शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

Shraddha se ki mohabbat

           जिन्दगी एक पहेली है ऐसा सुन रखा था पर आज उस पहेली में उलझने का मौका मिल ही गया. न चाहते हुए भी पता नहीं क्यूँ लगातार उलझने की कोशिशें बढती जा रही थी...... उलझन सिर्फ इतनी की जिन्दगी ने किसी को अपने साथ अपना हमसफ़र बना कर रहने की ख्वाहिश पाल ली..... क्या ये ख्वाहिश गलत थी? जब मेरे दोस्त जिसे मै आपना ही नाम दे रहा हूँ.... अतुल ने मुझसे पूछा तो मै कुछ भी बता पाने में असमर्थ था..... अतुल ने जब मुझसे पुछा तो मै कुछ भी बता या समझ पाने में बिलकुल असहाय था.... उसका सवाल शायद सही था.... या गलत? मै नहीं समझ पाया....कहानी कुछ यूँ है की अतुल एक संसथान में परियोजना सहायक के रूप में कार्यरत था..... उसी दौरान एक परियोजना पर उसे कार्य करने का मौका मिला उसकी जिन्दगी में सब कुछ ठीक चल रहा था और परियोजना भी.... उस परियोजना में एक लड़की भी प्रतिभागी के रूप में आई थी. शांत स्वभाव, सबसे अलग दिखने वाला चेहरा और आम लड़कियों की तरह उछल कूद न मचाने वाली उसकी आदत ने उसे अलग पहचान दे रखी थी.... उसके घर वालों ने क्या सोच कर उसका नाम रखा था? पूर्ण-रूपेण अपने नाम को सार्थक करती थी वोह लड़की........ जिसका नाम श्रद्धा (काल्पनिक नाम) था.... पूरी तरह से अतुल के दिलो-दिमाग पर छा चुकी थी.... लेकिन अतुल उससे कुछ कह पता की उससे पहले ही परियोजना का समापन हो गया...  और प्रतिभागी अपने-अपने घरों को वापस लौट गये....
           समय बीतता गया और समय के साथ वो सपना भी धूमिल हो चुका था... लेकिन अतुल को क्या मालूम था की जिन्दगी उससे मजाक करने के लिए उस सपने को दुबारा उसके सामने लेकर आ जाएगी..... दूसरी परियोजना के लिए आये हुए प्रतिभागियों में वह लड़की श्रद्धा भी शामिल थी.... एक फिल्म के सिलसिले में अतुल और उसके दो दोस्तों को श्रद्धा के गाँव जाना पड़ा.... उस समय श्रद्धा के साथ उसकी सहेली निशा भी थी.....शूटिंग को लेकर सब बहुत खुश थे... होते भी क्यूँ न ये उनकी डिप्लोमा फिल्म जो थी..... सबने दिन भर जी तोड़ मेहनत करके काम किया... दोपहर का खाना श्रद्धा के ही घर हुआ.... शाम को काम खत्म करके जब वे लोग वापस लौटने लगे तो उसकी सहेली ने ये बोल कर मना कर दिया की उसे कल कुछ काम है... और वो आज नहीं आ पायेगी.... खैर वो सब वापस आ रहे थे... पर श्रद्धा बहुत ही परेशान दिख रही थी.... सबने उसे बहुत हँसाने की कोशिश की पर वो हँसी नहीं... खैर जैसे तैसे सफ़र ख़त्म हुआ और वो लो वापस कैम्पस आ चुके थे... दिन भर की चिलचिलाती धूप में काम करने और रस्ते में कोल्ड ड्रिंक पीने से उसके गला लगातार जकड़ता जा रहा था.... जिसे देख कर अतुल बहुत परेशान हो उठा था.... और रास्ते में रुक कर उसने श्रद्धा के लिए दवा ले ली थी.... वापस आने के साथ ही श्रद्धा की आँखों में आंसू को देख कर अतुल बहुत परेशान हो उठा था.... उसने पुछा तो वो बोली की घर वालों की याद आ गयी थी बस और कुछ नहीं.... रात में खाना खाने के बाद सब अपने-अपने रूम को चले गये.. पर उसे कहाँ सुकून मिलने वाला था... सपने को इतने करीब से देख पाने के लिए अतुल ने कभी सोचा भी न था ... और आज जब वो अतुल के इतने करीब थी तो उसकी आँखों में आंसू कैसे बर्दास्त कर पता... उसने रात में श्रद्धा को फोन किया और दवा खा लेने के लिए बोला..... उसकी इच्छाओं को मानते हुए उसने दवा खा भी लिया....  उन दोनों की बाते चलती रही और एक दिन अतुल ने अपने दिल की बात को श्रद्धा के सामने रख ही दिया पर श्रद्धा ने अतुल को कोई जवाब नहीं दिया.... उसी दौरान श्रद्धा की सहेली निशा भी आ गयी... आज वो बहुत खुश थी....दोनों ने खूब ढेर सारी बातें  की और शायद अतुल की भी बात हुई उन दोनों की बातों में..... अतुल जिसे निशा भाई मानती थी.... पर उसने भी सहेली का ही साथ दिया.... और आखिर ५ दिनों के इन्तजार के बाद उसे जवाब मिल ही गया....जिस जवाब की अतुल ने कल्पना पहले से ही कर रखी थी... अतुल ये सोच रहा था की यदि श्रद्धा ने हाँ कर भी दी तो क्या वो अपने प्यार को कभी अपना भी पायेगा या नही? कारण था की श्रद्धा की छोटी बहने जो अबी अभी पढाई ही कर रही थी.. अगर श्रद्धा ने शादी के लिए हाँ कर दिया तो क्या उसके घर वाले इस बात को मन जायेंगे? क्या समाज उसके परिवार वालों को सुकून से जीने देगा? लेकिन फिर भी अतुल ने अपने दिल की बात बोल ही दिया था.....दिल पर किसका जोर चलता है. शायद यही हुआ था अतुल के साथ.
              श्रद्धा का जवाब था की वो अतुल से प्यार नहीं कर सकती. कारण वही थे जो अतुल के दिल को पहले से झकझोर रहे थे... फिर भी अतुल ने अपने जज्बातों को, अपनी भावनाओं को दांव पर लगा कर श्रद्धा से प्यार किया था.... श्रद्धा के मना करने के बाद उन दोनों की दोस्ती न टूटे इस डर से अतुल ने एक झूठ बोला श्रद्धा से की वो उसे मुर्ख बना रहा था.... पर श्रद्धा को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा था... फिर भी अतुल के कहने पर उसने विश्वास कर लिया... अतुल आज भी उससे बेपनाह मोहब्बत करता है...... शायद ये बात श्रद्धा अच्छी तरह से समझती है.... लेकिन दोनों एक दुसरे को दोस्त ही मानते हैं...... मुझे लगता है की अतुल ये भूल गया था की श्रद्धा दिल में रहती है... श्रद्धा भावनाओं में बसती है...... श्रद्धा होती तो अतुलनीय है पर श्रद्धा अतुल की नहीं हो पाई.... शायद श्रद्धा को पाना अतुल की किस्मत में नहीं था...... मै ये सोच रहा हूँ की ऊपर वाला फिर ऐसे लोगों से मिलवाता ही क्यूँ है जब वो मिल नहीं सकते...एक दूसरे के हो नहीं सकते?

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

पर्दा प्रथा और महिला सशक्तिकरण

             महिला और पर्दा दोनों का रिश्ता बहुत पुराना है. या यूँ कहूँ की दोनों एक दुसरे के पूरक हैं तो शायद समाज  या समाज के ठेकेदार बहुत खुश होंगे.... उनकी नजर में पर्दा आवरण है, मर्यादा है, शालीनता है...... लेकिन पर्दा करने वाली से क्या कभी उसकी राय जानी गयी? आज का समाज आयु, शिक्षा और जाति वर्ग में बँटा हुआ है. युवा और शिक्षित समाज इसे बेकार की चीज मानता है....... लेकिन बड़े और बुजुर्ग इसे जरुरी मानते हैं......अस्मिता की बाग-डोर को नाम दिया गया है "पर्दा".... लोग कहते हैं की समय आने पर होता है इसका एहसास.... भारतीय समाज में बेटी-बहु में अंतर को दर्शाता है पर्दा..... या यूँ कहूँ की घूँघट जो एक आवरण है, जो निर्धारित करती है मर्यादा को.....
              आज जब हम २२वीं सदी में और आजादी के ६३वें वर्ष में हैं, जब महिलाओं को पुरुषों के साथ, समाज के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर चलने की अनुमति दी गयी है तो फिर उन्हें परदे से बहार क्यूँ नहीं निकलने दिया जा रहा है? क्यूँ आर्थिक कठिनाईयों से जूझते हुए सामाजिक कुरीतियों और विषमताओं को तोड़ना महिलाओं के लिए आज भी नामुमकिन है? महिलाओं में अदम्य क्षमता और मानसिक परिपक्वता के बावजूद इन्हें परदे में रहने के लिए विवश कर दिया जाता है.... यह कहाँ तक सही है? राजाराम मोहन राय से लेकर स्वामी दयानंद सरस्वती तक की कोशिश के कारण शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से लेकर सती प्रथा तक की समाप्ति तक खुली हवा में रहने और साँस लेने वाली नारी भले ही  बाल विवाह, सती प्रथा और देवदासी का जीवन जीने से बच गयी हो लेकिन घर और समाज की चाहरदीवारी को लाँघ कर अपने लिए सम्मानित जीवन जीने की कल्पना करने वाली नारी को जीवन भर तनाव और घुटन के साथ जीवन यापन करना होता है.......
                मल्टी नेशनल कंपनियों में बड़े पदों पर बैठी हुई महिलाएं हो या फिर खेत-खलिहानों में फसल काटने, बोझा ढोने वाले मजदूर या फिर जेठ की चिलचिलाती धुप में सड़क के किनारे गोद में मासूम बच्चे को बांधे हुए पत्थर तोडती हुई महिला ! जिन्हें सहानभूति और दया तो मिलती है लेकिन समाज आज भी उनके द्वारा लिए गए फैसले के प्रति करुण नहीं है...........
                 पर्दा प्रथा के लिए कुछ इतिहासकारों का कहना है की भारत में हिन्दुओं में पर्दा प्रथा इस्लाम की देन है और कुछ का मानना है की पर्दा प्रथा भारतीय समाज में बहुत पहले से है. पर्दा बड़ों के प्रति सम्मान को प्रदर्शित करने का एक जरिया है. कारण कोई भी हो परदे में तो रहना पड़ता है महिलाओं को ही. जिन्हें अपनी ख़ुशी को मार कर, हालातों से समझौता करके........ बंद रहना होता है परदे में.......
                हमने विकास तो बहुत कर लिया है लेकिन इस विकास का सच कुछ और ही है. विश्वस्तरीय सर्वेक्षण की माने तो ज्यादातर अमेरिकी चेहरा ढकने वाले पर्दा पर प्रतिबन्ध के खिलाफ हैं बावजूद इसके सिर्फ २८ प्रतिशत अमेरिकियों ने पर्दा प्रथा प्रतिबन्ध का समर्थन किया है.....फ़्रांस में ८२, जर्मनी में ७१, ब्रिटेन में ६२ और स्पेन में ५९% लोग ही पर्दा प्रथा प्रतिबन्ध पर समर्थन दे रहे हैं......
              क्या हमारा विवेक पर्दा प्रथा को इतना ज्यादा जरुरी करार देता है...... क्या यही है मानव समाज की विकासशीलता? क्या पर्दा प्रथा विकास के लिए इतनी ज्यादा जरुरी है? कहाँ तक हुए हम विकसित ये सवाल है समाज और समाज के ठेकेदारों के लिए????????

रविवार, अप्रैल 10, 2011

ज़ीरो अर्थात शून्य या यूँ कहे गोल (0) तो क्या ये गलत होगा? क्या हमने कभी सोचा है की शून्य कितना बड़ा है, जिसे हम कुछ नहीं समझते. अगर कभी किसी छात्र के किसी भी विषय में ०/५० अंक होते है तो हम कहते हैं की इसे कुछ नहीं आता,क्यूँ? जब की हम सभी जानते हैं कि किसी भी कार्य की शुरूआती गणना हमेशा शून्य से ही होती है. फिर उस छात्र को क्यूँ इस नज़रिए से देखा जाता है की वह सबसे निरीह प्राणी है इस समाज का? गणितीय विधि से देखा जाये तो शून्य शेष सभी अंको पर भरी पड़ता है चाहे वह गुणा करना हो या फिर किसी से भाग देने की, बड़े से बड़े अंक को अपने बराबर लाने की ताकत होती है इस छोटे से गोले में जिसे हम कहते हैं शून्य. ऐसा क्या है इस छोटे से गोले में जो सबको कर देता है गोल अर्थात शून्य? हम बात करे सूर्य की, पृथ्वी की, चंद्रमा की, तारों की या फिर इन सबको देखने और इनका आभास करने वाली आँख का ये सभी है गोल, वृत्ताकार या यूँ कहें शून्य........ क्या यह गलत है? जब हम जानते है की समस्त सृष्टि ही गोल है, तो हम ०/५० को हीन भावना से क्यूं देखते हैं? क्या हम अपने आपको धोखा नहीं दे रहे है? क्या यह ० उस ५० तक पहुँचने की शुरुआत नहीं है? क्या ५० पहले आ जाएगा और ० बाद में आएगा? क्या शून्य का कोई महत्त्व नहीं है? शून्य से दो बातें मेरी समझ में आती हैं पहली की शून्य अनन्त है, दूसरी यह जो आम जन मानस की धारणा है की शून्य का कोई मतलब नहीं?
              यहाँ पर आम जन मानस की धारणा होगी की क्या पागल आदमी है..... बात शून्य की कर रहा है और उदहारण दे रहा है एक छात्र/छात्रा का जिससे इसको पढ़ कर उसका भविष्य बर्बाद हो जायेगा क्या ये भी उसी ०/५० में ही शामिल है? मै बताना चाहता हूं की ऐसा बिलकुल नहीं है.... मै सिर्फ इतना बताना चाहता हूं की आज हम जिस दौर में जी रहे हैं उस दौर को जरुरत है किसी भी मामले को जमीनी स्तर से देखने की और जो शुरू होगी शून्य से ही..... फैसला आपका होगा की आपका नजरिया क्या होता है?....

मंगलवार, अप्रैल 05, 2011

Eunuch.......

किन्नर! एक ऐसा शब्द जिसे सुनते ही ख्याल आता है कि अब तो हो गयी कहानी, और हमारी भेट भी हो ही जाती है जिंदगी के किसी न किसी मोड़ पर इनसे. कोई भी ख़ुशी का माहौल हो ख़ुशी बाँटने आ ही जाते है ये किन्नर..... हमने कभी सोचा है कि क्या है इनकी जिंदगी? शायद नहीं..... बचपन कि एक कविता "यदि होता किन्नर नरेश मै राज महल में रहता, सोने का सिंहासन होता सर पर मुकुट चमकता....... बंदी जन गुण गाते रहते दरवाजे पर मेरे...... बहुत अच्छी लगती थी जिसमे कविवर महोदय ने सब कुछ दे दिया था किन्नर को या यूँ कहूँ कि सारी सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण होते थे किन्नर...... लेकिन ये गुजरे ज़माने कि बात थी.... और शायद किन्नर का मतलब भी कुछ और रहा हो..... पर आज हम देखें तो किन्नर जिंदगी का वह पहलू है जो न तो पुरुषों कि श्रेणी में आता है और जिसे न ही स्त्री कि संज्ञा दी जा सकती है...........
             प्रकृति ने, भगवान या अल्लाह ने, विज्ञान कि भाषा में बोलूं तो एस्ट्रोजन और तेस्तास्तरोन हार्मोन्स कि कमी से ऐसा होता है..... मै उन कारणों में नहीं उलझना चाहता.....कारण कोई भी हो ख़ुशी और गम को तो वह भी महसूस करते हैं........ दिल उनके पास भी होता है...... उनमे भी होती हैं ख्वाहिशें....... लेकिन लिंग निर्धारण या यूँ कहूँ कि कुदरत कि मार, मार देती है उनके ख़ुशी गम और ख्वाहिशों को....
             कुदरत के इस अभिशाप के बाद भी वह करते हैं हमारे लिए दुआएं.... अपनी ख्वाहिशें मर जाने के बाद भी वह करते हैं प्रार्थना हमारी ख्वाहिशें पूरी होने कि.... लेकिन सवाल यह है कि हमने उनके लिए क्या सोचा??? सिर्फ चंद  पल का मनोरंजन..... या उनकी इस दशा को किसी जन्म के बुरे कर्मों का फल...... इससे आगे हम सोच भी नहीं सकते.... कारण इतना है कि वह होते है कुदरत कि मार के मारे हुए..... और आ जाते हैं हमारी हर एक ख़ुशी में खुशियाँ बाँटने..... दुआएं मांगने वह भी बिना हमारे बुलाये......
          वैसे भी भारत जैसे संस्कृति प्रधान देश में बोला जाता है कि " बिना बुलाये भगवान के भी घर आना और जाना नहीं चाहिए." शायद यही वह कारण हो जिसकी वजह से हम उन्हें हीन भावना कि नज़र से देखते हैं. हम ये क्यूँ नहीं सोचते कि वह भी इंसान ही हैं...... क्यूँ हम भूल जाते हैं लिंग भेद के चक्कर में इंसानियत को जो हमारी पहचान है...... क्यूँ देखते हैं हम इन्हें हेय दृष्टि से जब इनके पास भी दिल और ज़ज्बात है..... इनके लिए क्या कर रहे हैं हम और हमारी सरकार, क्या कर रहीं हैं हमारी समाज सेवी संस्थाएं? जब खुश और समाज में इज्जत के साथ रहना इनकी भी है ख्वाहिश....... जब ये भी हमारे साथ समाज के लिए, देश के लिए तैयार हैं कंधे से कन्धा मिलाकर चलने के लिए ......

मंगलवार, मार्च 15, 2011

प्रकृति का मंथन..........

           आदिकालीन धर्म ने प्रकृति को ही धर्म का  मूल ग्रन्थ माना. जबकि उपरांत में प्रकट हुए लगभग सभी धर्मों और सम्प्रदायों ने, प्रकृति से हट कर, एक व्यक्ति अथवा कुछ धर्माचार्यों द्वारा प्रतिपादित वादों के ग्रंथों को ही धर्म ग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया. आदिकालीन धर्म ने माना, व्यक्ति की बौद्धिकता में भ्रम का समावेश रहता है. उसके द्वारा बनाये मत-मतांतर, निर्विवाद और निःसंदेह हमेशा नहीं हो सकते. प्रकृति के नियम संदेह से परे और निःसंदेह हैं. इसलिए प्रकृति को ही ईश्वर के द्वारा निरंतर लिखा जा रहा धर्म ग्रन्थ मानना चाहिए. प्रभु ही घट-घट वासी आत्मा के रूप में सम्पूर्ण सचराचर को प्रकट करते है. आत्मा होकर परमेश्वर ही प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के क्षणों को प्रकट करते हैं. इसलिए प्रकृति ही वह ग्रन्थ है जिसे आत्मा निरंतर लिख रहा है, और हम सब इस ग्रन्थ के अक्षर हैं.
                चूँकि प्रकृति ही मूल ग्रन्थ है, इसलिए तर्कशास्त्र एवं विचार मंथन को स्वतंत्र और व्यापक स्वरुप प्रदान किया जाना चाहिए.  वादों-विवादों, ताकों तथा प्रकृतिजन सख्यों को चिंतन की मथानियों से मथ कर ग्रन्थ की भाषाओं को पढ़ना होगा, इसलिए तर्कशास्त्र को भी धार्मिक स्वरुप प्रदान किया गया है. इश्वर को भी प्रकृति की कसौटी पर मनुष्यों के संदेह के कटघरे में खड़ा किया गया. धर्म भी तर्क और संदेह की कसौटियों से बाहर नहीं जा सका. जबकि दूसरे लगभग सभी धर्मों में तर्क करना गुनाह है, पाप है. तर्क अथवा संदेह करने वाले को नर्क की आग में जलना पड़ता है, प्रायश्चित करना पड़ता है. जबकि आदिकालीन सनातन धर्म सम्मत धर्म में तर्कशास्त्र को माना गया है. जो मनुष्य मात्र से परमेश्वर के रूप में पूजित होना चाहता है, उसे मनुष्य मात्र के संदेहों के कटघरे में भी खड़ा होना पड़ेगा. प्रकृतिजन सख्यों, तर्कों और प्रमाणों के उपरान्त ही उसे निःसंदेह रूप से ग्रहण किया जायेगा. आदिकालीन शिक्षा में धर्म को तर्कशास्त्र से जोड़ कर, एक जीवंत ग्रन्थ की कल्पना की गयी है. कागज के पन्नों पर मरे हुए अक्षरों की किताब बदल सकती है. परन्तु प्रकृति के नियम अकाट्य हैं. आदिकालीन धर्म ने प्रत्येक नई कोपल का, तर्कशास्त्र की कसौटियों पर, स्वागत किया तथा प्रत्येक सूखी हुई पत्ती को धरती पर गिर जाने दिया. सम्पूर्ण विश्व में धर्म और शिक्षा का यह स्वरुप अतीत तो क्या वर्तमान में भी देखने को नहीं आता है.
                 ऋग्वेद से लेकर महाभारत तथा श्रीमद्भागवतगीता तक अध्यात्म के इस विश्वविद्यालय ने, कोई ऐसी बात नहीं कही, जिसे उसने विश्वव्यापी तर्क और प्रमाणों के साथ सिद्ध न किया हो........ सत्य और धर्म को लेकर भी आदिकालीन धर्म की अपनी अलग एवं स्पष्ट मान्यताएं रही हैं. हमने जानना चाहा की सत्य क्या है? उत्तर मिला, "प्रकृति से बिलोया हुआ अमृत ही सत्य है. जब हमने इस बात को स्पष्ट रूप में जानना चाह तो, ऐसे में ऋग्वेद में भी यही मिला की "जब भी सत्य रूपी दही को बिलोया गया तो ऋतु रूपी मक्खन के कण प्रकट हुए. ऋतु रूपी मक्खन के इन कणों को, मक्खन के गोलों में परिणित किया, तो ऋचाएं बनी. मक्खन के गोलों को जिस पात्र में रखा गया, उस पात्र का नाम ऋग्वेद हुआ तथा मक्खन को भोगने वाला दृष्टा, ऋषि कहलाये.
             ऋक, ऋत तथा ऋग इन तीनों का अर्थ एक ही है. प्रश्न उठा, वह कौन सा दही था, जो बिलोया गया जिससे ऋत रूपी मक्खन प्रकट हुए? पुनः ऋग्वेद में जिज्ञासा को शांत करने की कोशिश की गयी तो उत्तर मिलता है की, "सत्य आदि ऋषि है, ऋत आदि देव हैं."
              रहस्य खुल गए, ऋषि कहते हैं साधक को तथा देव कहते हैं साध्य को. एक सत्य साधक है जो सत्य है. एक सत्य साध्य है जो ऋत है. साधक प्रकृति है. जीव है. साध्य आत्मा है. अतः सत्य जो साधक है, वह प्रकृति स्वरुप है, इसलिए प्रकृति सा परिवर्तनीय है. इन दोनों का समागम ही सचराचर की लीला है. आत्मा और प्रकृति का ही मिलन जीवंत सचराचर है.
                प्रकृति और पुरुष के मिलन से शून्य में, क्षीरसागर में, ग्रह- नक्षत्र और ब्रह्माण्ड प्रकट होने लगे. वे परिक्रमाओं को प्राप्त हुए. संवत-सर जीवंत हुए. दिन और रात प्रकट हो गए. धरती प्रकट हुई! ऋत ने मोहा सत्य को. वे प्रणय सूत्र में बढ़ाते चले गए. पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, मनुष्य, प्रणयलीला द्वारा प्रकट होने लगे, प्रकट होते रहे हैं, प्रकट हो रहे है, और प्रकट होते रहेंगे........ प्रकृति कभी भी अपनी चल को रोकेगी नहीं............

गुरुवार, मार्च 10, 2011

Dharm Granthon ki Padhai Par Rok kyun?

                    आप पानी का बर्तन कब भरते है? जब वह खाली होता है.... भरे बर्तन में कोई भी व्यक्ति पानी नहीं भर पाता. साधना के उन्नत संस्कार भी खाली पड़े बर्तन में ही भरे जा सकते हैं. कोमल बाल्यावस्था में, आरंभिक शिक्षा के साथ ही परिपक्व मानसिकता हेतु, साधना को शिक्षा के क्रम में लेने से पुष्ट चरित्र के नागरिकों की कल्पना को साकार किया जा सकता है.
                   दुर्भाग्य से आरंभिक शिक्षा में, इस देश के बहुसंख्यकों को अथवा यूँ कहें कि मूल निवासियों को, पाठ्यक्रम में किसी भी प्रकार के धर्म ग्रंथ पढ़ाने की सख्त मनाही है. जबकि अल्पसंख्यक सम्प्रदायों को अपने स्कूलों में "बाइबिल" और "कुरान" आदि पढ़ाने का स्वतः अधिकार प्राप्त है. एक उच्च परिपक्व मानसिकता, विश्वव्यापी मानसिक स्तर, जो धार्मिक संकीर्णताओं से रहित है, उसे भी पढाने का हमे अधिकार, आरम्भिक कक्षाओं में नहीं है.
                  इसी के कारण राष्ट्र के नागरिक के चरित्र का अत्यधिक अवमूल्यन हो रहा है. परिपक्व मानसिकता के साथ ही प्रजातंत्र की कल्पना सार्थक हो सकती है. अपरिपक्व मानसिकता वाला व्यक्ति कभी भी मानवीय मूल्यों को तिलांजली देकर, पशुवत अथवा पिशाच की भांति आचरण कर सकता है. ऐसे व्यक्तियों के समूहों के साथ प्रजातंत्र अर्थहीन हो जाता है......

रविवार, मार्च 06, 2011

कथाएं एवं ग्रन्थ

                     दासता के लम्बे अंतरालों में लुप्त हो भारत-भारती, एक अँधेरे युग से लम्बे काल तक गुजरती रही है. उस समय जिन विदेशी धर्मों का प्रभाव आया, उनमें धर्म का स्वरुप इतिहास तक ही सीमित था. ईसाईयत, ईसा के ऐतिहासिक काल से ही आरम्भ होती थी , इस्लाम भी एक ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि से उभरता हुआ धर्म था. ऐतिहासिकता को ही धर्म धरम मानने की मानसिकताओं ने यहाँ पर भी; अतीत के संत, ऋषि तथा सूक्ष्म दृष्टा, मनोवैज्ञानिक एवं वैज्ञानिक उप्लब्धियों को केवल ऐतिहासिकता की दूरबीन से ही देखना आरम्भ कर दिया. इसी कारण भ्रमों का विस्तार होता चला गया. जो आज भी यथावत है. भारत को आदि संस्कृति ने धर्म ग्रन्थ के रूप में किसी पुस्तक को अकेले सम्मानित नहीं किया है. भारतीय संस्कृति तथा धर्म ने अतीत युग में, प्रकृति को ही धर्म का मूल ग्रन्थ माना है. एक ऐसा ग्रन्थ जिसे परमेश्वर ने स्वयं आत्मा के रूप में प्रगट होकर लिख रहा है. प्रकृति ही मूल ग्रन्थ है, तथा हम सब इस ग्रन्थ के अक्षर हैं. चारों वेद, ब्रह्मण, आरण्यक ग्रन्थ न्याय शास्त्र तथा पुराण आदि अध्यात्म  रुपी  विश्व विद्यालय  की  पाठ्य पुस्तकें  हैं. उपनिषद इन्ही पाठ्य पुस्तकों की संक्षिप्त टिप्पणियां हैं. सभी प्रकार के लीला  ग्रन्थ,  वेद  रुपी पुस्तकों का सरल एवं सरस, उदाहरणों सहित एवं  उद्वरणों  से युक्त,  स्पष्टीकरण हैं.  इस  प्रकार  लीला ग्रन्थ से लेकर वेद तक, धर्म का मूल पाठ नहीं है वरण धर्म का मूल पाठ जो प्रकृति है, उसको स्पष्ट करने वाला विश्वविद्यालय है. इसीलिए संस्थागत शिक्षा से पूर्व  सामाजिक, सामूहिक एवं परिपक्व शिक्षा को अतीत के युग में शिक्षा का ही उपक्रम माना गया.
                    बालक जिस अमृतमय ज्ञान को संस्थागत शिक्षा में पाने हेतु गुरुकुल में प्रवेश करेगा, उसी शिक्षा का सरल एवं सरस, स्पष्टीकरणों से युक्त ज्ञान को, वह राम और कृष्ण की लीलाओं में भागवत की कथाओं में तथा पौराणिक कथाओं में ग्रहण करता हुआ, संस्थागत शिक्षा की परिपक्व मानसिकता को शिक्षा से पूर्व ही प्राप्त कर लेता था. आधुनिक युग में बुढ़ापे तक उसे अस्मिता का परिचय नहीं होता है. अतीत की शिक्षा कथाओं और लीलाओं के माध्यम से अस्मिता का निःसंदेह परिचय प्रदान करके ही, समाज उसे संस्थागत शिक्षा की ओर भेजता था. अतीत के युग में संस्थागत शिक्षा में भी इन्ही कथाओं और मनोविज्ञान को सरल एवं सरस रूप में ग्रहण करता था.
                  इस प्रकार सभी कथाएं एवं ग्रन्थ प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का प्रत्येक क्षण बनाते रहे हैं.........