही अधिकृत व्यक्ति हूँ, जो की शहीदे-आज़म-भगतसिंह के बारे में, उनके जीवन से जुड़े हर पहलू पर बात कर सके  भगतसिंह के बारे में अगर हम साधारण भारतीय लोग गम्भीरतापूर्वक बात नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? मैं किसी भावुकता या तार्किकता की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करना चाहता इतिहास और भूगोल, सामाजिक परिस्थितियों और तमाम बड़ी उन ताकतों की, जिनकी वजह से भगतसिंह का हम मूल्यांकन करते हैं, अनदेखी करके भगतसिंह को देखना उचित नहीं होगा
पहली बात यह कि "दुनिया के इतिहास में 24 वर्ष की उम्र भी जिसको नसीब नहीं हो पाई, उनसे बड़ा बुद्धिजीवी कोई हुआ है?" उस शहीदे-आज़म-भगतसिंह का यह चेहरा जिसमें उनके हाथ में एक किताब हो-चाहे कार्ल मार्क्स की दास कैपिटल, तुर्गनेव या गोर्की या चार्ल्स डिकेन्स का कोई उपन्यास, अप्टान सिन्क्लेयर या टैगोर की कोई किताब-ऐसा उनका चित्र नौजवान पीढ़ी के सामने प्रचारित करने का कोई भी कार्य भारत की सरकारी और गैर-सरकारी मशीनरी सहित भगतसिंह के प्रशंसक ने भी नहीं किया जो की भगतसिंह की असली पहचान है
भगत सिंह को किताबों में ही कैदी बना कर रख दिया गया है उनको किताबों से बाहर लाना ही उस नौजवान देशभक्त के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी भगतसिंह विचारों के तहखाने में कैद है। उनको बहस के केन्द्र में लाएं भगतसिंह ने कहा था कि “ये बड़े बड़े अखबार तो बिके हुए हैं, इनके चक्कर में क्यों पड़ते हो?” भगतसिंह और उनके साथी छोटे छोटे ट्रैक्ट 16 और 24 पृष्ठों की पत्रिकाएं छाप कर आपस में बांटते थे यदि हम यही कर सकें तो इतनी ही सेवा भगतसिंह के लिए उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बहुत है विचारों की शान पर अगर कोई चीज चढ़ेगी तो वह तलवार बन जाती है, और जो सारी भ्रांतियों को निस्त-नाबुत कर देगी यह भगतसिंह ने हमको सिखाया था ऐसी कुछ बुनियादी बातें हैं जिनकी तरफ हम सभी को अब ध्यान देना ही होगा
भगतसिंह की उम्र का कोई भी व्यक्ति क्या भारतीय राजनीति का धूमकेतु नहीं बन पाया महात्मा गांधी, विवेकानन्द भी नहीं औरों की तो बात ही छोड़ दें पूरी दुनिया में भगतसिंह से कम उम्र में किताबें पढ़कर अपने मौलिक विचारों का प्रवर्तन करने की कोशिश किसी ने नहीं की लेकिन भगतसिंह का यही चेहरा सबसे अपरिचित और अप्रचारित है इस उज्जवल चेहरे को वे लोग भी देखना नहीं चाहते जो की अपने को सरस्वती के सच्चे साधक मानते हैं ऐसे लोग भी शहीदे-आज़म-भगतसिंह को सबसे बड़ा बुद्धिजीवी कहने में हिचकते हैं
मैं डॉ. राम मनोहर लोहिया के शब्दों में महात्मा गांधी से भी शिकायत करता हूँ कि 'हिन्द स्वराज' नाम की आपने जो अमर कृति 1909 में लिखी वह अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी उसे आप देवनागरी में भी लिख सकते थे जो काम गांधी और टैगोर नहीं कर सके जो काम हिन्दी के वरिष्ठ लेखक ठीक से नहीं कर सके, उस पर साहसपूर्वक बात को कह कर भगतसिंह जैसे 17 साल के तरुण ने भारत के इतिहास में दीपक का कार्य किया और हमारा मार्ग प्रशस्त किया उनके ज्ञान-पक्ष की तरफ हम पूरी तौर से अज्ञान बने हैं फिर भी भगतसिंह की जय बोलने में हमारा कोई मुकाबला नहीं है

जवाहरलाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा भी है कि 1928 का वर्ष भारी उथलपुथल का, भारी राजनीतिक हलचल का वर्ष था 1930 में कांग्रेस का रावी अधिवेशन हुआ, 1928 से 1930 के बीच ही कांग्रेस की हालत बदल गई जो कांग्रेस केवल निवेदन करती थी, अंग्रेज से यहां से जाने की बातें करती थी उसको मजबूर होकर लगभग अर्ध-हिंसक आंदोलनों में भी अपने आपको कभी-कभी झोंकना पड़ा यह भगतसिंह का कांग्रेस की नैतिक ताकत पर मर्दाना प्रभाव था हिन्दुस्तान की राजनीति में कांग्रेस में पहली बार युवा नेतृत्व अगर कहीं उभर कर आया है तो सुभाष चन्द्र बोष और जवाहरलाल नेहरू के रूप में है कांग्रेस में 1930 में जवाहरलाल नेहरू नेता बनकर 39 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय अध्यक्ष बने उनके हाथों तिरंगा झंडा फहराया गया और उन्होंने कहा- "पूर्ण स्वतंत्रता ही हमारा लक्ष्य है।" भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का यह चरित्र मुख्यत: भगतसिंह की वजह से बदला
भगतसिंह भारत के पहले नागरिक, विचारक और नेता हैं, जिन्होंने ने कहा था "भारत केवल किसान और मजदूर के दम पर नहीं आगे बढ सकता, जब तक नौजवान उसमें शामिल नहीं होंगे, तब तक कोई क्रांति नहीं हो सकती भगतसिंह ने पहली बार कुछ ऐसे बुनियादी मौलिक प्रयोग भारत की राजनीतिक प्रयोगशाला में किए हैं जिसकी जानकारी तक लोगों को नहीं है भगतसिंह के मित्र कॉमरेड सोहन सिंह उन्हें कम्युनिस्ट पार्टी में ले जाना चाहते थे, लेकिन भगतसिंह ने मना कर दिया जो आदमी कट्टर मार्क्सवादी था, जो रूस के तमाम विद्वानों की पुस्तकों को पढ़ते रहते थे आप कल्पना करेंगे कि जिन्हें कुछ हफ्ता पहले, कुछ दिनों पहले, यह मालूम पड़े कि उसको फांसी होने वाली है। उसके बाद भी रोज किताबें पढ़े? लेकिन भगतसिंह का व्यक्तित्व ऐसा ही था, भगतसिंह मृत्युंजय थे भारत के इतिहास में गिने-चुने ही मृत्युंजय हुए हैं.
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला।।



इसी जोशीले गीत के साथ 23  मार्च 1931  को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह तथा इनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु को फाँसी दे दी गई । फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन जैसे वक्ता की नहीं बल्कि "राम प्रसाद बिस्मिल" की जीवनी पढ़ रहे थे। कहा जाता है कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें यह सूचना दी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है तो उन्होंने कहा था- "ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।" फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले - "ठीक है अब चलो ।" फाँसी के बाद कहीं कोई आन्दोलन न भड़क जाए इसके डर से अंग्रेजों ने पहले इनके मृत शरीर के टुकड़े किए तथा फिर इसे बोरियों में भर कर फिरोजपुर की ओर ले गये जहाँ घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। गाँव के लोगों ने आग जलती देखी तो करीब आए । इससे डरकर अंग्रेजों ने इनकी लाश के अधजले टुकड़ों को सतलुज नदी में फेंककर भाग जाना ही उचित समझा। जब गाँव वाले पास आये तब उन्होंने इनके मृत शरीर के टुकड़ो कों एकत्रित कर विधिवत दाह संस्कार किया । और भगत सिंह हमेशा के लिये अमर हो गये।
भगतसिंह संभावनाओं के जननायक थे  वे हमारे अधिकारिक, औपचारिक नेता बन नहीं पाए इसलिए सब लोग भगतसिंह से डरते हैं- अंग्रेज और भारतीय हुक्मरान दोनों उनके विचारों को क्रियान्वित करने में सरकारी कानूनों की घिग्गी बंध जाती है संविधान पोषित राज्य व्यवस्थाओं में यदि कानून ही अजन्मे रहेंगे तो लोकतंत्र की प्रतिबद्धताओं का क्या होगा? भगतसिंह ने इतने अनछुए सवालों को र्स्पश किया है कि उन पर अब भी शोध होना बाकी है भगतसिंह के विचार केवल प्रशंसा के योग्य नहीं हैं, उन पर क्रियान्वयन कैसे हो-इसके लिए बौद्धिक और जन आन्दोलनों की जरूरत है
भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के उद्योगपतियो एक हो जाओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि अपनी बीवी के जन्म-दिन पर हवाई जहाज तोहफे में भेंट करो और उसको देश का गौरव बताओ. भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि वकीलों एक हो जाओ क्योंकि वकीलों को एक रखना और मेंढकों को तराजू पर रखकर तौलना बराबर है भगतसिंह ने कभी नहीं कहा कि देश के डॉक्टरों को एक करो। उनको मालूम था कि अधिकतर डॉक्टर केवल मरीज के जिस्म और उसके प्राणों से खेलते हैं उनका सारा ध्येय इस बात का होता है कि उनको फीस ज्यादा से ज्यादा कैसे मिले? अपवाद जरूर हैं; लेकिन अपवाद नियम को ही सिद्ध करते हैं इसलिए भगतसिंह ने कहा था दुनिया के मजदूरो एक हो। इसलिए भगतसिंह ने कहा था कि किसान मजदूर और नौजवान की एकता होनी चाहिए भगतसिंह पर राष्ट्रवाद का नशा छाया हुआ था उनका रास्ता मार्क्स के रास्ते से निकल कर आता था एक अजीब तरह का राजनीतिक प्रयोग भारत की राजनीति में होने वाला था लेकिन भगतसिंह काल कवलित हो गए, असमय चले गए हमारे देश में तार्किकता, बहस, लोकतांत्रिक आजादी, जनप्रतिरोध, सरकारों के खिलाफ अराजक होकर खड़े हो जाने का अधिकार छिन रहा है हमारे देश में मूर्ख राजा हैं वे सत्ता पर लगातार बैठ रहे हैं, जिन्हें ठीक से हस्ताक्षर भी करना नहीं आता ऐसे लोग देश के राजनीतिक चेक पर हस्ताक्षर कर रहे हैं हमारे यहां "आई एम सॉरी" जैसी एक सर्विस आ गई है. आई.ए.एस. आई.पी.एस.  की नौकरशाही है उसमें अब भ्रष्ट अधिकारी इतने ज्यादा हैं कि अच्छे अधिकारी ढूंढ़ना मुश्किल है हमारे देश में निकम्मे साधुओं की जमात है, वे निकम्मे हैं लेकिन मलाई खाते हैं इस देश के मेहनतकश मजदूर के लिए अगर कुछ रुपयों के बढ़ने की बात होती है, सब उनसे लड़ने बैठ जाते हैं हमारे देश में असंगठित मजदूरों का बहुत बड़ा दायरा है, हम उनको संगठित करने की कोशिश नहीं करते, हमारे देश में पहले से ही सुरक्षित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के कानून बने हुए हैं लेकिन भारत की संसद ने आज तक नहीं सोचा कि भारत के किसानों के भी अधिकार होने चाहिए भारतीय किसान अधिनियम जैसा कोई अधिनियम नहीं है किसान की फसल का कितना पैसा उसको मिले वह कुछ भी तय नहीं है एक किसान अगर सौ रुपये के बराबर का उत्पाद करता है तो बाजार में उपभोक्ता को वह वस्तु हजार रुपये में मिलती है आठ-नौ सौ रुपये बिचौलिए और दलाली में खाए जाते हैं। उनको भी सरकारी संरक्षण प्राप्त होता है, और सरकार खुद भी दलाली ही करती है ऐसे किसानों की रक्षा के लिए भगतसिंह खड़े हुए थे
भगतसिंह समाजवाद और धर्म को अलग-अलग समझते थे विवेकानंद समाजवाद और धर्म को समायोजित करते थे विवेकानंद समझते थे कि हिन्दुस्तान की धार्मिक जनता को धर्म के आधार पर समाजवाद की घुट्टी अगर पिलायी जाए तो शायद ठीक से समझ में बात आएगी गांधीजी भी लगभग इसी रास्ते पर चलने की कोशिश करते थे लेकिन भगतसिंह भारत के पहले रेशनल थिंकर, पहले विचारशील व्यक्ति थे, जो धर्म के दायरे से बाहर थे
श्रीमती दुर्गादेवी वोहरा को अंग्रेजी जल्लादों से बचाने के लिए जब भगतसिंह अपने केश काटकर प्रथम श्रेणी के डब्बे में कलकत्ता तक की यात्रा करनी पड़ी तो लोगों ने उनकी कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि सिख होकर अपने केश कटा लिए आपने? हमारे यहां तो पांच चीजें रखनी पड़ती हैं हर सिख को उसमें केश भी आता है यह आपने क्या किया? कैसे सिख हैं आप! जो सज्जन सवाल पूछ रहे थे वे शायद धार्मिक व्यक्ति थे भगतसिंह ने एक धार्मिक व्यक्ति की तरह जवाब दिया "मेरे भाई तुम ठीक कहते हो, मैं सिख हूं, गुरु गोविंद सिंह ने कहा है कि अपने धर्म की रक्षा करने के लिए अपने शरीर का अंग-अंग कटवा दो मैंने केश कटवा दिए, अब मौका मिलेगा तो अपनी गरदन कटवा दूंगा।" यह तार्किक विचारशीलता भगतसिंह की है उस नए भारत में वे 1931 के पहले कह रहे थे जिसमें भारत  के गरीब आदमी, इंकलाब और आर्थिक बराबरी के लिए, समाजवाद को पाने के लिए, देश और चरित्र को बनाने के लिए, दुनिया में भारत का झंडा बुलंद करने के लिए धर्म जैसी चीज की हमको जरूरत नहीं होनी चाहिए
भगतसिंह ने शहादत दे दी, फकत इतना कहना भगतसिंह के कद को छोटा करना है जितनी उम्र में भगतसिंह कुर्बान हो गए, इससे कम उम्र में मदनलाल धींगरा और शायद करतार सिंह सराभा चले गए थे भगतसिंह ने तो स्वयं मृत्यु का वरण किया यदि वे पंजाब की असेंबली में बम नहीं फेंकते तो क्या होता? कांग्रेस के इतिहास को भगतसिंह का ऋणी होना पड़ेगा लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल और बालगंगाधर तिलक ने कांग्रेस की अगुआई की थी, भगतसिंह लाला लाजपत राय के समर्थक और अनुयायी शुरू में थे
भूगोल और इतिहास से काटकर भगतसिंह के कद को एक बियाबान में नहीं देखा जा सकता जब लाला लाजपत राय की जलियावाला बाग की घटना के दौरान लाठियों से कुचले जाने की वजह से मृत्यु हो गई तो भगतसिंह ने केवल उस बात का बदला लेने के लिए एक सांकेतिक हिंसा की और सांडर्स की हत्या हुई भगतसिंह चाहते तो जी सकते थे, यहां वहां आजादी की अलख जगा सकते थे। बहुत से क्रांतिकारी भगतसिंह के साथी जिए ही लेकिन भगतसिंह ने सोचा कि यही वक्त है जब इतिहास की सलवटों पर शहादत की इस्तरी चलाई जा सकती है जिसमें वक्त के तेवर पढ़ने का मेधा  हो, ताकत हो, वही इतिहास पुरुष होता है
भगतसिंह ने कहा था जब तक भारत के नौजवान भारत के किसान के पास नहीं जाएंगे, गांव नहीं जाएंगे, उनके साथ पसीना बहाकर काम नहीं करेंगे तब तक भारत की आजादी का कोई मुकम्मिल अर्थ नहीं होगा मैं हताश तो नहीं हूं लेकिन निराश लोगों में से हूं, भारत के 18 वर्ष के नौजवान जो वोट देने का अधिकार रखते हैं उनको राजनीति की समझ नहीं है जब अस्सी-नब्बे वर्ष के लोग सत्ता की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ सकते तो नौजवान को भारत की राजनीति से अलग करना मुनासिब नहीं है लेकिन राजनीति का मतलब कुर्सी नहीं है
हम एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश का शिकार हैं हमको यही बताया जाता है कि डॉ. अम्बेडकर ने भारत के संविधान की रचना की भारत के स्वतंत्रता संग्राम सैनिकों ने भारत के संविधान की रचना की संविधान की पोथी को बनाने वाली असेम्बली का इतिहास पढ़ें सेवानिवृत्त आई.सी.एस . अधिकारी, दीवान साहब और राय बहादुर और कई पश्चिमाभिमुख बुद्धिजीवियों ने मूल पाठ बनाया देशभक्तों ने उस पर बहस की, उस पर दस्तखत करके उसको पेश कर दिया संविधान की पोथी का अपमान नहीं होना चाहिए लेकिन जब हम रामायण, गीता, कुरान शरीफ, बाईबिल और गुरु ग्रंथ साहब पर बहस कर सकते हैं कि इनके सच्चे अर्थ क्या होने चाहिए तो हमको हिन्दुस्तान की उस पोथी की जिसकी वजह से सारा देश चल रहा है, आयतों को पढ़ने, समझने और उसके मर्म को बहस के केन्द्र में डालने का भी अधिकार मिलना चाहिए. यही भगतसिंह का रास्ता है
            बड़ी खुशनसीब रही होगी वह कोख और गर्व से चौडा हो गया होगा उस बाप का सीना जिस दिन देश की आजदी के खातिर उसका लाल फांसी चढ़ गया था। हॉं आज उसी माँ-बाप के लाल भगत सिंह का शहीद दिवस है। आज देश भगत सिंह की 81वीं शहादत वर्ष पर भावभीनी श्रद्धांजलि देने जा  रहा है, 23 मार्च 1931 को शहीदे-आज़म-भगतसिंह को राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी दे दी गयी थी। भगत सिंह का जन्‍म 28 सितंबर 1907 में एक देश भक्‍त क्रान्तिकारी परिवार में हुआ था। सही कह गया कि "शेर के घर शेर ही जन्‍म लेता है।" उनका विश्वास था कि उनकी शहादत से भारतीय जनता और उद्विग्न हो जायेगी और ऐसा उनके जिन्दा रहने से शायद ही हो पाये। इसी कारण उन्होंने मौत की सजा सुनाने के बाद भी माफ़ीनामा लिखने से साफ मना कर दिया था। पंडित राम प्रसाद "बिस्मिल"  ने अपनी आत्म-कथा में जो-जो दिशा-निर्देश दिये थे, भगतसिंह ने उनका अक्षरश: पालन किया। उन्होंने अंग्रेज सरकार को एक पत्र भी लिखा, जिसमें कहा गया था कि उन्हें अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ भारतीयों के युद्ध का प्रतीक एक युद्धबन्दी समझा जाये तथा फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाये। फाँसी के पहले ३ मार्च को अपने भाई कुलतार को भेजे एक पत्र में भगत सिंह ने लिखा था -

"उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है  

हमें यह शौक है देखें, सितम की इन्तहा क्या है

दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।

सारा जहाँ अदू सही, आओ! मुक़ाबला करें।।"




           इन जोशीली पंक्तियों से उनके शौर्य का अनुमान लगाया जा सकता है। चन्द्र शेखर "आज़ाद" से पहली मुलाकात के समय जलती हुई मोमबती पर हाथ रखकर उन्होंने कसम खायी थी कि उनकी जिन्दगी देश पर ही कुर्बान होगी और उन्होंने अपनी वह कसम पूरी कर दिखायी।
हे देश के सच्चे सपूत आपको शत-शत नमन...
जय हिंद...


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Thanks and Regards
Atul Kumar
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गुरुवार, मार्च 08, 2012

Mahila aur antarrashtriya mahila diwas

March 8th, 2012

          आज एक ऐसा अवसर है जब भारत भर में होली और विश्व में महिला दिवस मनाया जा रहा है....  होली हिरनकश्यप वध और प्रहलाद की सुरक्षा में मनाया जाता है.... और महिला दिवस महिलाओं को उनके सम्मान के लिए मनाया जाता है... महिला एक ऐसा शब्द है जिससे आज के दौर के यूँ  कहूँ की  हर  दौर के लोग परिचित रहे हैं और होते रहेंगे….तो शायद यह गलत नहीं होगा…हमने अपनी संस्कृति के अनुसार बहुत से रूपों में महिला को जाना और पहचाना है, जिसमे माँ, बहन, बेटी, बहु  और पत्नी  मुख्य  रूप  से हमे देखने को मिले हैं, लेकिन ये सारे रिश्ते पुरुषों के बिना बेईमानी लगते  हैं कुछ ऐसा समीकरण  बना हुआ है समाज का… क्या पुरुषों के बिना स्त्री का अपना कोई वजूद नहीं है क्या …?
          भारत जैसा देश, जो अपनी विशालता, लोकतांत्रिकता और सर्वधर्म सम्मान के विधान के लिए जाना जाता है, जिस देश की पहचान रिश्तों की अनूठी कहानी को बयाँ करता है, जिस देश में स्त्री को दुर्गा, सरस्वती और काली जैसी आदि शक्तियों से संबोधित किया गया है, और ये संबोधन आज से नहीं आदि से होता आ रहा है. फिर भी हम आज तक स्त्री के सही मायनो को न तो खुद समझ पाए और न ही दूसरों को समझा पाने में सफल हो पाए हैं…..कारण भारत के धर्म ठेकेदारों की दोहरी नीति…..
          हमारे देश में एक तरफ तो स्त्री को माँ, बहन, बेटी, बहु, बेटी और देवी का स्थान दिया गया है जो की हमारे वेद-पुराणों और शास्त्रों में निहित है  और दूसरी तरफ राम चरित्र मानस में  हमारे महान रचयिता तुलसीदास जी ने लिख दिया है की:
“ढोल गवांर शुद्र पशु नारी, ये सब प्रताड़ना के अधिकारी.”
क्या मतलब है इस पंक्ति का...? शायद धर्माधिकारी इस बात को किसी अन्य पहलु से लें… लेकिन इन्होने भी यहाँ पर स्त्री को ही प्रताड़ना का अधिकारी बताया है… क्यूँ …? तुलसीदास जी इतने नाराज क्यूँ है स्त्रियों पर? ये शायद पूरी तरह से भूल गए थे की इनको इस लायक बनाने का श्रेय स्त्री, इनकी पत्नी रत्ना को ही जाता है… तुलसीदास जी ने न तो बढ़ी हुई नदी की चिंता की और न ही घनघोर अँधेरी रात की…. कामातुरता तो इतनी थी की इन्हें रस्सी और सांप में भी कोई फर्क नहीं दिखा… पत्नी (स्त्री) ने ही समझाया की अगर इतनी मोहब्बत और लगन तुम भगवान से करते तो सर्वस्व पा जाते, जितनी तुम मुझसे मोहब्बत करते हो… तुलसीदास लौट पड़े चोट खाकर… शायद उसी चोट का बदला ले रहे हैं... जिसने उन्हें स्वर्ग का रास्ता बताया, जिसने उन्हें दुनिया भर में अपनी पहचान का रास्ता दिखाया. उसी को इन साहब ने प्रताड़ना के लायक और नरक का द्वार बता डाला… स्त्री की गिनती ढोल, गंवार, शुद्र, पशु, में कर रहे हैं, और साथ ही साथ यह भी कह रहे हैं की उसको पीटो…यह सब पीटने के ही लायक हैं.
हमारे देश में हर लड़की को एक ही बात बोली जाती है की बेटी सीता बनकर रहना,मै जानना चाहता हूँ की आखिर सीता बनकर ही क्यूँ? शायद उनके पति (राम) और समाज उन पर शक कर सके? क्या अग्नि परीक्षा के बाद भी इन्हें ही घर के बाहर निकाला जा सके?  क्या वन-वास के लिए ही इन्हें सृष्टि ने रचा है? क्या अग्नि परीक्षा और विरह की पीड़ा हमेशा लड़कियों (स्त्रियों) को ही झेलनी होगी...? क्या वनवास भोगने के बाद भी सीता को ही घर और राज का त्याग करना होगा…? क्या हमेशा उर्मिला को ही लक्षमण की विरहवेदना को स्वीकारना होगा? इन सारी बातों पर क्या सोचने की जरुरत नहीं है? क्या स्त्रियाँ शक नहीं कर सकती? क्या अपने को प्रमाणित करने के लिए पुरुषों को अग्नि परीक्षा नहीं देनी चाहिए? क्या त्याग करना सिर्फ स्त्रियो के ही पक्ष में है? शायद एक बात, “पति परमेश्वर होता है.” का जो सगुफा सदियों से इन्हें सिखाया जाता है वो इस बात की आज्ञा नहीं देता है स्त्रियों को.
क्या अजीब बिडम्बना है हमारे समाज की हमे स्त्रियों, को कभी अपने से आगे समझा ही नहीं है.... हमारी धारणा है की स्त्री पुरुष की संपत्ति है…! शादी से पहले माँ-बाप की और शादी में कन्या दान के बाद पति की… कन्या दान..! जैसे की स्त्री कोई वस्तु है जो दान कर दी जाये…
संपूर्ण विश्व में जब महिला दिवस का आयोजन स्त्री उत्थान के लिए गत 8 मार्च को किया जाता है, तो इस दिवस को मानाने की ललक और लोगों का रुझान देखने को मिलता है. यहाँ तक की अफगानिस्तान, इरान, इराक और पकिस्तान जैसे देशों में भी महिला दिवस का आयोजन देखने को मिलता है… बीते कुछ वर्षों में महिलायें भी अपने हक को लेकर जागरूक हुई हैं…
इसका प्रमाण हमे अफगानिस्तान में हुए मुस्लिम महिलाओं के साथ बर्बरता में देखने को मिला भी, महिलाएं भले ही नकाब/ बुर्के में सही... पर विरोध के लिए आयीं और यह नज़ारा लोगों ने भी देखा… भारत में पिछले कुछ वर्षों में यहाँ की सरकार या यूँ कहें विश्व के समस्त देशों ने महिला आरक्षण की बात पर भरपूर जोर दिया गया है… और इस के लिए देशों की समाज सेवी संस्थानों ने भी साथ में आवाज बुलंद की है... “की महिलाओं को आरक्षण मिलना ही चाहिए…” आप खुद ही सोचिये की यह कहाँ तक सही है …? मै ये जानना चाहता हूँ की आरक्षण किसको मिलता है…?
जहाँ तक मैंने जाना है की आरक्षण उनको मिलता है जो की समाज के सताए हुए हैं… जो की हमेशा से शोषित होते रहे हैं…. जब महिलाओं के लिए ये बोला गया है की महिलाएं पुरुषों के कंधे से कन्धा मिलकर चल रही हैं, और चलती रहेंगी… तो फिर किस बात के शोषित और किस बात के सताए हुए …? बात गलत है; लोग यहाँ पर ये बोलने से पीछे नहीं हटेंगे की“ महिलाओं के साथ अत्याचार तो होते रहे हैं… उनको आरक्षण मिलना ही चाहिए…” तो फिर हमारा समाज किस बात के लिए उनको अभी तक इतनी बड़ी-बड़ी उपमाओं से इंगित करता रहा है…? विशेष अधिकार सिर्फ कमजोरों को दिए जाते हैं, ताकतवरों को विशेष अधिकार की जरुरत नहीं होती है. क्यूंकि हम उनके शरीर के हिस्से से आज इस लायक बने हैं… और यह कडुवा सच है की वह हमसे ज्यादा ताकतवर हैं...
अगर हमारा समाज स्त्रियों को आरक्षण देता भी है तो मेरा ये सोचना है की “क्या आज के इस दौर में सिर्फ आरक्षण से काम चल जायेगा? क्या जब तक हमारी सोच नहीं बदलती तब तक हम इस बात को मान पाएंगे की महिलाएं हमसे ऊपर हैं, क्या हमारा मनोविज्ञान इस बात को स्वीकार कर पायेगा की पुरुष स्त्रिओं से पीछे रहें…”
अगर हम इन बातों को आत्मसात कर सकते हैं तो मुझे नहीं लगता है की आरक्षण होना चाहिए. आरक्षण से क्या हम उस प्रतिमा, उस श्रद्धा का अपमान नहीं कर रहे हैं जो कि महिलाओं को पूजनीय बनाता है…? जहाँ तक मेरा मानना है की जिस देश, प्रान्त और घर की स्त्री गर्व से नहीं रह सकती उस के आस-पास रहने वाले लोग भी गौरवान्वित नहीं हो सकते… क्यूंकि हर गौरवान्वित पुरुष का जन्म एक स्त्री से ही होता है… अब ये हमे सोचना है की हम जिसके लिए आरक्षण की मांग कर रहे हैं ये उसके लिए क्या ये आरक्षण शब्द सही है? क्या जिसने हमे जन्म दिया है वो इतनी दीन-हीन है की हम उसे आरक्षित करें… ये तो हमारे लिए बहुत बुरी और शर्म की बात है.
हम पुरुषों के पास एक क्षमता है विचार की, तर्क की और वैज्ञानिक पहलु से सोचने की, स्त्री के पास क्षमता है प्रेम की, ह्रदय की, भावना की… अतः यह कहना मुश्किल है की इनमे किसको श्रेष्ठ कहें ... पुरुष यही समझता है की वह श्रेष्ठ है और स्त्री की दीनता उसने स्वीकार कर ली है, जो कि समझ में आता है. पर स्त्रियों ने भी स्वीकार कर ली…? वे भी मन ही मन में इस बात को मानने के लिए राजी हो गयी हैं की कहीं न कहीं वे पुरुष से कुछ कम हैं...
आज अगर महिलाओं को अपने आपको प्रमाणित करना है तो उन्हें सवाल उठने ही होंगे, समाज के विरुद्ध विद्रोह करना ही होगा… साथ ही साथ ये भूलना होगा की यह हमारी बेटी है, इसे हमने जन्म दिया है, और जो दूसरे घर से आ रही है वो मेरी अपनी नहीं है…ये भेदभाव मिटाना होगा... जब तक स्त्रियों के बीच का ये भेदभाव नहीं मिटता, जब तक स्त्री-स्त्री की दुश्मन बनी रहेगी तब तक न तो ये धर्मग्रन्थ इनके हक को दिला पाएंगे, न ही आरक्षण किसी काम आयेंगा और न ही विश्व भर में चलाया जा रहा महिला  दिवस का ये कार्यक्रम किसी हद तक कारगर सिद्ध होगा… आज के इस दौर में स्त्री को यह घोषणा करनी ही होगी की हमारी पृष्ठ भूमि अलग है, हमारे पास जीवन का और बड़ा उद्देश्य है, और बड़ा संदेश है… हममे ही जीवन को आनंदित करने की क्षमता है…
नारी मुक्ति के सम्बन्ध में विश्व भर में जाग्रति की लहर अपने आप में शुभ सन्देश तो है, जिसका स्वागत है परन्तु ये पर्याप्त नहीं है.



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Atul Kumar
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सोमवार, फ़रवरी 27, 2012

प्रेम vs अहंकार



         प्रेम वैसे तो अपनी अलग ही पहचान रखता है, लेकिन पाश्चात्य सभ्यता के चलते हम भी इसे एक पर्व के रूप में मनाने लगे हैं. जिसका प्रमाण फरवरी माह में हमे देखने को मिला है.... फरवरी माह अब मुझे ऐसा लगता है की आने वाले कुछ सालों में प्रेम माह के नाम से न जाना जाने लगे.... प्रेम एक ऐसा शब्द जिसकी जिसकी न तो कोई परिभाषा है, न कोई सिद्धांत और न ही प्रेम को किसी शास्त्र में पिरोया गया है… कबीर जी ने शायद ठीक ही कहा है:
“पोथी पढ़ -पढ़  जग मुआ, पंडित भया न कोय.
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय.”

आइये प्रेम के कुछ पहलुओं से रूबरू होने की कोशिश करते हैं शायद आज-कल का जो प्रेम है वह कुछ मायनों में सही रस्ते पर आ सके:
  1. बस प्रेम एक अनुभव है, प्रेम एक रस है जो हमेशा दूसरों को तृप्त करने पर विश्वास रखता है वहीँ दूसरी तरफ अहंकार एक खालीपन है जो कभी भी पूर्ण नहीं हो पाता.
  2. अहंकार हमेशा अपने से बड़ों को प्रेम करने की कोशिश करता है, अपने से बड़ों से ही सम्बन्ध जोड़ता है . प्रेम के लिए कोई छोटा-बड़ा नहीं होता, जो आ जाये उसी से सम्बन्ध जोड़ लेता है… ऐसा होता है प्रेम.
  3. प्रेम हमेशा झुकने को राजी है, अहंकार कभी भी झुकने को राजी नहीं है . अहंकार के पास जायेंगे तो उसके हाथ और ऊपर उठ जाते हैं, ताकि हम उसे छू न पायें. क्यूंकि जिसे छू लिया जाये वह छोटा है, कुछ  इस तरह से परिभाषित करता है अहंकार अपने आपको.
  4. प्रेम जब कुछ दे पाता है तो उसे ख़ुशी मिलती है, वह खुश होता है लेकिन अहंकार जब भी कुछ ले पाता है, तभी खुश होता है… प्रेम जिसके  पास होता है वह अपने आपमें सम्राट होता है जबकि अहंकार दिन-प्रतिदिन दिन और दरिद्र हो जाता है… कुछ ऐसा अंतर होता है इन दोनों में.
  5. प्रेम जब भी किसी दूसरों के लिए छाया बनता है तो वह आनंदित होता है…. परन्तु अहंकार जब किसी से उसकी छाया को छीन लेता है तभी उसे आनंद आता है… ये नजरिया होता है प्रेम का.
  6. प्रेम निरंतर प्रतीक्षा करता है, प्रेम एक प्रतीक्षा है जबकि अहंकार महत्वकांक्षा..
  7. अहंकार एक प्रयोजन है, यदि प्रयोजन पूरा होता है तभी आना चाहता है नहीं तो नहीं… यद्यपि प्रेम निष्प्रयोजन है, प्रेम अपने में ही प्रयोजन है… उसे कोई लालसा नहीं होती.
  8. प्रेम कुछ रोकना नहीं चाहता, जो रोक ले वह प्रेम नहीं… अहंकार रोकता है. प्रेम तो बेशर्त देता है.
  9. अहंकार रुपया मांगता है, क्यूँकि रुपया शक्ति है. अहंकार शक्ति मांगता है. अहंकार पाकर भी आनंदित नहीं होता. प्रेम अपने आपको मिटा कर भी, टूटकर भी खुश होता है…
             प्रेम एक तड़प है, निराभार है जबकि अहंकार उसे पागलपन और बचकानी बातें समझता है... अंतत प्रेम दूसरों पर मिटने का नाम  है जबकि अहंकार दूसरों को मिटने का काम है, अहंकार सिर्फ लेना जानता है और प्रेम देने की भाषा है. प्रेम बटने पर आनंदित होता है, अहंकार पाकर भी खुश नहीं हो पाता. प्रेम जीवन के अंतिम क्षणों में भी नहीं भूलता, अहंकार कुछ पल भी याद नहीं रख पाता… शायद ऐसा है प्रेम और अहंकार…
             क्या हमने पूरे माह इसी प्रेम का उत्सव मनाया है? क्या हमारे प्रेम का यही मानक है...? अगर नहीं तो इतना दिखावा किस बात का...?


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Atul Kumar
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शुक्रवार, दिसंबर 23, 2011

एक मुलाकात भारतीय शरणार्थियों से.......

                   जिन्दगी भी कैसे-कैसे इम्तिहान लेती है, शायद पंजाब से आये हुए शरणार्थियों को नहीं मालूम था. अगर कोई ऐसा इन्सान होता १९८३-८४ के समय पर जो की भविष्य बता पाता तो शायद २७-२८ साल पहले अपने प्रदेश और जिले को लोग छोड़ कर ये लोग दिल्ली न आते..... और न ही अपनी जिंदगी को बचाने के लिए भविष्य को गर्त में डालते...... लेकिन कौन जनता था की अपने ही देश के किसी दूसरे कोने में अपने आपको और परिवार को सुरक्षित रखने की इतनी बड़ी सजा मिल सकती है जहाँ न तो वर्तमान सुरक्षित होगा और न ही भविष्य की कोई किरण दिख रही होगी.
               जी हाँ मै बात कर रहा हूँ पीरागाढ़ी शरणार्थी कैम्प में रह रहे लोगो की, जिन्होंने १९८३-८४ के दंगों के दौरान पंजाब प्रान्त को छोड़ा था...... लालच यह थी की अभी यहाँ से बहार निकल जाते हैं तो शायद हमारा जीवन सुरक्षित हो जायेगा और जब हालत सुधर जायेंगे तो हम वापस अपने-अपने घरों को लौट आयेंगे...... लेकिन तब से आज तक पंजाब और देश के हालत तो सुधर गए लेकिन इनकी सुध किसी ने लेने की जहमत न उठानी चाही..... और ये शरणार्थी आज भी दिल्ली के पीरागाढ़ी शरणार्थी कैम्प में रह रहे हैं.... इन्हें न तो दिल्ली सरकार ने हालत के सुधरने के बाद पंजाब भेजने का प्रयत्न किया और न ही पंजाब प्रान्त की सरकार को अपने लोगों की याद आयी....
                १८/१२/२०११ को दिल्ली के पीरागाढ़ी कैम्प में जाने का मौका मिला तो आज के आधुनिक भारत और भारत सरकार का यह चेहरा जान पाया....... इस कैम्प में लगभग ३५०० शरणार्थी परिवार जो की पंजाब से आये थे रह रहे हैं..... पहले इन्हें रहने के लिए ५ सेक्टर सरकार ने बनवाए थे और इनकी उचित सुविधाओं का ख्याल भी रखा जाता था जैसे-जैसे राजनीति बदली सरकार बदली और सरकार की नियत भी बदल गयी..... सरकार ने धीरे-धीरे इनकी सुविधाओं को बंद करना शुरू किया और आज हालत यह हैं की जहाँ पर ३५०० परिवार ५ ब्लाक में रह रहे थे अब उन्हें ३ ब्लाक में रहने की जगह दी गयी है.... ब्लाक A और B को बड़े-बड़े व्यवसाइयों की मिली भगत के चलते दिल्ली सरकार ने वहां पर शापिंग माल और पार्क बनाने का प्रोजेक्ट तैयार कर डाला है.... दिल्ली सरकार के इस रवैये पर न तो वहां का क्षेत्रीय विधायक कुछ बोलने को तैयार है और न ही विपक्ष की तरफ से इन्हें कोई संतावना मिल रही है.
               जब दिल्ली सरकार इनके निवास की व्यवस्था नहीं कर पा रही है तो इनके लिए रोजगार कहाँ से लाएगी? इन सालों के दौरान इन शरणार्थियों ने स्वरोजगार के माध्यम से अपनी जीविका चलायी है.... कुछ ने सिलाई, सब्जी बेचना, लोगो के यहाँ पर काम करना इत्यादि...... २७-२८ सालों के दौरान किसी भी शरणार्थी को न तो कोई सरकारी नौकरी मिली है और न ही सरकारी नौकरी का किसी भी तरह का आश्वासन..... इनके रहने की अगर बात करें तो नालियां पानी से बहरी हुई बजबजाती रहती हैं जल निकासी की कोई व्यवस्था नहीं है, १ फेस की लाइन पर पूरे कैम्प को बिजली मुहैय्या कराई जाती है..... इस कैम्प में नेताओं का आगमन चुनाव के समय ही होता है.... उस समय इनसे नेताओं की अपनी परम्परा के अनुसार बड़े बड़े वादे करने की रस्म को पूरा किया जाता है और चुनाव के बाद वही होता है जो की पूरे देश के साथ किया जाता है.....
               यहाँ के लोगो से बात करने पर उन्होंने बताया की हम अब वापस भी नहीं जा सकते... पंजाब की सरकार को कई बार पत्राचार करने पर भी उनका कोई जवाब नहीं आया और अब तो सब कुछ बदल भी गया होगा..... २७-२८ साल पहले वहां से यहाँ आये और फिर सब कुछ यहाँ से वहां ले जाना बहुत कठिन काम है.... और इतना भी कठिन नहीं है यदि सरकार हमे वहां पर वापस हमे भेज दे और हमारी जमीनों को हमे वापस कर दे या फिर उसके बदले हमे मुनासिब मुआवजा देदे..... अगर सरकार ऐसा नहीं कर सकती तो हमे कम से कम जो हमारी जरुरी आवश्कताएं हैं तो हमे प्रदान करे..... लेकिन सरकार यह भी करने को तैयार नहीं...... अगर हमे मालूम होता की सकरार हम लोगो के प्रति इतनी उदासीन हो जाएगी तो हम कभी भी पंजाब को छोड़ कर नहीं आते.... भले ही हम मरते या फिर मार दिए जाते..... कम से कम हालत के काबू होने के बाद भविष्य की कुछ तो संभावना रहती . आज हमने अपनी जिन्दगियाँ तो बचा ली हैं पर भविष्य पूर्ण-रूपेण अंधकारमय हो गया है.....  हमारी तो हालत ठीक वैसे ही हो गयी है जैसे की धोबी का कुत्ता....... न हम घर के रहे और न हीं घाट के.......
               जब हम भारतवासी होकर भारत में अधिकार पाने के पात्र नहीं हैं तब भारतीय सरकार विदेशी सरकारों को क्यूँ कोसती हैं? जब हम अपने लोगों की सुरक्षा और उनके जीवन-जीविका को सुरक्षित नहीं कर सकते हैं तो हम किस हक़ से विदेशी सरकार के ऊपर लांछन लगते हैं की वहां पर भारतीय सुरक्षित नहीं हैं..... ऐसे में क्या होगा लोकतंत्र का और क्या होगा भारत की जनता का......??????? यही सवाल लेकर मै वहां से निकल आया..... जवाब पाने का कोई रास्ता नहीं है और न ही जो इसका जवाब दे सकते हैं वो देना चाहते हैं......

Atul Kumar
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शनिवार, दिसंबर 03, 2011

कब तक उनके बेजांदिलों में अपनों के लिए हमदर्दी खोजते रहेंगे?


१९४७ भारत की आज़ादी के साथ-साथ भारत के दो टुकड़े.... जो की एक सियासी सोच का हिस्सा था.. एक को नाम दिया गया भारत और दूसरे को पाकिस्ता... भारत जिसका स्वरुप तैयार किया गया था सर्व धर्म सम्मान के हिसाब से, और दूसरे भाग जिसे  पाकिस्ता कहते हैं... को पूर्ण रूपेण मुस्लिम संप्रदाय के लोगों के लिए. स्वेच्छा से जो चाहे जहाँ चाहे रहने की बात को ध्यान में रखते हुए... लेकिन हिन्दू और मुस्लिम राष्ट्र होने के नाते कुछ सियासी लोगों ने अपनी सियासत के झंडे बुलंद करने के लिए स्वेच्छा की बात को दरकिनार करते हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगे करा डाले... जिससे हिन्दू बहुतायत में भारत आ गए और मुस्लिम  पाकिस्ता की ओर पलायन कर गए... भारत में तो मुस्लिमों को भारतीय सरकार ने सारी सहूलियतें देते हुए अल्पसंख्यक के रूप आरक्षण भी दे दिया.... लेकिन पाकिस्ता में शायद ऐसा कुछ भी करने की जरुरत नहीं समझी पाकिस्तानी सरकार ने... जिसका खामियाजा आज तक लगभग 64 सालों बाद तक पाकिस्तानी हिन्दू भुगत रहे हैं.... 1972 में  पाकिस्ता के बटवारे के बाद जब पूर्वी  पाकिस्ता का निर्माण हुआ जिसे बंगला देश का नाम दिया गया... बंगला देश की कहानी भी कुछ ऐसी ही है... जैसे-जैसे समय बीता और लोगों को सियासत की चाल समझ में आयी उन्होंने अपने धर्म से सम्बंधित देशों की ओर रुख करना शुरू कर दिया... १९४७ से आज तक (2010) लगभग २ लाख से ज्यादा शरणार्थियों ने भारत में आ कर पनाह ली है.... और भारत सरकार ने भी उन्हें भारतीय संविधान के अनुरूप यहाँ का नागरिक बना दिया... जिनमे पाकिस्तानी, नेपाली, तिबत्ती, और बंगलादेशी आदि हैं.... जो की भारत की संस्कृति और विशाल ह्रदय का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण है..... लेकिन एक बड़ी बिडम्बना यह रही की हमने नेपाल, तिब्बत से आये लोगों को शरणार्थी का नाम दिया तो अपने ही देश के दूसरे टुकड़े से आये लोगों को घुसपैठ की संज्ञा से नवाजा....... यह कहाँ तक जायज है?
हाल ही में पाकिस्तान से आये कुछ हिन्दू परिवारों से मेरी मुलाकत दिल्ली के पास मजनू के टीले के पास हुई.... जो देवरा बाबा के आश्रम पर रह रहे हैं...... उनसे बात करने पर पता चल की उनका वीजा ख़त्म हो गया है..... और भारतीय सरकार से हिन्दू होने की वजह से यहाँ की नागरिकता पाने की बात कर रहे हैं..... करण जो दुनिया के तानाशाह नहीं जानना चाहते..... आज़ादी के ६४ सालों के बाद भी आज पाकिस्तान में हिन्दू परिवार बधुआ मजदूरी को मजबूर है.... पाकिस्तान के सिंध प्रान्त के मुसलामानों ने आज भी वहाँ पर अपने घरों में जेल बना रखी है, जहाँ पर हिन्दुओं को रखा जाता है....  वे लोग इनसे दिन भर काम करवाते हैं और फिर शाम को इन्हें वँही उनके घर में बनी जेल में डाल दिया जाता है..... शादीशुदा औरतों को वहाँ पर सिंदूर लगाने की अनुमति वहाँ के मुसलमानों ने नहीं दी है.... घर से वे लोग हिन्दू लड़कियों को जबरदस्ती उठा ले जाते है और उनके साथ कुकृत्य करके उन्हें मुसलमान बनने पर मजबूर करते हैं इन्ही कारणों से पाकिस्तान के हिन्दू परिवार वाले अपनी बेटियों की शादी १२-१३ साल की उम्र में करने को मजबूर हैं.... और वे आपस के ही लोगों में शादी कर डालते हैं..... जो लोग स्वेच्छा से उनकी बात  मान लेते हैं उन्हें कुछ सुविधाए भी दी जाती हैं....  उन्होंने बताया की पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में अगर किसी हिन्दू के ज्यादा पैसा है तो वो लोग लूट पाट करके हिदुओं के पैसे ले लेते हैं अगर उनका बिजनेस अच्छा चाल रहा होता है तो उस पर जबरदस्ती कब्ज़ा भी कर लेते हैं....... और वहाँ का पुलिस प्रशासन भी उनकी एक नहीं सुनता....
हमारे यहाँ अगर किसी घर के घर कोई मौत होती है तो लोग दुखी होते हैं.... चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान.... किसी को भी अपनी सभ्यता और संस्कृति के अनुसार अंतिम क्रिया कर्म करने में कोई मनाही नहीं है.... लेकिन  पाकिस्तान में अगर कोई हिन्दू मरता है तो उससे हिन्दू संस्कृति के अनुसार जलाने नहीं दिया जाता, और लाश को दफ़नाने के लिए उस पर हमेशा दबाव बनाया जाता है..... शायद इन्ही वजह से आये हुए शरणार्थियों में किसी का बेटा यहाँ पर मर गया तो वो लोग बहुत खुश हुए और बोले हम कम से कम भारत में अपने बेटे को अपनी संस्कृति के अनुसार क्रिया-कर्म कर सकेंगे.....
पाकिस्तान में हिन्दू परिवारों पर हो रहे अत्याचार शायद किसी को दिखाई नहीं दे रहे हैं.... और न ही भारत सरकार, पाकिस्तानी सरकार से कोई बात करना चाहती है... इन हिन्दू परिवार को लेकर...
एक लोकतान्त्रिक और धर्म निरपेक्ष राष्ट्र होने नाते इन आये हुए हिन्दू परिवार को भारत में जगह तो मिलनी चाहिए.... लेकिन भारत भी कब तक लोगों को भारतीय नागरिकता बांटता रहेगा? कब तक पडोसी देश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार को देख कर नजरंदाज करता रहेगा? कब तक हम  पाकिस्तान से आये मुसलमानों को पनाह देते रहेंगे और उनके बेजांदिलों में अपनों के लिए हमदर्दी खोजते रहेंगे? कब तक किसी धार्मिक देश में अन्य धर्म के लोगों के खिलाफ अत्याचार होते रहेंगे? आज ६४ सालो बाद भी हम अपने ही कटे हुए हिस्से के लोगों को न्याय नहीं दिला पा रहे हैं और बात कर रहे हैं विश्व शांति की..... क्या ऐसे लोगों को जीने का कोई हक नहीं है जो किसी दूसरे धार्मिक देश में रह रहे हैं? 
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Atul Kumar
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मंगलवार, नवंबर 15, 2011

जिन्दगी की रहगुजर


               जिन्दगी की रहगुजर में जो लम्हें बीत जाते जाते हैं, वो हमेशा हमे याद बनकर सताते हैं.... और जब उन लम्हों की कहानी हमे दूसरों की जुबानी सुनने को मिलती है तो वे पल सिर्फ और सिर्फ दिल पर दस्तक देते हैं और देते हैं बीते हुए  पलों के जरिये कुछ दर्द.... शायद कुछ ऐसा ही है इन लाइनों में.... जिन्हें बीती हुई जिन्दगी का एक अनमोल हिस्सा अगर नहीं कहते हैं तो उन लम्हों की तौहीन होगी.... उनको इन पंक्तियों में समेटने की एक कोशिश.....

जिन्दगी के सफ़र के गुजरे हुए लम्हे,
हमे हर पल सताते हैं......
अब जिन्दगी मेरी थम सी गयी है,
हमे हर पल बताते हैं......
अब गुजरे हुए लम्हों की कसक,
हमे हर पल दुखते हैं....
मेरी जिन्दगी से जुड़े अब वो तमाम किस्से,
हमे अब लोग सुनते हैं.....
जिन्दगी के सफ़र के गुजरे हुए लम्हे,
हमे हर पल सताते हैं......
अब जिन्दगी मेरी थम सी गयी है,
हमे हर पल बताते हैं......


एक याद है 16 /12 /2003 की....
अतुल कुमार
09454071501, 09554468502