मंगलवार, मार्च 15, 2011

प्रकृति का मंथन..........

           आदिकालीन धर्म ने प्रकृति को ही धर्म का  मूल ग्रन्थ माना. जबकि उपरांत में प्रकट हुए लगभग सभी धर्मों और सम्प्रदायों ने, प्रकृति से हट कर, एक व्यक्ति अथवा कुछ धर्माचार्यों द्वारा प्रतिपादित वादों के ग्रंथों को ही धर्म ग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया. आदिकालीन धर्म ने माना, व्यक्ति की बौद्धिकता में भ्रम का समावेश रहता है. उसके द्वारा बनाये मत-मतांतर, निर्विवाद और निःसंदेह हमेशा नहीं हो सकते. प्रकृति के नियम संदेह से परे और निःसंदेह हैं. इसलिए प्रकृति को ही ईश्वर के द्वारा निरंतर लिखा जा रहा धर्म ग्रन्थ मानना चाहिए. प्रभु ही घट-घट वासी आत्मा के रूप में सम्पूर्ण सचराचर को प्रकट करते है. आत्मा होकर परमेश्वर ही प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के क्षणों को प्रकट करते हैं. इसलिए प्रकृति ही वह ग्रन्थ है जिसे आत्मा निरंतर लिख रहा है, और हम सब इस ग्रन्थ के अक्षर हैं.
                चूँकि प्रकृति ही मूल ग्रन्थ है, इसलिए तर्कशास्त्र एवं विचार मंथन को स्वतंत्र और व्यापक स्वरुप प्रदान किया जाना चाहिए.  वादों-विवादों, ताकों तथा प्रकृतिजन सख्यों को चिंतन की मथानियों से मथ कर ग्रन्थ की भाषाओं को पढ़ना होगा, इसलिए तर्कशास्त्र को भी धार्मिक स्वरुप प्रदान किया गया है. इश्वर को भी प्रकृति की कसौटी पर मनुष्यों के संदेह के कटघरे में खड़ा किया गया. धर्म भी तर्क और संदेह की कसौटियों से बाहर नहीं जा सका. जबकि दूसरे लगभग सभी धर्मों में तर्क करना गुनाह है, पाप है. तर्क अथवा संदेह करने वाले को नर्क की आग में जलना पड़ता है, प्रायश्चित करना पड़ता है. जबकि आदिकालीन सनातन धर्म सम्मत धर्म में तर्कशास्त्र को माना गया है. जो मनुष्य मात्र से परमेश्वर के रूप में पूजित होना चाहता है, उसे मनुष्य मात्र के संदेहों के कटघरे में भी खड़ा होना पड़ेगा. प्रकृतिजन सख्यों, तर्कों और प्रमाणों के उपरान्त ही उसे निःसंदेह रूप से ग्रहण किया जायेगा. आदिकालीन शिक्षा में धर्म को तर्कशास्त्र से जोड़ कर, एक जीवंत ग्रन्थ की कल्पना की गयी है. कागज के पन्नों पर मरे हुए अक्षरों की किताब बदल सकती है. परन्तु प्रकृति के नियम अकाट्य हैं. आदिकालीन धर्म ने प्रत्येक नई कोपल का, तर्कशास्त्र की कसौटियों पर, स्वागत किया तथा प्रत्येक सूखी हुई पत्ती को धरती पर गिर जाने दिया. सम्पूर्ण विश्व में धर्म और शिक्षा का यह स्वरुप अतीत तो क्या वर्तमान में भी देखने को नहीं आता है.
                 ऋग्वेद से लेकर महाभारत तथा श्रीमद्भागवतगीता तक अध्यात्म के इस विश्वविद्यालय ने, कोई ऐसी बात नहीं कही, जिसे उसने विश्वव्यापी तर्क और प्रमाणों के साथ सिद्ध न किया हो........ सत्य और धर्म को लेकर भी आदिकालीन धर्म की अपनी अलग एवं स्पष्ट मान्यताएं रही हैं. हमने जानना चाहा की सत्य क्या है? उत्तर मिला, "प्रकृति से बिलोया हुआ अमृत ही सत्य है. जब हमने इस बात को स्पष्ट रूप में जानना चाह तो, ऐसे में ऋग्वेद में भी यही मिला की "जब भी सत्य रूपी दही को बिलोया गया तो ऋतु रूपी मक्खन के कण प्रकट हुए. ऋतु रूपी मक्खन के इन कणों को, मक्खन के गोलों में परिणित किया, तो ऋचाएं बनी. मक्खन के गोलों को जिस पात्र में रखा गया, उस पात्र का नाम ऋग्वेद हुआ तथा मक्खन को भोगने वाला दृष्टा, ऋषि कहलाये.
             ऋक, ऋत तथा ऋग इन तीनों का अर्थ एक ही है. प्रश्न उठा, वह कौन सा दही था, जो बिलोया गया जिससे ऋत रूपी मक्खन प्रकट हुए? पुनः ऋग्वेद में जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश की गयी तो उत्तर मिलता है की, "सत्य आदि ऋषि है, ऋत आदि देव हैं."
              रहस्य खुल गए, ऋषि कहते हैं साधक को तथा देव कहते हैं साध्य को. एक सत्य साधक है जो सत्य है. एक सत्य साध्य है जो ऋत है. साधक प्रकृति है. जीव है. साध्य आत्मा है. अतः सत्य जो साधक है, वह प्रकृति स्वरुप है, इसलिए प्रकृति सा परिवर्तनीय है. इन दोनों का समागम ही सचराचर की लीला है. आत्मा और प्रकृति का ही मिलन जीवंत सचराचर है.
                प्रकृति और पुरुष के मिलन से शून्य में, क्षीरसागर में, ग्रह- नक्षत्र और ब्रह्माण्ड प्रकट होने लगे. वे परिक्रमाओं को प्राप्त हुए. संवत-सर जीवंत हुए. दिन और रात प्रकट हो गए. धरती प्रकट हुई! ऋत ने मोहा सत्य को. वे प्रणय सूत्र में बढ़ाते चले गए. पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, मनुष्य, प्रणयलीला द्वारा प्रकट होने लगे, प्रकट होते रहे हैं, प्रकट हो रहे है, और प्रकट होते रहेंगे........ प्रकृति कभी भी अपनी चल को रोकेगी नहीं............

गुरुवार, मार्च 10, 2011

Dharm Granthon ki Padhai Par Rok kyun?

                    आप पानी का बर्तन कब भरते है? जब वह खाली होता है.... भरे बर्तन में कोई भी व्यक्ति पानी नहीं भर पाता. साधना के उन्नत संस्कार भी खाली पड़े बर्तन में ही भरे जा सकते हैं. कोमल बाल्यावस्था में, आरंभिक शिक्षा के साथ ही परिपक्व मानसिकता हेतु, साधना को शिक्षा के क्रम में लेने से पुष्ट चरित्र के नागरिकों की कल्पना को साकार किया जा सकता है.
                   दुर्भाग्य से आरंभिक शिक्षा में, इस देश के बहुसंख्यकों को अथवा यूँ कहें कि मूल निवासियों को, पाठ्यक्रम में किसी भी प्रकार के धर्म ग्रंथ पढ़ाने की सख्त मनाही है. जबकि अल्पसंख्यक सम्प्रदायों को अपने स्कूलों में "बाइबिल" और "कुरान" आदि पढ़ाने का स्वतः अधिकार प्राप्त है. एक उच्च परिपक्व मानसिकता, विश्वव्यापी मानसिक स्तर, जो धार्मिक संकीर्णताओं से रहित है, उसे भी पढाने का हमे अधिकार, आरम्भिक कक्षाओं में नहीं है.
                  इसी के कारण राष्ट्र के नागरिक के चरित्र का अत्यधिक अवमूल्यन हो रहा है. परिपक्व मानसिकता के साथ ही प्रजातंत्र की कल्पना सार्थक हो सकती है. अपरिपक्व मानसिकता वाला व्यक्ति कभी भी मानवीय मूल्यों को तिलांजली देकर, पशुवत अथवा पिशाच की भांति आचरण कर सकता है. ऐसे व्यक्तियों के समूहों के साथ प्रजातंत्र अर्थहीन हो जाता है......

रविवार, मार्च 06, 2011

कथाएं एवं ग्रन्थ

                     दासता के लम्बे अंतरालों में लुप्त हो भारत-भारती, एक अँधेरे युग से लम्बे काल तक गुजरती रही है. उस समय जिन विदेशी धर्मों का प्रभाव आया, उनमें धर्म का स्वरुप इतिहास तक ही सीमित था. ईसाईयत, ईसा के ऐतिहासिक काल से ही आरम्भ होती थी , इस्लाम भी एक ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि से उभरता हुआ धर्म था. ऐतिहासिकता को ही धर्म धरम मानने की मानसिकताओं ने यहाँ पर भी; अतीत के संत, ऋषि तथा सूक्ष्म दृष्टा, मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक उप्लब्धियों को केवल ऐतिहासिकता की दूरबीन से ही देखना आरम्भ कर दिया. इसी कारण भ्रमों का विस्तार होता चला गया. जो आज भी यथावत है. भारत को आदि संस्कृति ने धर्म ग्रन्थ के रूप में किसी पुस्तक को अकेले सम्मानित नहीं किया है. भारतीय संस्कृति तथा धर्म ने अतीत युग में, प्रकृति को ही धर्म का मूल ग्रन्थ माना है. एक ऐसा ग्रन्थ जिसे परमेश्वर ने स्वयं आत्मा के रूप में प्रगट होकर लिख रहा है. प्रकृति ही मूल ग्रन्थ है, तथा हम सब इस ग्रन्थ के अक्षर हैं. चारों वेद, ब्रह्मण, आरण्यक ग्रन्थ न्याय शास्त्र तथा पुराण आदि अध्यात्म  रुपी  विश्व विद्यालय  की  पाठ्य पुस्तकें  हैं. उपनिषद इन्ही पाठ्य पुस्तकों की संक्षिप्त टिप्पणियां हैं. सभी प्रकार के लीला  ग्रन्थ,  वेद  रुपी पुस्तकों का सरल एवं सरस, उदाहरणों सहित एवं  उद्वरणों  से युक्त,  स्पष्टीकरण हैं.  इस  प्रकार  लीला ग्रन्थ से लेकर वेद तक, धर्म का मूल पाठ नहीं है वरण धर्म का मूल पाठ जो प्रकृति है, उसको स्पष्ट करने वाला विश्वविद्यालय है. इसीलिए संस्थागत शिक्षा से पूर्व  सामाजिक, सामूहिक एवं परिपक्व शिक्षा को अतीत के युग में शिक्षा का ही उपक्रम माना गया.
                    बालक जिस अमृतमय ज्ञान को संस्थागत शिक्षा में पाने हेतु गुरुकुल में प्रवेश करेगा, उसी शिक्षा का सरल एवं सरस, स्पष्टीकरणों से युक्त ज्ञान को, वह राम और कृष्ण की लीलाओं में भागवत की कथाओं में तथा पौराणिक कथाओं में ग्रहण करता हुआ, संस्थागत शिक्षा की परिपक्व मानसिकता को शिक्षा से पूर्व ही प्राप्त कर लेता था. आधुनिक युग में बुढ़ापे तक उसे अस्मिता का परिचय नहीं होता है. अतीत की शिक्षा कथाओं और लीलाओं के माध्यम से अस्मिता का निःसंदेह परिचय प्रदान करके ही, समाज उसे संस्थागत शिक्षा की ओर भेजता था. अतीत के युग में संस्थागत शिक्षा में भी इन्ही कथाओं और मनोविज्ञान को सरल एवं सरस रूप में ग्रहण करता था.
                  इस प्रकार सभी कथाएं एवं ग्रन्थ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का प्रत्येक क्षण बनाते रहे हैं.........

सोमवार, फ़रवरी 14, 2011

Sainik Badugt Banaam GARIBI

                 अतीत के युगों में जंगली आदमखोर जातियां भी हुआ करती थी. आदमखोर जंगली उतने ही आदमियों को मारता था, जितने से उसका पेट भर जाता था. आधुनिक सभ्य समाज के बड़े समझदार लोग, आदमी मार कर नहीं खाते हैं. फिर भी उन्होंने एटम बम बना रखे हैं कि सारी पृथ्वी को १८ से २० बार नष्ट कर सकें. हम एक बार में  पृथ्वी को १ बार तो मानव विहीन कर देंगे पर पृथ्वी को १९ बार मानव विहीन करने के लिए कौन आएगा? यदि जंगली जाहिल भी होते तो वह भी हैरान होते कि जब ये खाते नहीं तो मारने के  लिए हथियार क्यूँ बटोरते हैं?
             सभी राष्ट्रों का डिफेन्स बजट लगभग २५ प्रतिशत या अधिक होता है. जबकि सारी दुनिया में गरीबी की रेखा के नीचे भी इतने ही प्रतिशत लोग हैं. हमे प्रकृति ने और परमेश्वर ने गरीब नहीं बनाया है. हम गरीब हुए हैं अपरिपक्व मानसिकता की राहों पर जाकर, अपने ही मिथ्याभिमान के कारण. एटम बम और दूसरे हथियार, उन गरीब लोगो की भूख है जिनके साथ यह बम बना कर अन्याय किया गया. यदि हम केवल अमेरिका के ही डिफेन्स बजट को समाप्त कर दें तो सारी धरती पर संभवतः कोई भी व्यक्ति गरीबी की रेखा के नीचे नहीं होगा. साधारण लोगों का शोषण करने वाले लोग, उन्हें गरीबी की रेखा के नीचे रहने और घुट-घुट कर रहने को मजबूर करने वाले लोग, कदापि सम्मान के योग्य नहीं हो सकते हैं. बौद्धिक दिवालियापन का मारा होगा वह जो ऐसे लोगों को सम्मानित करे. क्या यह सच नहीं है कि विश्व में उन्ही लोगों का सबसे बड़ा सम्मान है, जिन्होंने सारे विश्व का शोषण कर एटम के दाँत बनाये हैं? एटमी दांतों को अपने मुंह में लगाने वाले लोग ही विश्व शांति की बात करते हैं. इतना स्पष्ट उदाहरण और कहाँ मिलेगा? यदि गली का गुंडा अपने घर में हथियारों का ज़खीरा इकट्ठा करने लगे तो मोहल्ले के सारे लोग दौड़ कर थाने जायेंगे और उसके खिलाफ रिपोर्ट लिखाएंगे. आश्चर्य है की दुनिया में एटम बम का सबसे बड़ा जखीरा रखने वालों को बहुत सम्मान देते हैं. आखिर ऐसा कब तक चलेगा? कब तक हम इन फरेबियों के पीछे के पिछलग्गू बन कर लगे  रहेंगे? आखिर कब तक.........

शनिवार, फ़रवरी 12, 2011

shiksha v/s Education

             किसी भी राष्ट्र के लिए शिक्षा ही उसका भूत, वर्तमान और भविष्य होती है. नागरिक का चरित्र, राष्ट्र भक्ति, सुव्यवस्थित समाज तथा सुख एवं समृद्धि की मजबूत रीढ़ की हड्डी राष्ट्रीय शिक्षा ही होती है. आदि काल से आधुनिक समय तक शिक्षा ने अपने कई रूप बदले हैं. एक शिक्षा पद्धति  को  आदिकाल से सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टा, ऋषि, संत और मनीषी जन दे गए थे. एक शिक्षा जो लार्ड मैकाले ने गुलाम हिन्दुस्तान को दी थी, तथा एक शिक्षा जो हमारी सरकार ने हमे दी है. इसके साथ ही ६३ वर्षों से चली आ रही इस वर्तमान शिक्षा को मै स्पष्ट करना चाहूँगा.
            प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक राष्ट्र भाषा होती है. राष्ट्र भाषा से विहीन कोई भी राष्ट्र सम्मान नहीं पाता. गुलामी की जूठन को लादने वाला राष्ट्र कभी भी स्वतंत्र राष्ट्र नहीं माना जा सकता. वर्तमान शिक्षा हमारे राष्ट्र को राष्ट्रीय भाषा तक नहीं दे पाई है. पिछले ६३ वर्षों में राष्ट्र ने राष्ट्र भाषा के स्तर पर पराजय तो ली है और राष्ट्र भक्ति के स्तर पर भी हम बहुत बुरी तरह से पराजित हुए हैं. हमने चारित्रिक दृष्टि  से भी पिछले ६३ वर्षों में बहुत कुछ खोया है. सामाजिक दृष्टि से भी पिछले ६३ वर्ष में सामाजिक विघटन, विसंगतियों तथा बिखराव के होकर रह गए हैं. जिस देश के पास शिक्षा की दृष्टी नहीं है वह राष्ट्र अन्धे  ध्रतराष्ट्र की तरह है जो अपने ही वंश का तथा अपने ही राष्ट्र का समूल विनाश करवा बैठता है.
            आज की शिक्षा की जो व्यापक देन है वह है, "अच्छी नौकरी, बढ़िया तनख्वाह और मोटी घूस." मै यही प्रश्न पूछना चाहूँगा कि, "आप अपने बच्चे को क्यूँ पढ़ा रहे हैं?" इसलिए न! अच्छी नौकरी मिले, जहाँ तनख्वाह के साथ कुछ और भी व्यापक रूप से मिले, तो मेरा बेटा समाज में अच्छी प्रतिष्ठा, सुख और ऐश्वर्य पाए. क्या यह सच नहीं है? यदि यह सच है तो आज प्रतिष्ठा की कसौटी मोटी घूस ही तो है.
              सद्चरित्रता, सच्चाई और ईमानदारी मात्र हमारे चेहरे का मुखौटा बन कर रह गए हैं. मुखौटा भी ऐसा जो पूरी तरह से सड़ गया है. मुखौटा भी ऐसा जो जगह-जगह से उखड गया है, और उससे हमारा असली चेहरा बाहर झाँकने लगा है.
               मै आर्मी का मेजर हूँ, डाक्टर या इंजीनियर हूँ. इस देश का नेता, मंत्री या प्रधानमंत्री हूँ, जो कुछ हूँ मै हूँ, मै आपसे पूछना चाहता हूँ की आपने मुझे क्यूँ पढाया? प्राइमरी स्कूल के अध्यापक, विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर शिक्षा मंत्री तक मुझे क्यूँ पढ़ाते रहे? मेरे माता-पिता मुझे किस इच्छा से पढ़ाते रहे हैं? यदि पूरी ईमानदारी से हम इन प्रश्नों के उत्तर दें तो आधुनिक शिक्षा के उपरोक्त उद्देश्य हमारे सामने नंगे होकर नाचने लगेंगे. अतः कथित मुखौटे लगा कर हम स्वयं को ही तो अँधा बना रहे है?
                मै और मेरा स्वरुप आधुनिक शिक्षा में कहीं पर भी नहीं है. ऐसी शिक्षा जो मुझे मेरा स्वरुप भी न दिखा सके, मै स्वयं स्व अनभिज्ञ और अँधा रहूँ, ऐसी शिक्षा का क्या प्रयोजन? आज की शिक्षा हम सबको अपने प्रति अँधा ध्रतराष्ट्र ही तो बनती है. समाज में व्याप्त कुरीतियों की जड़ में वर्तमान की शिक्षा ही है. दहेज़ प्रथा में दोष है अथवा वर्तमान शिक्षा में प्रकट हुई हमारी भ्रमित मानसिकता के लिए दोषी है? प्रत्येक लड़की का पिता अपनी लड़की के लिए ऐसा पति चाहता है जिसकी तनख्वाह थोडा कम हो पर उपर की मोटी कमाई जरुर हो. अर्थात एक भ्रष्ट, राष्ट्रद्रोही तथा चरित्रहीन दामाद के दाम सबसे ऊपर हैं. दामादों की भीड़ में उसका सबसे अधिक महत्त्व है. लड़के का पिता भी चाहता है कि जब समाज बेईमान दामाद ही ढूंढ़ रहा है तो मेरी औलाद सबसे ज्यादा बेईमान हो तथा घूस के सबसे बड़े पद पर आसीन हो. आप ही बताइए जो रोज़मर्रा की जिंदगी में प्रत्येक व्यक्ति से घूस लेकर काम करता है, यदि वह अपने ससुर से दहेज़ नहीं लेगा, तो उसके अपने चरित्र पर धब्बा न लगेगा? हम प्रथा को गाली देते  हैं. मूल समस्या और वर्त्तमान शिक्षा प्रणाली के रूप में कुछ भी नहीं सोचना चाहते, आखिर क्यूँ?
                 आधुनिक शिक्षा कि उपलब्धियों का दूसरा उदाहरण हमारी भारतीय संसद है. भारत के संसद के सभी भारतीय सांसदों ने एक मत स्वीकारा है कि वे आंतरिक ईमानदारी, आत्मिक सच्चाई से शुन्य हैं. उनमें आधार भूत सच्चाई और इमानदारी की कमी है. इसलिए दल-बदलुआ कानून बनाया जाये. वर्तमान लोकसभा ने ही भारत के माथे पर कलंक का सबसे काला धब्बा, दल-बदलुआ कानून बना कर, भारत माता के माथे पर लगाया है, इस कानून की हमें क्या जरुरत थी? इसलिए न कि हमारे सारे सांसद कभी भी बेईमान और भष्ट हो सकते है? वे पैसे और पद के लिए टमाटर और आलू जैसी सब्जियों कि तरह बिक सकते हैं. उनमे चरित्र नाम कि कोई चीज नहीं है, इसलिए दल-बदलुआ कानून का पलस्तर उनकी टूटी हुई नैतिकता रूपी रीढ़ की हड्डी पर स्थाई रूप से चिपका दिया जाये? वे इतने भ्रष्ट क्यूँ हैं?
               आदि भारती युग में प्रचलित शिक्षा प्रणाली को समझने के लिए आदि भारत और भारती के स्वरुप को स्पष्ट कर लेना बहुत जरुरी है. हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि सैकड़ों साल की लम्बी गुलामी के अंतरालों में, स्मृति रूप में, गुलामी की भ्रमित छायाओं को ही, हमारे मस्तिष्क ने भर रखा है. गुलामी के अंतरालों के भ्रमित ज्ञान को ही हमने अतीत के ज्ञान के रूप में तथा पहचान के रूप में बटोर रखा है. हमें भारत-भारती के विशुद्ध रूप को जानने के लिए हमें गुलामी के अंतरालों को पार करके उस अतीत को टटोलना होगा जो विशुद्ध रूप से भारत-भारती का मौलिक स्वरुप था.
              आदि कालीन शिक्षा में शिक्षा की कल्पना सुदूर जंगल में वास करते ऋषि के साथ की गयी थी. ऋषि के ही आश्रम में गुरुकुल व्यवस्था रहती थी. जहाँ बालक शिक्षा पाने जाते थे. राजा से लेकर साधारण नागरिक तक के बालक समान भाव से गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने हेतु जाते थे. शिक्षा का एक छत्र अधिकार वन में रहते हुए तपस्वी को दिया गया था. ऐसा क्यूँ?
                 शायद! शिक्षा कोमल मस्तिष्क पर निर्णायक प्रभाव डालती है, इसलिए शिक्षा का पूरा अधिकार ऐसे व्यक्ति को मिलना चाहिए जो किसी पक्ष से जुड़ा अथवा आसक्त न हो, किसी प्रकार की परिस्थितियों में लिप्त न हो तथा उसमें किसी प्रकार के पूर्वाग्रह न हों. ऐसे व्यक्ति की कल्पना में भारत-भारती ने आदि काल में, शिक्षा का सम्पूर्ण, व्यापक तथा स्वतंत्र अधिकार, वन में वास करते हुए सन्यासी को प्रदान किया था. भविष्य में भी शिक्षाविद एक निष्पक्ष न्यायाधीश ही रहे, ऐसा विचार करके व्यवस्थाओं ने सन्यासी को सभी प्रकार के सामाजिक कृत्यों अलग कर दिया था. सन्यासी को अधिकार था कि गुरुकुल में छात्रों को सभी प्रकार के ज्ञान-विज्ञान, शिल्प, धनुर्विद्या, ज्योतिष, अध्यात्मिक, राजनीति तथा सभी प्रकार की नीति ज्ञान की शिक्षा प्रदान करे. सन्यासी को मात्र शिक्षित करने का अधिकार था परन्तु व्यावहारिक रूप से कर सकने की सामर्थ्य उन्हें प्रदान नहीं की गयी थी. जैसे वह ज्योतिष पढ़ा सकता था पर ज्योतिषी नहीं बन सकता था.
           वर्तमान शिक्षा में विश्वविद्यालय की शिक्षा में पाठ्यक्रम को सभी स्तरों पर सचिवालय के बाबू बनाते हैं ३-४ प्रकार के अर्थात सूक्ष्म पाठ्यक्रम को बनाकर वह अपने विभाग के बड़े बाबू को प्रेषित करते हैं. विभाग का बड़ा बाबू थोड़ी हेरा-फेरी करके बड़े आई० ए० एस० अफसर को भेज देता है. अफसर उनमें से किसी एक पर हस्ताक्षर की चिड़िया बिठा देता है. इसके उपरांत आठवां या दसवां फेल मंत्री अपने हस्ताक्षर जमा देता है, इस प्रकार आगामी वर्ष का पाठ्यक्रम नियत हो जाता है. इसी पाठ्यक्रम को विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पीठ पर सामान लादे गधे की भांति वर्ष भर ढोते रहते हैं और छात्रों पर लाद देते हैं. अतीत और वर्तमान शिक्षा का बहुत बड़ा भेद है.
             आदिकालीन शिक्षा का उद्देश्य भौतिक भटकाव न होकर छात्र को ही केन्द्र बिन्दु माना गया था. पर आज.......................

शुक्रवार, फ़रवरी 04, 2011

Sanskar ka asar.........

                 संस्कार शब्द के मेरा तात्पर्य आचरण तथा व्यवहार के द्वारा ग्रहण किये गए सूक्ष्म स्वाभाव से है. गुलाब में गुलाब कि गंध ही गुलाब का संस्कार है. ठीक उसी प्रकार अगले जन्म का ज्ञानरूपी गुलाब नहीं जाता, परन्तु संस्कार रूप में गुलाब कि गंध अर्थात ज्ञान द्वारा अर्जित सूक्ष्म स्वाभाव अवश्य जाता है. कल्पना करें कि एक व्यक्ति सड़क पर चला जा रहा है, ठोकर लगने से वह गिर जाता पड़ता है, उसके मुंह से पहला शब्द क्या निकलेगा? जो उसका सूक्ष्म अर्जित संस्कार है, वही बाहर आएगा. धार्मिक संस्कार वाले व्यक्ति के मुंह से हे भगवान! हे राम! या हे अल्लाह! निकलेगा. दूषित संस्कार वाले व्यक्ति के मुंह से "अबे" के साथ कोई भद्दी गाली स्वतः प्रकट हो जाएगी. दूसरा उदाहरण देना चाहूँगा, शराब पीने वाले व्यक्तियों के विभिन्न आचरण, विभिन्न संस्कारों के रूप में प्रकट होने लगते हैं. शराब पी कर कवि कविता करने लगता है, चित्रकार चित्र बनाने लगता है. गन्दा व्यक्ति अपने संस्कार के अनुरूप सड़क पर खड़ा होकर, गन्दी गालियाँ देने लगता है, तथा भद्दा आचरण करने लगता है.
                शराब में न तो गाली थी, न ही कविता और न ही एक चित्रकार की क्षमता . इसी प्रकार परिस्थितियां जब अनायास किसी के सामने आती हैं तो उसकी पहली प्रतिक्रिया उसके सूक्ष्म अर्जित संस्कार का स्वरुप होती हैं. भले ही दूषित संस्कार वाला व्यक्ति सावधानी के समय में कुछ अच्छे व्यक्तित्व का प्रदर्शन क्यों न करे, विषम परिस्थितियों में अनायास, संस्कार घटनावश सामने आ ही जाते हैं. मै इसी संस्कार कि बात कर रहा हूँ. जो हमे अपनी विषम परिस्थितियों में सत्य रूप से सहज ही अपने आप से सामने आ जाते हैं. संस्कार शब्द से मेरा यही तात्पर्य है.

Humara Mud Aur Switch Dusre ke haath me?????

            अक्सर हम लोग बात करते है की अगला व्यक्ति बड़ा ही बोर है और उसने मेरा मूड ऑफ़ कर दिया, या मुझे  कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है. इस प्रकार की बातें रोजमर्रा की जिंदगी में बराबर सुनने में आती हैं. एक घटना मेरे साथ भी ऐसी ही घटी मुझसे मिलने आये एक मित्र ने मुझसे बोला कि यार मै कल ही आ गया होता परन्तु क्या बताउं फला व्यक्ति ने मेरा मूड ऑफ़ कर दिया, जिसके करण मै कल आ नहीं पाया.
            मुझे लगा कि वह व्यक्ति बड़ा ही बुद्धिमान है, जिसने तुम्हारा मूड ऑफ़ कर दिया. उसे पता था कि तुम्हारे मूड का बटन कहाँ लगा है? जिससे उसने तुम्हारे मूड का बटन ऑफ़ कर दिया. आश्चर्य लगता है कि हमे हमारे मूड का बटन नहीं मिला जिससे कि हम उसे ऑन कर सकते. कितनी बचकानी बात है कि लोग हमारे मूड का बटन ऑफ़ कर देते हैं और हमे उसे ऑन करना नहीं आता. इस अपरिपक्व मानसिकता का प्रदर्शन बड़े-बड़े ज्ञानीजनो से भी मैंने सुना है.
            मुझे लगता है कि साधना ही इस अपरिपक्व मानसिकता का एक मात्र उपाय है जिससे हम अपनी मानसिकता पर पूर्ण एवं परिपक्व नियंत्रण पा सकते हैं. साधना के द्वारा हमारे मूड का बटन हमारे द्वारा ही नियंत्रित होता है. उसे कोई बाहर वाला व्यक्ति ऑफ़ या ऑन नहीं कर सकता.