मंगलवार, मई 12, 2026
सिस्टम हुआ 'लीक' और युवाओं की निकली चीख; आखिर कब तक बिकेगा भविष्य?
ारत में परीक्षा अब केवल योग्यता का पैमाना नहीं, बल्कि अनिश्चितता का दूसरा नाम बन चुकी है। साल 2024 में नीट (NEET) के महा-घोटाले ने पूरे देश को झकझोर दिया था, लेकिन उम्मीद थी कि शायद हुक्मरानों की नींद खुलेगी। मगर 2026 की पुनरावृत्ति ने यह सिद्ध कर दिया है कि सत्ता के गलियारों में संवेदनशीलता का अकाल पड़ा है।
पेपर लीक अब कोई छिटपुट घटना नहीं, बल्कि हज़ारों करोड़ों का संगठित उद्योग बन चुका है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि 2024 में पटना के लर्न बॉयज हॉस्टल से लेकर गुजरात के गोधरा और हरियाणा के झज्जर तक भ्रष्टाचार के जो तार जुड़े थे, वे आज भी पूरी तरह नहीं काटे जा सके हैं। पिछले पांच वर्षों में 50 से अधिक बड़ी परीक्षाएं रद्द हुई हैं, जिससे लगभग 2 करोड़ से अधिक छात्र प्रभावित हुए। परीक्षा फॉर्म की फीस के नाम पर सरकारें जो राजस्व इकट्ठा करती हैं, उसका एक अंश भी फुल-प्रूफ तकनीकी सुरक्षा पर खर्च नहीं करतीं। यह युवाओं से लिया गया वह वित्तीय बोझ है जिससे सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार का तंत्र फल-फूल रहा है।
सरकारी उपक्रमों और बिचौलियों की सांठ-गांठ यह प्रमाणित करती है कि यह केवल घरेलू प्रशासनिक विफलता नहीं है, बल्कि इससे भारत की वैश्विक छवि को भी धूमिल किया जा रहा है। एक समय था जब भारत को ग्लोबल टैलेंट हब कहा जाता था, लेकिन नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी संस्थाओं की लापरवाही और गिरती साख ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय छात्रों की डिग्रियों और योग्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि हमारी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं ही संदेह के घेरे में रहेंगी, तो क्या विदेशी विश्वविद्यालय और कंपनियां भारतीय प्रतिभाओं पर वैसा ही भरोसा कर पाएंगी? सरकार खुद अपने हाथों से अपने 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' को 'डेमोग्राफिक डिजास्टर' में बदल रही है। इसकी ताज़ा और शर्मनाक बानगी 3 मई 2026 को हुई परीक्षा है, जिसे पेपर लीक की भेंट चढ़ने के कारण रद्द कर दिया गया। अब लाखों अभ्यर्थियों को फिर से उसी मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना से गुजरते हुए पुनः परीक्षा देनी होगी। सवाल है कि क्या छात्र की मेहनत की कोई कीमत नहीं है?
पिछले 10-12 वर्षों में सरकारी मशीनरी द्वारा कार्यवाहियों का एक तय पैटर्न सुनिश्चित कर लिया गया है, जिसमें किसी प्रिंटिंग प्रेस के मामूली कर्मचारी या छोटे दलाल को गिरफ्तार कर हेडलाइन बना दी जाती है। असली खिलाड़ी सेफ ज़ोन में सुरक्षित रहते हुए अगले लीक की तैयारी में लग जाते हैं। सवाल यह है कि क्या बिना इनसाइडर मदद के किसी सुरक्षित सर्वर या स्ट्रॉन्ग रूम से पेपर बाहर आना संभव है? जब तक नीति निर्माताओं और उच्चाधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेगा। 2024 का 'एंटी-पेपर लीक कानून' केवल कागजों पर सजावटी वस्तु बनकर रह गया है, जिसका प्रमाण 2026 की ये घटना है।
तथाकथित 'रामराज' के दावों के बीच नौजवान खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। सालों की तपस्या जब एक लीक की भेंट चढ़ जाती है, तो केवल एक पेपर नहीं जलता, बल्कि एक गरीब परिवार की उम्मीदें जलती हैं और जलता है नव युवकों सुरक्षित और सुनहरा भविष्य। ऐसे में क्या भारत का भविष्य इतना सस्ता हो गया है कि उसे चंद रुपयों के लिए नीलाम कर दिया जाए? सत्ता के लोभी और दलाल क्या जानें इस मेहनत रूपी तपस्या को! क्या सत्ता में बैठे लोगों को उन आंसुओं की कीमत पता है जो एक छात्र रिजल्ट के बजाय परीक्षा रद्द होने की खबर पढ़कर बहाता है?
अगर सरकारें ठोस उपाय करने और सकारात्मक कदम उठाने में नाकाम हैं, तो उन्हें कुर्सी पर बने रहने का नैतिक अधिकार भी नहीं है। जब व्यवस्था बहरी हो जाए, तो आवाज बुलंद करनी पड़ती है। यदि सरकारें युवाओं के भविष्य को ठंडे बस्ते में डाल रही हैं, तो युवाओं को भी ऐसी सरकारों को इतिहास के बस्ते में डालने पर विचार करना होगा। निकलना होगा उन्हें उस संकीर्ण तालाब से जहाँ सिर्फ वैचारिक कीचड़ है। नौजवानों को यह समझना होगा कि सिर्फ पाँच किलो राशन उनकी जिंदगी का मकसद नहीं है और न ही किसी के कहने पर बार-बार लाइन में लगना उनका काम। लोकतंत्र में उखाड़ फेंकने की ताकत केवल नारों में नहीं, बल्कि सही समय पर सही सवाल पूछने और वोट की चोट में होती है। यह लड़ाई अब सिर्फ एक नौकरी की नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और राष्ट्र की गरिमा की है।
#अतुल_कुमार_श्रीवास्तव
#Atul_Kumar_Srivastava
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बेहतरीन विष्लेषण 👌👍
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